05/03/2026
आइने की कोई याददाश्त नहीं होती —
ऐसा मुझे तब तक लगता रहा,
जब तक मैंने उसे
आइने में अपनी तस्वीर लेते हुए नहीं देखा।
उस एक क्षण में
मैंने भी उसे आइने की नज़र से देखा —
और अनायास ही
मैं, आइने के साथ, स्वयं भी आइना हो गया
और कहीं दूर खड़ा इस रंगमंच को
एक दर्शक बना
निहारता रहा।
आइने ने उसे
गुलाल में भीगे रंगों में देखकर
उसके उस प्रतिबिंब को
अपने भीतर सदा-सर्वदा
सजा कर रख लिया।
वह जीवन भर
टूटना भूल गया,
और अब पिघल-पिघल कर
उसके रंगों में
धीरे-धीरे फैलने लगा।
वह रंगों की गिनती भी भूल गया —
बस उतने ही रंग,
जितने उसने अपने गालों पर
लगाए हुए थे,
आइने की स्मृति में
जुगनुओं-से जलते-बुझते रहे।
वह स्वयं मृदु गुलाल हो गया —
हवा में हल्का-सा तैरता,
उसकी उँगलियों की पोरों से छूकर
फिर उसी के चेहरे पर
एक रंग की तरह ठहर जाता।
और विस्मय से सोचता —
क्या कोई यूँ भी
आइनों को रंग लगा सकता है?
जैसे अज़ीज़ नबील का बेहद ख़ूबसूरत शेर है कि —
“साँस लेता हुआ हर रंग नज़र आएगा,
तुम किसी रोज़ मेरे रंग में आओ तो सही।”
अब आइना भी
उसी रंग में साँस ले रहा है,
आज से वह सचमुच जीवित है —
और चुपचाप
अगली होली की बाट जोह रहा है…।
— अमित
०४/०३/२६