12/08/2026
अवार्ड नहीं बिका… बस कुछ लोगों की सोच का भाव गिर गया है!
अवार्ड का मौसम आते ही कुछ लोगों की अंतरात्मा भी जाग जाती है…
और अंतरात्मा जागते ही उन्हें हर सम्मान में “बिक्री” नजर आने लगती है। 😏
मोहतरमा ने फरमाया—
“अवार्ड बिकने का समय आ गया है…”
अब सवाल बड़ा सीधा है—
अगर अवार्ड बिकते हैं, तो इतने वर्षों से जिन कलाकारों ने इस मंच पर सम्मान पाया, उनके सम्मान की कीमत भी आपने तय कर रखी है क्या?
नरेंद्र सिंह नेगी जी से लेकर हीरा सिंह राणा जी, चंद्र सिंह राही जी, कबूतरी देवी जी और उत्तराखंड की कला-संस्कृति के तमाम दिग्गजों तक…
क्या सबकी प्रतिभा भी किसी “ऑफर” में मिली थी?
और कमाल देखिए…
जिस मंच पर कभी खुद कला का प्रदर्शन करके तालियां बटोरीं,
आज उसी मंच पर सम्मान पाने वाले कलाकारों की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं।
वाह!
यानी जब मंच पर अपनी बारी हो तो—
“कला का सम्मान”
और जब किसी दूसरे की बारी आए तो—
“अवार्ड बिक गया!”
इसे कहते हैं शायद…
सुविधा के हिसाब से सिद्धांत बदलना। 😂
आलोचना करिए, खूब करिए।
किसी संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल है तो प्रमाण के साथ रखिए।
किसी पुरस्कार की चयन प्रक्रिया पर आपत्ति है तो सवाल उठाइए।
लेकिन बिना प्रमाण के यह घोषित कर देना कि “अवार्ड बिकते हैं”, सिर्फ आयोजन पर सवाल नहीं है…
यह उन कलाकारों की वर्षों की साधना और उनके सम्मान पर भी छींटाकशी है।
कला में बड़ा होना सिर्फ मंच पर नाच लेने, गा लेने या पुरस्कार पा लेने से नहीं होता।
कला के साथ संस्कार भी चाहिए,
असहमति के साथ तर्क भी चाहिए,
और आलोचना के साथ प्रमाण भी चाहिए।
वरना फिर बात अवार्ड की नहीं रहती…
बात उस सोच की हो जाती है,
जिसमें खुद सम्मान मिले तो मंच महान,
और दूसरे को सम्मान मिले तो मंच बिकाऊ!
तो मोहतरमा जी,
अवार्ड बिके हैं या नहीं—इसका प्रमाण आपके पास हो तो सामने रखिए।
लेकिन फिलहाल जो सबसे सस्ता दिखाई दे रहा है…
वो कोई अवार्ड नहीं,
बल्कि बिना प्रमाण के लगाए गए आरोप हैं। 😏
क्योंकि सम्मान खरीदने की बात करने से पहले,
दूसरों के सम्मान की कीमत समझना भी जरूरी है।