अपनी अथाईं

अपनी अथाईं सांस्कृतिक विमर्श

09/07/2026

चाल खलन की देख सुजन सब
चलते चरण संहाल।
मची कीच लख होती नैयाँ
किसकी धीमी चाल??

बहुत भले बन टिक नहिं सकते
कभी नीच के आगे।
हौले चले, वसन में फिर भी
दाग कीच के लागे।।
खल की देख खोपड़ी सूझै
शैतानी हर काल।
मची कीच लख होती नैयाँ
किसकी धीमी चाल??1।।

शैतानी जालों के धीरे
से सुलझाओ धागे।
रपट पड़ोगे दद्दा तुम जो
जरा तेज सा भागे।।
इक दो डग की पङ्क तोई तुम
भरियो तनक उछाल।।
मची कीच लख होती नैयाँ
किसकी धीमी चाल??2।।

https://youtu.be/dSIclPtZe9Q?si=oxiFEzT8RxYfGy4O
31/05/2026

https://youtu.be/dSIclPtZe9Q?si=oxiFEzT8RxYfGy4O

श्रद्धेय चाचाजी स्व. पं. श्री लक्ष्मीकान्त शर्मा जी के चरणों में षष्ठ भावप्रसूनाञ्जलि

https://youtu.be/xv-m88iFFy0?si=FwojnvCtHZHKjvvH
31/05/2026

https://youtu.be/xv-m88iFFy0?si=FwojnvCtHZHKjvvH

पञ्चम तिथ (पुण्य तिथि- ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी) को हिरण के साथ वाला चाचाजी का चित्र देखकर मन अटक गया और वहीं से कुछ शब्द ...

30/05/2026

नजरों पे रख नजर
हृदय पहचान लो।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।

गहराई आँख की कहे
उर की विशालता।
फेरी सी आँख कह उठे
कि तू है सालता।।
हो नैन में चमक तो
मीत मान लो।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।।1।।

झाँकें जरा जरा में जो
देखो मचल मचल।
खुद आय छलक जाय
विषहृदय का देख छल।।
भ्रूभङ्ग तनित देख
रार ठान लो।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।।2।।

अपलक नयन है सोच
कोइ मन में चल रहा।
रूखा भी लगे जानिए
अवसाद पल रहा।।
छन्नी नजर की साथ
सत्य छान लो।।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।।3।।

ऊँची चितौन गर्व की
जो रोष दिखे सङ्ग।
चहरा उठात जो उठे
तो प्रश्न करे दङ्ग।।
लुकझुक करे तुरत
तो समाधान लो।।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।।4।।

तिरछी नजर में व्यंग्य है
नीची नजर में डर।
जो दृष्टि दिखे सम तो वो
विश्वास का है घर।।
जो कम दिखे तो कल्पना
का यान लो।
मुखड़े का मौन मुख
है नयन जान लो।।5।।

15/05/2026

बुन्देली बब्बा और दुनिया की सैर
मुलक साल पेले बुन्देलखण्ड में एक बब्बा हते। पैरन में फिरकनी हती बब्बा के, सो एक जगे न टिक पात हते। घूमत.ई रेत थे। बब्बा ने बा सारी दुनिया नाप डारी थी, जे को लोगबाग जानत न हिते। जे आजकल जो देसन के नाम चल रये, बे बब्बा की बदौलत.ई लोगन ने जाने।
एक बेर बब्बा मानसरोवर खों गयॆ। दरसपरस करके तफरी करके, थोड़ो और रिंग गयॆ। लौटे सो एक इंगरेज मिलो, पुरानो जानपिचान बारो हतो, पर बब्बा बा की भासा न जानत हिते और न बो बब्बा की। बस अन्दाजे से.ई कछू कछू सबाल जबाब कर लेत हते। सो बाने......इंगरेज ने..ए, अपनी भाषा में पूछी कि बब्बा किते से आ रयॆ? बब्बा समझे के जो पूछ र.ओ के तुम मोय जान रयॆ के न.ईं? सो बोल परे के, अच्छे से चीन गयॆ। और तब.ईं से बा देस को नाम चीन पर ग.ओ।
एक बेर बब्बा चीन से थोड़ो और उत्तर खों रिंग गयॆ। बब्बा को एक संगाती हितो, सो क.ईं हिरा ग.ओ। भोत देर भयॆ पे बब्बा ए बाकी सुरत आई। अब जैसेई बो मिलो तो, किरोध करन लगो। बाकी बड़ी मिन्नतें कर बब्बा ने बाए मनाओ। भाँ से लौटे तो इंगरेज ने फिर अपनी बोली में पूछी कि कौन देस निकर गयॆ थे? बब्बा ने समझी कि जो पूछ र.ओ, के का भ.ओ थो? सो बब्बा बोल परे के मेरो जो संगाती रूस ग.ओ थो। और बा देस को नाम.ई तबसे रूस चल परो।
रूस और चीन के बीच में बब्बा अटके हते, ब.ई टेम पे मंगल की दसा ने आ के भटका द.ओ। बब्बा थे खुद.ई भोत बड़े जोतसी। फटाक से उपाय सोच ल.ओ के मूँगा पेरबे से आराम मिल सकथ है। उनको मोड़ा हतो संग, सो बा में ठूँसा देके बोले के नैक दौड़ तो रे। मोड़ा ने पूछी के काय? का हो ग.ओ। बब्बा बोले के मोपे चल रयॆ मंगल, सो तू नैक बजार से मूँगो लिया। भाँ के लोगन खों मूँगोलिया बड़ो अच्छो लगो सुनन में तो बिनने देस को नाम.ई मंगोलिया धर ल.ओ।
चीन से समन्दर पार एक देश में अपने इंगरेज संगाती और दो तीन जनेन के साथ बब्बा ने पकवान खावे की सोची। एक संगाती मुलक पकवान चर ग.ओ, अब घबरात फिरे के मेरो जी फिर र.ओ। बब्बा का करूँ के उल्टी न होय। बब्बा बोले के इते काय ओंकवे फिर र.ओ जा पान खा ले जाके किंथ.ऊँ। इंगरेज समझो के देश को नाम है जापान।
एक बार बब्बा बंगाल (जब पूरो हितो) से नैक आगे निकर ग.य। उनके साथ एक मुसलमान संगाती हतो। बा ने बताई के इते एक बीबी ने अपने मियाँ ए मार डारो थो। बब्बा बोले कि अरे जा जगह तो मियाँमार है। सो तबहिं से बा जगह मियाँमार से होत भ.ई म्याँमार कहलान लगी।
एक बेर बब्बा पच्छिम को चले। एक देश में रुके तो कोई पूछो के इते लोग एक दिना में कित्तो कमा लेयँ? बब्बा बोले के पैसा बारेन को देस है। एक दिना में एक अरब तक कमा लेत बाजी बेर। सो तब.ईं से बो देस हो ग.ओ अरब। उते से आगे की एक ने पूछी के बब्बा कभी इते ग.य थे का? सो बब्बा बोले के हम तो न ग.य, हमरे इते के एक मिस्सर जी ग.य थे। सो बो देस हो ग.ओ मिस्र। अब बब्बा मिस्र से दक्खन को चले, तो एक संगाती हिरा ग.ओ। सब.ई घबरा के पूछन लगे के काँ ग.ओ थो ? सो बा जगे हो ग.ई कांगो। उथ.ईं किथ.ऊँ बब्बा ए एक भूखी बिलैया मिली। बब्बा ने दूध मँगा के पिलाओ। बिलैया खूब दूध पी ग.ई, तो बब्बा पूछे के काय बिन्ना तू अफरी का? जा फिर और दूध चाने? और देश बन ग.ओ?. अफ्रीका।
बब्बा के संगाती हिते एक सरदारजी। नाम हतो अमरीक सिंह। बब्बा प्रेम से अमरीका बोलत हिते उनखों। उनको धन्धो थो केओला को। कोल केत थे बाये। सो दोई गुइयाँ समन्दर पार निकर गये जहाज से। कोल की गाड़ियें भर के सँग ले के ग.ए थे। भाँ के लोगन ने समझी के बब्बा मिठाई लाओ हैगो। आगलगाने भकस के खा गए। जेसेइ नासमिटे करिया हो गए। पूरी एक गाड़ी निपटा के इशारे से कैन लगे के बाबा और देओ। सिरदार जी बोलन चाहे के कोल हम और लाय देयँ। लेकिन 'कोल हम' इत्तो ही बकरे थे के बब्बा बोल पड़े बस्....स। ठठरीबँधेन ने पूरी गाड़ी खा डारी। अब का मोय खैहें? ब.ई टेम एक इँगरेज उते रिंग आओ थो, सो बो पूछ र.ओ थो बब्बा को नाम। और तब.ईं बाने सिरदार जी को 'कोल हम' और बब्बा को 'बस' सुनो सो बाय लगी के जे के रयॆ कोलम्बस सो जबईं से बब्बा बन गए कोलंबस। फिर बाने देश को नाम पूछो, तो बब्बा समझ न सके सो सिरदार जी से बोले के अमरीका, यार तू बता दे जरा। इंगरेज समझो के देश को नाम है अमरीका, सो तब.ईं से जो नाँव पर ग.ओ। और दुनिया केन लगी के कोलम्बस ने इमरीका की खोज करी हती।
ऐसेई उथ.ईं क.ईं घूमत एक जगे सिरदार जी पजामा धोके सुखाबे डारे थे के हवा में उड़ के किथ.ऊँ हिरा ग.ओ। दोई जने बाय ढूँड़ रयॆ थे के इत्ते में कोई ने पूछी के का नाम है झाँ को? पर बब्बा समझे के पूछ र.ओ के का हिरा ग.ओ? सो बब्बा बोल परे के पजामा। उते वारो सुनो पनामा और उते को नाम तबहिं से हो ग.ओ, पनामा।
तो भैया बब्बा ने ऐसे दुनिया की सैर करी। और इत्ते देशन के नाम धरा ग.ये ज.ई. से।

03/05/2026

बंगाल में किसी की भी जीत को सफलता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि फलता का चुनाव तो रद्द हो गया। इसलिए जिसकी भी जीत होगी, वह होगी अ-स-फलता ही।

03/05/2026

जब भी पड़ो अकेले मिलना
कुई न संगी हाथ।
सच जानो, पर देते रहियो
जग में सबका साथ।।

नहीं पराये, होते अपने
पर रह जाते दूर।
दिल अच्छा पर हालातों से
हो जाते मजबूर।
नहीं सुनाओ कभी किसी को
सब हैं बिना कसूर।
किस्मत मजे लेन को ठाड़ी
भरे आँख में धूर।।
बड़ी दूर से हैं मुसकाये
देखें दीनानाथ।
सच जानो, पर देते रहियो
जग में सबका साथ।।1।।

खुद से सीखो, यही सिखाता
यार अकेले चलना।
आ जाता है देख स्वयं ही
गिर गिर पुनः सँभलना।
हाल हजारों सिखला देते
हर हालत में ढलना।
रहे अकेले बच्चा भूले
फिर फिर यहाँ मचलना।।
खुद की नजर, उठा के चलिए
ऊँचा अपना माथ।।
सच जानो, पर देते रहियो
जग में सबका साथ।।2।।

वीर पुरुष एसी में दुबकेतज दुपहरिया घाम।और तनक छन सन तन सींचाहुइहे करिया चाम।।देख जोइ थो सूरज हमसेछिपतो थो बरखा में।और ठं...
01/05/2026

वीर पुरुष एसी में दुबके
तज दुपहरिया घाम।
और तनक छन सन तन सींचा
हुइहे करिया चाम।।

देख जोइ थो सूरज हमसे
छिपतो थो बरखा में।
और ठंड में तनक दिन चढ़े
कर देतो थो शामें।।
जेसे जासे मतलब नैयाँ
कह बैठे निज धाम।।
वीर पुरुष एसी में दुबके
तज दुपहरिया घाम।।1।।

राहु आन जो गरदन पकड़ी
कौन गैल में भागो?
करिया मों अपनो करवा लओ
तब जाके जो जागो।।
बोइ बरन राहू को बाँटै
खोज खोज हर ठाम।
वीर पुरुष एसी में दुबके
तज दुपहरिया घाम।।2।।

01/05/2026

टूटता शरीर लिये दौड़ जा
बैठने का काम नहीं जिन्दगी।
भस्म से भवन सपन के गढ़ चलो
हारने का नाम नहीं जिन्दगी।।

लक्ष्य है पहाड़
राह में कटीले झाड़
और फूलती है दम
यही सचाई है।
है समुद्र बीच में
पाँव खचे कीच में
वात ने भी धूम
आ मचाई है।।
दोपहर की धूप देख जेठ की
कुई सुहानी शाम नहीं जिन्दगी।।
भस्म से भवन सपन के गढ़ चलो
हारने का नाम नहीं जिन्दगी।।1।।

है इरिण का थल
न कहीं बूँद एक जल
डगर में फिर भी डग को
नाहिं डगमगान दे।
क्या लपक के दौड़ता
वन का कालमृग बड़ा
वो आयगा पकड़
जरा जो ध्यान दे।।
नीम से भी रस कुई निकाल लो
है पका सा आम नहीं जिन्दगी।।
भस्म से भवन सपन के गढ़ चलो
हारने का नाम नहीं जिन्दगी।।2।।

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