Shrimad Bhagavat Mahapuran Kavya - श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य

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श्री मद्भागवतमहापुराण की सम्पूर्ण कथा, भक्ति-रस और दर्शन को काव्यबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास- जहाँ हर श्लोक भाव बनकर, हर कथा कविता बन जाती है। A poetic journey through the SrimadBhagavatMahapuran blending devotion, philosophy, and divine emotion.

जय श्रीकृष्णा  🙏स्कंध 1 • अध्याय 12श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य (कविता रूप में)महाराज परीक्षित का जन्म(भगवद्-कृपा से रक्ष...
07/13/2026

जय श्रीकृष्णा 🙏
स्कंध 1 • अध्याय 12
श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य (कविता रूप में)

महाराज परीक्षित का जन्म

(भगवद्-कृपा से रक्षित जीवन और धर्मराज का उत्तराधिकारी)

शान्त हुआ था रण का कोलाहल, थम चुका था रक्त–प्रवाह,
धर्म पुनः सिंहासन पर बैठा, मिटने लगा अधर्म–प्रवाह।
किन्तु अभी भी पाण्डव–वंश का एक दीप था गर्भ–निवास,
जिसको लेकर धड़क रहा था समूचे कुल का विश्वास।

उत्तरा के पावन उर में वह जीवन–अंकुर पलता था,
अभिमन्यु की अमर विरासत बन भविष्य स्वयं चलता था।
जिसे बचाया स्वयं मुकुन्द ने ब्रह्मास्त्रों की ज्वाला से,
वह अंकुर अब विकसित होना था हरि–कृपा की छाया से।

समय पूर्ण जब हुआ प्रसव का, शुभ नक्षत्र आकाश चढ़े,
मंगल–घोष हुए गृह–गृह में, वेद–स्वर अम्बर पर चढ़े।
जन्म लिया उस तेजस्वी ने, जिसका जीवन ईश्वर–दान,
देख प्रसन्न हुए पाण्डव सब, पुलकित हुआ समस्त जहान।

धर्मराज के नयनों से तब आनन्दाश्रु झरने लगे,
भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव हर्ष–सुमन बरसाने लगे।
कुंती ने नवजात शिशु को भरकर हृदय लगाया प्रेम,
मानो टूटा हुआ कुल–दीपक फिर पा गया दिव्य नेम।

विप्र बुलाए गए सभी तब, ज्योतिष–वेत्ता, वेद–विदग्ध,
जिनके ज्ञान–दीप से आलोकित होता था जीवन–पथ।
शान्ति–यज्ञ, स्वस्तिवाचन, मंगल–सूक्तों का हुआ उच्चार,
धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पों से महका सारा राज–द्वार।

गायें, स्वर्ण, रत्न, वस्त्र, भूमि—दान हुए विप्रों के हाथ,
धर्मराज ने खोल दिए थे दान–धर्म के सारे पथ।
यज्ञ–धूम में उठती लगती हरि–कृपा की शुभ सुवास,
मानो स्वयं प्रसन्न खड़े हों यज्ञ–पुरुष भगवान विशेष।

विप्रों ने नवजात शिशु का ललाट निहारा ध्यान धर,
तेज–पुञ्ज वह साधारण न था, था हरि–कृपा का साकार स्वर।
बोले—"राजन्! सुनिए सावन-सी मधुर हमारी वाणी आज,
यह बालक होगा कुल–दीपक, धर्म–पथ का दिव्य समाज।

इक्ष्वाकु–सा सत्यनिष्ठ होगा, राम समान मर्यादा–धाम,
शिबि–सम अर्पण में अग्रणी, भरत–सा होगा धर्म–प्राण।
अर्जुन–सा होगा धनुर्धर यह, सिंह–समान प्रचण्ड पराक्रम,
हिमगिरि–सा धैर्य धरेगा, सागर–सा होगा उदार मन।

प्रह्लाद–सम निष्कपट भक्ति होगी इसके निर्मल उर में,
बलि–सा सत्य निभाएगा यह संकट के भीषण क्षण में।
पृथ्वी–माता–सा क्षमाशील, ब्रह्मा–सा होगा विवेक,
शंकर–सम वैराग्य धरेगा, धर्म रहेगा इसका टेक।

प्रजा इसे निज पिता कहेगी, यह सबको पुत्र समान रखेगा,
दीन, अनाथ, निराश जनों का जीवन–दीप स्वयं बन रहेगा।
राजसिंहासन इसके कारण पुण्य–पीठ बन जाएगा,
जहाँ न्याय और धर्म साथ हों, वैसा युग फिर आएगा।

किन्तु सुनो राजन्! कालचक्र अपना विधान निभाएगा,
एक दिवस यह बालक भी मृत्यु–पथ को अपनाएगा।
ऋषि–पुत्र के शाप–वचन से सात दिवस का होगा काल,
तब यह त्यागेगा राज–वैभव, खोजेगा जीवन का सवाल।

गंगा–तीर विराजेगा तब यह त्याग सभी अभिमान,
शुकदेव मुनि से श्रवण करेगा भागवत–अमृत महान।
सात दिवस में हरि–कथा का ऐसा होगा दिव्य प्रभाव,
मृत्यु बनेगी मोक्ष–द्वार, मिट जाएगा भव–अभिशाप।

विप्र–वचन सुन धर्मराज का हर्ष हुआ फिर क्षणभर मौन,
आनन्द और विषाद मिले थे एक साथ उस पावन क्षण।
सोचा—"जिस जीवन का रक्षक स्वयं जनार्दन भगवान,
उसका प्रत्येक श्वास बनेगा अवश्य जगत का कल्याण।"

तब बालक ने खोले नयन, देखा चारों ओर जहान,
मानो खोज रहा हो फिर से वही दिव्य करुणामय भगवान।
जिस रूप ने गर्भ–अंधकार में दी थी जीवन को पहचान,
उस छवि की खोज में ठहर–ठहर निहार रहा था वह जहान।

इस कारण विद्वानों ने उसका नाम रखा **"परीक्षित"**,
जो प्रत्येक मुख, प्रत्येक हृदय में खोजे हरि का शुभ चित्र।
जिसने गर्भ में देखा हरि को, जन्म पश्चात् भी खोजे वही,
हर प्राणी में, हर रूप में, हर श्वास में पहचान वही।

नाम हुआ जब "परीक्षित", गूँजा मंगल–घोष अपार,
देवों ने भी पुष्प बरसाए, गाया गंधर्वों ने सत्कार।
भाग्य जागा कुरुवंश का, फिर धर्म–दीप प्रज्वलित हुआ,
हरि–कृपा से रक्षित जीवन मानवता का पथिक हुआ।

हे प्रभु! ऐसा भाव हमें दो, जग में तेरा रूप निहारें,
प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक कण में तेरे चरणों को सँवारें।
जैसे परीक्षित ने जीवन भर खोजा केवल तेरा धाम,
वैसे ही हर श्वास हमारी जपे निरंतर तेरा नाम।

जय हो श्रीमद्भागवत–माता, जय शुक–वाणी अमृत–धार,
जय उस बालक की निष्कपटता, जिसने खोजा हरि–आधार।
जो श्रद्धा से यह कथा सुने, उसके अंतर यह विश्वास—
जिसकी रक्षा स्वयं हरि करें, उसका जीवन बने प्रकाश ॥
जय श्रीकृष्णा 🙏

#श्रीमद्भागवत_महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराणस्कंध 1 • अध्याय 11 का संक्षिप्त सारांशहस्तिनापुर से विदा लेकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय नगरी द्वा...
07/04/2026

श्रीमद्भागवत महापुराण
स्कंध 1 • अध्याय 11 का संक्षिप्त सारांश

हस्तिनापुर से विदा लेकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय नगरी द्वारका लौटे। उनके आगमन का समाचार मिलते ही पूरी द्वारका आनंद और उत्साह से भर उठी। नगर को फूलों, बंदनवारों और दीपों से सजाया गया। शंख, मृदंग और मंगलगीतों की मधुर ध्वनि के बीच नगरवासियों ने प्रेम और श्रद्धा से अपने प्रिय प्रभु का भव्य स्वागत किया।

भगवान श्रीकृष्ण ने सभी नागरिकों, ब्राह्मणों, वृद्धों, बालकों और स्त्रियों पर समान स्नेह बरसाया। इसके बाद उन्होंने अपने माता-पिता वसुदेव और देवकी के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया तथा अपनी अन्य माताओं और रानियों से प्रेमपूर्वक भेंट की। भगवान के आगमन से पूरी द्वारका में आनंद, शांति और मंगल का वातावरण छा गया।

सूत जी बताते हैं कि भगवान को बाहरी वैभव से अधिक अपने भक्तों का निष्काम प्रेम प्रिय होता है। जहाँ भगवान का स्मरण, प्रेम और भक्ति होती है, वहीं सच्चा सुख और दिव्य आनंद प्राप्त होता है।

इस अध्याय का संदेश है कि भगवान का वास्तविक स्वागत भव्य सजावट से नहीं, बल्कि श्रद्धा, प्रेम और निर्मल हृदय से होता है। जिस हृदय में भगवान का प्रेम बस जाता है, वही जीवन आनंद और मंगल से भर उठता है।
🙏

#श्रीमद्भागवत_महापुराण

जय श्रीकृष्णा  🙏श्रीमद्भागवत महापुराण स्कंध 1 • अध्याय 11भगवान श्रीकृष्ण का द्वारका आगमनहस्तिनापुर से प्रस्थान करने के ब...
07/03/2026

जय श्रीकृष्णा 🙏
श्रीमद्भागवत महापुराण

स्कंध 1 • अध्याय 11

भगवान श्रीकृष्ण का द्वारका आगमन

हस्तिनापुर से प्रस्थान करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय नगरी द्वारका की ओर बढ़ने लगे। मार्ग में अनेक नगरों और राज्यों के लोग उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े। जहाँ-जहाँ उनका रथ पहुँचा, वहाँ के लोग प्रेम और श्रद्धा से उनका स्वागत करने लगे। भगवान सबको अपनी मधुर मुस्कान और करुणामयी दृष्टि से आनंदित करते हुए आगे बढ़ते रहे।

उधर द्वारका नगरी में यह समाचार पहुँच चुका था कि भगवान श्रीकृष्ण लौट रहे हैं। यह सुनते ही पूरे नगर में हर्ष की लहर दौड़ गई। गलियों और राजमार्गों को साफ किया गया। द्वारों पर आम्र-पल्लव और फूलों की सुंदर बंदनवार सजाई गईं। घर-घर दीप प्रज्वलित किए गए। सुगंधित जल का छिड़काव किया गया और पूरा नगर उत्सव के रंग में रंग गया।

शंख, नगाड़े, मृदंग और वीणा की मधुर ध्वनि चारों ओर गूँज उठी। ब्राह्मण वेद-मंत्रों का उच्चारण करने लगे। स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं और बालक उत्साह से भगवान के स्वागत के लिए मार्ग के दोनों ओर खड़े हो गए।

भगवान श्रीकृष्ण का रथ जैसे ही द्वारका के द्वार पर पहुँचा, नगरवासियों का हृदय आनंद से भर उठा। सभी ने हाथ जोड़कर प्रभु का स्वागत किया। कोई पुष्प अर्पित कर रहा था, कोई आरती उतार रहा था, तो कोई भाव-विभोर होकर केवल उनके दिव्य स्वरूप का दर्शन कर रहा था।

द्वारका के लोगों के लिए भगवान केवल राजा नहीं थे; वे उनके जीवन के प्राण, रक्षक और परम आराध्य थे। वे जानते थे कि भगवान की उपस्थिति से ही उनका नगर सुख, शांति और समृद्धि से परिपूर्ण रहता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक सबकी ओर देखा। वे किसी में ऊँच-नीच का भेद नहीं करते थे। चाहे वृद्ध हों, बालक हों, स्त्रियाँ हों या सामान्य नागरिक—भगवान ने सभी को समान स्नेह और करुणा प्रदान की।

इसके बाद भगवान अपने महल पहुँचे। उनकी माता देवकी ने उन्हें हृदय से लगाया। पिता वसुदेव की आँखों में आनंद के आँसू थे। भगवान ने अत्यंत विनम्रता से अपने माता-पिता के चरण स्पर्श किए।

फिर वे अपनी अन्य माताओं से मिले। सभी माताएँ अपने पुत्र को देखकर अपार स्नेह से भर उठीं। भगवान ने प्रत्येक माता का आदर किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

इसके पश्चात भगवान अपनी रानियों के महलों में गए। लंबे समय बाद अपने प्रिय स्वामी को देखकर रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती तथा अन्य रानियों के हृदय आनंद और प्रेम से भर गए। उनके लिए भगवान का आगमन किसी महान उत्सव से कम नहीं था।

द्वारका में कई दिनों तक उत्सव का वातावरण बना रहा। नगर के प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर प्रसन्नता थी। सबके मन में एक ही भावना थी—भगवान हमारे बीच हैं, इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।

सूत जी इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम से बँध जाते हैं। उन्हें न वैभव प्रिय है और न ही बाहरी आडंबर; उन्हें तो केवल अपने भक्तों का निर्मल प्रेम प्रिय है।

इस अध्याय से सीख

*भगवान का सच्चा स्वागत बाहरी सजावट से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय से होता है।
*भगवान सभी भक्तों पर समान प्रेम और कृपा बरसाते हैं।
*जहाँ भगवान का स्मरण और प्रेम होता है, वहाँ आनंद और मंगल स्वतः आ जाते हैं।
*भक्त और भगवान का संबंध प्रेम का होता है, किसी स्वार्थ का नहीं।
*भगवान का आगमन केवल किसी नगर में नहीं, बल्कि भक्त के हृदय में सबसे बड़ा उत्सव होता है।

"जिस हृदय में भगवान का प्रेम बस जाए, वही हृदय सच्ची द्वारका बन जाता है।"
जय श्रीकृष्णा 🙏

#श्रीमद्भागवत_महापुराण

जय श्रीकृष्णा  🙏स्कंध 1 • अध्याय 11द्वारका-प्रवेश (कविता रूप में)(प्रेम की राजधानी में परमात्मा का पुनरागमन)पश्चिम–दिशा ...
07/01/2026

जय श्रीकृष्णा 🙏
स्कंध 1 • अध्याय 11

द्वारका-प्रवेश (कविता रूप में)

(प्रेम की राजधानी में परमात्मा का पुनरागमन)

पश्चिम–दिशा की गोद समेटे, सिंधु गा रहा मधुरिम गान,
नील लहरियाँ चरण पखारें, देख मुकुन्द का पुण्य विमान।
दूर दिगन्तों पर दीख रही थी स्वर्ण–शिखर–शोभित पुरी,
मानो नभ से उतर पड़ी हो स्वयं अमरावती सुन्दरी।

वह द्वारका—यदुवंश–विभूति, धर्म–दीप की ज्योति विशाल,
जहाँ राजमहल भी तप–मंदिर, जहाँ प्रजा का निर्मल भाल।
जिसकी गलियों में गूँज रही थी हरि–नामों की मधुर पुकार,
जहाँ प्रत्येक गृह के प्रांगण में बसता था श्रीकृष्ण–संसार।

ज्यों ही नगर–द्वार निकट आया, पाञ्चजन्य का नाद उठा,
शंख–ध्वनि ने नभ को छूकर मंगल–मंत्रों का रूप रचा।
क्षणभर में वह दिव्य ध्वनि बन हृदय–हृदय में जा समाई,
ज्यों विरही प्राणों को सहसा प्रियतम की पावन सुधि आई।

द्वारका की प्रत्येक गली में हर्ष–तरंगें दौड़ पड़ीं,
वृद्ध, कुमार, गृहिणी, बालक—सबकी पलकें आज झड़ीं।
“श्याम पधारे! नाथ पधारे!”—जयघोषों का ज्वार उमड़ा,
मानो स्वयं आनंद–सिन्धु ही तट छोड़ नगर में आ उतरा।

मंगल–कलश सजे गृह–गृह पर, तोरण लहराए द्वार–द्वार,
चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप से महका सारा राज–विहार।
रत्नजटित राजपथों पर बिखरे कुमकुम–रंजित फूल,
आज स्वयं लक्ष्मी ने जैसे धर ली हो उत्सव की धूल।

नगाड़ों की गंभीर ध्वनि में वीणा की कोमल झंकार,
शंख, मृदंग, आनक, दुन्दुभि—सब गाने लगे हरि–जयकार।
वेद–घोष से गूँजा अंबर, ऋत्विज पढ़ने लगे स्वस्ति,
सिंधु–तरंगें भी झूम–झूमकर करतीं हरि की आरती।

उग्रसेन उठ आए हर्षित, वसुदेव का पुलकित उर,
देवकी के नयन सुधा बन बरसे श्याम–मुखाम्बुज पर।
रोहिणी का वात्सल्य उमड़ा, रुक्मिणी का कम्पित प्राण,
सत्यभामा सहित महिषियाँ देख रहीं निज जीवन–धन।

माताओं ने बाहें फैलाकर पुत्र नहीं, प्रभु को पाया,
किन्तु प्रेम ने ईश्वर–भाव को मातृ–स्नेह में ढँक डाला।
कृष्ण झुके विनय से सबके चरण–कमल वंदित करते,
जगत–पिता बनकर भी जैसे पुत्र–धर्म को प्रथम धरते।

वसुदेव ने हृदय लगाया—“वत्स! कुशल तो सब अभियान?”
कृष्ण हँसे—“पिताश्री! आपकी कृपा से पूर्ण हुए सब काम।”
देवकी ने चूम लिया मस्तक, नयनों में छलका अनुराग,
जैसे वर्षों का संचित स्नेह पा गया हो आज सुहाग।

तब यदुवंशी वीर समस्त ही दौड़े लेकर प्रेम–उमंग,
बलराम ने आलिंगन देकर भर दी जीवन में तरंग।
सात्यकि, प्रद्युम्न, सांब, अक्रूर, उद्धव, चारुदेष्ण महान,
सबके मुख पर एक ही छवि थी—प्रेममय भगवान।

कोई चरणों में लोट रहा था, कोई भरता हृदय अपार,
कोई नयनों से ही करता था स्वागत का मधुर व्यवहार।
ऐसा लगता था उस क्षण जैसे प्रेम स्वयं आकार धरे,
और भगवान उसी प्रेम के उत्तर में मुस्कान भरे।

अट्टालिकाओं के शिखरों पर चढ़ बैठीं नगर–सुन्दरी,
कर में आरती, नयन प्रतीक्षा, पुलकित हर एक अँगुलि।
देख श्याम का शीतल मुखड़ा, लज्जित हुआ शशि का प्रकाश,
नील–मेघ पर विद्युत–रेखा ज्यों पीताम्बर का उल्लास।

एक सखी ने मंद स्वर में दूसरी से यह बात कही—
“धन्य हुई यह जन्म–धरा, जिसने आज यह छवि लही।
योगी जिनका ध्यान लगाएँ युग–युग की समाधि लगाकर,
वे ही आज हमारे सम्मुख मुस्काते हैं प्रेम लुटाकर।”

दूजी बोली—“धन्य रुक्मिणी! धन्य सभी प्रभु–महिषियाँ,
जिन्हें नित्य यह सौभाग्य मिला, सेवा की अनुपम ऋचियाँ।
हम तो केवल दूर खड़ी हैं दर्शन–सुधा पी लेने को,
वे तो जीती हैं प्रतिक्षण ही श्याम–सुधाकर लेने को।”

कृष्ण चले जब राजपथों से, झुकता जाता जन–समुदाय,
राजा होकर भी प्रत्येक जन का रखते थे पूर्ण सद्भाव।
जिसको देखा, उसे निहारा प्रेम–भरी करुणा–दृष्टि से,
एक क्षण में ही हर लेते थे जन्म–जन्म की क्लेश–विषे।

किसी वृद्ध का हाथ थामा, किसी शिशु को गोद उठाया,
किसी तपस्वी का शीश नवाया, किसी दरिद्र को गले लगाया।
यही तो था वह दिव्य वैभव, यही था ईश्वर का प्रमाण—
जो सबमें अपना रूप निहारे, वही कहलाए भगवान।

राजमहल के मध्य पहुँचकर, प्रथम प्रणति कुल–देवों को,
फिर सम्मान दिया विप्रों को, साधु–संत महात्माओं को।
तदनन्तर निज महलों में जाकर कुशल–क्षेम सब पूछी,
हर संबंध निभाया ऐसे, मानो प्रेम स्वयं हो मूर्ति।

धर्म जहाँ व्यवहार बने, प्रेम जहाँ हो राज्य–विधान,
वहीं बसाते हैं श्रीकृष्ण अपना नित्य दिव्य निवास–स्थान।
द्वारका केवल नगर न थी, वह थी भक्ति की राजधानी,
जहाँ श्वास–श्वास में गूँज रही थी हरि–रस की मधु–वाणी।

धन्य हुई वह पुण्य पुरी, धन्य हुआ उसका प्रत्येक प्राण,
जिसने पाया नित्य समीप श्रीकृष्ण–चन्द्र भगवान।
किन्तु प्रभु का सच्चा धाम न केवल स्वर्णिम द्वारका है,
जिस अंतर में प्रेम अखंडित, वही वास्तविक द्वारका है।

मंदिर, तीर्थ, वेद, पुराण सब तब ही होते सार्थक हैं,
जब मन–मंदिर के सिंहासन पर श्रीहरि स्वयं प्रतिष्ठित हैं।
प्रेम जहाँ निष्काम प्रज्वलित हो, सेवा जहाँ बने सम्मान,
वहीं उतरते हैं माधव बन जीवन के परम प्रमाण।

जय द्वारकाधीश देव, जय भक्त–वत्सल घनश्याम,
जय करुणा–सिन्धु, प्रेम–मूर्ति, जय यदुवंश–अभिराम।
जो श्रद्धा से यह कथा सुने, उसके अंतःकरण के द्वार,
भक्ति–दीप से आलोकित हों, उतरें स्वयं श्रीकृष्ण मुरारि।

प्रेम बने जीवन की भाषा, सेवा बने सर्वोच्च विधान,
हर हृदय बने दिव्य द्वारका, हर श्वास बने हरि–गुण–गान॥

जय श्रीकृष्णा 🙏

#श्रीमद्भागवत_महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराणस्कंध 1 • अध्याय 10 का संक्षिप्त सारांशमहाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर में धर्म और शांति की स्थापना...
06/30/2026

श्रीमद्भागवत महापुराण
स्कंध 1 • अध्याय 10 का संक्षिप्त सारांश

महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर में धर्म और शांति की स्थापना हो चुकी थी। कुछ समय तक पांडवों के साथ रहने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी नगरी द्वारका लौटने का निश्चय किया। उनके प्रस्थान का समाचार सुनकर पांडव, कुंती, द्रौपदी तथा हस्तिनापुर के सभी स्त्री-पुरुष विरह से व्याकुल हो उठे।

भगवान श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर द्वारका के लिए प्रस्थान करने लगे। नगर की स्त्रियाँ महलों की छतों से उनके दिव्य स्वरूप का दर्शन करते हुए उनकी महिमा का गुणगान करने लगीं। वे भगवान को केवल एक वीर पुरुष या राजा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के पालनकर्ता और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के रूप में स्मरण कर रही थीं।

यद्यपि भगवान दृष्टि से दूर जा रहे थे, फिर भी उनके भक्तों के हृदय में यह अटूट विश्वास था कि भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं छोड़ते। उनका प्रेम और कृपा सदैव भक्तों के साथ रहती है।

इस अध्याय का संदेश है कि भगवान का वास्तविक निवास भक्त के हृदय में होता है। सच्ची भक्ति में मिलन जितना मधुर होता है, उतना ही विरह भी भगवान के प्रति प्रेम को और गहरा बना देता है।
🙏
#श्रीमद्भागवत_महापुराण

जय श्रीकृष्णा🙏श्रीमद्भागवत महापुराण स्कंध 1 • अध्याय 10भगवान श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से द्वारका प्रस्थानमहाभारत का युद्ध...
06/30/2026

जय श्रीकृष्णा🙏
श्रीमद्भागवत महापुराण
स्कंध 1 • अध्याय 10

भगवान श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से द्वारका प्रस्थान

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो चुकी थी और युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बन चुके थे। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से पांडवों को राज्य और शांति दोनों प्राप्त हुए थे। प्रजा सुखी थी और राज्य में धर्म, न्याय तथा समृद्धि का वातावरण था।

कुछ समय तक हस्तिनापुर में रहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्तों को सांत्वना दी और उन्हें जीवन के कठिन समय से उबरने में सहारा दिया। जब सब कुछ व्यवस्थित हो गया, तब उन्होंने द्वारका लौटने का विचार किया।

यह समाचार सुनकर पांडवों और हस्तिनापुर के लोगों के हृदय में विरह का भाव जाग उठा। वे जानते थे कि भगवान केवल उनके सखा या संबंधी नहीं हैं, बल्कि उनके जीवन के सबसे बड़े सहारे हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्थान का समय आया। रथ सजाया गया। अर्जुन छत्र लेकर खड़े थे। उद्धव और सात्यकि उनके साथ थे। नगर की स्त्रियाँ महलों की छतों पर खड़ी होकर भगवान के दर्शन कर रही थीं। वे भगवान की मधुर मुस्कान, उनकी करुणा और उनके अद्भुत कार्यों का स्मरण कर रही थीं।

कुंती, द्रौपदी, सुभद्रा और अन्य स्त्रियों की आँखें नम थीं। पांडवों के हृदय में भी विरह की पीड़ा थी, परंतु वे जानते थे कि भगवान कभी अपने भक्तों को छोड़कर नहीं जाते। वे भले ही आँखों से दूर हो जाएँ, लेकिन भक्तों के हृदय में सदैव निवास करते हैं।

हस्तिनापुर की स्त्रियाँ भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान करते हुए कहने लगीं—

“धन्य हैं वे लोग, जिन्हें प्रतिदिन भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं। धन्य है द्वारका, जहाँ भगवान स्वयं निवास करते हैं।”

वे भगवान को केवल एक राजा या वीर पुरुष के रूप में नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के स्वामी और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के रूप में देख रही थीं।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए सभी को प्रेम भरी दृष्टि से देखते रहे। उनकी कृपा से सबके हृदय में भक्ति और शांति का अनुभव हो रहा था।

धीरे-धीरे रथ हस्तिनापुर से दूर चला गया। लोग अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान को निहारते रहे। उनके हृदय में विरह था, लेकिन साथ ही यह विश्वास भी था कि भगवान का प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।

इस अध्याय से सीख

भगवान का शारीरिक रूप से दूर होना, उनके प्रेम का दूर होना नहीं है।
सच्चा भक्त हर परिस्थिति में भगवान को अपने हृदय में अनुभव करता है। भगवान अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ते।
भगवान का स्मरण और प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा धन है।
विरह भी भक्ति का एक मधुर स्वरूप है, जो भगवान के प्रति प्रेम को और गहरा बना देता है।

जय श्रीकृष्णा🙏
#श्रीमद्भागवत_महापुराण

जय श्रीकृष्णा🙏श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य (कविता रूप में)स्कंध 1 • अध्याय 10 — द्वारका प्रस्थान(हस्तिनापुर से श्रीकृष्ण ...
06/30/2026

जय श्रीकृष्णा🙏
श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य (कविता रूप में)
स्कंध 1 • अध्याय 10 — द्वारका प्रस्थान

(हस्तिनापुर से श्रीकृष्ण का विदा होना — विरह में भक्ति का आलोक)

धर्म–दीप फिर प्रज्वलित हुआ, शांत हुआ रण का संताप,
भीष्म–वचन बन अमृत–धारा, धुल गया युगों का संताप।
राज्य–सिंहासन सुशोभित था, धर्मराज थे धर्माधार,
किन्तु नगर के प्रत्येक हृदय में उठता था एक और विचार।

आज मुकुन्द प्रस्थान करेंगे, लौटेंगे निज द्वारकापुरी,
यह सुनते ही हस्तिनापुर पर छा गई विरह–संध्या धुरी।
हर्ष मिला था जिन चरणों से, आज वही होंगे ओझल,
सूर्य खड़ा था नभ में फिर भी, लगने लगा दिवस विफल।

प्रातः बेला, शुभ मंगल–ध्वनि, शंख बजे, वेदों का गान,
रथ सजा था स्वर्णिम शोभित, बैठे उस पर भगवान।
दारुक ने संभाली थीं रश्मियाँ, गरुड़–ध्वज लहराता था,
नील–मेघ–सा श्याम स्वरूप, जग का चित्त चुराता था।

महाराज युधिष्ठिर आगे, कर जोड़े, नत, नीर–नयन,
भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, मौन हुए सब वीर–वदन।
विदुर, कृप, धौम्य और ऋषिगण, भरते हृदय में करुणा–श्वास,
मानो धर्म स्वयं रोक रहा हो अपने प्राणों का प्रवास।

कुंती बोलीं—“हे जगदीश्वर! फिर कब होगा तेरा दर्शन?
तेरे बिना यह राजमहल भी लगता जैसे शून्य–गगन।
जब–जब संकट हम पर आया, तू ही बनकर ढाल खड़ा,
अब सुख आया तो तू जाता—यह कैसा है प्रेम बड़ा?”

कृष्ण हँसकर बोले धीरे—“माता! कहाँ विदा होता हूँ?
जो स्मरण करे प्रेम सहित, उसके हृदय में रहता हूँ।
दूरी केवल देह की होती, प्रेम कभी दूर नहीं जाता,
भक्त जहाँ निष्कपट पुकारे, वहीं स्वयं हरि दौड़ा आता।”

द्रौपदी की आँखें सजल थीं, सुभद्रा का काँप रहा उर,
उत्तरा ने चरण पकड़ लिए, भर आया वात्सल्य–सागर।
गान्धारी भी मौन खड़ी थीं, धृतराष्ट्र नत मस्तक थे,
आज शत्रु और मित्र सभी, केवल कृष्ण–आश्रित थे।

नगर–नारियाँ अट्टालिकाओं पर चढ़ आईं दर्शन–लोभ,
हाथों में थे पुष्प–कलश, अधरों पर हरि–नाम–सुमोद।
एक–एक झरोखे से झरते, अश्रु और सुमनों के हार,
मानो प्रेम स्वयं बरसा हो बनकर पुष्पों की बौछार।

कोई बोली—“धन्य व्रज–भूमि, जिसने पाया यह नन्दलाल,
धन्य यशोदा, धन्य नन्द, धन्य वह गोपी–प्रेम विशाल।
हमने तो बस कुछ दिन पाया, उनका मधुर, मनोहर साथ,
व्रजवासियों ने जी भर देखा, हर पल उनका पावन हाथ।”

दूजी बोली—“धन्य अर्जुन हैं, जिनके रथ के सारथि बने,
धन्य वह धूल, जो रण–पथ में श्रीचरणों से पावन बने।
धन्य वह बाँसुरी, धन्य ग्वाले, धन्य यमुना का निर्मल तीर,
जिन्होंने प्रतिदिन देखा होगा श्यामसुंदर का दिव्य शरीर।”

रथ बढ़ने को हुआ अग्रसर, बज उठे मृदंग और शंख,
किन्तु नगर का हर एक कोना, मौन बना था भाव–अनंग।
अर्जुन ने थामा श्वेत छत्र, सात्यकि ने चँवर डुलाया,
उद्धव, दारुक साथ चले, प्रेम–पथ ने रूप सजाया।

पथ–पथ पर जन झुकते जाते, चरण–रज को शीश चढ़ाते,
किसी ने आरती उतारी, कोई भजन मधुरिम गाते।
बालक दौड़े, वृद्ध पुकारें—“प्रभु! शीघ्र पुनः आ जाइए,”
कृष्ण सभी को प्रेम–दृष्टि से मौन आशीष सुनाइए।

कृष्ण चले, पर दृष्टि उनकी पीछे बारंबार गई,
प्रेम जहाँ निष्काम बसा हो, वहाँ विरह भी आरती बनी।
हस्तिनापुर की हर गलियों में आज यही अनुभूति रही—
जैसे मंदिर से देव निकलें, पर सुगंध वहीं रह गई।

धूल उड़ी जब रथ के पीछे, सबने उसे मस्तक लगाया,
मानो उस पावन रज में ही जीवन–सौभाग्य समाया।
जब तक ध्वजा दिखाई देती, नयन उसी पर टिके रहे,
ध्वजा ओझल होते ही जैसे प्राण स्वयं रुक–से गए।

तब युधिष्ठिर मौन खड़े थे, अर्जुन भी न बोले एक,
भीम–हृदय में भी उस क्षण था बालक–सा अनुराग अशेष।
कृष्ण बिना यह राजसिंहासन भी जैसे निर्जीव प्रतीत,
प्रेम बिना वैभव क्या होता? यह समझा उस दिन समस्त।

विदुर बोले—“शोक न करना, प्रभु कभी दूर न होते हैं,
नाम, स्मरण और सत्य–कर्म में सदा विराजमान होते हैं।
जिसने कृष्ण को प्रेम दिया है, कृष्ण उसी के हो जाते,
भक्त–हृदय के कमल–निकेतन में नित्य निवास बनाते।”

रथ चला पश्चिम की दिशा में, सूर्य बढ़ा अपने पथ पर,
किन्तु पीछे छूट गया जैसे प्रेम अमर उस राजनगर।
कृष्ण गए, पर साथ छोड़ गए धर्म, करुणा और विश्वास,
भागवत का यही संदेश—भक्ति अमर, नश्वर है वास।

जय हो श्याम, द्वारकाधीश, जय भक्त–हृदय–निवास,
जय वह विरह, जहाँ मिलन का छिपा हुआ उल्लास।
जो सुन ले यह मंगल–कथा, उसके अंतर प्रेम जगे,
प्रभु दूर रहें तन से चाहे, मन से कभी न दूर रहें।

श्रीकृष्ण के चरण–कमल में अर्पित जीवन का सम्मान,
विरह बने जब भक्ति–दीपक, तभी सफल हो मानव–प्राण॥

जय श्रीकृष्णा🙏

#श्रीमद्भागवत_महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराणस्कंध 1 • अध्याय 9 का संक्षिप्त सारांशमहाभारत युद्ध के बाद राजा युधिष्ठिर गहरे दुःख और पश्चाताप से ...
06/24/2026

श्रीमद्भागवत महापुराण
स्कंध 1 • अध्याय 9 का संक्षिप्त सारांश

महाभारत युद्ध के बाद राजा युधिष्ठिर गहरे दुःख और पश्चाताप से भर गए थे। भगवान श्रीकृष्ण उन्हें लेकर शरशय्या पर विराजमान भीष्म पितामह के पास पहुँचे। वहाँ भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को धर्म, कर्तव्य, सत्य, दया और राजधर्म का उपदेश दिया तथा समझाया कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और परिणामों का भार भगवान पर छोड़ देना चाहिए।

अपने अंतिम समय में भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान किया। उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए प्रार्थना की कि उनका मन सदा श्रीकृष्ण के चरणों में स्थिर रहे। भगवान का स्मरण करते हुए उन्होंने शांत भाव से अपने प्राणों का त्याग किया और परम गति को प्राप्त हुए।

इस अध्याय का संदेश है कि धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन के हर क्षण भगवान का स्मरण करना चाहिए। सच्चे भक्त के लिए जीवन और मृत्यु दोनों ही भगवान की शरण में धन्य हो जाते हैं।

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श्रीमद्भागवत महापुराण स्कंध 1 • अध्याय 9 — भीष्म उपदेशशरशय्या पर भीष्म पितामह की अंतिम वाणीमहाभारत का युद्ध समाप्त हो चु...
06/24/2026

श्रीमद्भागवत महापुराण
स्कंध 1 • अध्याय 9 — भीष्म उपदेश

शरशय्या पर भीष्म पितामह की अंतिम वाणी

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों का विनाश हो गया था और धर्म की विजय हुई थी, लेकिन युद्ध के घाव अभी भी ताज़ा थे। हस्तिनापुर में राजा युधिष्ठिर के मन में गहरा दुःख था। उन्हें लगता था कि इतने लोगों के प्राणों का कारण वही हैं। राज्य और विजय उन्हें बोझ की तरह प्रतीत हो रहे थे।

भगवान श्रीकृष्ण यह जानते थे कि युधिष्ठिर के हृदय में पश्चाताप और मोह अभी भी शेष है। इसलिए वे पांडवों को साथ लेकर कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

चारों ओर अनेक ऋषि-मुनि और महापुरुष उपस्थित थे। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं भी वहाँ खड़े थे। पांडवों ने भीष्म पितामह को प्रणाम किया। वृद्ध भीष्म ने प्रेम से सबको देखा और भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान किया।

युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा—

“पितामह! मेरे मन में शांति नहीं है। कृपया मुझे धर्म का मार्ग बताइए, जिससे मैं अपने कर्तव्य का पालन कर सकूँ।”

भीष्म पितामह मुस्कुराए। उन्होंने कहा—

“हे राजन! संसार में जो कुछ होता है, वह भगवान की इच्छा और काल के अधीन होता है। मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, लेकिन फल और घटनाओं का भार अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए।”

उन्होंने राजा के धर्म, प्रजा के प्रति दायित्व, सत्य, दया, न्याय और सदाचार का विस्तार से उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि राजा का जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि प्रजा के कल्याण के लिए होता है।

भीष्म ने कहा—

“धर्म का पालन कठिन परिस्थितियों में भी नहीं छोड़ना चाहिए। जो मनुष्य सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।”

इसके बाद उनका मन भगवान श्रीकृष्ण की ओर लग गया।

उन्होंने भगवान की ओर प्रेम से देखते हुए कहा—

“वही श्रीकृष्ण, जो अर्जुन के सारथी बने, जिन्होंने युद्धभूमि में अपने भक्तों की रक्षा की, वही मेरे आराध्य भगवान हैं। मैं अपने अंतिम क्षणों में उन्हीं का स्मरण करना चाहता हूँ।”

भीष्म पितामह को वह दृश्य याद आने लगा जब युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त अर्जुन की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा तोड़कर हाथ में रथ का पहिया लेकर उनकी ओर दौड़े थे। उस प्रेम और भक्तवत्सलता का स्मरण करते हुए भीष्म का हृदय आनंद से भर गया।

उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए प्रार्थना की—

“हे प्रभु! मेरा मन अंतिम समय तक आपके चरणों में स्थिर रहे। मैं आपके उसी सुंदर स्वरूप का ध्यान करता हुआ इस शरीर का त्याग करूँ।”

भगवान श्रीकृष्ण की मधुर मुस्कान और दिव्य रूप का ध्यान करते हुए भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग किया।

आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। ऋषि-मुनि उनकी महिमा का गुणगान करने लगे। पांडवों की आँखें नम थीं, लेकिन उनके हृदय में यह संतोष था कि भीष्म पितामह भगवान का स्मरण करते हुए परम गति को प्राप्त हुए।

भगवान श्रीकृष्ण और सभी महापुरुषों ने उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस अध्याय से सीख

🌸 कर्तव्य का पालन करते हुए फल की चिंता भगवान पर छोड़ देनी चाहिए।
🌸 धर्म, सत्य और दया जीवन के सबसे बड़े आधार हैं।
🌸 भगवान का स्मरण जीवन के अंतिम क्षणों को भी पवित्र बना देता है।
🌸 सच्चा भक्त मृत्यु के समय भी भगवान के प्रेम में स्थिर रहता है।
🌸 भगवान अपने भक्तों के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

“जिसका अंतिम स्मरण भगवान हों, उसका जीवन और मृत्यु दोनों धन्य हो जाते हैं।”

जय श्रीकृष्णा 🙏

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जय श्रीकृष्णा 🙏श्रीमद्भागवत महापुराण (कविता रूम में)स्कंध 1 • अध्याय 9 — भीष्म उपदेश(शर–शय्या पर धर्म का अमृत और श्रीकृष...
06/23/2026

जय श्रीकृष्णा 🙏
श्रीमद्भागवत महापुराण (कविता रूम में)
स्कंध 1 • अध्याय 9 — भीष्म उपदेश

(शर–शय्या पर धर्म का अमृत और श्रीकृष्ण की महिमा)

कुरुक्षेत्र का रण थम चुका, शांत हुई थी रण–हुंकार,
धूल बसी थी शस्त्रों ऊपर, मौन पड़ा था भू–संसार।
किन्तु अभी भी एक महागिरि, सत्य–धर्म का था अवशेष,
शर–शय्या पर लेटे भीष्म, बनकर युग–युग का संदेश।

सूर्य अभी दक्षिणायण में, प्राण रोककर पड़े महान,
इच्छा–मृत्यु का वर था जिनको, दृढ़ था उनका तप–बलिदान।
तीरों की शय्या पर भी उनका, तेज न किंचित क्षीण हुआ,
ज्यों अस्ताचल जाता सूरज भी, स्वर्ण–प्रभा से पूर्ण हुआ।

धर्मराज युधिष्ठिर के मन में, शोक–विषाद अपार भरा,
“मेरे कारण ही यह संहार”—यह चिंतन अंतर में उतरा।
राज्य मिला, पर शांति न मिली, मन पर अपराधों का भार,
कैसे धारण करूँ राजधर्म? कौन बताए उचित विचार?

तब श्रीकृष्ण मुस्काए मंद, बोले मधुर वचनों के साथ—
“चलो, आज उस महापुरुष से सुन लो धर्म–अमृत की बात।
जिसने जीवन भर सत्य जिया, जिसने व्रत पर प्राण दिए,
उस भीष्म–सूर्य की अंतिम किरणें अभी शेष हैं लिए।”

कृष्ण, पाण्डव, ऋषि और मुनिगण, पहुँचे गंगा–पुत्र समीप,
शर–शय्या भी बन गई जैसे, योगी की तप–भूमि अतीव।
देखा भीष्म ने दूर खड़े हैं, स्वयं मुकुन्द, कृपालु श्याम,
पुलकित हुआ समस्त शरीर, भर आया नयनों में धाम।

कर जोड़े वे बोले—“धन्य मैं, आज सफल यह जीवन है,
जिसके दर्शन हेतु तरसते, योगी, ज्ञानी, मुनिजन हैं।
वही कृष्ण मेरे सम्मुख हैं, वही विश्व के आधार,
जिनके चरणों में समर्पित यह तन, मन, जीवन अपार।”

“कितनी अद्भुत तेरी लीला, हे वासुदेव! हे भगवान!
रथ–सारथी बन गए स्वयं, जिनका करते देव ध्यान।
अर्जुन के अश्वों की रश्मि थामी, धूल लगी मुख–मंडल पर,
और वही ब्रह्माण्ड–नायक हैं, जिनके संकेत से जग चलता।”

“रणभूमि में जब क्रोध–विह्वल, मैं बन बैठा था प्रचण्ड,
तब तुमने प्रतिज्ञा तोड़ने को उठा लिया था रथ–चक्र।
वह रूप आज भी स्मृति में है, नयनों में बसता हर बार,
जहाँ भक्त–प्रेम के कारण झुक गया स्वयं जगत–आधार।”

भीष्म की आँखों में झलका तब, रण–दृश्यों का दिव्य प्रकाश,
कृष्ण खड़े थे जैसे साक्षात् प्रेम और धर्म का निवास।
कहा—“मैं उस रूप को वंदूँ, जो अर्जुन का हित करता था,
अपने भक्त की रक्षा हेतु, नियमों से भी लड़ता था।”

“न मैं स्वर्ग की इच्छा करता, न योगों की सिद्धि महान,
बस अंतिम क्षण में नयनों में बस जाए तेरा श्याम विधान।
यह प्राण निकलें जब शरीर से, तब केवल तू ही दिखे,
तेरे चरण–कमलों की छवि में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे।”

कृष्ण सुन रहे थे प्रेम सहित, अधरों पर करुणा–मुस्कान,
भक्त–हृदय की निष्कपटता पर रीझ गए थे भगवान।
तब युधिष्ठिर आगे बढ़े, विनत भाव से शीश झुकाए,
बोले—“पितामह! धर्म बताइए, मन में संशय बहुत समाए।”

भीष्म ने फिर धर्म–दीपक की अमृत–ज्योति प्रकट कर दी,
राजधर्म, आचार, नीति की गंगा पुनः प्रवाहित कर दी।
“राजा वह जो प्रजा को जाने अपने पुत्रों के समान,
जिसके शासन में निर्बल भी पाए न्याय और सम्मान।”

“धर्म न केवल शास्त्रों में है, धर्म नहीं केवल उपदेश,
धर्म वही जो लोक–हितार्थ बने करुणा का दिव्य परिवेश।
सत्य रहे आधार राज्य का, दया रहे उसके प्राण,
बल हो धर्म–रक्षा के लिए, न हो अहंकार का अभियान।”

“लोभ जहाँ सिंहासन छू ले, वहाँ विनाश निकट आ जाए,
राजा यदि स्वार्थी बन बैठे, प्रजा विपत्ति में पड़ जाए।
इसलिए राजन! स्मरण रखना—सत्ता केवल सेवा है,
जिसमें जन–कल्याण न हो, वह केवल माया–मेवा है।”

“ब्राह्मण का बल ज्ञान बने, क्षत्रिय का बल धर्म–प्रचार,
वैश्य का बल लोक–समृद्धि, शूद्र का सेवा–व्यवहार।
सब मिलकर जब कर्म करें, तब समाज पुष्पित होता है,
एक भी तंतु टूटे तो फिर, राष्ट्र दुर्बल होता है।”

घंटों बहता रहा ज्ञान–सुधा का निर्मल, पावन प्रवाह,
ऋषि, राजा, देव सभी सुनते, मिटता जाता मन का दाह।
युधिष्ठिर का संशय टूटा, चित्त हुआ निर्मल, निष्काम,
जैसे घनघोर निशा के बाद उदित हो जाता हो भानु–धाम।

तब आया उत्तरायण–काल, सूर्य बढ़ा उत्तर की ओर,
भीष्म समझ गए—अब निकट है जीवन–संध्या का वह छोर।
नयन टिकाए कृष्ण–मुख पर, प्राण हुए हरि–नाम में लीन,
मानो गंगा मिलती सागर में, त्याग रही अपना अस्तित्व क्षीण।

बोले—“हे माधव! हे गोविन्द! अब अंतिम वंदन स्वीकार,
तेरे चरणों में समर्पित यह जीवन का संचित संसार।
जो कुछ पाया, तुझसे पाया; जो कुछ छोड़ा, तुझ पर वार,
अब यह आत्मा लौट रही है अपने सनातन आधार।”

कहकर भीष्म मौन हुए, स्थिर हो गई श्वासों की चाल,
गूँज उठा आकाश अचानक, देवों ने बरसाए फूल लाल।
गंगा–पुत्र ने त्यागी देह, पर अमर हुआ उनका ज्ञान,
धर्म, भक्ति और सत्य–व्रत का बनकर शाश्वत कीर्तिगान।

जय हो भीष्म पितामह की, जय उनकी निष्काम प्रतिज्ञा,
जय उस धर्म–दीप की, जिसने मिटा दिया अज्ञान–तमसा।
जय श्रीकृष्ण, भक्त–वत्सल, प्रेम–नियंत्रित भगवान,
जो भक्तों के लिए स्वयं बन जाते जीवन का प्रमाण॥

जो श्रद्धा से यह कथा सुने, उसके मन में धर्म जगे,
संकट में भी सत्य न छूटे, और हरि–स्मरण दृढ़तम रहे।
भीष्म–व्रत की दृढ़ता पाए, कृष्ण–भक्ति का अमृत–दान,
यही इस अध्याय का फल है, यही भागवत का सम्मान॥

जय श्रीकृष्णा 🙏

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