Poet Deo Bihari Sharma

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मोतीराम -कवि धूमिल।
10/11/2025

मोतीराम -कवि धूमिल।

लोकतंत्र का उत्सव।    #लोकतंत्र
09/11/2025

लोकतंत्र का उत्सव। #लोकतंत्र

बसंत आएगा
09/11/2025

बसंत आएगा

20/03/2025

विश्व गौरैया दिवस।
🐤🐤🐤🐤
वे तुम्हारी दुनिया उजाड़ देंगे ,
नोच डालेंगे तुम्हारे आशियाने ,
खा जाएंगे तुम्हारे हिस्से का अन्न ,
पी जाएंगे तुम्हारे हिस्से का जल,
मार लेंगे तुम्हारे बच्चो का हक,
समेट लेंगे तुम्हारे हिस्से का आसमान ,
और उसे भर लेंगे अपने जेबों में,
जैसे बच्चे भर लेते हैं ,
खेल खेल में अपने गुब्बारे में हवा ।

धीरे-धीरे तुम विलुप्त होते जाओगे ,
भूमिपुत्रों की तरह ,
फिर तुम्हारी दशा देखकर ,
उनकी मानवता अचानक कूदकर
कब्र से बाहर आ जायेगी ,
और लहरा देगी अपने "उपकारों" का परचम,
आसमान के अंतिम छोर तक।

फिर एक दिन बड़ी घोषणा होगी -
तुम्हारे संरक्षण के लिए ।
फिर एक दिन मुकर्रर कर दिया जायेगा ,
तुम्हारे नाम पर -विश्व गौरैया दिवस ,
जहां तुम्हारे बड़े-बड़े चित्र तो होंगे ,
लेकिन अफसोस! तुम नहीं होगी ।
#डीबी शर्मा।

20/03/2025

पुरुषवादी समाज में महिला दिवस।
🙆🙆🙆
दो पुरुष आपस में लड़ रहे थे ।
एक दूसरे को बुरी तरह गरिया रहे थे ।
एक ने सामने वाले को
उसकी बहन को लगा कर गाली दी ।
जवाब में दूसरे ने उसकी मां को लगा कर
उससे भी गंदी गालियां दी ।

दोनों एक दूसरे पर बहुत ज्यादा
आक्रामक हो गये,
बात बहुत आगे बढ़ गई।
दोनों ने एक-दूसरे पर गालियों की
बौछार कर दी , और एक दूसरे के
सात सात पीढ़ियों की औरतों को लगातार
भद्दी से भद्दी गालियां दी।
बल्कि यह कहिए कि लड़ाई के क्रम में ,
दोनों ने औरतों के लिए कुछ नई
गालियों का भी आविष्कार किया ।😂

दोनों को झगड़ते देखकर ,
एक तीसरा आदमी वहां आया ,और
दोनों को समझाकर मामले को
शांत कराने की कोशिश की,
लेकिन दोनों उससे उलझ पड़े,
और उसे भी भद्दी से भद्दी गालियां दी
लेकिन फिर वही , उसे नहीं -
उसकी भी बेचारी मां, बहन और बेटियों को।

अब जरा सोचिए,
वे लड़ाई आपस में कर रहें थे ,
वहां पर उन लोगों में से
ना तो किसी की मां थी, न बेटी
न हीं उनकी बहने ,
यहां तक कि कोई अन्य औरत की
छाया तक नहीं थी -
दूर दूर तक ,
और न हीं किसी औरत का
इनके झगड़े में कोई रोल था -
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ,
लेकिन इसके बावजूद गालियां सुन रही थी -
सिर्फ और सिर्फ औरतें।

पर दुखद तो यही है कि,
आज भी पुरूषवादी समाज में,
किसी को गरियाने के लिए ,
औरतों और उसके अंगों को
प्रतीकों के रूप में चुनना ही
सबसे ज्यादा सुविधाजनक है।
सच तो यही है, बाकी,
आठ मार्च को रस्म अदायगी करते रहिए,
पूरे धूमधाम से।😂😂

#डीबीशर्मा।

झील के किनारे जाड़े की एक शुबह.        (2)        *********उदयाचल के क्षितिज परअरूनाभ बिस्तर से, हल्के से धरती की ओर सफे...
27/01/2025

झील के किनारे जाड़े की एक शुबह.
(2)
*********
उदयाचल के क्षितिज पर
अरूनाभ बिस्तर से,
हल्के से धरती की ओर
सफेद, मुलायम, स्निग्ध,घने कोहरे
की रजाई से ,
अलसाई तिरछी नजरों से झांकता ,
रक्ताभ रेशमी किरणों की डोर के सहारे ,
विभावरी की इति से धीरे धीरे जागता,
जाड़े की प्रभात का सूरज.

झील के शांत जल -कपोल- इंदीवर का
बाल अरूण की आपतित
किरणों के प्यार भरे स्पर्श से,
शर्म से लाल हो जाना-
हर शुबह सृष्टि की जैसे एक
नयी शुरूआत!

जलराशि की धुंधली सतह पर शनैः शनैः
रेंगती मछुआरों की कृशकाय नौकाएं,
भोजन की तलाश में निम्न आकाश में उड़ती जल पक्षियों की पंक्तियाँ,
तृण पत्रों पर विनष्टी के इंतजार में
अबतक टिके ओस विन्दु,
अपने अपने खेतों की ओर
जाते हुए कृषक वृन्द.

प्रकृति का संगीत यहां ,
ब्यक्त से कहीं अधिक अव्यक्त!
अलग ही तरीके के जीवन दर्शन को
समझाती है ,बहलाती है यह शुबह,
झील के किनारे जाड़े की यह शुबह.
@ डीबी शर्मा.

शिकारगाह.*******जाड़े की अहले शुबहधुंधलके की चादर में लिपटी शांत  विस्तृत झील की गोद में तैरती एक कृशकाय नौका, और उसे खे...
22/01/2025

शिकारगाह.
*******
जाड़े की अहले शुबह
धुंधलके की चादर में लिपटी
शांत विस्तृत झील की गोद में
तैरती एक कृशकाय नौका,
और उसे खेता हुआ एक मछुआरा
जाल फेंकता हुआ उथले जल में
रोज की तरह मछलियों के शिकार में लीन.

जल के समानांतर नीची आकाश में
उड़ता एक चपल जल पंछी,
झील के जल में तैरती मछलियों पर
निगाह डाले हुए अनवरत -
उसे लपक लेने को आतुर,
सदा से अपने काम में व्यस्त.

जल के अन्दर बड़ी मछली
छोटी मछली के पीछे भागती हुई
बनाने को उसे अपना निवाला .

कोई मानता ही नहीं कि
मछली भी रोती है,
क्योंकि जल के अन्दर
किसी के आंसू दिखते नहीं.

झील के तट पर खड़ा एक पुराना शाल वृक्ष,
देखता हुआ जीवन के इस शास्वत संघर्ष को ,
हर रोज की तरह स्थिर, अचल, मौन धारे -
शायद यह सोंचकर कि
आखेट ही इस धरा का सत्य है.
दुनिया एक शिकारगाह है.
बाकी सब इसी के इर्द - गिर्द बुनी हुई
सिर्फ कल्पित कहानियाँ हैं ,
और कुछ नहीं, कुछ भी नहीं .
@ डीबी शर्मा.

जाड़े की एक शुबह.*************(2)जनवरी की शुबह, हाड़ कंपाती ठंढ.शीतलहरी में  कांपते, कुहासे की क्रोड में दुबके, सड़क के ...
18/01/2025

जाड़े की एक शुबह.
*************
(2)
जनवरी की शुबह,
हाड़ कंपाती ठंढ.
शीतलहरी में कांपते,
कुहासे की क्रोड में दुबके,
सड़क के किनारे पंक्ति में
खड़े आस पास.
नि:शब्द, अचल, अस्पृत,
शिशिर के पर्णपाती अमलतास.

ओस की रुपहली मोतियों
की चादर ओढ़ कर ,
अबतक गहरी नींद की आगोश में ,
धरती के बिस्तर पर
लेटी हुई निष्प्राण सी,
लगाये हुए सुर्योदय की आस.
मैदान की हरी-पीली -सुनहरी घास.

नुक्कड़ की चाय की दुकान पर,
मिट्टी के प्याले में, सोंधी ,
गरम गरम चाय की चुस्की लेते ,
शुबह की सैर में मेरे साथ निकले,
" महाधूर्त और काईंया " किस्म के
मेरे जिगरी दोस्त.😂
मुझे अपने दुखों के बारे में
कभी सोंचने ही नहीं देते.
कमीने कभी सुधरेंगे नहीं,
इस मुकाम पर भी
मेरी उम्र बढ़ने ही नहीं देते.
@ डीबी शर्मा

25/12/2024
शीघ्र प्रकाशित होने वाले मेरे दूसरे काव्य संग्रह " तुम अपनी सारी नफरतें मुझे दे दो" की प्रथम कविता।        🌺🌺   तुम अपनी...
19/12/2024

शीघ्र प्रकाशित होने वाले मेरे दूसरे काव्य संग्रह
" तुम अपनी सारी नफरतें मुझे दे दो" की प्रथम कविता।
🌺🌺
तुम अपनी नफरतें मुझे दे दो।
*******
तुम कितनी वहशतें पाले हुए हो !
गले में यह नाग जो डाले हुए हो !
तुम शंकर सा विषपायी तो नहीं ,
फिर विष पात्र क्यों थामे हुए हो ?

स्रष्टा खुद ही खुद से प्रश्न करके,
अपनी सृष्टि पर भौंचक खड़ा है।
जिससे उम्मीद थी सर्जक बनेगा,
क्यों यमराज सा तनकर खड़ा है?

दहन में तुम्हारा भी घर जलेगा।
घृणा से अंत अति विचित्र होगा,
यह काला नाग तुमको भी डंसेगा।
यह विषधर न तुम्हारा मित्र होगा।

जो आया था धरा को जीतने को,
बोलो ! वह सिकंदर अब कहाँ है?
जिस दंभ में था वह महा योद्धा,
ढूंढो ! उसकी अब मिट्टी कहाँ है?

क्या तुम ही जगत में श्रेष्ठतम हो?
कभी अपनी तरफ भी देख लेना।
विजय का दंभ जब मन में चढ़े तो,
उसमें अपना पतन भी देख लेना।

जिस श्रेष्ठता पर है दंभ तुमको,
वह तुम्हारा नहीं, एक वक्त भर है।
खुद को सिंधु समझना मूर्खता है।
तेरी हस्ती तो बस एक बूंद भर है।

तुम खुद को सूर्य कहते हो? कहो,
फिर तिमिर रथ पर क्यों चढ़े हो?
ओ रोशनी के मेरे भटके मसीहा!
दियों को बुझाने पर क्यों अड़े हो?

जिसे तुम धर्म ग्रंथों में ढूंढते हो,
वह ईश्वर मिट्टी का गागर नहीं है ।
स्रष्टिकर्ता है सभी सरहदों से परे ,
उसके सम्मुख कोई सागर नहीं है ।

घृणा की आग में क्यों जल रहे हो ?
घनी अंधेरी रात्रि में प्रदीप बनो ।
जहां अंतिम दिया भी बुझ चुका है ,
वहां तुम चिर प्रज्वलित दीप बनो ।

अग्नि बनो तो सृजन की अग्नि बनो।
क्रोध की अग्नि तुम्हें ही क्षय करेगा ।
तुम्हारा जीवन ही कठिन अग्निपथ है ,
अगर सम्हले नहीं तो खुद ही जलेगा ।

धरा से प्रकाश पुंज विलुप्त हो गया ,
तमस सारी धरती पर पसरा हुआ है ।
अपने- पराये का है भेद मिट चुका ,
आदमी कई टुकड़ों में टूटा हुआ है ।

गृष्म में वसंत की पुरवाई बन जा।
धरा पर गिर,अमृत की बूंद बन जा।
निराशाओं में नयी उम्मीद बन जा।
तमस के राज में तुम सूर्य बन जा।

निराशा चारों तरफ पसरा हुआ है ।
लगता है,यहां पर कुछ बुरा हुआ है
भाई का भाई पर भरोसा उठ चुका,
आदमी अपने आप से डरा हुआ है।

हर तरफ फैले हुए हैं धर्म के घरौंदे ,
हर कोई ईश्वर को है यहां बेच रहा ।
सबने किया हुआ है धर्म का नशा ,
कौड़ियों के दाम खुद को बेच रहा ।

अब व्यर्थ के संघर्ष को विश्राम देदो।
बहुत हुआ, स्वयं को अब त्राण देदो ।
स्वर्ग इसी धरा पर उतर कर आयेगी,
तुम अपनी सारी नफरतें मुझे देदो ।
#डीबीशर्मा

#हिंदीकविता


#कविताप्रेमी

11/12/2024

ग़ज़ल।
*****
तुम्हारी यह अदा अच्छी लगी !
तुम्हारी साजिशें अच्छी लगी ।

पैमाने को होंठों से दूर कर दी,
तुम्हारी यह कृपा अच्छी लगी ।

इस मयकदे को उजाड़ने वाले ,
तुम्हारी मयकशी अच्छी लगी।

नाज़ है मुझको तेरी दोस्ती पर !
उससे तो दुश्मनी अच्छी लगी ।

जिस चमन में मेरा वजूद नहीं ,
उससे वीरानियां अच्छी लगी ।

स्वर्ग की उलझनें जानलेवा हैं ,
नरक की सादगी अच्छी लगी।

बेरंग मुक्ति से थक गया हूं देव,
जिंदगी क़फ़स में अच्छी लगी ।
#डीबीशर्मा।

#हिंदीसाहित्य
#हिंदीकविता
#गजल


11/12/2024

गजल।
******
रातभर सोने की कोशिशें बेकार गई ,
भींगी आंखों की वर्जिशें बेकार गई ।

स्वप्न लहरें हृदय को छूकर लौट चलीं ,
मां की प्यार भरी लोरियां बेकार गईंं।

टूटने का दौर था ,पत्तों को टूटना ही था ,
बहार को बुलाने की मिन्नतें बेकार गई ।

रौशनी की चाह में मिली अंधेरी रात थी ,
दिन को रोक लेने की हसरतें बेकार गई ।

आदमी के भ्रम में पत्थर को साधता रहा ,
इस निशानदेही में हजारों तीरें बेकार गई ।

हक क्या?मांगने से मिलती नहीं है भीख,
इस सत्य को जानने में नस्लें बेकार गई।
@डीबी शर्मा

#हिंदीकविता
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