17/10/2020
“सिलसिलेवार मुलाकात”
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आज की मुलाकात ग्राम-नियामतपुर निवासी ब्रिजकिशोर यादव(बिरजू) के नाम रही।
आपको बताते चलें कि बिरजू रंगमंच की एक ऐसी शख्सियत है जिसने अपने जीवन की जवानी श्रीराम लीला को प्रभावी बनाने में खर्च कर दी। मंच की बल्लियां गाड़ने से लेकर मंच पर हास्य अभिनय का लोहा मनवाने तक का सफर तय करने वाले इस कलाकार ने अपने अभिनय कौशल से जहाँ दर्शकों को हास्य रस का पान कराया वहीं करुण रस का स्वाद भी चखाया। बड़ी ही सहजता से चरित्र में उतर जाना इनकी तमाम खूबियों में से एक है।
एक बार की बात है मंच पर लक्ष्मण - मेघनाद का युद्ध चल रहा था, सभी जानते हैं कि इन दोनों पात्रों का युद्ध अनेक बार और अधिकाधिक दिखाया जाता है जिसके कारण विशेष हैं जो मैं नहीं बताऊंगा। खै़र..... दर्शक ऊबे ना... इसलिये युद्ध के साथ साथ बीच में थोड़ी कॉमेडी भी पेश कर दी जाती थी। अब हुआ ये कि बिरजू तो ठहरा रावण दल का सैनिक जिसे कुछ भी करने और कहने की पारम्परिक स्वतंत्रता(मर्यादित) परन्तु रामादल तो पूर्ण मर्यादित। मेघनाद(महेश सक्सेना जी) लड़ते लड़ते मंच से उतर गये लेकिन सैनिक(बिरजू) डटा हुआ लक्ष्मण(सतीश सक्सेना जी) के साथ-‘पहिले हमसे लड़उ, अगर जीति गये तउ महराज से लड़िअउ’। लक्ष्मण ने ललकारा-‘सावधान’। अब ये खड़बड़ाया बोला-अरे रुकउ रुकउ, लड़ाई के कुछ नियम होति करो, ऐसेइ थोड़उ चिल्लाइ परे सावधान। लक्ष्मण बोले-‘अच्छा बताओ क्या नियम होते हैं लड़ाई के'। बोला-‘लेउ औउ सुनउ इन्हइ जहो न पता कि लड़ाई कइसे लड़ी जाति अउ लन्न आइ गए हमास्संग'। लक्ष्मण बोले-‘तो तुम्हीं बता दो'। बोला-‘हाँ, अब तुमने सही कही। देखउ हम कहंइ कि लड़ाई शुरू तउ शुरू, हम कहंइ बंद तउ बंद’। शर्त मान ली गयी। लड़ाई शुरू हुई। ठेठ देहाती अंदाज, हाथ में लकड़ी की डेढ़ फुटी तलवार।दर्शक झूम झूम जायें। अब लक्ष्मण को ये समझ में न आये कि करें तो करें क्या। लक्ष्मण जी ज्यों ही धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना साधते तभी ये बोल देता कि लड़ाई बंद, फिर जैसे ही लक्ष्मण जी दिशा बदलते तभी हमलावर हो जाता ये कहकर कि लड़ाई शुरू। शर्त के नियम से बंधे हुये लक्ष्मण जी कुछ न कर पाते सिवाय पसीना बहाने के। तभी हनुमान जी(लल्ला) ने देखा कि लक्ष्मण जी को थकान होने लगी है तो सामने आकर स्वयं लड़ने लगे। ये तो थी सामान्य बात, मज़े की बात तो ये है कि जब हनुमान जी ने उसे खदेड़ा तो खुद को बचाने के लिए वह मंच की साइड विंग के पास लगे लोहे के खम्बे पर इस तरह चढ़ गया जैसे छिपकली चढ़ रही हो। ये नज़ारा अद्भुत तो था ही असुनियोजित भी था। दर्शक वर्ग पेट पकड़ हँस रहा था लेकिन कलाकार वर्ग भौचक्का था कि ये किया कैसे बिरजू ने। अब हनुमान जी वहीं खड़े कि कहीं ये गिर न पड़े, लेकिन हनुमान जी के रहते वो कैसे उतरे। निर्देशक का इशारा पाकर हनुमान जी सरक लिए तब दुबले शरीर का बिरजू खम्बे से उतरा और कमर में खोंसी तलवार निकालकर मंच पर चक्कर लगाने लगा तुर्रा ये कि ‘भाग गये सब डरके'। बाहें फैलाकर-‘हम जैसे योद्धा के सामने कोई टिक ही नहीं पाया’।
इस तरह के दृश्यों की कोई स्क्रिप्ट नहीं होती है। निपुण रंगकर्मी presence of mind का प्रदर्शन करता है।
परिस्थितियोंवश ये कलाकार मंच से दूर होता गया।
तमाम संस्मरण के बीच ये भी एक लमहा था।
ऐसा रंगसाधक तस्वीर के मध्य में। दाहिनी ओर सत्यनारायण ‘जुगनू' जी तथा बायीं तरफ मैं स्वयं।