08/14/2024
बचपन में गाँव की रामलीला में बहुत ही जोशीले व वीर रस से ओतप्रोत छंद व दोहो से श्रीरामकथा का आयोजन होता था तो सहज रूप से ही संस्कारौं के बीज अवचेतन मन में पड़ जाते थे। हालाँकि उस समय तो ये ही सोचते थे कि शायद ये छंद/ दोहे रामलीला के निर्देशक ने लिखे होंगे परन्तु समय के साथ संस्कारों ने जड़ पकड़ ली और पाया कि ये रचनायें तो लगभग १०० वर्ष पहले ही राधेश्याम रामायण में लिख दी गयी थीं।
कथावाचस्पति पंडित राधेश्याम जी उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में १८९० में जन्मे और लोक-नाट्य-शैली के आधार पर खड़ीबोली में रामायण की कथा को २५ खण्डों में पद्यबद्ध किया था और इस कृति ने राधेश्याम रामायण के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त की। हिन्दी भाषा-भाषीप्रदेशों, विशेषतया उत्तर प्रदेश के ग्राम-ग्राम में, इसका प्रचार हुआ। कथावाचकों ने अपने कथावाचन तथा रामलीला करनेवालों ने रामलीला के अभिनय के लिए इसे अपनाया।
इस पूरी रचना को विभिन्न गायकों ने समय समय पर अपने अपने हिसाब से संगीतबद्ध किया है जिसमें बुंदेलखंड के देशराज पाटेरिया जी ने बड़े ही जोश में गाया है जिसमें गाँव की खड़ीबोली का आनंद आता है जबकि राजकुमार पंकज जी के गायन में संगीत और वीररस का सहज मिश्रण है।
राधेश्याम रामायण में विभिन्न उपमाओं का यथास्थान वर्णन किया है और पढ़ने/ सुनने के साथ ही कथा अंतःस्थल में उतरने लगती है। वर्तमान समय में मानवता के प्रति विश्व के कुछ देशों का व्यवहार और पंडित राधेश्याम जी द्वारा लंका का वर्णन कितना मिलता है, इस छंद में।
कोमेंट में राधेश्याम रामायण को पढ़ने की व सुनने की कुछ कड़ियाँ हैं जो आपको आनंद दे सकती हैं।