26/11/2025
चल पड़ते हैं, चल पड़ते हैं, चल पड़ते हैं बाबूजी,
सुबह–सुबह ही रोज़ सड़क पर चल पड़ते हैं बाबूजी।
आपस में सबसे मिलते हैं ‘चौराहों’ पर बाबूजी,
चौपड़ खेलते संग साथी के मिल जाते है बाबूजी।
अपने जीते कर जाते है, सब कुछ नाती–पोतो का,
नगद खेत मकान सम्पति का, बटवारा भी बाबूजी।
घाट–घाट का पिया है पानी तभी ऊर्जा भरपूर लिए,
आदर्शो की प्रतिमूर्ति ये, लगते सभी को बाबूजी।
सजग प्रहरी वन देश के खातिर, चौकस रहते बाबूजी,
चरण चूमती शिखर साधना, प्यारे प्यारे बाबूजी।
निर्णय की जब बारी आती, साफ साफ कह देते है,
नही सोचते आगे पीछे, कह देते है बाबूजी।
जब बच्चो के बीच मे होते, वे बच्चे बन जाते है, मछली, पर्वत, राजा रानी, सुनते सुनाते बाबूजी।