Baab-e-sukhan

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गुज़रे   हुऐ   लम्हों  के   ख़यालात  की   ख़ुश्बू !बरसात  की  उस  रात  के जज़्बात की  ख़ुश्बू !!उफ़ चाँद सितारों की ग़ज़...
18/01/2026

गुज़रे हुऐ लम्हों के ख़यालात की ख़ुश्बू !
बरसात की उस रात के जज़्बात की ख़ुश्बू !!

उफ़ चाँद सितारों की ग़ज़ल ख़्वानी का आलम !
एहसासे मुहब्बत में वो नग़्मात की ख़ुश्बू !!

जब हुस्न कभी इश्क़ में तहलील हुआ था !
सांसों में है अब तक उन्हीं लम्हात की ख़ुश्बू !!

बेचैन हवाऐं हैं जो इस दौरे ख़िज़ां में !
शायद इन्हें आने लगी बरसात की ख़ुश्बू !!

छाया है फ़ज़ाओ में नशा आज भी तन्हा !
महसूस मुझे होती है उस रात की ख़ुश्बू !!

रेहान मुबारक तन्हा

काश मिल जाए कभी ताबीर-ए- ख़्वाब-ए- ज़िन्दगी कौन  जाने  बंद  कब  हो जाए  बाब - ए - ज़िन्दगीکاش مل جائے کبھی تعبیرِ  خوابِ...
21/07/2025

काश मिल जाए कभी ताबीर-ए- ख़्वाब-ए- ज़िन्दगी
कौन जाने बंद कब हो जाए बाब - ए - ज़िन्दगी
کاش مل جائے کبھی تعبیرِ خوابِ زندگی
کون جانے بند کب ہو جاۓ بابِ زندگی


आरज़ूएं हसरतों में रोज़ - ओ - शब ढलती रहीं
हो नहीं पाए कभी हम इंतखाब - ए - ज़िन्दगी
آرزوئیں حسرتوں میں روز و شب ڈھلتی رہیں
ہو نہیں پاۓ کبھی ہم انتخابِ زندگی

तार टूटा ही रहा कोई न कोई हर नफ़स
बेसुरा बजता रहा हरदम रबाब - ए - ज़िन्दगी
تار ٹوٹا ہی رہا کوئی نہ کوئی ہر نفس
بے سرا بجتا رہا ہردم ربابِ زندگی

कर नहीं पाए गुल - ए - तर का तख़इयुल भी कभी
हम को तड़पाता रहा कुछ यूं सराब - ए - ज़िन्दगी
کر نہیں پاۓ گلِ تر کا تخیل بھی کبھی
ہم کو تڑپاتا رہا کچھ یوں سرابِ زندگی


हो के पुर उम्मीद जब भी कुछ किया हमने सवाल
सख़्त बेज़ारी से पुर आया जवाब - ए - ज़िन्दगी
ہو کے پر امید جب بھی کچھ کیا ہم نے سوال
سخت بیزاری بھرا آیا جوابِ زندگی

मिट गईं असलाफ़ की गोया कि अब क़दरें तमाम
सब इसे कहने लगे हैं इन्क़िलाब -ए - ज़िन्दगी
مٹ گئیں اسلاف کی گویا کہ اب قدریں تمام
سب اسے کہنے لگے ہیں انقلابِ زندگی

कौन इसकी रोशनी से हो सकेगा फ़ैज़ याब
डूब जाएगा अगरचे आफ़ताब-ए- ज़िन्दगी
کون اسکی روشنی سے ہو سکے گا فیضیاب
ڈوب جاۓ گا اگرچہ آفتابِ زندگی

छोड़ कर यारो तकब्बुर कर लें कुछ आमाल नेक
चन्द रोज़ा ही तो है आख़िर शबाब - ए - ज़िन्दगी
چھوڑ کر یارو تکبر کر لیں کچھ اعمال نیک
چند روزہ ہی تو ہے آخر شبابِ زندگی

तेज़ रफ़्तारी मियां कुछ कम नहीं है आप में
हो नहीं पाएंगे लेकिन हम रकाब - ए - ज़िन्दगी
تیز رفتاری میاں کچھ کم نہیں ہے آپ میں
ہو نہیں پائیں گے لیکن ہم رکابِ زندگی

ख़ैर-ओ - शर का उसको अंदाज़ा भी होगा किस तरह
जो नहीं करता कभी भी एहतिसाब - ए - ज़िन्दगी
خیر و شر کا اس کو اندازہ بھی ہوگا کس طرح
جو نہیں کرتا کبھی بھی احتسابِ زندگی

यूं तो सब सामान - ए - इशरत भी मयस्सर है 'तरब'
फिर भी कम होता नहीं क्यूं इज़्तराब- ए - ज़िन्दगी
یوں تو سب سامانِ عشرت بھی میسر ہے 'طرب'
پھر بھی کم ہوتا نہیں کیوں اضطرابِ زندگی

-- सईद अहमद 'तरब' नियाज़ी --
-- سعید احمد طرب نیازی --

ग़ज़लहमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहींहमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं।बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहींतौफ़ीक़ दे ...
03/08/2023

ग़ज़ल

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं।

बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये ने'आमत भी कम नहीं।

मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अह्ल-ए-सितम नहीं
मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं।

या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वुस'अतें
दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं।

ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयख़ाने में मगर
क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं।

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं।

मर्ग-ए-ज़िगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं।

ग़ज़लक्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकताआँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता।तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्याहर शख...
03/08/2023

ग़ज़ल

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता।

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता।

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता।

घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता।

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता।

वसीम बरेलवी

ग़ज़लअपने  होठों  पर  सजाना चाहता हूँआ  तुझे  मैं   गुनगुनाना  चाहता  हूँ।कोई  आसू  तेरे  दामन पर गिराकरबूंद   को   मोती  ...
03/08/2023

ग़ज़ल

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ।

कोई आसू तेरे दामन पर गिराकर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूँ।

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ।

छा रहा हैं सारी बस्ती में अंधेरा
रोशनी को घर जलाना चाहता हूँ।

आखरी हिचकी तेरे ज़ानो पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ।

क़तील शिफ़ाई

ग़ज़लकी है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ ।गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो डूब...
03/08/2023

ग़ज़ल

की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ
थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ ।

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ ।

मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे
हम ने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ ।

रक़्स-ए-सबा के जश्न में हम तुम भी नाचते
ऐ काश तुम भी आ गए होते सबा के साथ ।

इक्कीसवीं सदी की तरफ़ हम चले तो हैं
फ़ित्ने भी जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ ।

ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद
पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ।

कैफ़ी आज़मी

ग़ज़लतुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो बचते नहीं मुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्र से क़...
03/08/2023

ग़ज़ल

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो

बचते नहीं मुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्र से
क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो

क्या वो भी बे-गुनह-कुश ओ हक़-ना-शनास हैं
माना कि तुम बशर नहीं ख़ुर्शीद ओ माह हो

उभरा हुआ नक़ाब में है उन के एक तार
मरता हूँ मैं कि ये न किसी की निगाह हो

जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद
मस्जिद हो मदरसा हो कोई ख़ानक़ाह हो

सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ़ सब दुरुस्त
लेकिन ख़ुदा करे वो तिरा जल्वा-गाह हो

'ग़ालिब' भी गर न हो तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुनिया हो या रब और मिरा बादशाह हो

मिर्ज़ा ग़ालिब

07/07/2023

Big shout out to those who’ve recently engaged with me!

Mamta Joshi, Mahesh Saxena, Upendra P. Meher

सामने   पर्दे  के  आओ  मैं ने  सच बोल  दियाअब नक़ाब अपना हटाओ मैं ने सच बोल दियाशोर अब जितना मचाओ  मैं ने सच बोल दियामुझ ...
07/07/2023

सामने पर्दे के आओ मैं ने सच बोल दिया
अब नक़ाब अपना हटाओ मैं ने सच बोल दिया

शोर अब जितना मचाओ मैं ने सच बोल दिया
मुझ पे बोहतान लगाओ मैं ने सच बोल दिया

काव्या सहर की कलम से

19/03/2023

वक़्त ने तोड़ दी ज़ंजीर ए तअल्लुक़ आख़र
जाने वाले तुझे अब कौन यहाँ रोकेगा

काव्या सहर

यौमे जम्हूरिया ( गणतन्त्र दिवस ) के मुबारक मौक़े पर सभी अहबाब को दिली मुबारकबाद इसी हवाले से एक नज़्म अहबाब की नज़्र -  ...
26/01/2023

यौमे जम्हूरिया ( गणतन्त्र दिवस ) के मुबारक मौक़े पर सभी अहबाब को दिली मुबारकबाद
इसी हवाले से एक नज़्म अहबाब की नज़्र -

रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन -----------------------------------------

कोई भूखा न हो कोई प्यासा न हो
ख़ौफ़ दिल में किसी के ज़रा सा न हो
आओ सब लोग मिलकर करें कुछ जतन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

अपने गुलशन में हर्गिज़ न आये ख़िजाँ
क़ौमो मज़हब के झगड़े न हों अब यहाँ
सब हों ख़ुश हाल फूले फले ये चमन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

प्यार बाटें करें नफ़रतें बरतरफ़
फिर हो माहौले अम्नो अमां हर तरफ़
फिर से ख़ुशियों की शाहिद हों गंगो जमन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

कोई सुब्हे बनारस तो देखे ज़रा
और शामे अवध का भी मन्ज़र है क्या
फिर से पंजाब में हो वोही बांकपन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

व्यास ओ रावी ओ झेलम की जलवा गरी
नर्मदा ताप्ती और ये गोदावरी
गोद में इसकी यारो हैं क्या क्या रतन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

वो जो जन्नत नुमां अपना कश्मीर था
कैसे पुर कैफ़ ख़्वाबों की ताबीर था
फिर से लौट आये उसकी वो प्यारी फ़बन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

ख़ून आलूद क्यूँ इसके मन्ज़र हुए
लाल ओ गुल सारे क्यूँ इसके ख़न्जर हुए
किसने ज़ख़्मी किये सबके तन और मन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

क़त्ल ओ ग़ारतगरी का ये बाज़ार क्यूँ
मुल्क सारा ही लगता है बीमार क्यूँ
तर्क कर दो ख़ुदारा ये दीवाना पन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

कौन देता है ये हुक्मे ग़ारतगरी
किसलिए है ये हालात की अबतरी
अम्न का इसको पहनाइये पैरहन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

ताजिराने सियासत ये क्या .कर दिया
ख़ूँ में नस्लों की ये ज़ह् र क्यूँ भर दिया
अब जुनूने मज़हब का मिटाओ चलन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

क़ौम ओ मिल्लत के झगड़े न फैलाइये
नौजवानों को हर्गिज़ न बहकाइये
हों तरक़्की की जानिब ये सब गामज़न
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

है यकीं ये हमें वो भी दिन आयेगा
खेल ख़ूनी तुम्हारा न चल पायेगा
होंगे क़िस्मत तुम्हारी ये दार ओ रसन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

हम पे क़िस्मत अभी भी मेह् रबान है
अब भी दुनिया में ताज अपनी पहचान है
हम बदल लें 'तरब' अपना चाल ओ चलन
रश्के जन्नत बने अपना प्यारा वतन

---सईद अहमद 'तरब'नियाजी़----

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