10/03/2026
"मेरे कदम"
निराशाओं की तरफ बढ़ते_ बढ़ते ,
अचानक ही मेरे कदम रुक जाते हैं !
"एक सोच "फिर से जीने को प्रेरित करती है _
कि गर मौत समान दुख न मिलता _
जीवन में ,तो मैं सुख_दुख का अन्तर कैसे समझ पाती ?
कैसे समझ पाती जीवन को ?
कैसे समझ पाती औरों के दुख को ?
गर सुख ही सुख मिलता मुझे हर पल तो,
कैसे मैं आशाओं के दीप को _
जलाना सीख पाती ?
उस वक्त फिर से मेरे कदम रुक जाते हैं !
जब दिल पर घाव टीस देते हैं _
एहसास होता है ये सच कि ,
लोग रिश्तों में प्यार की भीख देते हैं !
है सच ये भी कि मैं कभी_कभी बहुत टूट जाती हूं !
अतीत को याद कर _
ईश्वर से अकसर रूठ जाती हूं ।
जब जब याद आता है वो दुखों का समंदर_
तब तब निराशाएं घेरने लग जाती है मुझे,
और मेरे कदम रुक जाते हैं !
फिर से इस सोच के साथ कि गर ,
न मिलती मुझे नफरत बेहद अपनों से तो_
मैं प्रेम को कैसे समझ पाती ?
कैसे मैं गैरों में छिपे अपनों को और_
अपनों में छिपे गैरों को ढ़ूंढ पाती ?
मेरे कदम हमेशा उस वक्त रूक जाते हैं !
जब अहम मुझे घेरने लग़ता है ,
मैं तब याद कर लेती हूं फिर से अतीत को !
फिर से समेट लेती हूं उस दुख के समंदर को_
अपने भीतर !
जिसने मुझे अपनों के बीच रह तन्हा कर,
मुझे मुझसे मिलाया_
मुझे जीना सिखाया _
मुझे सुख और दुख के अन्तर को समझाया !
जब जब निराशाओं से घिरने लगती हूं मैं,
रोक लेती हूं अपने कदमों को !
क्योंकि मैंने अब निराशा में आशा को ढ़ूंढना_
सीख लिया है !
मैंने आंसुओं को पोंछ हंसना सीख लिया है ।
मैंने जीवन को समझ_
जीवन को हर हाल में जीना सीख लिया है ।
मैंने सीख लिया है जीना
तभी अब सकारात्मकता की राह पर चल,
नहीं रोकती अपने बढ़ते कदमों को_
क्योंकि अब मैंने चलना सीख लिया है !
मैंने हंसना सीख लिया है !!
Feelings