Chandi maa ka beta

Chandi maa ka beta jai ho mindal machail wali chandi maiya ji ki

Jai ho mindal wasni ki . Aap sabhi ko bahut khushi hogi jeh suhn kr ki humare jammu ki shaan singer vijay sharma ji ka n...
13/06/2020

Jai ho mindal wasni ki . Aap sabhi ko bahut khushi hogi jeh suhn kr ki humare jammu ki shaan singer vijay sharma ji ka new bhajan aya mindal mata ka bahut he acha bhajan hai aap sabhi jrur suhne esko like aur share bhi kre sath main youtube channel ko bhi subscribe kare

Chandi mata bhajan 2020 Jai chandi maa असें औना मिंधल गरां Music. Kumar gourav ji Video editing by. Chandi maa ka beta Verma ji

Jai mata di sabhi bhagto ko
04/05/2020

Jai mata di sabhi bhagto ko

कालिका माता के 7 रहस्य जानें और सुख पाएं...अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'महाकाल की काली। 'काली' का अर्थ है समय और काल। काल, जो सभ...
02/05/2020

कालिका माता के 7 रहस्य जानें और सुख पाएं...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
महाकाल की काली। 'काली' का अर्थ है समय और काल। काल, जो सभी को अपने में निगल जाता है। भयानक अंधकार और श्मशान की देवी। वेद अनुसार 'समय ही आत्मा है, आत्मा ही समय है'। मां कालिका की उत्पत्ति धर्म की रक्षा और पापियों-राक्षसों का विनाश करने के लिए हुई है।

काली को माता जगदम्बा की महामाया कहा गया है। मां ने सती और पार्वती के रूप में जन्म लिया था। सती रूप में ही उन्होंने 10 महाविद्याओं के माध्यम से अपने 10 जन्मों की शिव को झांकी दिखा दी थी।

नाम : माता कालिका
शस्त्र : त्रिशूल और तलवार
वार : शुक्रवार
दिन : अमावस्या
ग्रंथ : कालिका पुराण
मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा
दुर्गा का एक रूप : माता कालिका 10 महाविद्याओं में से एक
मां काली के 4 रूप हैं- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।
राक्षस वध : माता ने महिषासुर, चंड, मुंड, धूम्राक्ष, रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों के वध किए थे।

माता कालिका के प्रसिद्ध तीन मंदिर
कलियुग में 3 देवता जाग्रत कहे गए हैं- हनुमान, कालिका और भैरव। कालिका की उपासना जीवन में सुख, शांति, शक्ति, विद्या देने वाली बताई गई है। मां कालिका की भक्ति का प्रभाव व्यावहारिक जीवन में मानसिक, शारीरिक और सांसारिक बुराइयों के अंत के रूप में दिखाई देता है जिससे किसी भी इंसान के तनाव, भय और कलह का नाश हो जाता है।

हिन्दू धर्म में सबसे जागृत देवी हैं मां कालिका। मां कालिका को खासतौर पर बंगाल और असम में पूजा जाता है। 'काली' शब्द का अर्थ काल और काले रंग से है। 'काल' का अर्थ समय। मां काली को देवी दुर्गा की 10 महाविद्याओं में से एक माना जाता है।

विशेष : कालिका के दरबार में जो एक बार चला जाता है उसका नाम-पता दर्ज हो जाता है। यहां यदि दान मिलता है तो दंड भी। आशीर्वाद मिलता है तो शाप भी। यदि आप कालिका के दरबार में जो भी वादा करने आएं, उसे पूरा जरूर करें। जो भी मन्नत के बदले को करने का वचन दें, उसे पूरा जरूर करें अन्यथा कालिका माता रुष्ट हो सकती हैं। जो एकनिष्ठ, सत्यवादी और वचन का पक्का है समझो उसका काम भी तुरंत होगा।

अगले पन्ने पर पहला रहस्य...

मां दुर्गा ने कई जन्म लिए थे। उनमें से दो जन्मों की कथाएं ज्यादा प्रसिद्ध हैं। पहला, जब उन्होंने राजा दक्ष के यहां सती के रूप में जन्म लिया था और फिर वे यज्ञ की आग में कूदकर भस्म हो गई थीं। दूसरा, जब उन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया, तब वे पार्वती कहलाईं।

दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र थे। उनकी दत्तक पुत्री थीं सती, जिन्होंने तपस्या करके शिव को अपना पति बनाया, लेकिन शिव की जीवनशैली दक्ष को बिलकुल ही नापसंद थी। शिव और सती का अत्यंत सुखी दांपत्य जीवन था, पर शिव को बेइज्जत करने का खयाल दक्ष के दिल से नहीं गया था। इसी मंशा से उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें शिव और सती को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया।

जब सती को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उस यज्ञ में जाने की ठान ली। शिव से अनुमति मांगी, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जब हमें बुलाया ही नहीं है, तो हम क्यों जाएं? सती ने कहा कि मेरे पिता हैं तो मैं तो बिन बुलाए भी जा सकती हूं। लेकिन शिव ने उन्हें वहां जाने से मना किया तो माता सती को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर वे कहने लगीं- 'मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी और उसमें अपना हिस्सा लूंगी, नहीं तो उसका विध्वंस कर दूंगी।'

वे पिता और पति के इस व्यवहार से इतनी आहत हुईं कि क्रोध से उनकी आंखें लाल हो गईं। वे उग्र-दृष्टि से शिव को देखने लगीं। उनके होंठ फड़फड़ाने लगे। फिर उन्होंने भयानक अट्टहास किया। शिव भयभीत हो गए। वे इधर-उधर भागने लगे। उधर क्रोध से सती का शरीर जलकर काला पड़ गया।

उनके इस विकराल रूप को देखकर शिव तो भाग चले लेकिन जिस दिशा में भी वे जाते वहां एक-न-एक भयानक देवी उनका रास्ता रोक देतीं। वे दसों दिशाओं में भागे और 10 देवियों ने उनका रास्ता रोका और अंत में सभी काली में मिल गईं। हारकर शिव सती के सामने आ खड़े हुए। उन्होंने सती से पूछा- 'कौन हैं ये?'

सती ने बताया- 'ये मेरे 10 रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं, पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में द्यूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोडशी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।’ माता का यह विकराल रूप देख शिव कुछ भी नहीं कह पाए और वे दक्ष यज्ञ में चली गईं।

अगले पन्ने पर दूसरा रहस्य...

दुखों को तुरंत दूर करतीं काली : 10 महाविद्याओं में से साधक महाकाली की साधना को सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली मानते हैं, जो किसी भी कार्य का तुरंत परिणाम देती हैं। साधना को सही तरीके से करने से साधकों को अष्टसिद्धि प्राप्त होती है। काली की पूजा या साधना के लिए किसी गुरु या जानकार व्यक्ति की मदद लेना जरूरी है।

महाकाली को खुश करने के लिए उनकी फोटो या प्रतिमा के साथ महाकाली के मंत्रों का जाप भी किया जाता है। इस पूजा में महाकाली यंत्र का प्रयोग भी किया जाता है। इसी के साथ चढ़ावे आदि की मदद से भी मां को खुश करने की कोशिश की जाती है। अगर पूरी श्रद्धा से मां की उपासना की जाए तो आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। अगर मां प्रसन्न हो जाती हैं तो मां के आशीर्वाद से आपका जीवन बहुत ही सुखद हो जाता है।

अगले पन्ने पर तीसरा रहस्य...

कालरात्रि और काली : दुर्गा के 9 रूपों में 7वां रूप हैं देवी कालरात्रि का इसलिए नवरात्र के 7वें दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। कालरात्रि माता गले में विद्युत की माला धारण करती हैं। इनके बाल खुले हुए हैं और गर्दभ की सवारी करती हैं, जबकि काली नरमुंड की माला पहनती हैं और हाथ में खप्पर और तलवार लेकर चलती हैं।

काली माता के हाथ में कटा हुआ सिर है जिससे रक्त टपकता रहता है। भयंकर रूप होते हुए भी माता भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं। कालरात्रि माता को काली और शुभंकरी भी कहा जाता है।

कालरात्रि माता के विषय में कहा जाता है कि यह दुष्टों के बाल पकड़कर खड्ग से उसका सिर काट देती हैं। रक्तबीज से युद्घ करते समय मां काली ने भी इसी प्रकार से रक्तबीज का वध किया था।

अगले पन्ने पर चौथा रहस्य...

जीवनरक्षक मां काली : माता काली की पूजा या भक्ति करने वालों को माता सभी तरह से निर्भीक और सुखी बना देती हैं। वे अपने भक्तों को सभी तरह की परेशानियों से बचाती हैं।

* लंबे समय से चली आ रही बीमारी दूर हो जाती हैं।
* ऐसी बीमारियां जिनका इलाज संभव नहीं है, वह भी काली की पूजा से समाप्त हो जाती हैं।
* काली के पूजक पर काले जादू, टोने-टोटकों का प्रभाव नहीं पड़ता।
* हर तरह की बुरी आत्माओं से माता काली रक्षा करती हैं।
* कर्ज से छुटकारा दिलाती हैं।
* बिजनेस आदि में आ रही परेशानियों को दूर करती हैं।
* जीवनसाथी या किसी खास मित्र से संबंधों में आ रहे तनाव को दूर करती हैं।
* बेरोजगारी, करियर या शिक्षा में असफलता को दूर करती हैं।
* कारोबार में लाभ और नौकरी में प्रमोशन दिलाती हैं।
* हर रोज कोई न कोई नई मुसीबत खड़ी होती हो तो काली इस तरह की घटनाएं भी रोक देती हैं।
* शनि-राहु की महादशा या अंतरदशा, शनि की साढ़े साती, शनि का ढइया आदि सभी से काली रक्षा करती हैं।
*पितृदोष और कालसर्प दोष जैसे दोषों को दूर करती हैं।

अगले पन्ने पर पांचवां रहस्य...

कालिका का यह अचूक मंत्र है। इससे माता जल्द से सुन लेती हैं, लेकिन आपको इसके लिए सावधान रहने की जरूरत है। आजमाने के लिए मंत्र का इस्तेमाल न करें। यदि आप काली के भक्त हैं तो ही करें।

मंत्र :

ॐ नमो काली कंकाली महाकाली मुख सुन्दर जिह्वा वाली,
चार वीर भैरों चौरासी, चार बत्ती पूजूं पान ए मिठाई,
अब बोलो काली की दुहाई।

इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से आर्थिक लाभ मिलता है। इससे धन संबंधित परेशानी दूर हो जाती है। माता काली की कृपा से सब काम संभव हो जाते हैं। 15 दिन में एक बार किसी भी मंगलवार या शुक्रवार के दिन काली माता को मीठा पान व मिठाई का भोग लगाते रहें।

अगले पन्ने पर छठा रहस्य...

रक्तबीज का वध : ब्रह्माजी के शरीर से ब्राह्मी, विष्णु से वैष्णवी, महेश से महेश्वरी और अम्बिका से चंडिका प्रकट हुईं। पलभर में सारा आकाश असंख्य देवियों से आच्छादित हो उठा। ब्राह्मणी ने अपने कमंडल से जल छिड़का जिससे राक्षस तेजहीन होने लगे, वैष्णवी अपने चक्र, महेश्वरी अपने त्रिशूल से, इन्द्राणी वज्र से और सभी देवियां अपने अपने आयुधों से आक्रमण कर रही थीं। राक्षस सेना भागने लगीं।

तब रक्तबीज ने राक्षसों को धिक्कारा कि वे स्त्रियों से डरकर भाग रहे हैं? रक्तबीज हमला करने आया, तो इन्द्राणी ने उस पर शक्ति चलाई जिससे उसका सर कट गया और रक्त भूमि पर गिरा। किंतु पूर्व वरदान के प्रभाव से उस रक्त से फिर एक रक्तबीज उठ खड़ा हुआ और अट्टहास करने लगा। जैसे ही शक्तियां उसे मारतीं, उसके रक्त से और असुर उठ खड़े होते। जल्द ही असंख्य रक्तबीज सब और दिखने लगे।

मां चंडिका ने श्रीकाली से कहा कि इसका रक्त भूमि पर गिरने से रोकना होगा जिससे और रक्तबीज न जन्में। देवी काली ने कहा कि आप सब इन्हें मारें, मैं एक बूंद रक्त भी भूमि पर न पड़ने दूंगी। और ऐसा ही हुआ भी, जल्द ही सारे नए रक्तबीज युद्ध में मारे गए। तब रक्तबीज समझ गया कि काली उसे पुनर्जीवित नहीं होने दे रही हैं, तो वह चंडिका को मारने दौड़ा। तब चंडिका ने उसे मार दिया और काली ने रक्त को भूमि पर न गिरने दिया। देवता चंडिका की जय-जयकार करने लगे।

अगले पन्ने पर सातवां रहस्य...

महाकाली की उत्पत्ति कथा : श्रीमार्कण्डेय पुराण एवं श्रीदुर्गा सप्तशती के अनुसार काली मां की उत्पत्ति जगत जननी मां अम्बा के ललाट से हुई थी।

कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के आतंक का प्रकोप इस कदर बढ़ चुका था कि उन्होंने अपने बल, छल एवं महाबली असुरों द्वारा देवराज इन्द्र सहित अन्य समस्त देवतागणों को निष्कासित कर स्वयं उनके स्थान पर आकर उन्हें प्राणरक्षा हेतु भटकने के लिए छोड़ दिया। दैत्यों द्वारा आतंकित देवों को ध्यान आया कि महिषासुर के इन्द्रपुरी पर अधिकार कर लिया है, तब दुर्गा ने ही उनकी मदद की थी। तब वे सभी दुर्गा का आह्वान करने लगे।

उनके इस प्रकार आह्वान से देवी प्रकट हुईं एवं शुम्भ-निशुम्भ के अति शक्तिशाली असुर चंड तथा मुंड दोनों का एक घमासान युद्ध में नाश कर दिया। चंड-मुंड के इस प्रकार मारे जाने एवं अपनी बहुत सारी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यराज शुम्भ ने अत्यधिक क्रोधित होकर अपनी संपूर्ण सेना को युद्ध में जाने की आज्ञा दी तथा कहा कि आज छियासी उदायुद्ध नामक दैत्य सेनापति एवं कम्बु दैत्य के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे युद्ध के लिए प्रस्थान करें। कोटिवीर्य कुल के पचास, धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति मेरे आदेश पर सेना एवं कालक, दौर्हृद, मौर्य व कालकेय असुरों सहित युद्ध के लिए कूच करें। अत्यंत क्रूर दुष्टाचारी असुर राज शुंभ अपने साथ सहस्र असुरों वाली महासेना लेकर चल पड़ा।

उसकी भयानक दैत्यसेना को युद्धस्थल में आता देखकर देवी ने अपने धनुष से ऐसी टंकार दी कि उसकी आवाज से आकाश व समस्त पृथ्वी गूंज उठी। पहाड़ों में दरारें पड़ गईं। देवी के सिंह ने भी दहाड़ना प्रारंभ किया, फिर जगदम्बिका ने घंटे के स्वर से उस आवाज को दुगना बढ़ा दिया। धनुष, सिंह एवं घंटे की ध्वनि से समस्त दिशाएं गूंज उठीं। भयंकर नाद को सुनकर असुर सेना ने देवी के सिंह को और मां काली को चारों ओर से घेर लिया। तदनंतर असुरों के संहार एवं देवगणों के कष्ट निवारण हेतु परमपिता ब्रह्माजी, विष्णु, महेश, कार्तिकेय, इन्द्रादि देवों की शक्तियों ने रूप धारण कर लिए एवं समस्त देवों के शरीर से अनंत शक्तियां निकलकर अपने पराक्रम एवं बल के साथ मां दुर्गा के पास पहुंचीं।

तत्पश्चात समस्त शक्तियों से घिरे शिवजी ने देवी जगदम्बा से कहा- ‘मेरी प्रसन्नता हेतु तुम इस समस्त दानव दलों का सर्वनाश करो।’ तब देवी जगदम्बा के शरीर से भयानक उग्र रूप धारण किए चंडिका देवी शक्ति रूप में प्रकट हुईं। उनके स्वर में सैकड़ों गीदड़ों की भांति आवाज आती थी।

असुरराज शुम्भ-निशुम्भ क्रोध से भर उठे। वे देवी कात्यायनी की ओर युद्ध हेतु बढ़े। अत्यंत क्रोध में चूर उन्होंने देवी पर बाण, शक्ति, शूल, फरसा, ऋषि आदि अस्त्रों-शस्त्रों द्वारा प्रहार प्रारंभ किया। देवी ने अपने धनुष से टंकार की एवं अपने बाणों द्वारा उनके समस्त अस्त्रों-शस्त्रों को काट डाला, जो उनकी ओर बढ़ रहे थे। मां काली फिर उनके आगे-आगे शत्रुओं को अपने शूलादि के प्रहार द्वारा विदीर्ण करती हुई व खट्वांग से कुचलती हुईं समस्त युद्धभूमि में विचरने लगीं। सभी राक्षसों चंड मुंडादि को मारने के बाद उसने रक्तबीज को भी मार दिया।

शक्ति का यह अवतार एक रक्तबीज नामक राक्षस को मारने के लिए हुआ था। फिर शुम्भ-निशुंभ का वध करने के बाद बाद भी जब काली मां का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तब उनके गुस्से को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्ते में लेट गए और काली मां का पैर उनके सीने पर पड़ गया। शिव पर पैर रखते ही माता का क्रोध शांत होने लगा

Jai kara vaishno maiya da bhol sache darwar ki jai
27/04/2020

Jai kara vaishno maiya da bhol sache darwar ki jai

mata kisampooran KATHAprachin samay ki baat hai ek budiauratapne 7 bacho k sath apne ghar rehtithi, ekdin wo aurat subah...
26/04/2020

mata ki
sampooran KATHA
prachin samay ki baat hai ek budi
aurat
apne 7 bacho k sath apne ghar rehti
thi, ek
din wo aurat subah khana pakane k
liye
chule me lakadiya jalane lagi to usne
dekha
ki wahan jameen se ek pathar nikal
raha
hai, wo us pathar ko ukhadne lagi
wo jitna
us pathar ko todti wo pathar 2 guna
aur
nikal jata, budi aurat thak gayi
pather
todne ki koshish karte, wo so gayi
raat ko
maa uske sapne me ayi aur use
bataya ki
jis pathar ko tu tod rahi hai wo
meri pindi
hai me shat fad kar niklungi, budi
aurat ne
kaha maa to me kahan rahungi, maa
ne
kaha me to yahin niklungi, budi
aurat ne
maa se kaha ap unke ghar kyu nahi
nikalti
jinke 4 shat hai aur itne me uski
ankh khul
gayi, subha wo kehne lagi me bi
dekti hun
ap yahan kaise nikalte ho aur wo fir
se
pindi rupi pathar ko todne ki
koshish karti,
maa ko us pas gussa aya, aur ek ek
karke
us budi aurat k sato putr mar
gaye........
JAI MAA
CHANDI.......$$
budi aurat rone lagi, tab maa
chandi ayi aur us budi aurat se
kehne lagi,
jab tune meri baat mane li hoti to
yeh din
na dekhna padta, ab budi aurat akeli
thi,
maa se uska yeh dukh dekha nahi
gaya aur
maa kanya roop me aker budi aurat
ko
khana pka kar khilati, ek din budi
aurat ne
maa se kaha ab me ji kar kya
karungi
mujhe apne andar basa lo bas itni
kripa
karna ki me duniya me badnam na
ho jau,
maa ne budi aurat ko 3 bardan diye,
1 jisko
bi mere nam kh chowki ayegi wo
pehle teri
yaad me royega fir meri chowki
many
jayegi. 2 dusra bardan diya k ab is
gaun me
ek hi bael se khet jutega, jo koi bi
dusra
bael lagayega uska ek bael mar
jayega.
wahan aj bi ek hi bael se kheto me
kam
hota hai. 3 tesra bar diya k adi
chaki se hi
atta niklega aj bi wahan adi chakki
se hi
atta nikalta hai. fir maa ne uska
nam apne
nam k sath jod liya. JAI KARA
MINDALA
WALI DA.
1987 ki baat hai thakur kulbir g ki
nukari
machail me lagi, thakur g nastik
they wo
murti pooja ko nahi mante they, ek
din jab
thakur g so rahe they to thakur g ko
mandir
ka darwaja khulne ki aawaz ayi,
thakur g ne
socha koi chor aya hai, wo uthe aur
mandir
k pass aakar
dekhne lage par wahan andera hone
k
karan wahan koi nahi dikha, unme
se ek
sipahi ne goli chala di, aur wahan se
chale
gaye, agle din sabhi bimar ho gaye
kafi ilaz
karwane k baad bi wo thik nahi ho
rahe
they tab thakur g ne apni posting
karwa li
aur wo machail se wapis jane lage
par wo
abhi kuch hi door pahunche to wo
achanak
gir pade unse hila bi nahi ja raha
tha tabhi
wahan ek bujurg aya aur usne
thakur g ko
uthaya aur kaha k tumse koi galti
hui hai
maa k mandir jao aur maa se mafi
mango,
thakurg uthe aur mandir ki taraf
chal diye,
jab wo mandir pahunche to thakur g
ne
kaha agar maa ap sache ho to muje
aur
mere sipahiyo ko thik kar do aur
thodi hi
der baad thakur g thik ho gaye unhe
thodi
bi darb nahi thi unke sipahi bi thik
ho gaye,
itne me mandir me baithe pujari ko
chowki
ayi aur maa ne thakur g ko kaha ki
aj se tu
mera bacha hai, tab se thakur g roj
subha
mandir me puja karte......
JAI CHANDI MAA.
CHANDI MAA KI KATHA
jab se wo thik hue roj subha mandir
pooja k
liye jane lage, aise hi samay nikalta
raha,
ek din thakur g ne apni posting
karwane k
liye arzi di par maa k hukam se unki
posting nahi hui, usi din wo sham
ko maa k mandir gaye to mandir k
pujari ko
chowki ane lagi maa ne thakur g ko
kaha ki
tu muje chod kar ja raha hai, to
thakur g ne
kaha maa me tuje kabhi chod nahi
sakta,
itne me thakur g ko bi chowki ana
shuru ho
gayi, thakur g ka samay maa ki
bhakti me
nikalta raha, ek din thakur g ko pata
chala
ki unki posting ho gyi, thakur g maa
k
mandir gaye aur maa se baat karne
lage
kehne lage maa meri posting ho gayi
me
tuje chod kar kaise jaunga me apke
bina
nahi reh sakta, tab maa ne thakur g
ko
kaha ki beta tu kyu pareshan hota
hai me
to tere ang sang hun, maa ne thakur
g se
kaha ki beta agar mere bache itne
kast
utha kar mere pas ate hain to kya
me apne
bacho k pas nahi ja sakti, maa ne
thakur g
ko bataya ki tu ghar ja me tere pass
aa
jaungi, thakur g ne maa se kaha k
such me
maa, to maa ne thakur g ko kaha k
tere
ghar me kisi choti kanya ko chowki
(grahni)
ayegi aur wo ander se trishul utha
kar
jahan maregi wahan meri murti
niklegi, us
jagah ko khod kar murti nikal lena
aur tab
me tumhare ghar aa jaungi, thakur
g ki
khushi ka koi thikana na raha, aur
thakur g
ne maa ko namaskar kiya aur agle
din wo
wahan se chal diye......
maa ki leela apram par hai.....
JAI CHANDI MAA...........$$..
thakur g apne ghar pahunch gaye,
thakur g
roj maa ki puja karte, aise hi time
nikal
raha tha, ek din achanak ek kanya
ko
chowki (grahni) ayi aur chowki me
kanya ne
mandir se trishul utha kar bahar
jameen
par mar diy
a, thakur g sab ko bata chuke they
ki maa
mujse kaha hai k me tere ghar
ayungi, pura
gaun dekhne k liye aa gaya k maa
kab
nikalengi, thakur g ne us jagah ko
khodna
shuru kar diya, aur wahan par maa
chandi k
jaikare gunjne lage, bahut der tak
khodne k
baad bi wahan se kuch nahi nikala,
karib 10
ft. gehra khadda khod diya tha,
thakur g
pareshan ho gaye, pura gaun bi
chup hokar
sochn hokar
sochne laga k kahin thakur g ne logo
ko
bebkoof to nahi banaya, thakur g
bahut
dukhi ho gaye aur weh apne ghar
me chale
gaye, wo mandir me jakar maa se
kehne
lage he maa tune mere sath aisa kyu
kiya,
pura gaun mujhe jhootha keh reha
hai, agar
na nikalna tha to mujse kaha kyu
tha,
thakur g ne kaha ab me jikar kya
karunga
mera mar jana hi thik hai, aur wo
apni
talwar dundne lage.............
JAI MAA CHANDI, JAI MAA MINDALA
KALI........
thakur g apne ghar k mandir gaye
aur maa
se kehne lage ki he maa ab der na
laga
mere pas ane me, warna me is
talwar se
apni jaan le lunga, usi samay wahan
se do
fuji duty par ja rahe they, unhone
logo se pucha ki jahan itne log kyu
ikhatha
hue hai, to us aadmi ne bataya ki
jahan
maa chandi parkat hone wali hai,
fuji bole
hum bi dekhte hai, wahan
pahunchte hi ek
fuji ko jabardast chowki ane lagi,
wahan ek
dum se tej tufan ane laga wo fuji jis
ped ko
hath lagata wo ped gir jata, us fuji
ne
wahan apne hatho se thodi mitti aur
khodi
to wahan se ek pyari si maa ki murti
nikali,
aur us jagah ka batawaran maa k
jaikoro se
gunjne laga, thakur g ne jab maa k
jaikaro ki
awaz suni to wo bahar gaye to
wahan
dekha ki maa ki murti nikal gayi thi,
tabi
thakur g andar aye aur maa se
kehne lage
ki maa me itna papi hun kya jo ap
mere
hatho se nahi nikhale, tabi ek kanya
ko
chowki aa gayi aur maa ne thakur g
se kaha
ki agar me tere hatho se nikal jati to
log
kehte ki isne pehle hi jahan murti
rakh di
hogi, aur liye kai tarai ki baate
karte, maa
ne thakur g ko bardan diya ki tu kisi
bimar
par hath rakhega to woi thik ho
jayega, aur
maa ne kaha ki ab se tu har sal meri
yatra
lekar machil ayega, tab se thakur ji
har sal
maa ki chadi yatra lekar jate hai, 18
aug ko
maa ki chadi yatra bharwah se
nikalti hai
kai jagah raat ko rukte hue 22 aug
ko maa
k darwar jate hain, par kuch salo se
thakur
g ke chote 22 chadi lekar jate hai
kyunki ek
aacident ke karan thakur g chal nahi
sakte
they, par kehte hai wo accident kisi
aur k
liye tha par thakur g ne apne upar
le liya,
aur ab thakur g helicopter se
machail jate
hai....
maa ki katha smapt....
bagto agar mujse koi galti ho gayi
ho tohmuji papi ko maaf karna......
jaikara chandi mahamai da.......$$
Bolo sache darwa ki jai .
Jai kara thakur kulvir ji da bhol sache darwar ki jai

Jai shri krishna
26/04/2020

Jai shri krishna

मचैल यात्रा: प्रकृति की गोद में की गई इस यात्रा को लोग जीवन भर नहीं भूलतेकिश्तवाड़, असाल गांव में माता सरथल का सिद्धपीठ ...
26/04/2020

मचैल यात्रा: प्रकृति की गोद में की गई इस यात्रा को लोग जीवन भर नहीं भूलते

किश्तवाड़, असाल गांव में माता सरथल का सिद्धपीठ हो या पाडर की दुर्गम पहाडिय़ों के बीच मां रणचंडी का मंदिर है। इसके इतिहास, महत्व व लोकप्रियता को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन देवियों के प्रति यहां के जनमानस में कितनी श्रद्धा व आस्था है।

मचैल गांव किश्तवाड़ से 95 किलोमीटर और गुलाबगढ से तीस किलोमीटर दूर भूर्ज और भोट नाले के बीच स्थित अत्यंत खूबसूरत गांव है। दुर्गम पहाडिय़ों के बीच प्रकृति की गोद में बसे इस गांव के मध्य भाग में प्रसिद्ध मचैल माता का मंदिर काष्ठ का बना हुआ है। इस मंदिर के मुख्य भाग में समुद्र मंथन का आकर्षक और कलात्मक दृश्य अंकित है। मंदिर के बाहरी भाग में पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियां लकड़ी की पट्टिकाओं पर बनी हुई हैैं। मंदिर के भीतर मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं। इस पिंडी के साथ दो मूर्तियां स्थापित हैं, जिनमें एक चांदी की मूर्ति है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले जंस्कार (लद्दाख) के बौद्ध मतावलंबी भोटों ने इसे मंदिर में चढ़ाया था। इसलिए इस मूर्ति को भोट मूर्ति भी कहते हैं। मूर्तियों पर कई प्रकार के आभूषण सजे हैं। मंदिर के सामने खुला मैदान है, जहां यात्री खड़े हो सकते हैं।

इस देवी पीठ के बारे में कई जनश्रुतियां हैं। कहते हैं कि जब भी किसी शासक ने मचैल के रास्ते जंस्कार या लद्दाख के क्षेत्र पर चढ़ाई की तो अपनी विजय के लिए माता से जरूर प्रार्थना की। सेना नायकों और योद्धाओं की इष्टदेवी होने के कारण ही इनका नाम रणचंडी पड़ा। जोरावर सिंह, वजीर, लखपत जैसे सेना नायकों ने जब जंस्कार या लद्दाख पर चढ़ाई की तो मां से प्रार्थना की और विजय हासिल की थी। वर्ष 1947 में जब जंस्कार क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चला गया तो भारतीय सेना में कर्नल हुकूम सिंह ने माता के मंदिर में मन्नत रखी और जब वह जीत कर आए तो मंदिर में भव्य यज्ञ के आयोजन के साथ धातु की मूर्ति स्थापित की। दूसरी मूर्ति कर्नल यादव ने चढ़ाई थी।

वर्तमान में ठाकुर कुलवीर सिंह पाडर क्षेत्र में पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्त थे। उनका भी मचैल आना हुआ। यहां उन्हें माता की भव्यता और कृपा का एहसास हुआ और वह माता की भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने वर्ष 1981 में मचैल यात्रा शुरू की। पहले यह यात्रा छोटे से समूह तक ही सीमित थी, लेकिन किश्तवाड़ व गुलाबगढ़ का मार्ग खुलने के बाद यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। यात्रा में धीरे-धीरे राज्य ही नहीं बाहरी राज्य पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु आने लगे।

मचैल यात्रा भाद्रपद संक्रांति से दो दिन बाद 18 अगस्त भद्रवाह के चिनौत गांव से प्रांरभ होती है, जिसकी विधिवत पूजा की जाती है। छड़ी में हजारों लोग ढोल, नगाड़े जैसे वाद्य यंत्रों के सुरीले और दिव्य रागों से मां के जयकारे लगाते हुए चलते हैं। इस यात्रा का महत्वपूर्ण व पहला पड़ाव किश्तवाड़ होता है। इस यात्रा की एक कड़ी के रूप में महालक्ष्मी मंदिर पक्का डंगा जम्मू से भी एक छड़ी निकाली जाती है, जो किश्तवाड़ पहुंच कर यात्रियों के साथ मिल जाती है। इस तरह से यह यात्रा पूरे जम्मू संभाग की यात्रा बन जाती है। किश्तवाड़ में यात्रा का भव्य स्वागत होता है। यहां रात्रि विश्राम व खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है। अगले दिन हजारों की संख्या में स्त्री, पुरुष, बच्चे व बूढ़े यात्रा की विदाई करते हैैं। किश्तवाड़ से गुलाबगढ़ की यात्रा वाहनों से तय की जाती है, लेकिन इसके आगे पैदल सफर तय करना पड़ता है।

गुलाबगढ़ से प्रात:काल छड़ी मसू के लिए रवाना होती है। मसू से निकल कर छड़ी का अगला पड़ाव चशोती गांव होता है। चशोती से निकल कर अगले दिन यात्रा मचैल गांव पहुंचती है।

इन छोटे-छोटे गांव के लिए छड़ी का पहुंचना उत्सव के समान होता है। यहां के लोग अपने तरीके से छड़ी का स्वागत करते हैं और यात्रियों की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जगह-जगह लंगर का इंतजाम होने के बावजूद स्थानीय लोग अपने घरों में भोजन कराते हैं और रात्रि विश्राम के लिए जगह देते हैं। पैदल चलने के कारण यह यात्रा थोड़ी कठिन जरूर होती है, लेकिन प्रकृति के अनुपम दृश्यों, पहाड़ों से गिरते झरनों, लंबे छायादार वृक्षों, फूलों व कहीं-कहीं भोट नाले को निहारते हुए यात्री सारी थकान भूल जाते हैैं। प्रकृति की गोद में की गई इस यात्रा को लोग जीवन भर नहीं भूलते। मंदिर में पहुंच कर मन उल्लास से भर जाता है। यहां पहुंच कर जैसे यात्री जन्म-जन्म के पुण्य प्राप्त कर सभी बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। अब इस यात्रा में लाखों श्रद्धालु शिरकत करने लगे हैं। यात्रा की देखरेख कर रही सर्व शक्ति सेवक संस्था कोशिश कर रही है कि यह यात्रा माता वैष्णो देवी व बाबा अमरनाथ की तर्ज पर बोर्ड के अधीन हो जाए ताकि यात्रियों को और सुविधा मिल

श्री गणेश के जन्मदिन का शुभ अवसर करीब है। पूरे देश भर में श्री गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। श्रीगणेश माता पार्वती ...
26/04/2020

श्री गणेश के जन्मदिन का शुभ अवसर करीब है। पूरे देश भर में श्री गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। श्रीगणेश माता पार्वती और शिवजी के बेटे हैं। इनके जन्म को लेकर कई तरह की कथाएं हैं। वराहपुराण और शिवपुराण में विनायक के जन्म को लेकर अलग-अलग कथाएं हैं।

1. वराहपुराण के मुताबिक भगवान शिव ने गणेशजी को पचंतत्वों से बनाया है। जब भगवान शिव गणेश जी को बना रहे थे तो उन्होंने विशिष्ट और अत्यंत रुपवान रूप पाया। इसके बाद यह खबर देवताओं को मिली। देवताओं को जब गणेश के रूप और विशिष्टता के बारे में पता लगा तो उन्हें डर सताने लगा कि कहीं ये सबके आकर्षण का केंद्र ना बन जाए। इस डर को भगवान शिव भी भांप गए थे, जिसके बाद उन्होंने उनके पेट को बड़ा कर दिया और मुंह हाथी का लगा दिया।

2 . वहीं शिवपुराण में कथा इससे अलग है। इसके मुताबिक माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी लगाई थी, इसके बाद जब उन्होंने अपने शरीर से हल्दी उबटन उतारी तो उससे उन्होंने एक पुतला बना दिया। पुतले में बाद में उन्होंने प्राण डाल दिए। इस तरह से विनायक पैदा हुए थे। इसके बाद माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिए कि तुम मेरे द्वार पर बैठ जाओ और उसकी रक्षा करो, किसी को भी अंदर नहीं आने देना।


कुछ समय बाद शिवजी घर आए तो उन्होंने कहा कि मुझे पार्वती से मिलना है। इस पर गणेश जी ने मना कर दिया। शिवजी को नहीं पता था कि ये कौन हैं। दोनों में विवाद हो गया और उस विवाद ने युद्ध का रूप धारण कर लिया। इस दौरान शिवजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश का सिर काट डाला।


पार्वती को पता लगा तो वह बाहर आईं और रोने लगीं। उन्होंने शिवजी से कहा कि आपने मेरे बेटा का सिर काट दिया। शिवजी ने पूछा कि ये तुम्हारा बेटा कैसे हो सकता है। इसके बाद पार्वती ने शिवजी को पूरी कथा बताई। शिवजी ने पार्वती को मनाते हुए कहा कि ठीक है मैं इसमें प्राण डाल देता हूं, लेकिन प्राण डालने के लिए एक सिर चाहिए। इस पर उन्होंने गरूड़ जी से कहा कि उत्तर दिशा में जाओ और वहां जो भी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सोई हो उस बच्चे का सिर ले आना। गरूड़ जी भटकते रहे पर उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली क्योंकि हर मां अपने बच्चे की तरफ मुंह कर के सोती है। अंतत: एक हथिनी दिखाई दी। हथिनी का शरीर का प्रकार ऐसा होता हैं कि वह बच्चे की तरफ मुंह कर के नहीं सो सकती है। गरूड़ जी उस शिशु हाथी का सिर ले आए। भगवान शिवजी ने वह बालक के शरीर से जोड़ दिया। उसमें प्राणों का संचार कर दिया। उनका नामकरण कर दिया। इस तरह श्रीगणेश को हाथी का सिर लगा।

3 . श्री गणेश चालीसा में वर्णित है कि माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप किया। इस तप से प्रसन्न होकर स्वयं श्री गणेश ब्राह्मण का रूप धर कर पहुंचे और उन्हें यह वरदान दिया कि मां आपको बिना गर्भ धारण किए ही दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी। ऐसा कह कर वे अंतर्ध्यान हो गए और पालने में बालक के रूप में आ गए।

चारों लोक में हर्ष छा गया। भगवान शिव और पार्वती ने विशाल उत्सव रखा। हर तरफ से देवी, देवता, सुर, गंधर्व और ऋषि, मुनि देखने आने लगे। शनि महाराज भी देखने आए। माता पार्वती ने उनसे बालक को चलकर देखने और आशीष का आग्रह किया। शनि महाराज अपनी दृष्टि की वजह से बच्चे को देखने से बच रहे थे। माता पार्वती को बुरा लगा। उन्होंने शनिदेव को उलाहना दिया कि आपको यह उत्सव नहीं भाया, बालक का आगमन भी पसंद नहीं आया। शनि देव सकुचा कर बालक को देखने पहुंचे, लेकिन जैसे ही शनि की किंचित सी दृष्टि बालक पर पड़ी, बालक का सिर आकाश में उड़ गया। उत्सव का माहौल मातम में परिवर्तित हो गया। माता पार्वती विकल हो गई। चारों तरफ हाहाकार मच गया। तुंरत गरूड़ जी को चारों दिशा से उत्तम सिर लाने को कहा गया। गरूड़ जी हाथी का सिर लेकर आए। यह सिर शंकर जी ने बालक के शरीर से जोड़कर प्राण डाले। इस तरह गणेश जी का सिर हाथी का हुआ।

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