Kritya, A bilingual poetry journal

Kritya, A bilingual poetry  journal Kritya is the first bilingual web journal in India, stated in 2005 , presents poetry in translation.

एलिसा बैगिनि Elisa biaginiin kritya new issueइन कविताओं का अनुवाद रति सक्सेना ने किया है। मैंपत्थर, तने,हड्डी, एक पत्तीक...
06/12/2023

एलिसा बैगिनि Elisa biagini

in kritya new issue

इन कविताओं का अनुवाद रति सक्सेना ने किया है।



मैं
पत्थर, तने,
हड्डी, एक पत्ती
की तरह
चक्कर खाती हूं
मेरी मुट्ठी बन्द
हो जाती है
फिर कभी ना खुलने के लिए

*

मेरी रोटी
सख्त हो गई है
पत्थर की तरह,
आंखों में सुलगती लकड़ियां
लालिमा में
प्रतिबिम्ब
हो रही हैं

*

एप्रोन के भीतर
रोटी और पत्थर
मेरी कलाई ने
धरती को सूंघा
घंटी की तरह घनघनाते हुए
बर्तनों ने मुझे पुकारा

Hindi समकालीन कविता समकालीन कविता by Editor 0 comments एलिसा बैगिनि Elisa biagini एलिसा बैगिनि Elisa biagini इतालवी मूल की कवि हैं, जो अंग्रेजी और इ...

Kritya's new issue -Hindi हरिहर झाघोड़े घोड़े महत्वाकांक्षाओं केउंची उंची लालसाओं केभागते हुयेसरपट  मैदान की बात ही क्याचढ़...
06/12/2023

Kritya's new issue -Hindi

हरिहर झा

घोड़े

घोड़े महत्वाकांक्षाओं के
उंची उंची लालसाओं के
भागते हुये
सरपट मैदान की बात ही क्या
चढ़ भी जाते हैं सीडि़यों पर
भले ही पैर लहूलुहान
कभी तो दुनियावी बोझे से लदा तांगा
कंधो पर उठाये
आकाश मे उड़ते हुये
भावना के परिन्दो को
नीचा दिखाते हुये¦
ये घोड़े दे गये मुझे
अथाह शक्ति, धन दौलत
ईर्ष्या मित्रो की
गालियां दुश्मनों की
अजनबियों की व्यंग्यमय मुस्कान
सब कुछ पा लिया
अपने ही बलबूते पर याने
बलपूर्वक इस घोड़े के बूते पर
सब कुछ पा लिया
अपने स्वयं की पूर्णाहूति देकर
मेंने
अश्व नहीं
नरमेध यज्ञ मे
घोड़े को किया
यशस्वी विजयी कीर्तिमान।

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समकालीन कविता  in kritya's new issue हेलेन दावर की कविता(HELEN DWYER)तुम्हारे दफ़नाए जाने के बादअगली सुबह जब मैं उठीपहली...
06/12/2023

समकालीन कविता
in kritya's new issue


हेलेन दावर की कविता

(HELEN DWYER)

तुम्हारे दफ़नाए जाने के बाद
अगली सुबह जब मैं उठी
पहली चीज जो मैने देखी
वे मेरे जूते थे

बरसात ने कब्र खोदने वालों का काम
आसान कर दिया था, तुम किसी को
परेशान करना ही कहां चाहते हो
शायद मैं भी उन्हे जल्द माफ कर दूं
काम पाने के लिए गिद्ध की तरह
ताक लगाए उन लोगों को

कुछ औरते मुझे कब्र से दूर ले गईं
लेकिन कहां दूर कर पाईं पीड़ा से

मै्ने अविश्वास से चुप रहना चाहा
सच पर अविश्वास, लेकिन
वह मिट्टी, तुम्हारी मिट्टी
आज भी मेरे जूतों पर चिपकी है।

Hindi समकालीन कविता समकालीन कविता by Editor 0 comments एलिसा बैगिनि Elisa biagini एलिसा बैगिनि Elisa biagini इतालवी मूल की कवि हैं, जो अंग्रेजी और इ...

राघवन अत्तोळी मलयालम भाषा के दलित कवि हैं, वे काष्ठ मूर्तिकार भी हैं। भूमि पुत्र होने के कारण उनकी कविता यथार्थ का अनुभव...
06/12/2023

राघवन अत्तोळी मलयालम भाषा के दलित कवि हैं, वे काष्ठ मूर्तिकार भी हैं। भूमि पुत्र होने के कारण उनकी कविता यथार्थ का अनुभव है। मां नामक कविता विशेष रूप से प्रसिद्ध रही है। इस कविता का अनुवाद रति सक्सेना ने किया है।



राघवन अत्तोऴी



कण्डति





गली में कूड़े के ढेर पर
गन्दे लूगड़ों में
जलती भूख से
पसीना पसीना हुई वह,
रात के ब्यालू को
कुछ चीजें समेटे
बुझे दिये वाली कोठरी में
अकेली बैठी वह,
दिन की सफेदी खींचते
कालिख छोड़ते
सूरज को सरापती
दिशाओं के चेहरे करिया जाने तक
ठहराई मजूरी के बदले
घास खोदती वह ।



पत्थर कूटकूट कर
हाथ बटाती वह
बीज बिखेर
आंसुओं से सींचती वह,
जुए से जुते बैलों से
खिंची गाड़ियां
हाँफते सिसकते जनम
आवारा भटकते बच्चे
मरे गोत्र
कुचले लक्ष्य ;
खिले लहराते खेतों में
उगे नाज से
भरता किसी और का भण्डार ,
अधभरे पेट पर
कसी लंगोटी बाँधे
कमर झुकी बुढ़िया सी
झुकी रहती वह
खेत के किनारे
भूख से बिलबिलाते
बच्चे के चेहरे को धोती
आंसू बहाती वह ।

आधे निमिष को
स्तनपान कर
आंसुओं को
पसीने में बदलती वह,
निषेध सूक्तों को
लगातार उलीच
कविता रच सजाती वह,
नारियल के रेशों सी
बिखरी बिखरी ज़िन्दगी
कुचले खोपरे सी
फैली जीर्णताएँ ।



भीड़ भड़क्कर में
मंडराती भीख मांगती
भीख में मिले नाज सी
कुचली वह
प्यास से जब गला तड़कता
तो छुआछात की राक्षस लीला में
फटे फूटे कण्ठ वाली वह
वही है मेंरी जन्मदात्री
उसे चाहिये रोशनी
जो बुझ गई
और गरमागरम तेल,
इसे चाहिए नहीं कपड़े
जो पाप में डूबे हों
इसे तो चाहिए बस
मुट्‌ठी भर रेत
जिसमें पाप के दाग न हों
ज़रा सा धान
जिसमें खून के दाग न हो,
यही है मेरी
जन्मदात्री माँ । ।……..

Hindi कविता के बारे में कविता के बारे में by Editor 0 comments राघवन अत्तोळी मलयालम भाषा के दलित कवि हैं, वे काष्ठ मूर्तिकार भी हैं।...

विष्णु नागर मात्र कवि नहीं, कथाकार ‌और व्यंग्यकार भी हैं।  मुझे कवि की कविताओं में छिपी कथात्मकता और व्यंग्यात्मकता ने प...
06/12/2023

विष्णु नागर मात्र कवि नहीं, कथाकार ‌और व्यंग्यकार भी हैं। मुझे कवि की कविताओं में छिपी कथात्मकता और व्यंग्यात्मकता ने प्रभावित किया। विशेष रूप से छोटी कविताओं ने, जिसमे एक लम्बी सार गर्भित कथा छिपी हो, या फिर कहें तो जो जिन्दगी की कथा बखान करती हो। विष्णु नागर फिलहाल, दिल्ली में वास करते हैं। ये कविताएं कृत्या में बहुत पहले प्रकाशित हो चुकी हैं, समकाल में इनकी प्रासंगिकता देखते हुए पुनः प्रकाशन का निर्णय लिया गया है।


आहटें


मैं क्यों अनजान बना बैठा हूं

जैसे मुर्गा हूं

क्यों कुकड़ू कूz करता घूम रहा हूं

जैसे मैं बिल्कुल बैचेन नहीं हूं

क्यों अपनी कलगी पर कुछ ज्यादा इतराने लगा हूं

क्यों पिंजड़े में बन्द जब कसाई की दूकान पर

ले जाया जा रहा हूं तो

ऐसा बेपरवाह नजर आ रहा हूं जैसे कि सैर पर जा रहा हूं

क्यों मैं पंख फड़फड़ाने, चीखने और चुपचाप मर जाने में

इतना विश्वास करने लगा हूं

क्यों मैं मानकर चल रहा हूं कि मेरे जिबह होने पर

कहीं कुछ होगा नहीं

क्यों मैं खाने मे लजीज लगने की तैयारी में जुटा हूं

क्यों मैं बेतरह नस्ल का मुर्गा बनने की प्रतियोगिता मं शामिल हूं

और क्यों मैं आपसे चाह रहा हूं कि कृपया आप मुझे मनुष्य ही समझे ।

Hindi मेरी पसन्द प्रिय कवि by Editor 0 comments विष्णु नागर मात्र कवि नहीं, कथाकार ‌और व्यंग्यकार भी हैं। मुझे कवि की कविताओं में छ....

अग्रज कवि- ( In kritya's new issue)K Satchidanandanजीभों का पेड़ गलीकूचों में, ट्‌टारियों मेंगाँव भर में चेचकगाँव की माता...
06/12/2023

अग्रज कवि- ( In kritya's new issue)

K Satchidanandan

जीभों का पेड़


गलीकूचों में, ट्‌टारियों में
गाँव भर में चेचक
गाँव की माता, महामाता
किले से ज़ारी की राजाज्ञा
बाँध लो पकड़ कर इलाके की जीभें
औरचढ़ा दो बलि सभी की
उस्ताद की, बब्बा की जीभ कुतर ली
भानजे की जीभ कुतर ली
दुश्मन की जीभ कुतर ली
खबरढोलची ने चिल्ला कर मुनादी की
छोकरे की जीभ कुतर ली
दीवारों पर कालिख से तस्वीर खींचने वाले
कलाकार की जीभ कुतर ली
धुआं पीते, सोना बोते
कामगारों की जीभ कुतर ली
महामाता, गांव की माता
देहरी भर जीभें कुतर लीं
मन्दिर में रोमांचित खड़ा है
बिना जीभ वाला देवता


में, भंडारघरों में
खिल रही थी चेचक जिस दिन
गांव की माता महामाता
कुतर रही थी जीभ सभी की जिस दिन
एक जीभ में किल्ला फूटा उसी दिन
दिन ब दिन बढ़ने लगा
नींव के पहले पत्थर से
मूल जड़ फूट पड़ी
पहली पत्ती ,नन्ही पत्ती
उण्णियार्चा की तलवार जैसे
मुन्नी पत्ती, मोटी पत्ती
कण्णप्पन की ढाल जैसी
तीसरी पत्ती, हरी पत्ती
करिम्बाडि। की हथेली जैसी
चौथी पत्ती बुन्दकियों वाली
नागराज के फण जैसी
पाँचवीं पत्ती, धारदार पत्ती
सूरज के दिल जैसी
सैंकड़ोंसैंकड़ों पत्तियों
खून टपकाती जीभों जैसी


किसकी है यह जीभ
गुस्से में थरथराती खड़ीं माता
जीभ ने नगाड़ा बजाया
मैं आदी कवि की जीभ हूं
अंधेरे से लोक को जगाते मेरे गीत
दूसरी जीभ ने हामी भरी
हम भी उगी है उसी गीत से
गांव की माता, महा माता
गवैय्या का गोत्र मिट जाए
तो फिर गाएगा कौन गाना?
गीत गाने के लिए जीभ नहीं तो
लोग सच्चाई कैसे जानेंगे?
सच ही मालूम नहीं तो
गांव कैसे जगेगा ?
पहाड़ी पर खड़ा बिन मुँह वाला देवता।
मुंह खोले बिना खड़ा है
आसमान की ओर ताकता
महामाता ने तलवार खींची
पेड़ को जड़ से काटने
जहां जहां घाव वहां वहां खून
हजारों जीभें उमग उठीं
ज़मी में गढ़े दबे सच
चमकने लगे पत्तीपत्ती पर
जीभों के पेड़ वाले उस गांव का
लोगों ने नाम धरा
जीभों का गांव, पवित्र धाम



बिन मुंह वाला देवता केरलीय लोक कथा संग्रह एतिह्य माला में वररुचि के एक पुत्र का उल्लेख है जिसके मुंह ही नहीं था। उसे वा इल्लाद Sप्पन के नाम से पुकारा जाता था।
करम्बाडी लोक कथा की एक सुन्दरी कन्या जिसकी गाँzव के लिए बलि दे दी गई थी।

Hindi कवि अग्रज अग्रज कवि by Editor 0 comments के सद्चिदानन्दन की तीन लम्बी कविताएं के सच्चिदानन्दन देश के मशहूर अग्रज कवि हैं, जो ....

कृत्या का नया अंकमेरी बातयुद्ध शब्द से जितना हम भयभीत होते हैं, उतना ही हम उसे अपने करीब पाते हैं। मानवता के इतिहास में ...
06/12/2023

कृत्या का नया अंक

मेरी बात

युद्ध शब्द से जितना हम भयभीत होते हैं, उतना ही हम उसे अपने करीब पाते हैं। मानवता के इतिहास में शान्ति से पहले युद्ध प्रधान रहा है, सर्वप्रथम प्रकृति की दुर्गमता से युद्ध, फिर सहजीवों से युद्ध, और फिर समूहों और उन समूहों के कबीलों में युद्ध। यहां तक युद्ध स्व अस्तित्व को बचाये रखने के लिए था, लेकिन इसके उपरान्त जब मानवीय समाज में स्थिरता आई, सुरक्षित स्थान पर बसेरा बनने लगा तो युद्ध के कारण लालच अथवा घृणा हो गए। ये भावनाएं मानव के मन मे स्वतः उपजी थीं, इनमें प्रकृति का हाथ नहीं था। अन्य जीवों में इन भावनाओं का अतिरेक नहीं था। प्राचीनतम इतिहास युद्धकालीन स्थिति का गवाह है़।

https://kritya.in/my-voice-hn-dec-23/

ऋग्वेद के बीस प्रतिशत से अधिक सूक्त युद्ध गीत हैं, जिनमें या तो इन्द्र का यौद्धा के रूप में महिमा गान है, अथवा युद्धों में देव शक्तियों के सहयोग की कामना है। यूरोप महाद्वीप का इतिहास तो लम्बे काल तक युद्धप्रधान रहा है। युद्ध के कभी कारण रहे हैं तो कभी बिना कारण मात्र अहंकार के लिए लिए भी युद्ध किया जाता रहा है। सिकन्दर को युद्ध की जरूरत सिर्फ अपने अहंकार की पुष्टि के लिए थी। चिंगेज खां के लिए युद्ध विजेता की अहंकार के अतिरिक्त अपने कबीलों को बांधे रखने के लिए था। मानव जितनी उन्नति करता गया उतना ही युद्ध से जुड़ता गया। यहां तक ही लगभग हरेक देश ने युद्ध के साजो सामान का जखीरा खड़ा कर लिया।

कहा जाता है कि इस वक्त विभिन्न देशों में इतना विस्फोटक सामग्री है कि कुछ मिनिटों में दुनिया खत्म हो जाए। हम सब यह जानते हैं, फिर भी दुनिया में युद्ध खत्म नहीं हुआ है। यहां तक जब दुनिया भयानक वायरस से जूझ रही थी, युद्ध की छाया बनी रही, उक्रेन का युद्ध साल भर से खत्म नहीं हुआ कि फिलिस्तीन इसराइल का युद्ध आरंभ हो गया।

जो युद्ध में लिप्त होता है, वह किसी न किसी पक्ष में होता है, अर्थात् युद्ध विरोधी स्थिति में कदापि नहीं होता है, और जो दूर से देखता है, वह कभी मात्र दर्शक होता है, अथवा कभी भागीदार भी। युद्ध का विरोध पूर्णतया तभी संभव है जब युद्ध की विद्रूपता को रेखांकित कर समझा जाए। युद्ध की त्रासदी आगामी बहुत बड़ी पीढ़ी को बुरी तरह से प्रभावित करेगी। यानी कि युद्ध आने वाली दुनिया को गलत सीख दे कर जाता है, जख्मों के साथ मन को भी सालता है।

यही कारण है कि युद्ध जिसमें तानाशाही साम्राज्य की मनमानी हो, दुखदायी है।

युद्ध के विरोध में आवाज़ उठाते हुए

रति सक्सेना

Hindi मेरी बात मेरी बात by Editor 0 comments युद्ध शब्द से जितना हम भयभीत होते हैं, उतना ही हम उसे अपने करीब पाते हैं। मानवता के इतिह....

Kritya's New issue-our Masters-Rituu-samhaara-KALIDASA, *The burning sands emit furious heatafflict the snake, with lowe...
06/12/2023

Kritya's New issue-

our Masters-

Rituu-samhaara-KALIDASA,



*
The burning sands emit furious heat
afflict the snake, with lowered hood panting,
speeding with crooked creep aggrieved.
Behold ! the snake now with fear no more,
Rests in the shade, at his enemy peacock’s feet.



*

Malignant heat makes the thirst more acute
and now the king of the jungle of prowess famed,
Forgetting his valour pants perturbed,
Open-mouthed, dangling – tongued, with

quivering manes,

And kills not the nearby elephants too.



*



Beneath the parasols of the unshrivelled hoods

Sweltered and thirsty
dry throated huge elephants,

To come by cool showers—
just a few drops of water,
Overcoming the fright of the lion
glide about him with no more fear.

and More

https://kritya.in/our-masters-dec-23-2/




*
The burning sands emit furious heat
afflict the snake, with lowered hood panting,
speeding with crooked creep aggrieved.
Behold ! the snake now with fear no more,
Rests in the shade, at his enemy peacock’s feet.



*

Malignant heat makes the thirst more acute
and now the king of the jungle of prowess famed,
Forgetting his valour pants perturbed,
Open-mouthed, dangling – tongued, with

quivering manes,

And kills not the nearby elephants too.

English Our Masters Our Master by Editor 0 comments Rituu-samhaara-KALIDASA, KALIDASA, (kaalidaasa), India’s greatest Sanskrit poet and dramatist. In spite of the celebrity of his name, the time when he flourished always has been an unsettled question, although most scholars nowadays favor the mid...

Editor's ChoiceAgyeya (Sachchidananda Hirananda Vatsyayana, (1911 –1987) Translated by Elizabeth Kurian Mona POETIC ARE ...
06/12/2023

Editor's Choice

Agyeya (Sachchidananda Hirananda Vatsyayana, (1911 –1987)

Translated by Elizabeth Kurian Mona

POETIC ARE FLOWERS


Poetic are flowers
Prosaic are leaves,
In all, harmony breathes,
Is there any meaning
That this grass underfoot
Cannot unfold?

Surrender is symphony, devotion- music,
Compassion is refrain – love of humanity.
Seek not for the pause;
Egotism itself is a pause
Continue the fight with yourself,
My friend!

***

Editor’s Choice English Editor’s Choice by Editor 0 comments Agyeya (Sachchidananda Hirananda Vatsyayana, (1911 –1987) Translated by Elizabeth Kurian Mona Sachchidananda Hirananda Vatsyayana, was popularly known by his pen-name Agyeya, (meaning Beyond comprehension). He was a pioneer of modern...

Kritya's -In the Name of Poetry Sharmila RayRUINS Naked and immenseThe ruins stare at me.Here the evenings are still bor...
06/12/2023

Kritya's -In the Name of Poetry

Sharmila Ray

RUINS


Naked and immense
The ruins stare at me.
Here the evenings are still born
children and the rain if falls at all is
light as a grasshopper.

I have my notions about other ruins,
but this one makes me search myself.
Each cry
I utter is lost in the limitless space
then it gathers speed and hits the
frozen walls breaking into an echo.

Perhaps, the story I’m looking for
is buried beneath the mosaics and
in the whispering of the lizards.
Perhaps,
it is there when the
first star shines and the
gods of night draw their curtain
over moon-drenched pillars.

Converse
Contemporary Indian Poetry in English
Celebrating 75 years of India’s Independence.
Edited by Sudeep Sen
Published by P**a Rann Books And Media U.K. 2022



English In The Name Of Poetry In the Name of Poetry by Editor 0 comments Sharmila Ray Home 1 Home is a manuscript you write and rewriteevery day, every week, every month, every year…The manuscript moves from calm outlinesto rugged terrain washed by late summer’s light.Seen from a distance the ma...

new issue of kritya
01/12/2022

new issue of kritya

My Voice My Voice by Editor 0 comments A few lines of the great poet Ayyappa Panikker give an insight-   “The sky asked the earth again Why are you, who do not lie still Even for a day, wrangling with me?   The earth to the sky: You cannot move You cannot go anywhere It is because of my rotation...

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