21/05/2026
एक घना जंगल है उन आँखों में,
जिसमें भटकना
एक तरह का घर लौटना है।
मैं उसी जंगल की कंदराओं में रहने वाला हूँ;
और तुम्हें अवगत हो कि,
जहाँ रोशनी भी पेड़ों से
इजाज़त लेकर आती है,
जिसकी हवा में उदासी
मद्य सी घुल जाती है,
हर ध्वनि जहां किसी अनकहे
प्रेम संवाद है,
जहाँ सन्नाटा भी किसी
जीवित तरह की
आवाज़ है।
वहाँ;
पंछियों के सुरों का गहरा आलाप है,
किसी झरने सी श्वेत धारा की
कत्थई चट्टानों पर थाप है,
भीनी भीनी मिट्टी की सोंधी महक है,
पत्तों की धीमी सरसराहट और
चिड़ियों की चहक है,
हवा के साथ झूमते पेड़ों का नृत्य है,
मोरों के पुकारते गीतों का नेपथ्य है,
पलाश की दहकती लालिमा का विहार है,
महुए की मदमाती सुगंध का विस्तार है।
वे ऐसी पगडंडियाँ हैं
जिनमें खोने का भय है
पर कुछ अचंभित कविताओं
का होना तय है।
अपनी धुरी पर जब दाएं बाएं
जब ये ताकती हैं,
तो पेड़ों की छाया में
रौशनी झांकती है,
रौशनी ज़मीन से बातें करने
लगती है,
और तुम्हारे रूप की
सुनहरी तस्वीरें रचने लगती हैं।
मैं तुम्हें उसी तस्वीर के माध्यम से
पहचानता हूँ,
ऐसा लगता है कि
मैं तुम्हें सदियों से जानता हूँ।
/अमित
२१/०५/२६