22/04/2026
हर तरफ़ मुफ़लिसी का धुआँ है, ये कैसी बस्ती है,
रोटी भी किस्मत से मिले, ये कैसी मजबूरी सस्ती है।
मतलबी रिश्तों का यहाँ हर चेहरा बदला-बदला है,
जिसको अपना समझा था, वही सबसे बड़ी सज़ा सी है।
तन्हाई ने इस कदर मुझको अपना बना लिया,
अब भीड़ में रहकर भी दिल में वीरानी बसी है।
खुद से जुदा होकर जीना अब आदत सी बन गई,
आईना देखूँ तो लगता है कोई अजनबी खड़ा सा है।
जिन्हें संभालने में उम्र गुज़ार दी हमने अपनी,
वही आज पूछते हैं, "तू किस काम का आदमी है?"
बेख़ौफ़ होकर दर्द अब सीने में घर कर बैठा है,
आँखों की नमी भी अब तो जैसे पत्थर सी हो गई है।
हर ख़्वाब जो देखा था, वो रेत सा बिखर गया,
हाथों की लकीरों में बस खाली सी उदासी है।
"इसराईल" अब सीख गया है चुपचाप सहना सब कुछ,
क्योंकि हर खुशी के पीछे छुपी कोई गहरी कमी है।