20/10/2025
🪔 छोटी दिवाली/ नरक चतुर्दशी / रूप चौदस
दिवाली यानी आनंद, प्रकाश और उत्सव का त्योहार। लेकिन इस दिवाली का पहला दिन होता है “नरक चतुर्दशी”, जिसे हम प्यार से “छोटी दिवाली” या “रूप चौदस” भी कहते हैं।
🗓️ कब मनाई जाती है?
नरक चतुर्दशी दिवाली से एक दिन पहले, कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
क्योंकि यह बड़ी दिवाली से पहले आती है, इसलिए इसे छोटी दिवाली कहा जाता है।
🌅 इस दिन क्या किया जाता है?
• शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए सुबह-सुबह तेल स्नान (अभ्यंग स्नान) किया जाता है, जिसमें उबटन (हर्बल पेस्ट) का उपयोग किया जाता है।
• धर्म और प्रकाश के सम्मान में घर में आकाशदीप (कंदील) और दीये जलाए जाते हैं।
• घर के देवताओं, विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण, देवी लक्ष्मी और भूदेवी की पूजा की जाती है।
• पारंपरिक मिठाई, तांदूले के व्यंजन और फूलों से बना प्रसाद अर्पित किया जाता है।
सूर्योदय से पहले उठकर कारिट फल (कड़वा फल) को दरवाज़े की चौखट पर बाएं पैर के अंगूठे से फोड़ा जाता है और उसका रस जीभ पर लगाया जाता है — यह नरकासुर का प्रतीक है।
यह कार्य कटुता, दुष्टता और बुरी आदतों (जैसे नशा) के नाश का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी को काम्य व्रत कहा जाता है — जिसका अर्थ है धन, पुत्र, और सफलता की कामना से पूजा करना।
⚔️ कथा – नरकासुर का अंत
नरकासुर एक प्रसिद्ध राक्षस था, जिसे पृथ्वी (भूदेवी) के गर्भ से उत्पन्न विष्णुपुत्र कहा जाता था। वह विष्णु के वराह अवतार के समय पैदा हुआ था, जब विष्णु ने पृथ्वी को पाताल से मुक्त कराया था।
नरकासुर ने प्राग्ज्योतिषपुर में अपना साम्राज्य स्थापित किया। राजा जनक ने उसे 16 वर्ष की आयु तक पाला-पोसा था। बाद में विष्णु ने उसे उसी राज्य का राजा बना दिया।
शुरुआत में वह न्यायप्रिय राजा था, लेकिन बाद में बाणासुर की संगति में दुष्ट बन गया।
वशिष्ठ मुनि ने उसे श्राप दिया कि उसका वध विष्णु के हाथों होगा।
ब्रह्मदेव से वर प्राप्त करने के बाद, उसे यह आशीर्वाद मिला कि उसका वध केवल उसकी माता या उसके समान किसी स्त्री के हाथों होगा।
वर पाकर वह अहंकारी बन गया —
उसने 16,100 राजकुमारियों का अपहरण किया, देवी अदिति के कुंडल और वरुण देव का छत्र भी छीन लिया। वह देवताओं, गंधर्वों और मनुष्यों के लिए आतंक बन गया।
नरकासुर देवी कामाख्या से विवाह करना चाहता था। देवी ने शर्त रखी कि वह एक रात में नीलाचल पर्वत की चोटी तक सीढ़ियाँ बनाए।जब उसका कार्य लगभग पूर्ण हुआ, तो देवी ने मुर्गे की बाँग से उसे भ्रमित कर दिया।वह काम अधूरा छोड़कर चला गया — आज भी उस अधूरी सीढ़ी के अवशेष "मेखेलौजा पथ" कहलाते हैं।
देवता इंद्र के नेतृत्व में विष्णु के पास गए और मदद माँगी।
विष्णु ने अपनी पत्नी सत्यभामा (जो भी भूदेवी की पुत्री थीं) को साथ लिया और नरकासुर का वध किया।
मृत्यु से पहले नरकासुर ने वर माँगा —
“जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करेगा, उसे नरक से मुक्ति मिले।”
इसलिए आज के दिन अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है।
वध के बाद भूदेवी ने श्रीकृष्ण को वैजयंती माला और रत्न अर्पित किए।
कृष्ण ने सभी बंदी स्त्रियों को मुक्त कर उन्हें सम्मान दिया।
नरकासुर के वध से सबने राहत की साँस ली।
इसलिए नरक चतुर्दशी उत्सव के रूप में मनाई जाती है, न कि शोक के रूप में।
💃 “रूप चौदस” क्यों कहते हैं?
इस दिन सुबह तेल लगाकर उबटन (चंदन, बेसन, केसर आदि) से स्नान किया जाता है।
इससे शरीर शुद्ध होता है और चेहरे पर स्वाभाविक चमक आती है।
इसलिए इसे रूप चौदस कहा जाता है — यानी अपने सौंदर्य और तेज का उत्सव!
🪔 १४ दीये क्यों जलाए जाते हैं?
कहा जाता है कि इस दिन हमारे 14 पीढ़ियों के पूर्वज हमें आशीर्वाद देने आते हैं।
ये 14 दीये उन्हें हमारे घर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
ये पूर्वजों की स्मृति और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक हैं।
🌼 आज के समय में इसका अर्थ
आज का “नरकासुर” हमारे भीतर की बुरी आदतें हैं —
क्रोध, नशा, स्वार्थ, और मोबाइल का अत्यधिक उपयोग।
इस त्योहार का संदेश है:
“मन के नरकासुर का अंत करो और अपने भीतर प्रकाश लाओ।” ✨
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