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एक युवक पुलिस की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया।।🙄पुलिस अफसर ने उससे पूछा कि अगर सेब का दाम 150 रुपये किलो हैं तो 100 ग्...
01/11/2024

एक युवक पुलिस की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया।।
🙄
पुलिस अफसर ने उससे पूछा कि
अगर सेब का दाम 150 रुपये किलो हैं तो 100 ग्राम सेब कितने के आएंगे।
😉
युवक की गणित कमज़ोर थी, मगर चतुराई भरपूर थी, बोला....,साहब अगर 100 ग्राम सेव के मुझें पैसे देने पड़े तो फ़िर पुलिस के सिपाही की नौकरी किस काम की...??
🙄
अफसर..... चलो मान लेते हैं, लेकिन अगर तुम्हारी पत्नी बाज़ार जाए तो 150 रुपए प्रति किलो के रेट से 100 ग्राम सेब उसे कितने का पड़ेगा ...
🙄
युवक बोला....अरे साहब, उसकी क्या बात करते हैं। अपनी पत्नी को मैं आपसे ज्यादा जानता हूं, 100ग्राम लेना है तो वो 100 ग्राम सेब का ही रेट पूँछेगी, पक्का...
😉
अफसर.... अच्छा चल ये भी माना मगर, अगर तेरा भाई यही लेने बाज़ार जाए तो…...
🙄
युवक.....उसकी बात मत करो साहब... वो किसी काम का नही, एक नम्बर का कामचोर है।
सारा दिन खाकर पड़ा रहता है।
😉
अफसर ने हार नहीं मानी, बोला....अगर तुम्हारा बाप सेब लेने जाए तो इस रेट के हिसाब से 100 ग्राम सेब का दाम क्या होगा..
🙄
अरे साहब, मेरे पिता के तो मुंह में दाँत ही नही बचे हैं,
मेरा बापू केला खाता हैं,
फ़िर न वो सेव खरीदेंगे औऱ न ही रेट पूछेंगे ।
😉
अफ़सर भी ढीठ था, फिर पूछ बैठा.....
अगर मजबूरी में घर पर कोई न हो औऱ तुम्हारी बहन सेव खरीदने बाजार जाए तो...
🙄
युवक....सर मैने उसकी शादी पांच साल पहले ही कर दी है,
अब वो जाने और बहनोई जाने.....
उनकी इच्छा..सेव ख़रीदे, लीची ख़रीदे, संतरा ख़रीदे, आम ख़रीदे.... मुझें उससे क्या......
और वैसे भी साहब, नौकरी मैं करूँगा या पूरा मेरा खानदान करेगा ....
😉
अफसर के सब्र का बांध अब टूटने लगा था.....
बहुत गुस्से में बोला....
🙄
भाई अगर कोई बिलकुल आम आदमी सेब लेने जाए तो 100 ग्राम सेब कितने का हुआ,
अब बताओ......
😉
युवक.....साहब आम आदमी को सेब खाने लायक सरकार औऱ हमारे सिस्टम ने छोड़ा ही कहाँ है, वो तो बेचारा नमक रोटी में परेशान है......
आम आदमी तो बस सेव का ठेला लगाता है और खास आदमी ही ख़रीद कर सेव खाता है......... 😁😁😁🙄

**मेरी कहानी**मेरा नाम अजय है, और मैं एक छोटे से गाँव में रहता हूँ। मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। मेरे माता-पित...
29/10/2024

**मेरी कहानी**

मेरा नाम अजय है, और मैं एक छोटे से गाँव में रहता हूँ। मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता मेहनती थे, और उन्होंने हमेशा मुझे अच्छी शिक्षा देने की कोशिश की। गाँव में हमसे बड़े एक किसान थे, जिनकी फसल हमेशा अच्छी होती थी। मुझे याद है, जब मैं छोटा था, तो मैं उनके खेतों में खेलता था और फसलों की बढ़ती हरियाली को देखता था।

स्कूल में मैं पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन मेरे मन में हमेशा कुछ नया करने की चाह थी। मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक पुस्तकालय की स्थापना की। गाँव के बच्चे वहाँ आकर पढ़ते थे और नई-नई किताबें पढ़ने का आनंद लेते थे। धीरे-धीरे, पुस्तकालय गाँव के बच्चों के लिए एक ज्ञान का केंद्र बन गया।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने अपने गाँव की सामाजिक समस्याओं को समझना शुरू किया। मैंने देखा कि बहुत से लोग शिक्षा के महत्व को नहीं समझते थे। मैंने गाँव के बुजुर्गों और शिक्षकों के साथ मिलकर एक जागरूकता कार्यक्रम शुरू किया। हम स्कूलों में जाकर बच्चों और उनके माता-पिता को शिक्षा के लाभ समझाते थे।

एक दिन, मैंने निर्णय लिया कि मुझे गाँव के बच्चों के लिए एक और सुविधा प्रदान करनी चाहिए। मैंने एक खेल का मैदान बनाने की योजना बनाई। मैंने गाँव के लोगों को एकत्र किया और सभी ने मिलकर काम किया। कुछ महीनों बाद, हमारा खेल का मैदान तैयार हो गया। बच्चों ने वहाँ क्रिकेट, फुटबॉल और कबड्डी खेलना शुरू कर दिया।

इस तरह, मैंने अपनी जिंदगी में कुछ सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश की। मैंने सीखा कि अगर हम मिलकर काम करें, तो किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है।

मेरे जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब मेरे पिता बीमार हो गए। मैंने पढ़ाई के साथ-साथ खेती का काम भी संभालना शुरू किया। यह मेरे लिए कठिन था, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मेरे दोस्तों ने मेरा साथ दिया, और हम सब मिलकर काम करते रहे। धीरे-धीरे, मेरे पिता की तबियत ठीक हो गई, और मैंने फिर से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया।

मेरे जीवन में एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मैंने कॉलेज में प्रवेश लिया। वहाँ मैंने नए लोगों से मिला, और मेरी सोच का दायरा बढ़ा। मैंने समाज सेवा के कई प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया, जिससे मुझे समाज की असली समस्याओं का ज्ञान हुआ।

आज, मैं अपने गाँव वापस आया हूँ और बच्चों को शिक्षा देने के लिए काम कर रहा हूँ। मैंने एक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना है।

मेरी कहानी यह सिखाती है कि कठिनाइयाँ जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम मेहनत और दृढ़ता से काम करें, तो हम अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। मेरा सपना है कि मेरे गाँव के सभी बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और अपने सपनों को पूरा करें।

इस तरह, मैंने अपने अनुभवों से सीखा है कि हर छोटी सी कोशिश का बड़ा महत्व होता है।

योगेश ट्रेन की जनरल बोगी में बर्थ सीट पर सोया हुआ था | गाडी रूककर वापस चली तो अचानक उसकी नजर अपनी तलाकशुदा पत्नी रागिनी ...
29/10/2024

योगेश ट्रेन की जनरल बोगी में बर्थ सीट पर सोया हुआ था | गाडी रूककर वापस चली तो अचानक उसकी नजर अपनी तलाकशुदा पत्नी रागिनी पर पडी | पता नहीं कब वह उसके सामने वाली सीट पर आकर बैठ गई थी | 6 साल बाद वह उसे देख रहा था | वह बहुत कमजोर हो गई थी | उसने पुरानी
सस्ती सी साडी पहन रखी थी | ना माथे पर बिंदी और ना गले में मंगलसूत्र था | तो क्या उसने अभी तक दूसरा विवाह नहीं किया | क्या अभी तक वह मेरी तरह अकेली ही है | योगेश ऐसा सोच ही रहा था कि तभी रागिनी की नजर उस पर पडीनजरे मिली तो योगेश दूसरी तरफ देखने लगा | फिर पता नहीं
योगेश के दिमाग में क्या आया कि वह सीट से नीचे उतर आया और रागिनी के पास बैठे लडके से कहा कि वह ऊपर वाली सीट पर चला जाये | लडका मान गया तब योगेश रागिनी के पास बैठ गया | बैठते ही योगेश बोला " रागिनी
कैसी हो ?"

रागिनी ने नजर न मिलाते हुए खिडकी की तरफ देखते हुए बोला कि " मैं ठीक हूँ और आप? "
योगेश बोला मैं भी ठीक हूँ और कानपुर जा रहा हूँ |त्यौहार होने के कारण रिजर्वेशन सीट नहीं मिली | इस कारण जनरल बोगी में आना पडा | तुम कहां जा रही हो ? वह बोली मैं भी कानपुर ही जा रही हूँ | आजकल माँ वही बडे भईया के पास ही है | बीमार है इसलिए मिलने जा रही हूँ | काफी देर दोनों चुप रहे |
फिर योगेश बोला " एक बात पूछूँ ?" रागिनी ने आँखों से ही पूछा क्या? योगेश संकोच करते हुए पूछा " अभी तक शादी क्यों नहीं की ?
वह कुछ नहीं बोली | मगर जब योगेश ने दोबारा नहीं पूछा तो रागिनी ने पूछा " आपने की है शादी " योगेश ने भी बिना बोले ना में गर्दन हिला दी | फिर काफी देर तक दोनों चुप रहे | मानो एक दूसरे को परख रहे थे |
डिब्बे में कुल्फी बेचने वाला आ गया था | योगेश बोला खाओगी रागिनी ने ना में सिर हिला दिया. योगेश ने रिक्वेस्ट करते हुए फिर पूछा " खा लो यार , तुम्हारे
साथ मैं भी खा लूंगा " | जानता हूँ तुम्हारी सबसे बडी
कमजोरी कुल्फी है | वह थोडा मुस्कुराई तो योगेश ने महसूस किया कि वह अपनी आँखों से बहने वाली आंसुओं को समेटने का प्रयास कर रही है | 5 साल उसके साथ रहा था ,जब वह अपने आँसुओं को समेटने का प्रयास करती थी तो ऐसे ही मुस्कुराया करती थी | योगेश दूसरी तरफ देखने
लगा तो रागिनी चुपके से अपनी आँसुओ को पोछने लगी |

फिर वह सहज होकर बोली " एक शर्त पर खाउंगी "योगेश बोला क्या शर्त है ? तो रागिनी बोली " पैसे मैं दूंगी " योगेश कुछ नहीं बोला फिर रागिनी ने दो कुल्फियां खरीद ली और एक कुल्फी योगेश को देते हुए बोली " अब मैं भी कमाने लगी हूँ , एक प्राइवेट स्कूल में पढाती हूँ , महीने के 10 हजार मिलते हैं | कुल्फी खाते हुए योगेश बोला " तलाक के समय
कोर्ट के आदेश पर मैं तुम्हें 30 लाख रूपये दे तो रहा था। अगर ले लेती तो अपना स्कूल खोल लेती | जबकि तुम बहुत स्वाभिमानी हो , इस जमाने में पैसे के बिना कुछ नहीं होता | वह हंस कर बोली अगर ले लेती तो अपनी जमीर को क्या जवाब देती | तो ये जमीर रोज कहता कि जिसे छोड कर
आयी हो उसी के सहारे पल रही हो | योगेश बोला तुम बहुत अच्छी हो , मासूम हो | ये एहसास तुमसे तलाक लेने के बाद मुझे हुआ | तुम यकीन नहीं करोगी? मैं बहुत बदल गया हूँ | पीना बिल्कुल छोड दिया है , गुस्सा बिल्कुल नहीं करता | अब मैं किसी को नीचा दिखाने की कोशिश भी नहीं करता जो तुम्हें बहुत बुरा लगता था | वो सब बुरी आदतें मैने छोड दी है | वह उदास होकर बोली " अब क्या फायदा " जब मैं मना किया करती थी तब आप मेरी एक भी बात नहीं सुनते थे | आपके कारण मैं हमेशा टेंशन में रहती थी | इसी कारण मुझे दो बार गर्भपात भी हुआ | वरना आज मेरे भी दो बच्चे होते | एक 8 साल का हो गया होता और दूसरा 6 साल का होता | कहकर
वो रो पडी | बच्चों की बात पता चली तो योगेश के भी आंखों में आँसों आ गये लेकिन वह पुरूष था तो आँसुओं को पलकों तक पहुँचने से पहले ही पी गया और बोला " कभी कभी लगता है मैं बहुत बुरा आदमी हूँ | मैने कभी रिश्तों की कदर नहीं की , उसी की सजा झेल रहा हूँ आज | बिल्कुल अकेला हो गया हूँ , अब मां भी नहीं रही | "
मां के होने पर रागिनी को बडा दुख हुआ और बोली मां को भली चंगी छोड कर आयी थी , उनको क्या हो गया था | इस बार योगेश भावुकता वश अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया
और बोला वो तुम्हें हर दिन याद करती थी , बोलती थी बहु को वापस घर ले आओ | मैं उन्हें कैसे समझाता कि तलाक के बाद बहुएं वापस घर नहीं आती | फिर दोनों के बीच चुप्पी छा गई थी | कानपुर आ गया था |स्टेशन आने वाला था | योगेश बोला वापस कब जाओगी? रागिनी बोली आज रात यही रूकूंगी , कल की सुबह की ट्रेन से वापस जाउंगी | फिर वही खडी हो गई ,योगेश भी खडा हो गया और पूछा" कितने बजे वाली ट्रेन से वापस जाओगी "
रागिनी बोली हम गरीब लोग हैं ,रिजर्वेशन नहीं करा पता हैं , जनरल डिब्बे में सफर करते हैं | इसलिए जो भी ट्रेन मिलती है टिकट लेकर चढ जाते हैं | इतना कहकर वह नीचे उतर गई | योगेश अपना सूटकेस सम्हालता हुआ उसके पीछे लपका और बोला अगर मैं रिजर्वेशन की दो टिकटें ले लूं तो मुझे पता है कि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी लेकिन मैं तुम्हारे साथ सफर करना चाहता हूँ | जनरल में ही चल लूंगा , बताओ कितने बजे
यहां मिलोगी ? रागिनी आटो में बैठती हुई बोली " 9 बजे यहां मिलूंगी " फिर उसके देखते देखते आटो आँखों से ओझल हो गया | योगेश कानपुर दो दिन के लिए आया था मगर रागिनी का
साथ पाने के लिए उसने अपना शेड्यूल बदल लिया | उसने जल्दी से अपने बिजनेस का काम पूरा किया और अगले दिन सुबह साढे 8 बजे ही स्टेशन आ गया | रागिनी 9 की जगह
10 बजे स्टेशन पहुँची | और बोली आप अभी तक यहीं पर , मैं सोच रही थी कि आप चले गये होंगे |
रागिनी बहुत खुश थी | बोली मां अब बिल्कुल ठीक है | योगेश बोला मैं तुम्हारा भी टिकट ले आया हूँ | अब 30 रूपये के टिकट के लिए कुछ कहना मत | रागिनी हंसते हुए बोली अभी ट्रेन आने में आधा घंटा है , चलो तब तक कुल्फी खाते हैं | पैसे मैं दे दूंगी , हिसाब बराबर हो जायेगा | इतना कहकर
वह फिर मुस्कुरा दी | वह जब भी मुस्कुराती थी योगेश की नजर उसके चेहरे पर ठहर जाती थी | फिर दोनों ने कुल्फी खायी और तब तक ट्रेन आ गयी और फिर से एक नया सफर
शुरु हो गया मगर इस सफर में कुछ खास था | योगेश कुछ कहने के लिए तिलमिला रहा था | मगर डर भी रहा था कि वह मना करा देगी तो | योगेश नोटिस कर रहा था कि रागिनी बडे भाई के घर से नई साडी पहन कर आई थी |वह बहुत सुन्दर लग रही
थी | खिडकी से आ रही ठंडी हवा के झोंके से रागिनी के ललाट पर लटकी बालों की एक लडी झूम उठती है | उसे ऐसे देखकर योगेश के दिल में एहसास सा उठता है कि ये औरत कभी उसकी जिन्दगी थी मगर मैं इसे सम्हाल कर नहीं रख
पाया | योगेश की मन:स्थिति से अनजान रागिनी बोली " क्या हुआ आप गुमशुम से क्यों हो ?" | दोस्त बन कर ही सही कुछ बात तो कर लो | योगेश बोला मुझे दोस्ती नहीं चाहिए | रागिनी को झटका सा लगा , बोली " फिर क्यों मेरे साथ सफर करने के लिए उतावले थे आप" योगेश बोला "मुझे तू चाहिए "
| हमेशा के लिए | जन्मों जन्मों के लिए | मेरे साथ हंसने के लिए , मेरे साथ रोने के लिए | वह इतनी जल्दी में ये सारी बातें बोला कि रागिनी बस उसके मुंह की ओर देखती रह गई | वह आगे बोला " मैं गलत था , तुम्हारी कदर नहीं कर पाया " |
मगर तुम्हारे जाने के बाद मुझे मेरे गलतियों का एहसास हो गया है | मुझे माफ कर दो " कहकर वह रो पडा | रागिनी चुप हो गई , बस उसके चेहरे की तरफ देखे जा रही थी | योगेश
उसके दोनों हाथ पकड कर बोला " मुझे माफ कर दे यार | मैं वादा करता हूँ अब कभी भी तुम्हारे आंसुओं की वजह नहीं बनूंगा | तू जो कहेगी वही करूंगा , प्लीज लौट आ | " रागिनी ने माथे पर साडी थोडी सी पीछे सरकाई और बोली इधर देखिये जरा |" योगेश ने देखा रागिनी ने मांग भर रखी थी | वह बोली मैं जानती थी आप यही सब करोगे | मैंने कल ही सोच
लिया था कि अब अकेले चलने के दिन खत्म हो गये हैं | मेरा हमसफर लौट आया है | अब आगे का सफर उसी के साथ तय करना है | थक गई हूँ मैं अकेले चलते चलते | कहते हुए वह अजीब सी मुद्रा में मुस्कुराने लगी | योगेश बोला , मैं
जानता हूँ जब तेरा दिल रोने को होता है तब तू ऐसे ही मुस्कुराती है | मत रोक इन आंसुओं को , इन्हें बह जाने दो | दिल हल्का हो जायेगा | इतना सुनते ही रागिनी का संयम जवाब दे गया | वह जोर जोर से रोने लगी , पूरे डिब्बे के लोग
उन्हें देखने लगे | मगर रागिनी ने लोगों की परवाह नहीं की | वह योगेश के कंधे पर सर रखकर रोती रही | कुछ देर बाद रागिनी का गांव आ गया | गाडी कुछ पल रूकी फिर चल पडी | रागिनी को अब वहां उतरना ही नहीं था | जिन्दगी में एक नया सफर फिर से शुरू हो गया | अब उसकी मंजिल मायका
नहीं पिया का घर था | जो वर्षों से उसके उसके लौटने का इन्तजार कर रहा था | वह अब भी योगेश के कंधे पर सर रखी थी | आंखें बंद कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी , एक मासूम बच्चे की तरह |
कहानी कैसी लगी कमेन्ट करके जरूर बतायें | कहानी अच्छी लगी हो तो विडियो को प्लीज लाइक कर दीजिए , शेयर कर दीजिए and follow us
धन्यवाद 🙏

पुरानी यादेंमेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़...
28/10/2024

पुरानी यादें
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है

हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है.

● हम वो आखिरी पीढ़ी हैं

जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।

● हम वो आखिरी लोग हैं…

जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे. और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे

● हम वो आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने चिमनी , लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।

● हम उसी पीढ़ी के लोग हैं…

जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।

● हम उस आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।

जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।

जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती घोटी है।

जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है. और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है

जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।

जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे ❣️🙏

रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें। माता पिता जैसे सास,...
27/10/2024

रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें। माता पिता जैसे सास, ससुर और एक छोटी सी ननद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहे थें।


आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था,


खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी की रेनू के बड़े भाई ने, अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था। क्यूँकी पैसें तो उनके पास बचें नही थें, जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें, फिर भला बच्चें माँ बाप को क्यूँ रखने लगें। रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें ।

रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी। आखिर लड़की थी, अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था ।
आज वही माता पिता मंदिर के किसी कोने में भूखें प्यासें पड़ें थे।


रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी । वो अपने माता पिता को घर ले आए। पर वहाँ हिम्मत नही कर पा रही थी, क्यूँकी उनके पति कम बोलते थे, अधिकतर चुप रहते थे । जैंसे तैंसे रात हुई और रेनू के पति व पूरा परिवार खाने के टेबल पर बैठा था । रेनू की ऑखे सहमी थी, उसने डरते हुये अपने पति से कहा,
सुनिये जी, भाईया_भाभी ने मम्मी पापा को घर से निकाल दिया हैं। वो मंदिर में पड़े है, आप कहें तो उनको घर ले आऊ ।

रेनू के पति ने कुछ नही कहा, और खाना खत्म कर के अपने कमरें में चला गया, सब लोग अभी तक खाना खा रहें थे, पर रेनू के मुख से एक निवाला भी नही उतरा था, उसे बस यही चिंता सता रही थी अब क्या होगा ? इन्होने भी कुछ नही कहा, रेनू रुहाँसी सी ऑख लिए सबको खाना परोस रही थी ।

थोड़ी देर बाद रेनू के पति कमरें से बाहर आए और रेनू के हाथ में नोटो का बंडल देते हुये कहा, इससे मम्मी, डैडी के लिए एक घर खरीद दो, और उनसे कहना, वो किसी बात की फ्रिक ना करें मैं हूं।
रेनू ने बात काटते हुये कहा, आपके पास इतने पैसे कहा से आए जी ??
रेनू के पति ने कहा, ये तुम्हारे पापा के दिये गये ही पैसे हैं।

मेरे नही थे, इसलिए मैंने हाथ तक नही लगाए।

वैसे भी उन्होने ये पैसे मुजे जबरदस्ती दिये थे, शायद उनको पता था एक दिन ऐसा आयेगा।

रेनू के सास_ससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरों से देखने लगें, और उनके बेटे ने भी उनसे कहा, अम्मा जी बाबूजी सब ठीक है ना??

उसके अम्मा बाबूजी ने कहा बड़ा नेक ख्याल है बेटा, हम तुम्हें बचपन से जानते हैं, तुझे पता है, अगर बहू अपने माता_पिता को घर ले आयी, तो उनके माता पिता शर्म से सर नही उठा पायेंगे, की बेटी के घर में रह रहें, और जी नही पाएगें ।

इसलिए तुमने अलग घर दिलाने का फैसला किया हैं, और रही बात इस दहेज के पैसे की, तो हमें कभी इसकी जरूरत नही पड़ी। क्यूँकी तुमने कभी हमें किसी चीज की कमी होने नही दी, खुश रहो बेटा कहकर रेनू और उसके पति को छोड़ सब सोने चले गयें ।
रेनू के पति ने फिर कहा, अगर और तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुझे बताना, और अपने माता_पिता को बिल्कुल मत बताना घर खरीदने को पैसे कहाँ से आए, कुछ भी बहाना कर देना, वरना वो अपने को दिल ही दिल में कोसते रहेंगें।
चलो अच्छा अब मैं सोने जा रहा, मुझे सुबह दफ्तर जाना हैं, रेनू का पति कमरें में चला गया, और रेनू खुद को कोसने लगी, मन ही मन ना जाने उसने क्या_क्या सोच लिया था, मेरे पति ने दहेज के पैसें लिए है, क्या वो मदद नही करेंगे, करना ही पड़ेगा, वरना मैं भी उनके माँ_बाप की सेवा नही करूगीं।
रेनू सब समझ चुकी थी, की उसके पति कम बोलते हैं, पर उससे ज्यादा कही समझतें हैं।
रेनू उठी और अपने पति के पास गयी, माफी मांगने, उसने अपने पति से सब बता दिया।
उसके पति ने कहा कोई बात नही होता हैं, तुम्हारे जगह मैं भी होता तो यही सोचता।
रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नही था, एक तरफ उसके माँ_बाप की परेशानी दूर दूसरी तरफ, उसके पति ने माफ कर दिया,
रेनू ने खुश और शरमाते हुये अपने पति से कहा,
मैं आपको गले लगा लूं ? उसके पति ने अट्टहास करते हुये कहा, मुझे अपने कपड़े गंदे नही करने और दोनो हंसने लगें और शायद रेनू को अपने कम बोलने वालें पति का ज्यादा प्यार समझ आ गया!!
जय मैया की

ऑफिस से आया तो राधिका रोज़ की तरह मेरा चाय पर इंतज़ार कर रही थी. यह हमारा सालों पुराना नियम था, मैं जब तक फ्रेश होता हूं, ...
26/10/2024

ऑफिस से आया तो राधिका रोज़ की तरह मेरा चाय पर इंतज़ार कर रही थी. यह हमारा सालों पुराना नियम था, मैं जब तक फ्रेश होता हूं, राधिका चाय ले आती है. आज चाय का घूंट भरते हुए मैंने उससे पूछा, “बिपिन से बात हुई? परसों आ रहा है न?”
“नहीं, कोई फोन तो नहीं आया.”
“अच्छा है, आ जाएं सब, तुम्हारा दिल बहल जाएगा.” उसने कोई जवाब नहीं दिया. मैं थोड़ा हैरान हुआ. आजकल वह अपनी प्रतिक्रिया जल्दी नहीं देती. मन ही मन पता नहीं क्या सोचती रहती है. पर हां, ख़ुश रहती है. उसके चेहरे पर इस उम्र में भी एक चमक रहती है. सुंदर तो वह हमेशा ही लगती रही है, पर आजकल एक आभा है उसके चेहरे पर. मैं उसे निहार रहा था और वह चाय पीने में मगन थी. सुंदर सी कॉटन की साड़ी, उस पर ढीला सा जूड़ा, माथे पर बड़ी सी बिंदी, एक हाथ में घड़ी, दूसरे हाथ में पिछले महीने ही ख़रीदा सोने का कंगन पहने वह बड़ी अच्छी लग रही थी. आजकल मैं उसे जितना सोचने लगा हूं, उतना तो मैंने जवानी में भी नहीं सोचा होगा उसके बारे में. उसने जैसे ही पूछा, “आप क्या सोच रहे हैं?” मेरा मोबाइल बज उठा, बिपिन! हमारे बड़े बेटे का फोन था. कह रहा था, “पापा, हम लोग परसों नहीं आ पाएंगे.”
मैं चौंका, “क्यों? क्या हुआ?”
“नीता को अपने भाई के घर जाना है, उसकी भतीजी का बर्थडे है.”
“तो उसके बाद आ जाना. दिवाली की तो छुट्टियां होंगी अभी, रिंकी के स्कूल का भी नुक़सान नहीं होगा.”
“नहीं पापा, उसके बाद ऊटी जाने का मन है नीता का.”
मैं फिर कुछ नहीं बोला, “ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.” कहकर मैंने उदास मन से फोन बंद कर दिया. राधिका ने शायद बातचीत से अंदाज़ा लगा लिया था. उसने कुछ नहीं पूछा तो मैं हैरान हुआ. ख़ुद ही बताया, “बिपिन नहीं आ रहा है, पहले अपने साले के यहां, फिर ऊटी जाना है उसे.”
“ठीक है, कोई बात नहीं.” कहकर राधिका ने आराम से अपनी चाय की आख़िरी घूंट लेते हुए उठते हुए कहा, “अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए, मैं थोड़ा सैर करके आती हूं.” वह मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना बहुत सहजता से मुस्कुराती हुई अपना रुमाल और घर की चाबी लेकर रोज़ की तरह चली गई और मैं हैरान सा बैठा रह गया.
राधिका! मेरी सर्वगुण संपन्न पत्नी क्या मुझसे अपने दिल का हाल भी नहीं शेयर करेगी? कितना दुख हुआ होगा उसे बेटे-बहू-पोती के न आने का. कैसे मन में ही रख लिया अपना दुख. बेचारी, कितनी दुखी होगी मन ही मन.
मैंने ऐसे ही उठकर चौथी मंज़िल पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी से नीचे देखा, राधिका हंसती-मुस्कुराती अपनी सहेलियों के साथ आगे बढ़ रही थी. बेचारी कैसे बनावटी हंसी हंस रही होगी. क्या यह बात सच है जो मैंने कहीं पढ़ी थी कि हर नारी स्वभावतः एक अच्छी अभिनेत्री होती है, मैं ख़ुद ही इस बात पर मुस्कुरा दिया.
मैंने रोज़ की तरह बेडरूम में लेटकर थोड़ी देर टीवी देखा, साथ-साथ अपने विचारों में डूबता रहा, मेरे रिटायरमेंट में अभी दो साल बचे हैं, हमारा बड़ा बेटा बिपिन, उसकी पत्नी नीता और बेटी रिंकी पूना में रहते हैं. छोटा बेटा विनय अपनी पत्नी नेहा और बेटे शाश्‍वत के साथ बैंगलोर में कार्यरत है और हम दोनों पति-पत्नी यहां मुंबई में.
अपनी सुविधानुसार दोनों बेटे यहां आते-जाते रहते हैं, पर कुछ दिनों से देख रहा हूं, यहां आने में उनकी रुचि कम रह गई है. मैं हमेशा अपने काम में बहुत व्यस्त रहा हूं, पर अब अक्सर राधिका के बारे में सोचने लगा हूं. कैसे रहती होगी पूरा दिन, पर वह किसी बात की शिकायत क्यों नहीं करती? उस पर ख़ुश भी दिखती है. आज उससे बैठकर बहुत-सी बातें करूंगा. उसका दिल बहलाऊंगा, उसे बाहर डिनर पर ले जाऊंगा. मुझे अचानक उस पर बहुत प्यार आने लगा, इतने में डोरबेल बजी तो मैं लपककर उठा, राधिका होगी. मैंने दरवाज़ा खोला, वही थी. रुमाल से अपना गला थपथपा रही थी. मैंने प्यार से पूछा, “गर्मी लग रही है? पानी पिओगी?”
“नहीं-नहीं, ठीक है, पी लूंगी.” उसने मुंह-हाथ धोया, पानी पीया. फिर मैंने कहा, “थक गई होगी. आओ, थोड़ा लेटकर आराम कर लो.” मैं चाहता था वह मेरे पास बैठे, मैं उसका दुख बांटू, बच्चों की बेरुखी से दुखी उसका मन बहलाऊं. वह बेडरूम में आकर लेट गई, मैं भी वहीं लेट गया. मैंने उसका हाथ सहलाते हुए कहा, “उदास हो राधिका?”
“मैं..? क्यों?”
“बच्चे नहीं आ रहे हैं न!”
वह आराम से अपना जूड़ा खोलती हुई बोली, “अच्छा है नहीं आ रहे हैं.”
मैं चौंका, “क्या कह रही हो? मुझे पता है तुम बहुत दुखी हो, चिंता मत करो, मैं छुट्टी लेकर तुम्हें विनय के घर ले चलूंगा. तुम बिल्कुल उदास मत हो.”
“नरेन, क्या मैं आपको उदास लग रही हूं?”
मैं चुप रहा, तो वह मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोली, “मैं ज़रा भी उदास नहीं हूं, सच कहूं तो इस बार उनके न आने की ख़बर से मुझे राहत ही मिली है. कमरदर्द के कारण अब ज़्यादा काम होता नहीं है और उन सबके आने से काम बहुत बढ़ जाता है और बहुएं तो मेहमानों की तरह ही आती हैं. मुझे लगा अब मुझे भी समझदार हो ही जाना चाहिए. उनसे क्या उम्मीद रखूं मैं? समझ गई हूं, उनकी दुनिया अलग है और हमारी अलग. अब इतना ही बहुत है कि हालचाल मिलते रहें, वे जहां रहें ख़ुश रहें. बस, और क्या चाहिए?
और अब यह जो हमारे जीवन की दूसरी पारी है मुझे काफ़ी हद तक अच्छी लग रही है. समय तो लगा है संभलने में, पर धीरे-धीरे सब ठीक लग रहा है. मैंने भी लाइफ को नए सिरे से एंजॉय करना सीख लिया है. बहुत जी ली बच्चों के लिए, अब मैं अपने ढंग से जी रही हूं. जो दिल चाहता है बनाती हूं, खाती हूं, घूमती हूं. और क्यों जाऊं किसी बेटे के यहां उदास होकर. जो मेरे जाते ही फिर नई ज़िम्मेदारियां मुझे सौंपकर बाहर घूमते फिरते हैं. अब मुझे रिश्तों के छलावे में नहीं पड़ना. भले ही वो मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं, पर अब उनकी अलग हस्ती है, जिसमें हस्तक्षेप करने के बदले मैं अपने बचे हुए साल स़िर्फ अपने लिए जीना चाहती हूं.”
राधिका ने धाराप्रवाह अपनी बात कहकर मेरे सीने पर सिर रख दिया. फिर कहा, “देर से ही सही, पर अब वे पल तो मिले जिन्हें मैं अब तक ढूंढ़ रही थी.”
मेरा मन भर सा आया. मैं भावुक हो गया और प्यार से उसके बाल सहलाने लगा. लगा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखकर उन्हें सही दिशा देकर दूसरी पारी को ख़ुशी-ख़ुशी जीने का राधिका का यह तरीक़ा ठीक ही तो है.
राधिका ने फिर कहा, “बच्चे अपनी फैमिली में सेट हैं और मैं आपके साथ, फिर किस बात पर दुखी होऊं. सारी उम्र तो बच्चों की फरमाइशों और सेवा में बिता दी. अब अपने अधूरे शौक़ पूरे कर रही हूं. बच्चों की पढ़ाई के ख़र्चे, उनकी मांगें पूरी करने के लिए अपने लिए कुछ ख़रीदना मुश्किल होता था. अब तो वॉर्डरोब भरा है मेरा. बच्चे अपनी दुनिया में ख़ुश और मैं आपके साथ ख़ुश!” मैंने राधिका को हैरानी से देखा, वह खुलकर मुस्कुरा रही थी. एकदम सरल, सहज सी मुस्कान. कहीं कोई शिकायत, कोई क्षोभ नहीं, पूरी तरह संतोष और पारदर्शिता झलक रही थी उसकी बात में.
मैं भी हंस दिया, पूछा, “आज डिनर पर बाहर चलें?”
“क्यों नहीं, गुड आइडिया.” कहकर उसने मेरे कंधे पर सिर टिका दिया.

रवि का जन्म एक छोटे से गांव में हुआ था, जहां सुविधाएं सीमित थीं और जीवन जीना भी एक संघर्ष था। उसके परिवार की आर्थिक स्थि...
26/10/2024

रवि का जन्म एक छोटे से गांव में हुआ था, जहां सुविधाएं सीमित थीं और जीवन जीना भी एक संघर्ष था। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। रवि के पिता एक छोटे किसान थे, जिनकी जमीन बमुश्किल उनके परिवार का पेट भर पाती थी। उसकी मां घर संभालती थी, और हर दिन परिवार के लिए दो वक्त का भोजन जुटाने की कोशिश करती थी। रवि का बचपन कठिनाइयों में बीता, लेकिन उसने कभी अपने हालात को अपने सपनों पर हावी नहीं होने दिया।

रवि की एक ही ख्वाहिश थी—शहर जाकर पढ़ाई करना और अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालना। परंतु उसकी यह ख्वाहिश एक दूर का सपना ही लगती थी, क्योंकि उसके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे उसकी पढ़ाई का खर्च उठा सकें। गांव में केवल एक प्राइमरी स्कूल था, और आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना अनिवार्य था। मगर शहर जाना आसान नहीं था, खासकर एक ऐसे परिवार के लिए, जो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाता था।

रवि ने अपने पिता से शहर जाकर पढ़ाई करने की इच्छा जताई। उसके पिता की आंखों में आंसू आ गए। वे जानते थे कि रवि होशियार है, और उसकी मेहनत उसे कहीं दूर तक ले जा सकती है, लेकिन आर्थिक तंगी ने उनके सपनों को भी बांध रखा था। उन्होंने रवि से कहा, "बेटा, हम तुम्हारी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते। अगर कुछ कर पाते तो हम जरूर करते, लेकिन हालात हमारे हाथ में नहीं हैं।"

रवि ने अपने पिता की यह बात सुनी, लेकिन उसने हार मानने से इनकार कर दिया। उसने खुद से वादा किया कि चाहे जो भी हो, वह पढ़ाई करेगा और अपने सपनों को पूरा करेगा। उसने अपने गांव में छोटे-मोटे काम करना शुरू किया—किसानों के खेतों में मदद करना, गांव के दुकानदारों का सामान ढोना, और जो भी काम मिल सकता था, वह करने लगा। वह दिनभर मेहनत करता और रात में घर आकर पढ़ाई करता।

कई महीनों की कड़ी मेहनत के बाद रवि ने कुछ पैसे जमा किए। वह जानता था कि यह पैसे शहर में पढ़ाई शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन यह उसकी शुरुआत के लिए काफी थे। आखिरकार, रवि ने शहर जाने का फैसला किया। उसने अपने माता-पिता को यह बताया, और उन्हें यकीन दिलाया कि वह वहां जाकर भी काम करेगा और पढ़ाई का खर्च खुद उठाएगा। उसके माता-पिता ने भारी मन से उसे विदा किया, लेकिन उनके दिल में एक उम्मीद भी थी कि उनका बेटा कुछ बड़ा करेगा।

शहर में जिंदगी गांव से बिल्कुल अलग थी। वहां की चकाचौंध और तेज जीवनशैली ने रवि को हैरान कर दिया, लेकिन उसने जल्द ही खुद को उस माहौल में ढाल लिया। उसने एक छोटे से कमरे में रहना शुरू किया, जिसे उसने कई और छात्रों के साथ साझा किया। वहां की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं थी, लेकिन रवि को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वह केवल अपने सपनों पर ध्यान दे रहा था। उसने कॉलेज में दाखिला लिया और साथ ही एक छोटी सी नौकरी भी खोज ली, जिससे वह अपनी पढ़ाई और खाने-पीने का खर्च उठा सके।

शहर में पढ़ाई करना आसान नहीं था। कॉलेज में पढ़ाई का स्तर ऊंचा था, और वहां के छात्र अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ पढ़ाई कर रहे थे, जबकि रवि के पास साधारण किताबें और एक पुराना फोन था। लेकिन उसने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से खुद को साबित किया। वह दिन-रात पढ़ाई करता, नोट्स बनाता और परीक्षा की तैयारी करता। जब उसके सहपाठी छुट्टियों में घूमने जाते, रवि तब भी काम करता और खाली समय में पढ़ाई करता।

रवि के संघर्ष के दिन लंबे थे, लेकिन उसकी मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी। उसने अपने पहले साल की परीक्षा में अच्छे अंक हासिल किए, और इसके बाद उसे एक स्कॉलरशिप भी मिल गई, जिससे उसकी पढ़ाई का बोझ थोड़ा कम हुआ। अब वह पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकता था, और उसकी आर्थिक चिंताएं भी थोड़ी कम हो गई थीं। रवि ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और और भी कड़ी मेहनत करने लगा।

रवि की यह मेहनत सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं थी। उसने अपने जीवन में अनुशासन को जगह दी, अपने काम और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना सीख लिया। हर दिन वह कुछ नया सीखने की कोशिश करता, चाहे वह पढ़ाई से जुड़ा हो या जीवन के दूसरे पहलुओं से। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा, और उसे यकीन हो गया कि वह अपने सपने को पूरा कर सकेगा।

कई सालों के संघर्ष और कठिनाइयों के बाद, रवि ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। उसने अपनी कक्षा में सबसे ऊंचे अंकों के साथ ग्रेजुएशन किया। उसकी यह सफलता केवल उसकी नहीं थी, बल्कि उसके परिवार और उसके गांव के लिए भी गर्व का क्षण था। अब रवि के पास कई नौकरी के प्रस्ताव आने लगे, लेकिन उसने सबसे अच्छे प्रस्ताव को चुना। उसकी मेहनत ने उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी दिलाई, जहां वह अपने परिवार को एक बेहतर जीवन दे सकता था।

रवि अब अपने जीवन में स्थिरता पा चुका था। उसने अपनी पहली तनख्वाह से अपने माता-पिता के लिए एक नया घर खरीदा, और उन्हें गांव से शहर बुला लिया। अब उसका परिवार भी शहर में एक आरामदायक जीवन जी रहा था, जो कभी केवल एक सपना लगता था। लेकिन रवि ने कभी अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भुलाया। वह जानता था कि उसकी सफलता उसकी कड़ी मेहनत और संघर्ष का नतीजा है।

आज रवि एक सफल व्यक्ति है, लेकिन उसने अपने गांव और वहां के बच्चों को नहीं भुलाया। वह अक्सर अपने गांव जाता है और वहां के बच्चों के लिए किताबें और अन्य शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराता है। वह उन्हें यह सिखाता है कि जीवन में कठिनाइयाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इंसान मेहनत और लगन से काम करे, तो वह किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है।

रवि की यह संघर्षमय कहानी हर किसी के लिए एक प्रेरणा है। उसने यह साबित कर दिया कि गरीबी और मुश्किल हालातों के बावजूद अगर आप अपने सपनों पर डटे रहते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं, तो आप अपनी मंजिल जरूर पा सकते हैं। रवि की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है, बस आपको अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना होता है और हार नहीं माननी चाहिए।

🇮🇳हमारे यूपी और बिहार मे बूढ़ पुरनिया एक कहावत कहते थे।❤️ जो बचपन में बहुत सुनने को मिलता था एक कहानी जो  रात में निकले ...
25/10/2024

🇮🇳हमारे यूपी और बिहार मे बूढ़ पुरनिया एक कहावत कहते थे।❤️ जो बचपन में बहुत सुनने को मिलता था एक कहानी जो रात में निकले सांप और महुआ के बीच का संवाद है ।
💯सांप बोला महुआ से टीप से टपाक से कपार काहे फोरले?
महुआ बोला सांप से ठेंगे से, बोंंगे से रात काहे डोलले?😄
अर्थ -सारी रात टप टप टपकने वाला महुआ जब सांप के सर पर गिर जाता है तब सांप नाराज होकर कहता कि टीप से टपक कर कपार क्यों फोड़ दिया?
तब महुआ भी ऐठ कर जबाब देता है कि मेरे ठेंगे से कपार फूटा इतनी रात में इधर उधर डोल क्यों रहे थे।🤣

आम में बौर और महुआ में कुंच आने का मतलब होता है कि प्रकृति ने अपना श्रंगार कर लिया है। सारे पेड़ पौधे नव पल्लव, कली फूल धारण करके,बसंत ऋतू के आगमन की तैयारी में लग गए है।
जी हाँ! महुआ के पेड़ में भी फूल आने का यही समय होता है।
कल तिनछठी व्रत में महुआ के उल्लेख पर कई लोगों ने उसके बारे में पूछा था तो सोचा आज तनिक विस्तार से वर्णन कर दूँ।
हम लोग छोटे थे तब महुये के बड़े बड़े बगीचे हुआ करते थे जिसे महुआबारी" कहा जाता था। सुबह सुबह घर के निक्कमे सदस्य एवं छोटे बच्चों के हाथ मे छोटी छोटी डलिया थमा कर महुआबारी मे महुआ बीनने के लिए भेज दिया जाता था सारी रात महुये के फूल टपकते थे जिन्हे सुबह चुन कर धूप मे सूखने के लिए डाल दिया जाता था।
ताजे फूल इतने मीठे रसभरे होते है मानो रसगुल्ला मुँह मे डाल लिया हो। सूखने के बाद भी ये किशमिश की भांति अपना स्वाद लिए रहते है। ताजे महुआ के फूलों को चुनकर,धोकर, निचोड़ कर उसका रस निकाल कर उसमें आटा गुंथकर ठकुवा, लापसी जैसे पकवान बनते है।सूखे फूल को और गेहूं के आटे को भूनकर उसे उखल मे कूटकर लाटा बनाया जाता था। अगर किसी के हाथ में या पैरों में अपरस एक बिमारी होती है चमडा छूटता है तो महुआ का फूल बिना कुछ खाए पीए बासी मुह हथेली पर मसलकर आधे घंटे बाद धो लिजीए दो या तीन दिन में बिमारी खत्म सूखे महुआ को भिगोकर पीसकर बाँधने से सूजन, दर्द, मोच इत्यादि मे आराम मिलता है।हां! सबसे जरूरी बात कि इसका ज्यादा फायदा वो व्यक्ति बता सकता है जो महुआ महरानी का सेवन करता हो। जी हाँ! सही समझे आप इसके फूल से शराब भी बनाई जाती है।जब फूल का मौसम खत्म हो जाता है और आम के पेड़ से आम का सीजन भी खत्म हो जाता है तब महुआ के फल की बारी आती है। जिसे " कोइन " कहते है।
महुवा के फल यानी कोवा की सब्जी उबालकर बेसन और चावल का आटा डालकर बनाई जाती है जिसका स्वाद बहुत ही उत्तम होता है। इसमें कितने लोगों ने इस सब्जी को खाया है कृपया बताएं।
घर की बड़ी बुजुर्ग महिला सारी कोइन इकट्ठा करके उसका गुदा अलग करके बीज निकाल लेती है।
बीज के ऊपर का खोल भी काफ़ी सख्त होता है इसलिए उसे भिगो कर रखते है फिर ईंट के टुकड़े या पत्थर से तोड़कर गिरी निकालकर सूखा ली जाती है। इस गिरी में काफ़ी मात्रा में तेल होता है।
इसके तेल का स्वाद कसैला होता है इसलिए नीबू की पत्ती को तेल में पकाया जाता है ताकि इसका स्वाद और गंध दूर करके खाने के प्रयोग में लाया जा सके इसे रिफाइंड की जगह पर तलने के लिए इस्तेमाल कर सकते है।इसके तेल को शरीर में लगाने से त्वचा का रुखापन दूर होता है

वैसे से महुआ के बारे में मेरा इतनी ही जानकारी था जो घर के बड़े बुजुर्गो से सुने थे आज आप सबसे साझा किए है। आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य साझा करें और अगर आपको हमारा पोस्ट अच्छा लगे तो प्लीज लाइक शेयर कॉमेंट और फॉलो करके सपोर्ट कीजिए 🙏

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