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05/08/2026

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"काबुलीवाला" केवल एक काबुली व्यापारी और एक बच्ची की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक पिता के हृदय में अपनी संतान के लिए ...
05/08/2026

"काबुलीवाला" केवल एक काबुली व्यापारी और एक बच्ची की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक पिता के हृदय में अपनी संतान के लिए बसे प्रेम की सार्वभौमिक कथा है। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस कहानी के माध्यम से सिद्ध किया है कि सच्ची मानवता हर प्रकार की सीमाओं को पार कर जाती है और यही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान है।

#कहानी #हिंदी

04/08/2026

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भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को वर्ष 20...
04/08/2026

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित "लोकमान्य तिलक नेशनल अवार्ड" प्रदान किया गया। पुणे में आयोजित गरिमामय समारोह में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, सुनेत्रा पवार, केंद्रीय राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल सहित अनेक गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।

यह सम्मान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 106वीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रदान किया गया। अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि तिलक ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देते हुए "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" का अमर मंत्र दिया और भारतीय संस्कृति व राष्ट्रवाद को मजबूत आधार प्रदान किया।

अमित शाह ने कहा कि अजीत डोभाल का पांच दशकों से अधिक का राष्ट्रसेवा का सफर असाधारण रहा है। वर्ष 1972 में भारतीय पुलिस सेवा में आने के बाद उन्होंने खुफिया ब्यूरो (IB) में कई महत्वपूर्ण अभियानों का नेतृत्व किया। पूर्वोत्तर, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम और पाकिस्तान में उनकी रणनीतिक भूमिका भारतीय सुरक्षा इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय रही है। पाकिस्तान में वर्षों तक अत्यंत संवेदनशील परिस्थितियों में कार्य करते हुए उन्होंने अद्भुत साहस और कुशल रणनीति का परिचय दिया।

उन्होंने कहा कि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किए जाने के बाद देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती मिली। आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक रणनीति, भारतीय सेनाओं का आधुनिकीकरण, मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) को सशक्त बनाने और भारत की वैश्विक सुरक्षा नीति को मजबूत करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

देवभूमि उत्तराखंड के मूल निवासी अजीत डोभाल को यह प्रतिष्ठित सम्मान मिलने से पूरे प्रदेश में खुशी और गर्व का माहौल है। सामाजिक, शैक्षणिक और बुद्धिजीवी वर्गों ने इसे उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण बताया है। लोगों का कहना है कि अजीत डोभाल केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की पहचान बन चुके हैं। उनका शांत नेतृत्व, दूरदर्शी सोच, राष्ट्रभक्ति और अद्वितीय रणनीतिक क्षमता देश के युवाओं के लिए प्रेरणा है।

देवभूमि की पावन धरती ने देश को अनेक वीर सपूत दिए हैं और अजीत डोभाल उन्हीं महान विभूतियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने समर्पण, साहस और कर्मनिष्ठा से भारत का सम्मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। उनका यह सम्मान पूरे उत्तराखंड के लिए गर्व, प्रेरणा और आत्मसम्मान का प्रतीक है। 🇮🇳❤️

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04/08/2026

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ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 आखिरकार खत्म हो गए हैं. एक खूबसूरत क्लोजिंग सेरेमनी के साथ गेम्स का अंत हो गया. क्लोजिंग से...
04/08/2026

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 आखिरकार खत्म हो गए हैं. एक खूबसूरत क्लोजिंग सेरेमनी के साथ गेम्स का अंत हो गया. क्लोजिंग सेरेमनी में भारतीय दल का नेतृत्व गोल्ड मेडल जीतने वाली बॉक्सर जैस्मिन लम्बोरिया के पास रहा.

वहीं गेम्स खत्म होने के साथ ही कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स फ्लैग को भारतीय दिग्गज नीरज चोपड़ा के हवाले किया, जिन्होंने इसे भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा और गुजरात के उप-मुख्यमंत्री हर्ष संघवी को सौंपा क्योंकि अगली बारी भारत की है.

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बदरीनाथ धाम में एक ऐसी महान साधिका थीं, जिनकी पूरी संपत्ति केवल भगवान नारायण का चिंतन, मनन और कठोर साधना थी। साधना, तप, ...
04/08/2026

बदरीनाथ धाम में एक ऐसी महान साधिका थीं, जिनकी पूरी संपत्ति केवल भगवान नारायण का चिंतन, मनन और कठोर साधना थी। साधना, तप, सम्मान, प्रतिष्ठा या भौतिक संपत्ति का लेशमात्र भी मोह उन्हें कभी छू नहीं सका। उनका संपूर्ण जीवन भगवान श्रीहरि की निस्वार्थ भक्ति और सेवा को समर्पित रहा।

भागवती माई प्रतिदिन प्रातः स्नान-ध्यान के बाद भगवान बदरीविशाल के मंदिर पहुंचतीं और अपने मधुर कंठ से श्रीमद्भागवत के श्लोक सुनातीं। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करतीं और भगवान बदरीविशाल के लिए पहली तुलसी की माला स्वयं गूंथकर अर्पित करती थीं। यह क्रम लगातार 76 वर्षों तक बिना किसी व्यवधान के चलता रहा।

ईश्वर की साधना के मार्ग पर बहुत कम ऐसे साधक होते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा, इच्छा, भौतिक सुख, सम्मान या प्रसिद्धि की लालसा के केवल भगवान के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दें। भागवती माई ऐसी ही एक विरली तपस्विनी थीं।

मात्र 14 वर्ष की आयु में वे नेपाल स्थित अपने गांव से पैदल यात्रा कर बदरीनाथ धाम पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के लगभग 76 वर्ष बदरीनाथ में ही भगवान श्रीहरि नारायण के अर्चन, वंदन, चिंतन, मनन और भजन में समर्पित कर दिए। लगभग 90 वर्ष की आयु तक वे बदरीनाथ धाम में ही रहीं और अंततः वहीं देह त्यागी।

भागवती माई का जीवन अत्यंत सादा था। बदरीनाथ में एक छोटी-सी कुटिया, पहनने के लिए केवल दो जोड़ी वस्त्र और हर समय "नारायण-नारायण" का जाप—यही उनकी जीवनभर की सबसे बड़ी संपत्ति थी। उन्होंने कभी धन, प्रतिष्ठा या साधना से मिलने वाले सम्मान की इच्छा नहीं की।

बदरीनाथ धाम को मोक्षधाम और भू-बैकुंठ कहा जाता है। यहां भगवान नारायण की साधना का सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता। लेकिन अक्सर साधना के साथ प्रतिष्ठा और अहंकार का भाव भी जुड़ जाता है। भागवती माई ने जीवनभर स्वयं को इन सभी मोहों से दूर रखा और केवल भगवान बदरीविशाल की अनन्य भक्त बनी रहीं।

स्थानीय लोग बताते हैं कि बदरीनाथ में भागवती माई जैसी निस्वार्थ और तपस्विनी साधिका बहुत विरले ही हुई हैं। बदरीनाथ के निकट बामणी गांव के बलदेव मेहता बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में भागवती माई जैसी साधना, तप के अहंकार से मुक्त और भौतिक संपत्ति से पूर्णतः विरक्त साधिका कभी नहीं देखी।

बदरीनाथ मंदिर के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, भागवती माई प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर भगवान बदरीविशाल को श्रीमद्भागवत के श्लोक सुनाती थीं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करती थीं और पहली तुलसी माला स्वयं भगवान को अर्पित करती थीं। यह उनकी दैनिक साधना का अभिन्न हिस्सा था।

प्रत्येक एकादशी को वे नारद शिला पर प्रातः 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक एक ही आसन पर बैठकर श्रीमद्भागवत का पारायण करती थीं। उनका प्रत्येक एकादशी व्रत निर्जला होता था।

लगभग 90 वर्ष की आयु में भागवती माई ने बदरीनाथ धाम में ही अपने प्राण त्यागे। उनका अंतिम संस्कार बदरीनाथ में ब्रह्मकपाल से ऊपर स्थित पवित्र सोनकात्री क्षेत्र में किया गया।

भागवती माई ने कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया। गुरु बनने या प्रसिद्धि पाने की इच्छा उनसे कोसों दूर थी। वे सभी को समान भाव, स्नेह और करुणा से देखती थीं। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति में न अहंकार होता है, न प्रसिद्धि की चाह और न किसी प्रकार का स्वार्थ।

भागवती माई का जीवन आज भी यह संदेश देता है कि यदि मन पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित हो जाए, तो संसार की कोई भी वस्तु मनुष्य को आकर्षित नहीं कर सकती। उनका तप, त्याग और निस्वार्थ भक्ति सदैव श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

🙏 जय बदरीविशाल

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02/08/2026

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02/08/2026

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