23/08/2026
مسافر
- شاعرِ عظیم لکشمی پرساد دیوکوٹا
.....
کس مندر کو جاؤ گے مسافر، کس مندر میں جانا ہے؟
کس مواد سے عبادت کرنا، ساتھ کیسے لے جانا ہے؟
انسانوں کے کندھے چڑھ کر، کس جنت کو پانا ہے؟
ہڈیوں کے جاذب کھمبے، گوشت و خوں کی دیواریں،
ذہن کا یہ سنہرا عرش، احساسات کے دروازے،
دریائے رگ کی مائی لہریں، خود ہی مندرِ زبر—
کس مندر کو جاؤ گے مسافر، کس مندر کے در؟
دل کا جمیل تخت پہ ہے، اکبرِ جہاں کا راج،
شعور کا یہ نورِ سنہرا، اس کے سر کا تاج،
جسم کا یہ مندرِ جمیل، ارضِ جہاں مرکز۔
خدا ہے اندر، چشمِ نمائی سے ڈھونڈتے پھرے ہو کون سا پُر؟
رہتا ہے خدا گہرائیوں میں، سطحوں پہ بہتے ہو کتنی دور؟
جستجو کرو گے؟ نورِ دل کی شمع جلا کے بھرپور؟
دوست مسافر، سرِ سڑکوں پہ چلتا ہے خدا ساتھ ساتھ،
چومتا ہے خدا، کام سنہرا کر رہا انسانی ہاتھ،
چھوتا ہے وہ پیشانیِ خادم، بڑھا کے اپنا طلسمی دشت۔
سڑک کنارے گاتا ہے خدا ترنمِ مرغاں میں،
بولتا ہے خدا انسانوں کے نغمۂ درد و احزاں میں،
دیدار کہیں دیتا نہیں پر، چشمِ جاہل کے نظاروں میں—
کس مندر کو جاؤ گے مسافر، کس نو جہاں کے ویرانوں میں؟
آؤ، آؤ، واپس آؤ، جاؤ پکڑو پائے انسان،
مرہم لگا لو سلگتے ہوئے زخمِ بیمار و بے چین،
ہنسا لو چہرۂ روشنِ خدا، ہو تم گر ایک انسان۔.............................
نیپالی سے اردو ترجمہ — سمن پوکھریل.......................................................................................................................
मुसाफिर
- शाइर-ए-अज़ीम लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा .....
किस मन्दिर को जाओगे मुसाफ़िर, किस मन्दिर में जाना है?
किस मवाद से इबादत करना, साथ कैसे ले जाना है?
इन्सानों के कन्धे चढ़कर, किस जन्नत को पाना है?
हड्डियों के जाज़िब ख़म्भे, गोश्त-ओ-ख़ूँ की दीवारें,
ज़ेहन का ये सुनहरा अर्श, एहसासात के दरवाज़े,
दरिया-ए-रग की माई लहरें, ख़ुद ही मन्दिर-ए-ज़बर—
किस मन्दिर को जाओगे मुसाफ़िर, किस मन्दिर के दर?
दिल का जमील तख़्त पे है, अकबर-ए-जहाँ का राज,
शऊर का ये नूर-ए-सुनहरा, उसके सर का ताज,
जिस्म का ये मन्दिर-ए-जमील, अर्ज़-ए-जहाँ मरकज़।
ख़ुदा है अन्दर, चश्म-ए-नुमाई से ढूँढते फिरे हो कौन सा पुर?
रहता है ख़ुदा गहराइयों में, सतहों पे बहते हो कितनी दूर?
जुस्तजू करोगे? नूर-ए-दिल की शम्मा जला के भरपूर?
दोस्त मुसाफ़िर, सर-ए-सड़कों पे चलता है ख़ुदा साथ-साथ,
चूमता है ख़ुदा, काम सुनहरा कर रहा इन्सानी हाथ,
छूता है वो पेशानी-ए-ख़ादिम, बढ़ा के अपना तिलस्मी दश्त।
सड़क किनारे गाता है ख़ुदा तरन्नुम-ए-मुर्ग़ानों में,
बोलता है ख़ुदा इन्सानों के नग़्मा-ए-दर्द-ओ-अहज़ानों में,
दीदार कहीं देता नहीं पर, चश्म-ए-जाहिल के नज़ारों में—
किस मन्दिर को जाओगे मुसाफ़िर, किस नौजहाँ के वीरानों में?
आओ, आओ, वापस आओ, जाओ पकड़ो पा-ए-इन्सान,
मरहम लगा लो सुलगते हुए ज़ख़्म-ए-बीमार-ओ-बेचैन,
हँसा लो चेहरा-ए-रौशन-ए-ख़ुदा, हो तुम गर एक इन्सान।
...................................................
नेपाली से उर्दू तर्जुमह - सुमन पोखरेल ...................................................
❤️🙏❤️...................................................
#नेपालीसाहित्य #नेपालीकविता #लक्ष्मीप्रसाददेवकोटा #देवकोटा #सुमनपोखरेल #उर्दुअनुवाद #मानवता #मानवतावाद #आध्यात्मिकता #जीवनदर्शन
#انسانیت
मुसाफिर / लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा / सुमन पोखरेल - कविता कोश भारतीय काव्य का विशालतम और अव्यवसायिक संकलन है जिसमें हि.....