Manoranjan Aapke Liye

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Prem Se Boliye Jai Mata Di
17/06/2024

Prem Se Boliye Jai Mata Di

10/05/2024
नमस्कार मित्रों
04/05/2024

नमस्कार मित्रों

08/03/2024

ॐ नमः शिवाय।
ॐ नमः शिवायै।।

11/02/2024

*अवश्य पढ़ें*
एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो हमारे घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें। बेटी ने यह भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते। संत ने बेटी के आग्रह को स्वीकार किया।

कुछ समय बाद जब संत घर आए, तो उसके पिताजी पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे और एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी। संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से यह कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई हो।

संत ने पूछा - मुझे लगता है कि आप मेरे ही आने की उम्मीद कर रहे थे, पिता- नहीं, आप कौन हैं?
संत ने अपना परिचय दिया और फिर कहा- मुझे यह खाली कुर्सी देखकर लगा कि आपको मेरे आने का आभास था।

पिता- ओह यह बात नहीं है, आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाजा बंद करेंगे क्या? संत को यह सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाजा बंद कर दिया।

पिता- दरअसल इस खाली कुर्सी का राज मैंने आज तक किसी को भी नहीं बताया, अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी जिंदगी, मैं यह जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है। मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता था, वो तो सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे, कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था। मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया, लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं, भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है, उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो, फिर विश्वास करो कि वहाँ भगवान खुद ही विराजमान हैं अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो।

मैंने ऐसा ही करके देखा, मुझे बहुत अच्छा लगा, फिर तो मैं रोज दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा, लेकिन यह ध्यान रखता था कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले। अगर वह देख लेती, तो परेशान हो जाती या वह फिर मुझे मनोचिकित्सक के पास ले जाती।

यह सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की, सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा। संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था, इसलिए विदा लेकर चले गए।

दो दिन बाद बेटी का फोन संत के पास आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद ही मृत्यु हो गई थी, जिस दिन पिताजी आपसे मिले थे। संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ तो नहीं हुई?
बेटी ने जवाब दिया- नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी, तो उन्होंने मुझे बुलाया, मेरा माथा प्यार से चूमा, यह सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। जब मैं वापस आई, तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे, लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज भी देखी। पिताजी ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाए हों। संतजी, वो क्या था?

यह सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले, बड़ी मुश्किल से बोल पाए - काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊँ। बेटी! तुम्हारे पिताजी की मृत्यु भगवान की गोद में हुई है। उनका सीधा सम्बन्ध सीधे भगवान से था। उनके पास जो खाली कुर्सी थी, उसमें भगवान बैठते थे और वे सीधे उनसे बात करते थे। उनकी प्रार्थना में इतनी ताकत थी कि भगवान को उनके पास आना पड़ता था।

आकर्षण शायद अनेको के लिए हो सकता है,
समर्पण किसी एक के लिए होता है, 💞💞

*राधे-राधे🙏

10/02/2024

*❤️ एक दान ऐसा भी ❤️*
*एक बुज़ुर्ग शिक्षिका भीषण गर्मियों के दिन में बस में सवार हुई, पैरों के दर्द से बेहाल, लेकिन बस में सीट न देख कर जैसे – तैसे खड़ी हो गई।*

*कुछ दूरी ही तय की थी बस ने कि एक उम्रदराज औरत ने बड़े सम्मानपूर्वक आवाज़ दी, "आ जाइए मैडम, आप यहाँ बैठ जाएं” कहते हुए उसे अपनी सीट पर बैठा दिया। खुद वो गरीब सी औरत बस में खड़ी हो गई। मैडम ने दुआ दी, "बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरी बुरी हालत थी सच में।"*उस गरीब महिला के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई।*
*कुछ देर बाद शिक्षिका के पास वाली सीट खाली हो गई। लेकिन महिला ने एक और महिला को, जो एक छोटे बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी और मुश्किल से बच्चे को ले जाने में सक्षम थी, को सीट पर बिठा दिया।*
*अगले पड़ाव पर बच्चे के साथ महिला भी उतर गई, सीट खाली हो गई, लेकिन नेकदिल महिला ने बैठने का लालच नहीं किया* ।
*बस में चढ़े एक कमजोर बूढ़े आदमी को बैठा दिया जो अभी - अभी बस में चढ़ा था।*
*सीट फिर से खाली हो गई। बस में अब गिनी – चुनी सवारियां ही रह गईं थीं। अब उस अध्यापिका ने महिला को अपने पास बिठाया और पूछा, "सीट कितनी बार खाली हुई है लेकिन आप लोगों को ही बैठाते रहे, खुद नहीं बैठे, क्या बात है?"*
महिला ने कहा, *"मैडम, मैं एक मजदूर हूं, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं कुछ दान कर सकूं। तो मैं क्या करती हूं कि कहीं रास्ते से पत्थर उठाकर एक तरफ कर देती हूं, कभी किसी जरूरतमंद को पानी पिला देती हूं, कभी बस में किसी के लिए सीट छोड़ देती हूं, फिर जब सामने वाला मुझे दुआएं देता है तो मैं अपनी गरीबी भूल जाती हूं । दिन भर की थकान दूर हो जाती है । और तो और, जब मैं दोपहर में रोटी खाने के लिए बैठती हूं ना बाहर बेंच पर, तो ये पंछी - चिड़ियां पास आ के बैठ जाते हैं, रोटी डाल देती हूं छोटे-छोटे टुकड़े करके । जब वे खुशी से चिल्लाते हैं, तो उन भगवान के जीवों को देखकर मेरा पेट भर जाता है। पैसा धेला न सही, सोचती हूं दुआएं तो मिल ही जाती है ना मुफ्त में। फायदा ही है ना और हमने लेकर भी क्या जाना है यहां से।"*

*शिक्षिका अवाक रह गई, एक अनपढ़ सी दिखने वाली महिला इतना बड़ा पाठ जो पढ़ा गई थी उसे।*
*अगर दुनिया के आधे लोग ऐसी सोच को अपना लें तो धरती स्वर्ग बन जाएगी।*

*दान धन से नहीं, मन से होता है*। 🌹🙏

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