07/13/2026
जय श्रीकृष्णा 🙏
स्कंध 1 • अध्याय 12
श्रीमद्भागवत महापुराण काव्य (कविता रूप में)
महाराज परीक्षित का जन्म
(भगवद्-कृपा से रक्षित जीवन और धर्मराज का उत्तराधिकारी)
शान्त हुआ था रण का कोलाहल, थम चुका था रक्त–प्रवाह,
धर्म पुनः सिंहासन पर बैठा, मिटने लगा अधर्म–प्रवाह।
किन्तु अभी भी पाण्डव–वंश का एक दीप था गर्भ–निवास,
जिसको लेकर धड़क रहा था समूचे कुल का विश्वास।
उत्तरा के पावन उर में वह जीवन–अंकुर पलता था,
अभिमन्यु की अमर विरासत बन भविष्य स्वयं चलता था।
जिसे बचाया स्वयं मुकुन्द ने ब्रह्मास्त्रों की ज्वाला से,
वह अंकुर अब विकसित होना था हरि–कृपा की छाया से।
समय पूर्ण जब हुआ प्रसव का, शुभ नक्षत्र आकाश चढ़े,
मंगल–घोष हुए गृह–गृह में, वेद–स्वर अम्बर पर चढ़े।
जन्म लिया उस तेजस्वी ने, जिसका जीवन ईश्वर–दान,
देख प्रसन्न हुए पाण्डव सब, पुलकित हुआ समस्त जहान।
धर्मराज के नयनों से तब आनन्दाश्रु झरने लगे,
भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव हर्ष–सुमन बरसाने लगे।
कुंती ने नवजात शिशु को भरकर हृदय लगाया प्रेम,
मानो टूटा हुआ कुल–दीपक फिर पा गया दिव्य नेम।
विप्र बुलाए गए सभी तब, ज्योतिष–वेत्ता, वेद–विदग्ध,
जिनके ज्ञान–दीप से आलोकित होता था जीवन–पथ।
शान्ति–यज्ञ, स्वस्तिवाचन, मंगल–सूक्तों का हुआ उच्चार,
धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पों से महका सारा राज–द्वार।
गायें, स्वर्ण, रत्न, वस्त्र, भूमि—दान हुए विप्रों के हाथ,
धर्मराज ने खोल दिए थे दान–धर्म के सारे पथ।
यज्ञ–धूम में उठती लगती हरि–कृपा की शुभ सुवास,
मानो स्वयं प्रसन्न खड़े हों यज्ञ–पुरुष भगवान विशेष।
विप्रों ने नवजात शिशु का ललाट निहारा ध्यान धर,
तेज–पुञ्ज वह साधारण न था, था हरि–कृपा का साकार स्वर।
बोले—"राजन्! सुनिए सावन-सी मधुर हमारी वाणी आज,
यह बालक होगा कुल–दीपक, धर्म–पथ का दिव्य समाज।
इक्ष्वाकु–सा सत्यनिष्ठ होगा, राम समान मर्यादा–धाम,
शिबि–सम अर्पण में अग्रणी, भरत–सा होगा धर्म–प्राण।
अर्जुन–सा होगा धनुर्धर यह, सिंह–समान प्रचण्ड पराक्रम,
हिमगिरि–सा धैर्य धरेगा, सागर–सा होगा उदार मन।
प्रह्लाद–सम निष्कपट भक्ति होगी इसके निर्मल उर में,
बलि–सा सत्य निभाएगा यह संकट के भीषण क्षण में।
पृथ्वी–माता–सा क्षमाशील, ब्रह्मा–सा होगा विवेक,
शंकर–सम वैराग्य धरेगा, धर्म रहेगा इसका टेक।
प्रजा इसे निज पिता कहेगी, यह सबको पुत्र समान रखेगा,
दीन, अनाथ, निराश जनों का जीवन–दीप स्वयं बन रहेगा।
राजसिंहासन इसके कारण पुण्य–पीठ बन जाएगा,
जहाँ न्याय और धर्म साथ हों, वैसा युग फिर आएगा।
किन्तु सुनो राजन्! कालचक्र अपना विधान निभाएगा,
एक दिवस यह बालक भी मृत्यु–पथ को अपनाएगा।
ऋषि–पुत्र के शाप–वचन से सात दिवस का होगा काल,
तब यह त्यागेगा राज–वैभव, खोजेगा जीवन का सवाल।
गंगा–तीर विराजेगा तब यह त्याग सभी अभिमान,
शुकदेव मुनि से श्रवण करेगा भागवत–अमृत महान।
सात दिवस में हरि–कथा का ऐसा होगा दिव्य प्रभाव,
मृत्यु बनेगी मोक्ष–द्वार, मिट जाएगा भव–अभिशाप।
विप्र–वचन सुन धर्मराज का हर्ष हुआ फिर क्षणभर मौन,
आनन्द और विषाद मिले थे एक साथ उस पावन क्षण।
सोचा—"जिस जीवन का रक्षक स्वयं जनार्दन भगवान,
उसका प्रत्येक श्वास बनेगा अवश्य जगत का कल्याण।"
तब बालक ने खोले नयन, देखा चारों ओर जहान,
मानो खोज रहा हो फिर से वही दिव्य करुणामय भगवान।
जिस रूप ने गर्भ–अंधकार में दी थी जीवन को पहचान,
उस छवि की खोज में ठहर–ठहर निहार रहा था वह जहान।
इस कारण विद्वानों ने उसका नाम रखा **"परीक्षित"**,
जो प्रत्येक मुख, प्रत्येक हृदय में खोजे हरि का शुभ चित्र।
जिसने गर्भ में देखा हरि को, जन्म पश्चात् भी खोजे वही,
हर प्राणी में, हर रूप में, हर श्वास में पहचान वही।
नाम हुआ जब "परीक्षित", गूँजा मंगल–घोष अपार,
देवों ने भी पुष्प बरसाए, गाया गंधर्वों ने सत्कार।
भाग्य जागा कुरुवंश का, फिर धर्म–दीप प्रज्वलित हुआ,
हरि–कृपा से रक्षित जीवन मानवता का पथिक हुआ।
हे प्रभु! ऐसा भाव हमें दो, जग में तेरा रूप निहारें,
प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक कण में तेरे चरणों को सँवारें।
जैसे परीक्षित ने जीवन भर खोजा केवल तेरा धाम,
वैसे ही हर श्वास हमारी जपे निरंतर तेरा नाम।
जय हो श्रीमद्भागवत–माता, जय शुक–वाणी अमृत–धार,
जय उस बालक की निष्कपटता, जिसने खोजा हरि–आधार।
जो श्रद्धा से यह कथा सुने, उसके अंतर यह विश्वास—
जिसकी रक्षा स्वयं हरि करें, उसका जीवन बने प्रकाश ॥
जय श्रीकृष्णा 🙏
#श्रीमद्भागवत_महापुराण