Furkan S Khan Feels

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30/08/2025

दिल में अरमानों का समंदर उतर आया है,
तेरे जाने से जो खालीपन घर आया है।

रात भर जाग के निहारी है चाँद की सूरत,
जैसे आँखों में कोई सपना ठहर आया है।

लोग कहते हैं मोहब्बत में सुकूँ मिलता है,
हमने देखा है कि हर ज़ख़्म निखर आया है।

तू नहीं है तो भी तेरी ही महक रहती है,
तेरे होने का अहसास मगर आया है।

चाँदनी रातें भी अब रंग बदलने लगीं है,
दिल की वीरानी में मौसम भी उतर आया है।

— Furkan S Khan

26/08/2025

ना राहें मिलीं, ना कोई कारवाँ मिला
मुझे इस सफ़र में बस इक ग़ुमाँ मिला

तलाश-ए-मोहब्बत में भटका किया दिल
ना चाहत मिली, ना कहीं आशियाँ मिला

वतन की हवाओं की खुशबू तरस गई
यहाँ बस ग़ुरबत का ही इशारा मिला

कभी टूटे ख़्वाबों की किरचें समेटते
कभी यादों का बोझ दोबारा मिला

किसी के लबों से दुआ की तलाश थी
मगर हर लब पे सिवा ताना मिला

जहाँ भी गया अपना चेहरा छुपा लिया
कि आईने में ख़ुद से भी ग़मज़दा मिला

हमारे क़दम यूँ भटकते रहे सदा
न रहबर मिला, न कोई सहारा मिला

"फ़ना" के लहजे में सच लिख दिया मैंने
मुझे हर दर्द में बस तराना मिला

— Furkan S Khan

18/08/2025

दिल को तेरे ख़्याल से फ़ुर्सत नहीं मिली,
इस दर्द-ए-इश्क़ की कोई राहत नहीं मिली।

हर रंग-ए-ज़िंदगी तिरे पर्दे में छुप गयी,
उस हुस्न की तलाश में हसरत नहीं मिली।

इक उम्र कट गई तेरी यादों के सिलसिले,
पर जाँ को आरज़ू से इजाज़त नहीं मिली।

हम ने तो चाहा ख़ुद को भुला दें तेरे लिए,
लेकिन किसी भी ज़ख़्म पे राहत नहीं मिली।

दुनिया ने दिल लगाया हज़ारों बहार से,
हमको मगर तिरी ही मोहब्बत नहीं मिली।

— Furkan S Khan Feels

12/08/2025

हर सफ़र में कोई चेहरा नज़र नहीं आया,
हम जहाँ भी गए, अपना शहर नहीं आया।

बरसों बीते हवाओं में परदेस की ख़ुशबू,
पर वतन का वो महका हुआ लहर नहीं आया।

ख़्वाब आंखों में सजाए हुए उम्र कट गई,
पर किसी ख्वाहिश का भी मुक़रर नहीं आया।

प्यार का चाँद भी बादलों में ही छुपा रहा,
दिल के आँगन में कोई सहर नहीं आया।

राह में बस अजनबी मुस्कुराते गुज़र गए,
साथ चलने का कोई हुनर नहीं आया।

अब तो लगता है कि ख़ुद से भी दूरी है,
आईनों में भी अपना असर नहीं आया।

— Furkan S Khan Feels

26/07/2025

रोशनी ने चाँद से पूछा तो हया आ गई,
रात की रूह में इक नई अदा आ गई।

वफ़ा के किस्से लिखे थे रेत पर मैंने,
तेरे आने की खबर थी तो हवा आ गई।

हिज्र की राह में ठहरी थी मेरी साँसें,
तेरा नाम लिया तो नई सदा आ गई।

मौत से डर के जो जीते थे सदीयों तक,
फुरक़ान को हँसते देखा तो दुआ आ गई।

हमने तन्हाई से बातें कीं मगर क्या कहें,
तेरी यादों में भी शायरी खुद-ब-खुद आ गई।

— Furkan S Khan Feels

26/07/2025

उसके के शहर में कुछ बातें अजीब थीं,
सन्नाटे में भी आवाज़ें करीब थीं।

गुज़रे दिनों की महक से गलियाँ महक उठीं,
जैसे पुराने ख़तों में छुपी तरकीब थीं।

वक़्त ने कितने चेहरे बदल दिए एक पल में,
हम सोचते रहे, शायद वही तदबीर थीं।

रात की ओट में चुपके से बातें हुईं,
ख़्वाहिशें भी जैसे दिल की रक़ीब थीं।

फ़ुरक़ान ने जब लफ़्ज़ों को सजाना शुरू किया,
महफ़िल में ग़ज़लें नहीं, कहानियाँ नसीब थीं।

— Furkan S Khan Feels

26/07/2025

हवा में अब भी तेरी ख़ुशबू टहलती है,
तेरे बिना भी ये दुनिया सँभलती है।

वफ़ाओं की क़ीमत यहाँ कौन जाने,
यहाँ तो याद भी किस्मत से मिलती है।

हिज्र में बीती हर एक रात ने सिखाया,
कि रूह दर्द में कैसे मचलती है।

मौत आई तो अहसास हुआ एक लम्हे को,
ज़िंदगी भी किसी ख्वाब सी निकलती है।

हमने अश्कों से सजाई है ये महफ़िल,
तभी तो ग़ज़ल भी दिल से निकलती है।

— Furkan S Khan Feels

26/07/2025

वक़्त के आईने में चेहरा बदलता देखा,
हर घड़ी को किसी ख़्वाब सा ढलता देखा।

वफ़ा की राह पे चलते रहे उम्र भर,
मगर हर मोड़ पे वादा भी टलता देखा।

हिज्र की रात ने नींद छीन ली आँखों से,
सवेरा आया तो दिल और भी जलता देखा।

मौत की आहट पे सन्नाटा उतर आया,
ज़िंदगी को चुपके से फिसलता देखा।

हमने तन्हाई से बातें कीं बहुत रातों तक,
और हर लफ़्ज़ में अपना ही हल चलता देखा।

— Furkan S Khan Feels

24/07/2025

"हिज्र की रात"

हिज्र की रात थी, चाँद भी बेहाल था,
दिल मेरे पास था, जिस्म कहीं और था।

नींद की राह में तेरा ही ख़्वाब था,
जैसे हर एक लम्हा तुझसे सवाल था।

तेरी यादें सहर तक जलाती रहीं,
मैं बुझा भी नहीं, और मैं राख भी था।

तेरे क़दमों की आहट न आई कभी,
घर तो अब भी वही है मगर ख़ामोश था।

हम जो बिछड़े तो यूँ टूटी हर इक चीज़,
आईना तक भी अब मुझसे ख़फ़ा था।

— Furkan S Khan Feels

24/07/2025

"वक़्त के साथ..."

वक़्त के साथ सब कुछ बदलता गया,
जो मेरा था, वो भी फिसलता गया।

वफ़ा के लिये दिल तरसता रहा,
और वो बेवफ़ाई में ढलता गया।

हिज्र की रातें तवील थीं बहुत,
चाँद भी पर्दे में छुपता गया।

मौत जब आई तो हँस कर मिली,
ज़िंदगी का बोझ हल्का हुआ।

किससे कहें हम दर्द-ए-दिल अपना,
हर कोई बस वक़्त पर टलता गया।

— Furkan S Khan Feels

24/07/2025

"ख़ुद से एक बात हुई थी"

ख़ुद से एक बात हुई थी रात के सन्नाटे में,
तेरा ज़िक्र आ गया था दर्द की आवाज़ में।

चाँद भी ख़ामोश था, तारों की महफ़िल बुझ गई,
क्या मिला है तुझको मुझसे दूरी के अंदाज़ में?

आईने से कह दिया, अब तुझे देखा न जाए,
अपना ही अक्स दुश्मन लगे इन अल्फ़ाज़ में।

लोग तो दुनिया निभाते हैं फ़क़त चेहरों से,
हमने ढूँढा तुझको हर इक दिल के अंदाज़ में।

तेरी ख़ुशबू आज भी आती है सजदों के बाद,
जैसे तू शामिल हो हर एक नमाज़ में।

— Furkan S Khan

15/07/2025

ख़यालों में हम तेरे उम्र भर चल दिए थे,
न जाने कहाँ तक ये पाँव थक गए थे।

वो मौसम, वो बादल, वो पहली सी बारिश,
तेरे साथ लम्हे भी कैसे सज गए थे।

न कोई शिकायत, न शिकवा रहा अब,
हम तन्हा बहुत अपने दिल से कह गए थे।

कभी फूल थे हम भी बाग़-ए-वफ़ा में,
तेरे रूठ जाने से कांटे बन गए थे।

ये किस मोड़ पर आज लाई है क़िस्मत,
जहाँ हम कभी साथ चलते गए थे।

— Furkan S Khan

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Yasmeen
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