Tum Hamesa Mere Shath Ho

Tum Hamesa Mere Shath Ho Love

05/06/2023

“सफ़र”

ये सफ़र रुक गया वहीं
उन वादियों को मन में समेट कर
हम आशियाने को लौट आए हैं

वो पहाड़,वो बर्फ़,उन ऊँचाइयों को
अगले मिलन के वादे के साथ
उन्हें बेशक़ीमती यादों
के साथ छोड़ आए हैं

उन नज़ारों को अलविदा कहना
आसान नहीं था यारों
मगर करते भी क्या
कुछ सुकून साथ लाएँ हैं
और ख़ुद का कुछ हिस्सा
वहीं छोड़ आए हैं

05/06/2023

गहराइयों से कुछ नहीं लेना मुझ को,
किनारा हूँ बस साथ साथ चलने दे...

03/12/2022

मेरे अल्फ़ाज़✍🏻✍🏻

आँख भर आए पर छलक न पाए
तब क्या कीजे?
कोई दिल तोड़ जाए
और साथ छोड़ जाए
तब क्या कीजे?

कोई ख़्वाब देखा हो
और पूरा न हो पाए
तब क्या कीजे ?

ये इम्तिहान है ज़िंदगी के
चलते ही रहेंगे
ज़िंदगी के साथ चलो
तो न रोना पड़ेगा
और न ही कोई ख़्वाब टूटेगा

गुलज़ार साहब ने लिखा है न
‘ए ज़िंदगी गले लगा ले’

अmit

29/10/2022

मेरे अल्फ़ाज़✍🏻✍🏻

ग़म की हैसियत तो देखो
ख़ुशनुमा शामों पर
ग्रहण सा छाया है

पर क्या पता इसे
कि हम पर भी ख़ुद की
खुमारी का साया है
अmit

05/10/2022
28/09/2022

💕💕💕जिस पल आप दिल से मुस्कुराओगे 💕💕💕

💕💕💕अपनी हँसी में हमारी💕💕💕💕
💕💕💕झलक पाओगे💕💕💕

💞💞💞

💕💕💕💕ये न समझना कि साथ छोड़ देंगे हम पलट💕💕💕 कर देखोगे तो💕💕💕 हर राह पर हमें पाओगे 💞💕💕

27/09/2022

अंतहीन गगन में
विछोह की हर रात
किसी के अधूरे मन को
सम्पूर्ण करता है
एक छोटा सा
टुकड़ा चाँद का....!

27/09/2022

कश्तियों में छेद है कितने
मन के मतभेद है कितने

होने को सब अपने लगते
जख्म दिए कुरेद कितने

नकली चेहरे देख लिए अब
रंगने को है रंगरेज कितने

इश्क मोहब्बत सब छलावा
दिलों में रखते भेद कितने

असली सूरत ना काफ़ी है
नकली से परहेज कितने

चंद कदमों पर रहे बिछड़ फिर
आशिक है दिल फेक कितने ...
अmit

27/09/2022

एहसास,
शब्द
और तुम

प्रेम,
समर्पण
और मैं

बारिश,
जमीं
और बादल

बड़ा ही आलौकिक
संबंध है इनका

जाने क्यों
ऐसा लगता है
ये बने ही हैं सिर्फ
एक दूजे के लिए...

ऐसे भाव
जो बयां
किए बिना ही
उन तक
स्वत:
पहुंच जाते हैं

जैसे
मैं और तुम
ऐसे ही हैं न

जैसे
सूर्य के साथ
प्रकाश का होना

चंद्रमा के साथ
शीतलता
का होना

जैसे
पुष्प के साथ
सुगंध का होना

जैसे
जल के साथ
तरंग का होना

और जैसे
तुम्हारे मन में
मन का होना

अmit®

26/09/2022

उन से अब शिकवे -शिकायत कैसी,
जो अपने नही, उनकी चाहत कैसी....

दिल तोड़ के मेरा,
समझती है वो बेगुनाह खुद को,
उनकी तो ये आदत, इसमें हैरत कैसी.....

हंस कर के मेरे हाल पे,
सिकंदर समझती है खुद को,
निभाना उन्हें न आया,
तो हम पे तोहमत कैसी..

तुम ख़ास हो, जो कहती थी
मुझ को हर बात पे,
पल में गैर कर गई,
उनकी, खुद के दिल से ये बगावत कैसी..

दिल अब भी तेरी
फिक्र करता, जाने क्यूं?
जो मुहब्बत ही नही दरम्यान

फिर तेरी इबादत कैसी.....
अmit

26/09/2022

"मै डरता नही उसकी कद्र करता हूँ
उसका सम्मान करता हूँ।

-" कोई फरक नही पडता कि वो कैसी है
पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।"

माँ बाप रिश्तेदार नही होते।
वो भगवान होते हैं।उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं।

भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं ,
दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है।
आपका मेरा रिश्ता भी जरूरत और पैसे का है

पर,
पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है

अपने सारे रिश्ते को पीछे छोडकर।

और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है

आखिरी साँसो तक।"

पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पूरा रिश्तों की भण्डार है।

जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है ,
हमसे दुलार करती है तो एक माँ जैसी होती है।

जब वो हमे जमाने के उतार चढाव से आगाह करती है,और मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ क्योकि जानता हूँ वह हर हाल मे मेरे घर का भला करेगी तब पिता जैसी होती है।

जब हमारा ख्याल रखती है हमसे लाड़ करती है, हमारी गलती पर डाँटती है, हमारे लिये खरीदारी करती है तब बहन जैसी होती है।

जब हमसे नयी नयी फरमाईश करती है, नखरे करती है, रूठती है , अपनी बात मनवाने की जिद करती है तब बेटी जैसी होती है।

जब हमसे सलाह करती है मशवरा देती है ,परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, झगड़े करती है तब एक दोस्त जैसी होती है।


जब वह सारे घर का लेन देन , खरीददारी , घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है तो एक मालकिन जैसी होती है।

और जब वही सारी दुनिया को यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी छोडकर हमारे बाहों मे आती है
तब वह पत्नी, प्रेमिका, अर्धांगिनी , हमारी प्राण और आत्मा होती है जो अपना सब कुछ सिर्फ हमपर न्योछावर करती है।"

मैं उसकी इज्जत करता हूँ तो क्या गलत करता हूँ.
अmit

26/09/2022

भर जाती हो,
उर में आनंद,
नीरव मन में,
हर्ष जगाती हो।
हरा -भरा कर देती हो,
मन का आँगन,
दबे पाँव जब तुम,
मेरी ओर आती हो।

लिख देती हो पलकों पर,
इक स्वप्न सजीला,
सुनहरी संभावनाओं से,
रचती हो अंबर नीला-नीला।
आधी बातें अधरों पर,
आधी आँखों में लेकर,
मंदिम-मंदिम मधुर रागिनी,
पथ पर फैलाती हो।
दबे पाँव जब तुम,
मेरी ओर आती हो।

इक-इक पग तुम्हारा जब,
मेरी ओर चलता है,
आशाओं को पुष्पित करता,
नया सवेरा खिलता है।
मधुरस का झरना तुम्हारी,
कोमल, चंचल, वाणी
संघर्ष पथ पर बाँहें फैलाएं,
मेरी नित नयी प्रेरणा बन जाती हो,
दबे पाँव जब तुम,
मेरी ओर आती हो।

तुम सृजन हो,
जीत का,
तुम सौभाग्य ,
हृदय की प्रीत का।
धूल भरे जग में हँसकर,
खोल देती हो बंद तकदीरें,
कहकर अपना मुझको,
दिव्य, प्रेम-आलोक से,
भर जाती हो।
दबे पाँव जब तुम,
मेरी ओर आती हो।
✍️
अmit

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