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21/05/2026

एक घना जंगल है उन आँखों में,
जिसमें भटकना
एक तरह का घर लौटना है।
मैं उसी जंगल की कंदराओं में रहने वाला हूँ;
और तुम्हें अवगत हो कि,

जहाँ रोशनी भी पेड़ों से
इजाज़त लेकर आती है,
जिसकी हवा में उदासी
मद्य सी घुल जाती है,
हर ध्वनि जहां किसी अनकहे
प्रेम संवाद है,
जहाँ सन्नाटा भी किसी
जीवित तरह की
आवाज़ है।

वहाँ;
पंछियों के सुरों का गहरा आलाप है,
किसी झरने सी श्वेत धारा की
कत्थई चट्टानों पर थाप है,
भीनी भीनी मिट्टी की सोंधी महक है,
पत्तों की धीमी सरसराहट और
चिड़ियों की चहक है,
हवा के साथ झूमते पेड़ों का नृत्य है,
मोरों के पुकारते गीतों का नेपथ्य है,
पलाश की दहकती लालिमा का विहार है,
महुए की मदमाती सुगंध का विस्तार है।

वे ऐसी पगडंडियाँ हैं
जिनमें खोने का भय है
पर कुछ अचंभित कविताओं
का होना तय है।

अपनी धुरी पर जब दाएं बाएं
जब ये ताकती हैं,
तो पेड़ों की छाया में
रौशनी झांकती है,

रौशनी ज़मीन से बातें करने
लगती है,
और तुम्हारे रूप की
सुनहरी तस्वीरें रचने लगती हैं।

मैं तुम्हें उसी तस्वीर के माध्यम से
पहचानता हूँ,
ऐसा लगता है कि
मैं तुम्हें सदियों से जानता हूँ।

/अमित
२१/०५/२६

आइने की कोई याददाश्त नहीं होती —ऐसा मुझे तब तक लगता रहा,जब तक मैंने उसेआइने में अपनी तस्वीर लेते हुए नहीं देखा।उस एक क्ष...
05/03/2026

आइने की कोई याददाश्त नहीं होती —
ऐसा मुझे तब तक लगता रहा,
जब तक मैंने उसे
आइने में अपनी तस्वीर लेते हुए नहीं देखा।

उस एक क्षण में
मैंने भी उसे आइने की नज़र से देखा —
और अनायास ही
मैं, आइने के साथ, स्वयं भी आइना हो गया
और कहीं दूर खड़ा इस रंगमंच को
एक दर्शक बना
निहारता रहा।

आइने ने उसे
गुलाल में भीगे रंगों में देखकर
उसके उस प्रतिबिंब को
अपने भीतर सदा-सर्वदा
सजा कर रख लिया।

वह जीवन भर
टूटना भूल गया,
और अब पिघल-पिघल कर
उसके रंगों में
धीरे-धीरे फैलने लगा।

वह रंगों की गिनती भी भूल गया —
बस उतने ही रंग,
जितने उसने अपने गालों पर
लगाए हुए थे,
आइने की स्मृति में
जुगनुओं-से जलते-बुझते रहे।

वह स्वयं मृदु गुलाल हो गया —
हवा में हल्का-सा तैरता,
उसकी उँगलियों की पोरों से छूकर
फिर उसी के चेहरे पर
एक रंग की तरह ठहर जाता।

और विस्मय से सोचता —
क्या कोई यूँ भी
आइनों को रंग लगा सकता है?

जैसे अज़ीज़ नबील का बेहद ख़ूबसूरत शेर है कि —

“साँस लेता हुआ हर रंग नज़र आएगा,
तुम किसी रोज़ मेरे रंग में आओ तो सही।”

अब आइना भी
उसी रंग में साँस ले रहा है,
आज से वह सचमुच जीवित है —
और चुपचाप
अगली होली की बाट जोह रहा है…।

— अमित
०४/०३/२६

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