30/12/2024
कुम्भपर्व क्यों लगातार मनाए जाते हैं ? (प्रस्तुत है कुम्भोत्पत्ति की अमरकथा )
कुम्भ की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। इनमें स्कन्द पुराण में समुद्र मन्थन की कथा सर्वाधिक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार 'हिमालय' के समीप 'क्षीरोद' नाम का एक सागर है। एक समय देवताओं और दानवों के बीच अमृत कुम्भ की प्राप्ति के लिए सागर के मूल में कूर्म (कच्छप) और उसके ऊपर मन्दरांचल पर्वत को स्थापित करके उस पर 'वासुकि' नाग की रस्सी बनाकर मन्थन किया गया। समुद्र-मन्थन द्वारा क्षीरसागर से चौदह (14) रत्न निकले। जैसे- (1) कालकूट विष, (2) पुष्पक विमान, (3) ऐरावत हाथी, (4) पारिजात वृक्ष, (5) अप्सरा रम्भा, (6) कौस्तुभ मणि, (7) बाल चन्द्रमा, (8) कुण्डल धनुष, (9) शार्ग धनुष, (10) कामधेनु गाय, (11) उच्चैश्रवा घोड़ा, (12) समस्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठातृ लक्ष्मी, (13) विश्वकर्मा (14) अन्त में महाविष्णु धनवन्तरि के हाथों में शोभायमान अमृत से आपूरित कुम्भ (कलश) उत्पन्न हुआ। देवताओं के संकेत पर इन्द्र पुत्र जयन्त अमृत- कुम्भ लेकर बड़े वेग से भागने लगे। दैत्यगण जयन्त का पीछा करने लगे। अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं और राक्षसों के मध्य बारह दिव्य दिन (मानुषी बारह वर्ष) तक भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध के समय जिन-जिन स्थानों पर 'कुम्भ' से अमृत की बूंदे गिरी थी, उन-उन स्थानों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कुम्भ-महापर्व मनाया जाता है। तत्पश्चात् भगवान् श्रीविष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके अमृत को देवताओं में बांटा।
पुराणानुसार 'अमृत-कुम्भ' की रक्षा में बृहस्पति, सूर्य व चन्द्रमा ने विशेष सहायता की थी। 'चन्द्रमा' ने अमृत को कुम्भ में से गिरने से, 'सूर्य' ने कुम्भ को फूटने से और 'बृहस्पति' ने असुरों द्वारा अमृत के अपहरण होने से तथा 'शनि' ने देवराज इन्द्र के भय से अमृत-कुम्भ की रक्षा की थी। इसी कारण सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति-तीनों ग्रहों के विशेष योग में ही कुम्भ महापर्व मनाया जाता है।
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