Mainbiharhoon

Mainbiharhoon The name Bihar is a derivative from Vihara, which means 'monastery'. True to its name and its rich c

दुनिया का सबसे पहला गणराज्य बिहार के वैशाली में स्थापित किया गया था। 2600 साल पहले बिहार को सबसे ज्यादा शांतिप्रिय यानी अहिंसा प्रिय भूमि कहा जाता था। बोधगया और पावापुरी में लोग शांति प्राप्त करने के लिये आते थे और आज भी आते हैं। भारत के चार महान राजा इसी राज्य से थे- समुद्र गुप्त, सम्राट अशोक, राजा विक्रमादित्य और चंद्रगुप्त मौर्य। पुरातन काल में संस्कृति और सत्ता के बारे में अध्ययन करने के लिये

दुनिया भर से लोग यहां आया करते थे। भारतीय सभ्यता की असली तस्वीर पाटलीपुत्र से ही उभरी थी। नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। बौद्ध और जैन धर्मों के अलावा सिख धर्म की जड़ें भी यहां से जुड़ी हैं। गुरुगोविंद सिंह का जन्म पटना में हुआ। पुरातन काल में बिहार देश की व्यापारिक राजधानी हुआ करती थी। तब देश का 40 फीसदी व्यापार सिर्फ मगध, वैशाली, मिथिला, विदेहा, अंग, साक्य प्रदेश, विज्जी, जनका से हुआ करता था।

23/09/2020

हिन्दी की युद्ध काव्य परम्परा के शिखर पुरुष राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयन्ती पर विनम्र प्रणाम

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।

मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।

है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है।

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड, झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं, हम उनको गले लगाते हैं।

वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया।

जब विघ्न सामने आते हैं, सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल, तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही, जाते हैं हमें जगाकर ही।

वाटिका और वन एक नहीं, आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड, पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं, बागों में शाल न मिलते हैं।

कंकरियाँ जिनकी सेज सुघर, छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं, लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं, वे ही शूरमा निकलते हैं।

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे, तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है, क्या कर सकती चिनगारी है?

10/09/2020
गणेश चतुर्थी और चौरचन की हार्दिक शुभकामनाएं
22/08/2020

गणेश चतुर्थी और चौरचन की हार्दिक शुभकामनाएं

मंगल भवन अमंगल हारी।द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥होइहि सोइ जो राम रचि राखा।को करि तर्क बढ़ावै साखा॥हो, धीरज धरम मित्र अरु न...
05/08/2020

मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिये चारी॥
जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू॥
हो, जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
रघुकुल रीत सदा चली आई।
प्राण जाए पर वचन न जाई॥
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता॥

28/07/2020

Kumar Museum, Hasanpur (Samastipur)

This museum was founded in 1958 by Dr. Maun, and has a rich collection of antiquities and artistic materials of Mangalgarh, Pand, Bharwadi, Kumran, Checher (Vaishali), Srinagargarh (Saharsa), Chandi (Eastern Champaran), Morang (Nepal) etc. Here ancient antiquities and metal statues, monuments, historical coins, earthen pots, ancient manuscripts, bead, medieval weapon, mithila folk painting, old handicraft samples, Mughal era wallets, farman etc. have increased its dignity. This museum is registered by the state government and should be developed as a district museum.

इंतज़ार करने वालों को सिर्फ़ उतना ही मिलता है,जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं !पूर्व राष्ट्रपति,   के नाम से प्रसिद्...
27/07/2020

इंतज़ार करने वालों को सिर्फ़ उतना ही मिलता है,जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं !
पूर्व राष्ट्रपति, के नाम से प्रसिद्ध, महान वैज्ञानिक, भारत रत्न डॉ जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
उनका आदर्श जीवन देशवासियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

कारगिल विजय दिवस हमारे जांबाज सैनिको की वीरता, शौर्य और बलिदान की याद दिलाता है, मातृभूमि के अमर शहीदों को शत् – शत् नमन...
26/07/2020

कारगिल विजय दिवस हमारे जांबाज सैनिको की वीरता, शौर्य और बलिदान की याद दिलाता है, मातृभूमि के अमर शहीदों को शत् – शत् नमन।

Khudneshwar AsthanKhudneshwar Asthan is a Hindu temple devoted to Lord Shiva located 17 kilometers southwest of the Sama...
24/07/2020

Khudneshwar Asthan
Khudneshwar Asthan is a Hindu temple devoted to Lord Shiva located 17 kilometers southwest of the Samastipur district headquarters. The name of the temple was inherited from a Muslim woman named Khudni who found the Lingam at this location and became a devotee of Lord Shiva. Her mortal remains were buried one yard south beside the Lingam under the same temple roof.

During the British Empire, Narhan estate built this temple in 1858 and appointed a priest as a caretaker. Devotees flock there yearround, but especially during its annual festival of Maha Shivratri and in the month of Shravan, crowds emerge for darshana and worship. In 2008 Bihar Religious Trust Board Chairman Kishore Kunal provided financial assistance from the board and announced it to be developed for tourists to demonstrate Hindu-Muslim unity.

In the 14th century the temple site was covered by dense forest and was used mainly for grazing cattle. Khudni often went there for grazing her cow. One day while returning home after grazing, she tried milking her cow but received no milk. This continued for several days. One day while grazing, the cow left her sight. She found the cow and was astonished to see her cow shedding milk. She ran to the village to relate her discovery. The local people cleared the ground and started digging, only to find a Lingam. After her death her remains were buried beside the Lingam. They erected a temple that they named “Khudneshwar Asthan” inherited from the name of the Muslim woman Khudni Biwi.

मन्नीपुर मंदिरआस्था ऐसी की सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करना भी कम लगता है। विश्वास ऐसा कि कण-कण में मां भगवती का दर्शन हो...
23/07/2020

मन्नीपुर मंदिर

आस्था ऐसी की सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करना भी कम लगता है। विश्वास ऐसा कि कण-कण में मां भगवती का दर्शन होता है। दूर दराज से आये श्रद्धालु अपनी मन्नतें व उसके पूरे होने का जिक्र एक-दूसरे से कर रहे थे।
स्थानीय लोगों के अलावा यहां दूसरे प्रदेशों से भी श्रद्घालु आकर अपनी मन्नत मांगते हैं। मन्नतें पूरा होने पर वे मां भगवती के दरबार में पुन: हाजिरी लगाते हैं। नवमी के दिन मां भगवती की खोईंछा भरने का अपना अलग ही महत्व है। इसलिए कतारबद्ध महिलाएं इसके लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। यहां शुरू से ही बलि प्रथा नहीं है। सिर्फ फूल और अक्षत देकर छागर को छोड़ दिया जाता है।

22/07/2020

महाभारतकालीन पांडव स्थान उपेक्षित

जिस स्थल को अतुल्य भारत के तहत वैश्विक पर्यटन के मानचित्र पर होना चाहिए, वह अपनी पहचान खोता जा रहा। वहां खेती की जा रही। यह है दलसिंहसराय स्थित महाभारतकालीन पांडव स्थान। लगभग 22 एकड़ में यह फैला है। यहां खोदाई में पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। इसकी महत्ता देखते हुए मुख्यमंत्री ने पर्यटन स्थल का दर्जा देने की घोषणा की थी। लेकिन, हुआ कुछ नहीं। पाड़ पंचायत स्थित पांडव स्थान का इतिहास महाभारतकाल से जुड़ा बताया जाता है।
कहा जाता है कि वनवास के दौरान यहां पांडव आए थे। यहां पांडव कृष्ण धाम मंदिर भी है, जहां पांडवों की प्रतिमाएं लगी हैं। वर्ष 2002 में हुए पुरातात्विक उत्खनन में कुषाणकालीन सभ्यता के भी प्रमाण मिले थे। दीवारें भी मिली थीं, जो 45 सेमी से लेकर एक मीटर चौड़ी थीं। एक मृदभांड के टुकड़े पर ब्राह्मी लिपि का अभिलेख मिला था। 15 स्तंभों का भी पता चला था। ऐसी मूर्तियां मिली थीं, जिससे नाथ पूजा होने की पुष्टि होती है। यहां आज भी नाथ पूजा होती है।
इसे साढ़े तीन से चार हजार वर्ष पुरानी ताम्रपाषाण कालीन सभ्यता के रूप में चिन्हित किया गया है। यहां से प्राप्त पुरावशेषों की तुलना सूबे के सोनपुर व चिरांद के अलावा देश में अन्य जगहों पर ऐसी सभ्यता के मिले प्रमाणों से की जाती है।
अभिलेखों और वस्तुओं की हुई जांच
खोदाई में मिले ब्राह्मी अभिलेख, राजाओं की तस्वीर युक्त तांबे के सिक्के, तांबे की कटोरियां, औजार, मुहर, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां, गोमेद पत्थर, मोतियां, काले रंग का चमकीला बर्तन, हाथी दांत एवं कुषाणकालीन सिक्कों सहित अन्य की जांच कराई गई। लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान में रेडियो कार्बन डेङ्क्षटग से जांच में सभी चीजें लगभग 3600 वर्ष पुरानी बताई गईं।

सावन में भगवान भोले के जलाभिषेक के लिए समस्तीपुर जिले के विद्यापतिधाम में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। यहां मिथिलां...
21/07/2020

सावन में भगवान भोले के जलाभिषेक के लिए समस्तीपुर जिले के विद्यापतिधाम में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। यहां मिथिलांचल के अलावा पड़ोसी देश नेपाल और उत्तरप्रदेश के भी शिवभक्त पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। मनोकामना लिंग के रूप में प्रसिद्ध विद्यापतिधाम मंदिर में एक साथ भक्त व भगवान की पूजा की जाती है। यह स्थल भक्त कवि विद्यापति, भगवान भोलेनाथ व माता गंगा का संगम स्थल भी है। मंदिर के बारे में कहानी है कि कवि विद्यापति भगवान शंकर और मां गंगा के अनन्य भक्त थे। उनकी भक्ति से भगवान शंकर इतने प्रसन्न हुए कि वे उगना नौकर के रूप में उनके यहां काम करने लगे। एक दिन जंगल में विद्यापति को प्यास लगने पर उगना के भगवान शिव होने का राज खुला। तब भगवान ने शर्त रख दी कि इसे कोई दूसरा जानेगा तो वे अर्न्तध्यान हो जाएंगे।

पत्नी ने उगना को पीटा तो खुल गया भगवान शिव का राज

एक दिन उनकी पत्नी ने देखा कि विद्यापति काम कर रहे हैं और उगना बैठा है। इस पर क्रोधित होकर वे उगना को मारने दौड़ी तब विद्यापति के मुंह से निकल गया साक्षात शंकर पर वार। इसके बाद भगवान अंर्तध्यान हो गये। इसके बाद वियोग में कवि मधुबनी के अपने बिस्फी ग्राम से गंगा के लिए चले। रास्ते में थक जाने पर एक जगह बैठ गये और कहा कि वे माता के लिए इतनी दूर आ सकते है तो मां यहां क्यों नहीं आ सकती है। कहते है वर्तमान विद्यापतिधाम से तीन कोस की दूरी पर स्थित गंगा की धारा आयी और उन्हें अपने साथ बहा कर ले गयी। कुछ दिनों बाद उसी स्थान पर एक काली गाय प्रतिदिन दूध गिरकर चली जाती थी। यह देख लोगों ने खुदाई की तो बड़ा शिवलिंग व छोटा दो लिंग निकला।

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