09/05/2026
“यह जिसमों इश्म का कांटा जो बेढब सा खटकता था, खलिश सब मिटगयी, कांटा निकल जाना मुबारक हो”
मुबारक हो मुबारक हो मुबारक हो 🙏
अध्यात्म प्रतिमूर्ति, ज्ञान के अथाह सागर,विश्व प्रेम के सम्पोषक, ज्योतिर्विद, चिंतक, विचारक तथा लेखक: प्रातः समरणीय आचार्य डॉ केदारनाथ प्रभाकर (09 मई 1933 - 31 जुलाई 2022) के अवतरण दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई ।
शरीर जब हो जाता है मृत,फैंक दिया जाता है उसे तुरन्त, कर दिया जाता है उसे भस्मीभूत पर, मैं तो हूं परे शरीर से, प्रमाण है इसका यही, अनन्तता ने, असीमता ने, की है प्राण-प्रतिष्ठा मेरी ही, केवल मेरी ही, अपने मन-मन्दिर में ।
तभी बने हैं सारे कान, मेरा कान, सारे नेत्र, मेरा नेत्र, सारे हाथ, मेरा हाथ, सारे मन, मेरा मन, मैं तो हूं इतना असीम, इतना अनन्त बना लिया ‘मृत्यु’ को ही अपना ग्रास, और स्वयं पी गया, सभी प्रकार के प्रतीतात्मक भेद-अभेद;
क्योंकि मैं हूं पूर्ण, परिपूर्ण ।