16/01/2026
कौन थे “कुँवारा भिवसेन” (भीमाल पेन)?
कुँवारा भिवसेन, जिन्हें गोंड समाज में भीमाल पेन कहा जाता है, संपूर्ण गोंडवाना की आस्था का केंद्र हैं।
यह पवित्र स्थल आज के महाराष्ट्र राज्य के नागपुर ज़िले के पारशिवनी तहसील में स्थित है।
हर वर्ष चैत्र महीने में यहाँ सव्वा महीने तक चलने वाली जत्रा (मेला) लगती है, जिसमें पूरे गोंडवाना से श्रद्धालु आते हैं।
भीमाल पेन के जीवन और इतिहास की यह कथा तिरुमाल शंकरराव मरस्कोल्हे (नागपुर) की पुस्तक पर आधारित है।
प्राचीन काल की पृष्ठभूमि
कहा जाता है कि रावण काल से लगभग 700 वर्ष पूर्व, वर्तमान मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले में मोहमभट्टा राज्य था।
इस राज्य के राजा थे सयमाल मडावी, और उनकी रानी का नाम था झमया।
राजा-रानी को एक पुत्र हुआ, जिसका नाम भुरा भगत था।
भुरा भगत अत्यंत साहसी, बलवान और निर्भीक थे। जंगल में अकेले जाकर हिंसक पशुओं का शिकार करना उनका शौक था।
भुरा भगत और कोतमा का विवाह
एक दिन भुरा भगत शिकार के लिए बैहर के जंगल (आज का कान्हा-किसली क्षेत्र) गए।
उसी दिन उसी क्षेत्र के राजा ढोला उइका, अपनी पुत्री कोतमा के साथ वहाँ आए थे।
संयोगवश भुरा भगत और कोतमा पानी की तलाश में एक तालाब के किनारे मिले।
पहली ही भेंट में दोनों एक-दूसरे से प्रभावित हुए।
कुछ समय बाद राजा ढोला उइका वहाँ पहुँचे।
भुरा भगत के तेज और व्यक्तित्व को देखकर उन्होंने अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा।
परिवारों की सहमति से भुरा भगत और कोतमा का विवाह संपन्न हुआ।
भीमा का जन्म
विवाह के बाद कोतमा गर्भवती हुईं।
चैत्र पूर्णिमा के दिन, जंगल में रहते हुए, उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया।
उस बालक का नाम रखा गया — भीमा।
पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया।
गोटूल शिक्षा और अलौकिक प्रतिभा
पाँच वर्ष की आयु में ही भीमा को गोटूल में शिक्षा हेतु भेज दिया गया।
उस समय गोटूल के मुखिया (मुर्सेनाल) थे माहारू उइका, जो भीमा के गुरु बने।
भुरा भगत और कोतमा को कुल 11 संतानें हुईं —
6 पुत्र: भीमा, जाटबा, केशबा, हिरबा, भाजी, मुकोशा
5 पुत्रियाँ: पंधरी, पुन्गार, मुगुर, कुशार, खेरदाई
भीमा असाधारण प्रतिभा के धनी थे।
वे लाठी, मुष्टि, मल्लविद्या, धनुर्विद्या, योग, तंत्र-मंत्र, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र और राजकाज में पारंगत थे।
इतिहासकारों के अनुसार, भीमा गोंडी धर्म के चौथे मुठवा (धर्मगुरु) थे।
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