Ashok Bhagat And Bittu Kashyap

Ashok Bhagat And Bittu Kashyap जय श्री बागेश्वर बाला जी महाराज जय शनि देव जी महाराज जय श्री सीता राम जी ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जी

08/05/2026

भजन सम्राट गायक श्री नरेंद्र कौशिक जी
जय श्री बाला जी महाराज जय श्री राम जी

30/04/2026
*श्री दुर्गा चालीसा*नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी...
19/03/2026

*श्री दुर्गा चालीसा*

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥1॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥2॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥3॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥4॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै॥सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥5॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥परी गाढ़ सन्तन र जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥6॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥7॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥8॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥9॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥10॥

दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें?दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:1. साफ-सफाई और पवित्रता: स...
19/03/2026

दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें?

दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:

1. साफ-सफाई और पवित्रता: सबसे पहले, अपने आप को साफ और पवित्र करें। स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें।
2. पूजा स्थल तैयार करें: एक साफ और शांत स्थान पर दुर्गा जी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
3. दीप प्रज्वलन: घी या तेल का दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं।
4. माँ दुर्गा का ध्यान करें: हाथ जोड़कर माँ दुर्गा का ध्यान करें और उनकी कृपा की प्रार्थना करें।
5. चालीसा का पाठ करें: दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू करें। इसे धीरे-धीरे और स्पष्ट शब्दों में पढ़ें।
6. पाठ पूरा होने पर: पाठ पूरा होने के बाद, माँ दुर्गा की आरती करें और उनकी कृपा की प्रार्थना करें।
7. अंत में: अंत में, सभी जीवों के कल्याण की कामना करें और माँ दुर्गा की कृपा के लिए धन्यवाद दें।

नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

एक दिन प्रभु श्री राम ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया और कहा-" हे हनुमान ! मेरे भक्तों मे ज्यादा ना सही थोड़ा बहुत तो अं...
09/01/2026

एक दिन प्रभु श्री राम ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया और कहा-" हे हनुमान ! मेरे भक्तों मे ज्यादा ना सही थोड़ा बहुत तो अंहकार आ ही जाता है परन्तु तुम्हारे भीतर लेशमात्र भी अंहकार नहीं है
तुम तो महाज्ञानी हो महावीर हो और मेरे सबसे बड़े भक्त भी फिर भी तुम अंहकार से मुक्त हो
कैसे अंजनेय?"
हनुमान जी ने प्रभु के चरणो में शीश झुका कर कहा-" प्रभु अंहकार का आरंभ " मैं और मेरा " से होता है
मैं तो आपका हूं प्रभु और मेरे पास जो कुछ भी है वो सब आपका दिया है प्रभु
अब आप बताइए मैं अभिमान करूं तो किस चीज का?
अभिमान करने के लिए मेरे पास मेरा कुछ है ही नहीं"
इतना सुनते ही प्रभु श्री राम ने हनुमान जी को अपने ह्रदय से लगा लिया और कहा-" हे हनुमान ! इसलिए तो तुम मुझे अति प्रिय हो क्योंकि तुम्हारे भक्ति में अंहकार नहीं समर्पण की भावना है "
इसलिए जो भी आपको ईश्वर ने दिया उस पर अभिमान करने की जगह उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद दे ।।

हनुमान न करते ये काम, तो युद्ध में होती रावण की विजय!!!!!कहा जाता है कि उस दौर में एक घटना अगर बिना किसी विघ्न के संपन्न...
03/01/2026

हनुमान न करते ये काम, तो युद्ध में होती रावण की विजय!!!!!

कहा जाता है कि उस दौर में एक घटना अगर बिना किसी विघ्न के संपन्न हो जाती तो युद्ध में रावण का हारना लगभग असंभव ही हो जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रावण का आतंक खत्म नहीं होता।

राम और रावण का युद्ध सत्य और असत्य के बीच संघर्ष था, जिसमें श्रीराम का विजयी होना सुनिश्चित था, लेकिन रावण को कम आंकना भी सही नहीं है।

रावण बहुत बड़ा योद्धा था और उसके समान युद्ध विद्या के ज्ञाता बहुत कम लोग थे। उसके परिवार में भी कई बड़े योद्धा और युद्ध तकनीक के जानकार थे, लेकिन रावण का पतन हुआ क्योंकि वह अधर्म की राह पर था।

कहा जाता है कि उस दौर में एक घटना अगर बिना किसी विघ्न के संपन्न हो जाती तो युद्ध में रावण का हारना लगभग असंभव ही हो जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रावण का आतंक खत्म नहीं होता। यह तब की बात है जब रावण का बेटा मेघनाद युद्ध में मारा गया।

कौन था वह तांत्रिक?????

पुत्र की मौत से रावण को बहुत दुख हुआ। उसके परिजनों ने रावण का समझाया कि वह ऐसी राह छोड़ दे जो उसके विनाश की वजह बन रही है लेकिन रावण नहीं माना। उसने अपने भाई महिरावण को बुलाया और पूरी घटना बताई।

रावण की तरह ही महिरावण भी बहुत बड़ा तपस्वी था। वह पाताल लोक का शासक था। उसने काली की भक्ति से कई सिद्धियां हासिल की थीं। वह कई मायावी शक्तियों का स्वामी और कुशल तांत्रिक था।Rpd

रावण ने उसे समझाया कि अगर वह राम और लक्ष्मण की बलि चढ़ा देगा तो काली प्रसन्न हो जाएंगी और वह अजेय हो जाएगा। रावण की बात सुनकर महिरावण मान गया और उसने भी रावण का साथ निभाने का वादा कर लिया।

क्यों हुई विभीषण को चिंता
जब विभीषण को यह मालूम हुआ कि महिरावण युद्ध में शामिल हो गया है तो उन्हें चिंता हुई। वे उसकी मायावी शक्तियों के विषय में परिचित थे। उन्होंने सबको उसके बारे में बताया और हनुमानजी को यह उत्तरदायित्व सौंपा कि वे श्रीराम-लक्ष्मण की सुरक्षा करें। हनुमान ने कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींच दी और पहरा देने लगे।

महिरावण अपने खोटे इरादे लेकर वहां पहुंचा लेकिन द्वार पर हनुमानजी खड़े थे। वह उनकी शक्ति से परिचित था इसलिए युद्ध नहीं करना चाहता था। उसने विभिन्न प्राणियों का रूप धारण किया लेकिन कुटिया में प्रवेश करने में सफल नहीं हुआ। आखिरकार उसने एक चाल चली।

ऐसी चाल चली महिरावण ने
इस बार महिरावण ने विभीषण का रूप धारण किया और हनुमानजी के पास जाकर बोला, मैं श्रीराम और लक्ष्मणजी की सुरक्षा देखना चाहता हूं। यह कहकर वह भीतर चला गया। चूंकि वह विभीषण के वेश में था इसलिए हनुमानजी ने उसे जाने दिया।

वह अंदर चला गया और वहीं से श्रीराम-लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया। बाद में हनुमानजी और विभीषण को यह बात मालूम हुई। विभीषण की सलाह पर हनुमान भी पाताल चले गए।

वहां महिरावण बलि चढ़ाने की तैयारी कर रहा था। कहा जाता है कि वहां हनुमान एक मधुमक्खी के वेश में गए और उन्होंने माता से पूछा, क्या आप भगवान श्रीराम का रक्त पीना चाहती हैं? जवाब में काली ने कहा, नहीं, मुझे दुष्ट महिरावण का रक्त चाहिए।

यह सुनकर मधुमक्खी के वेश में हनुमान ने दोनों भाइयों के कान में उपाय बताया। बलि का समय निकट आया तो महिरावण ने श्रीराम से कहा कि वे बलिवेदी पर अपना शीश रखें। श्रीराम बोले, मैं क्षत्रिय हूं और मैंने कभी किसी के सामने शीश नहीं झुकाया। अगर तुम मुझे ऐसा करके दिखाओ तो कर लूंगा।

महिरावण ने अपना सिर बलिवेदी पर रखा और उसी वक्त हनुमान अपने असल रूप में आ गए। उन्होंने उसी क्षण तलवार से महिरावण की बलि चढ़ा दी। रावण और महिरावण के मंसूबे अधूरे रह गए और श्रीराम युद्ध में विजयी होकर अयोध्या लौटे।

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