26/10/2024
ऑफिस से आया तो राधिका रोज़ की तरह मेरा चाय पर इंतज़ार कर रही थी. यह हमारा सालों पुराना नियम था, मैं जब तक फ्रेश होता हूं, राधिका चाय ले आती है. आज चाय का घूंट भरते हुए मैंने उससे पूछा, “बिपिन से बात हुई? परसों आ रहा है न?”
“नहीं, कोई फोन तो नहीं आया.”
“अच्छा है, आ जाएं सब, तुम्हारा दिल बहल जाएगा.” उसने कोई जवाब नहीं दिया. मैं थोड़ा हैरान हुआ. आजकल वह अपनी प्रतिक्रिया जल्दी नहीं देती. मन ही मन पता नहीं क्या सोचती रहती है. पर हां, ख़ुश रहती है. उसके चेहरे पर इस उम्र में भी एक चमक रहती है. सुंदर तो वह हमेशा ही लगती रही है, पर आजकल एक आभा है उसके चेहरे पर. मैं उसे निहार रहा था और वह चाय पीने में मगन थी. सुंदर सी कॉटन की साड़ी, उस पर ढीला सा जूड़ा, माथे पर बड़ी सी बिंदी, एक हाथ में घड़ी, दूसरे हाथ में पिछले महीने ही ख़रीदा सोने का कंगन पहने वह बड़ी अच्छी लग रही थी. आजकल मैं उसे जितना सोचने लगा हूं, उतना तो मैंने जवानी में भी नहीं सोचा होगा उसके बारे में. उसने जैसे ही पूछा, “आप क्या सोच रहे हैं?” मेरा मोबाइल बज उठा, बिपिन! हमारे बड़े बेटे का फोन था. कह रहा था, “पापा, हम लोग परसों नहीं आ पाएंगे.”
मैं चौंका, “क्यों? क्या हुआ?”
“नीता को अपने भाई के घर जाना है, उसकी भतीजी का बर्थडे है.”
“तो उसके बाद आ जाना. दिवाली की तो छुट्टियां होंगी अभी, रिंकी के स्कूल का भी नुक़सान नहीं होगा.”
“नहीं पापा, उसके बाद ऊटी जाने का मन है नीता का.”
मैं फिर कुछ नहीं बोला, “ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.” कहकर मैंने उदास मन से फोन बंद कर दिया. राधिका ने शायद बातचीत से अंदाज़ा लगा लिया था. उसने कुछ नहीं पूछा तो मैं हैरान हुआ. ख़ुद ही बताया, “बिपिन नहीं आ रहा है, पहले अपने साले के यहां, फिर ऊटी जाना है उसे.”
“ठीक है, कोई बात नहीं.” कहकर राधिका ने आराम से अपनी चाय की आख़िरी घूंट लेते हुए उठते हुए कहा, “अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए, मैं थोड़ा सैर करके आती हूं.” वह मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना बहुत सहजता से मुस्कुराती हुई अपना रुमाल और घर की चाबी लेकर रोज़ की तरह चली गई और मैं हैरान सा बैठा रह गया.
राधिका! मेरी सर्वगुण संपन्न पत्नी क्या मुझसे अपने दिल का हाल भी नहीं शेयर करेगी? कितना दुख हुआ होगा उसे बेटे-बहू-पोती के न आने का. कैसे मन में ही रख लिया अपना दुख. बेचारी, कितनी दुखी होगी मन ही मन.
मैंने ऐसे ही उठकर चौथी मंज़िल पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी से नीचे देखा, राधिका हंसती-मुस्कुराती अपनी सहेलियों के साथ आगे बढ़ रही थी. बेचारी कैसे बनावटी हंसी हंस रही होगी. क्या यह बात सच है जो मैंने कहीं पढ़ी थी कि हर नारी स्वभावतः एक अच्छी अभिनेत्री होती है, मैं ख़ुद ही इस बात पर मुस्कुरा दिया.
मैंने रोज़ की तरह बेडरूम में लेटकर थोड़ी देर टीवी देखा, साथ-साथ अपने विचारों में डूबता रहा, मेरे रिटायरमेंट में अभी दो साल बचे हैं, हमारा बड़ा बेटा बिपिन, उसकी पत्नी नीता और बेटी रिंकी पूना में रहते हैं. छोटा बेटा विनय अपनी पत्नी नेहा और बेटे शाश्वत के साथ बैंगलोर में कार्यरत है और हम दोनों पति-पत्नी यहां मुंबई में.
अपनी सुविधानुसार दोनों बेटे यहां आते-जाते रहते हैं, पर कुछ दिनों से देख रहा हूं, यहां आने में उनकी रुचि कम रह गई है. मैं हमेशा अपने काम में बहुत व्यस्त रहा हूं, पर अब अक्सर राधिका के बारे में सोचने लगा हूं. कैसे रहती होगी पूरा दिन, पर वह किसी बात की शिकायत क्यों नहीं करती? उस पर ख़ुश भी दिखती है. आज उससे बैठकर बहुत-सी बातें करूंगा. उसका दिल बहलाऊंगा, उसे बाहर डिनर पर ले जाऊंगा. मुझे अचानक उस पर बहुत प्यार आने लगा, इतने में डोरबेल बजी तो मैं लपककर उठा, राधिका होगी. मैंने दरवाज़ा खोला, वही थी. रुमाल से अपना गला थपथपा रही थी. मैंने प्यार से पूछा, “गर्मी लग रही है? पानी पिओगी?”
“नहीं-नहीं, ठीक है, पी लूंगी.” उसने मुंह-हाथ धोया, पानी पीया. फिर मैंने कहा, “थक गई होगी. आओ, थोड़ा लेटकर आराम कर लो.” मैं चाहता था वह मेरे पास बैठे, मैं उसका दुख बांटू, बच्चों की बेरुखी से दुखी उसका मन बहलाऊं. वह बेडरूम में आकर लेट गई, मैं भी वहीं लेट गया. मैंने उसका हाथ सहलाते हुए कहा, “उदास हो राधिका?”
“मैं..? क्यों?”
“बच्चे नहीं आ रहे हैं न!”
वह आराम से अपना जूड़ा खोलती हुई बोली, “अच्छा है नहीं आ रहे हैं.”
मैं चौंका, “क्या कह रही हो? मुझे पता है तुम बहुत दुखी हो, चिंता मत करो, मैं छुट्टी लेकर तुम्हें विनय के घर ले चलूंगा. तुम बिल्कुल उदास मत हो.”
“नरेन, क्या मैं आपको उदास लग रही हूं?”
मैं चुप रहा, तो वह मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोली, “मैं ज़रा भी उदास नहीं हूं, सच कहूं तो इस बार उनके न आने की ख़बर से मुझे राहत ही मिली है. कमरदर्द के कारण अब ज़्यादा काम होता नहीं है और उन सबके आने से काम बहुत बढ़ जाता है और बहुएं तो मेहमानों की तरह ही आती हैं. मुझे लगा अब मुझे भी समझदार हो ही जाना चाहिए. उनसे क्या उम्मीद रखूं मैं? समझ गई हूं, उनकी दुनिया अलग है और हमारी अलग. अब इतना ही बहुत है कि हालचाल मिलते रहें, वे जहां रहें ख़ुश रहें. बस, और क्या चाहिए?
और अब यह जो हमारे जीवन की दूसरी पारी है मुझे काफ़ी हद तक अच्छी लग रही है. समय तो लगा है संभलने में, पर धीरे-धीरे सब ठीक लग रहा है. मैंने भी लाइफ को नए सिरे से एंजॉय करना सीख लिया है. बहुत जी ली बच्चों के लिए, अब मैं अपने ढंग से जी रही हूं. जो दिल चाहता है बनाती हूं, खाती हूं, घूमती हूं. और क्यों जाऊं किसी बेटे के यहां उदास होकर. जो मेरे जाते ही फिर नई ज़िम्मेदारियां मुझे सौंपकर बाहर घूमते फिरते हैं. अब मुझे रिश्तों के छलावे में नहीं पड़ना. भले ही वो मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं, पर अब उनकी अलग हस्ती है, जिसमें हस्तक्षेप करने के बदले मैं अपने बचे हुए साल स़िर्फ अपने लिए जीना चाहती हूं.”
राधिका ने धाराप्रवाह अपनी बात कहकर मेरे सीने पर सिर रख दिया. फिर कहा, “देर से ही सही, पर अब वे पल तो मिले जिन्हें मैं अब तक ढूंढ़ रही थी.”
मेरा मन भर सा आया. मैं भावुक हो गया और प्यार से उसके बाल सहलाने लगा. लगा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखकर उन्हें सही दिशा देकर दूसरी पारी को ख़ुशी-ख़ुशी जीने का राधिका का यह तरीक़ा ठीक ही तो है.
राधिका ने फिर कहा, “बच्चे अपनी फैमिली में सेट हैं और मैं आपके साथ, फिर किस बात पर दुखी होऊं. सारी उम्र तो बच्चों की फरमाइशों और सेवा में बिता दी. अब अपने अधूरे शौक़ पूरे कर रही हूं. बच्चों की पढ़ाई के ख़र्चे, उनकी मांगें पूरी करने के लिए अपने लिए कुछ ख़रीदना मुश्किल होता था. अब तो वॉर्डरोब भरा है मेरा. बच्चे अपनी दुनिया में ख़ुश और मैं आपके साथ ख़ुश!” मैंने राधिका को हैरानी से देखा, वह खुलकर मुस्कुरा रही थी. एकदम सरल, सहज सी मुस्कान. कहीं कोई शिकायत, कोई क्षोभ नहीं, पूरी तरह संतोष और पारदर्शिता झलक रही थी उसकी बात में.
मैं भी हंस दिया, पूछा, “आज डिनर पर बाहर चलें?”
“क्यों नहीं, गुड आइडिया.” कहकर उसने मेरे कंधे पर सिर टिका दिया.