श्री सदगुरु कबीर सेवा संस्थान, प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली लहरतारा वाराणसी

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श्री सदगुरु कबीर सेवा संस्थान, प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली लहरतारा वाराणसी Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from श्री सदगुरु कबीर सेवा संस्थान, प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली लहरतारा वाराणसी, Art, प्राचीन कबीर प्रकट स्थल लाहरतारा वाराणसी, Ramnagar.

महंत गोविंद दास शास्त्री का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण में विकसित हुआ। बचपन से ही उन्हें संत परंपरा, भक्ति और समाज सेवा में गहरी रुचि थी। उन्होंने संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया।

1 अगस्त, 2026 को **भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष माननीय श्री श्याम जाजू जी से शिष्टाचार भेंट, सामाजिक ...
02/08/2026

1 अगस्त, 2026 को **भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष माननीय श्री श्याम जाजू जी से शिष्टाचार भेंट, सामाजिक विषयों एवं 'आरएसएस के 100 वर्ष' पुस्तक पर सार्थक चर्चा**

नई दिल्ली स्थित उनके आवास पर भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ चिंतक **माननीय श्री श्याम जाजू जी** से डॉ. मनोज कुमार सिंह, एडवोकेट श्री राजकुमार जी एवं अन्य सहयोगियों ने शिष्टाचार भेंट की। यह मुलाकात अत्यंत आत्मीय एवं विचारोत्तेजक वातावरण में सम्पन्न हुई, जिसमें राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों तथा समाज सेवा से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शताब्दी वर्ष यात्रा के ऐतिहासिक महत्व पर विशेष विमर्श हुआ। इस अवसर पर **प्रभात प्रकाशन** द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तक **"आरएसएस के 100 वर्ष"** पर भी विस्तार से चर्चा की गई। श्री श्याम जाजू जी ने इस पुस्तक की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह ग्रंथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की वैचारिक यात्रा, संगठनात्मक विकास, सेवा कार्यों, सामाजिक समरसता, राष्ट्र निर्माण तथा सांस्कृतिक जागरण के विविध आयामों को तथ्यपूर्ण एवं व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पुस्तकें नई पीढ़ी को भारत की संगठनात्मक एवं सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।
श्री श्याम जाजू जी ने स्नेहपूर्वक **"आरएसएस के 100 वर्ष"** पुस्तक भेंट की। डॉ. सिंह ने इस अमूल्य उपहार के लिए उनका आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रामाणिक साहित्य का अध्ययन समाज, शिक्षा और राष्ट्र जीवन से जुड़े शोध एवं विमर्श को नई दिशा प्रदान करता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक भारतीय समाज के विकास, सेवा एवं संगठन की परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण संदर्भ सिद्ध होगी।
इस अवसर पर महंत गोविन्द दास शास्त्री ज़ी द्वारा श्री श्याम जाजू जी को **"सद्गुरु कबीर अमृत चेतन स्मारिका"** भी भेंट की गई। स्मारिका के माध्यम से संत कबीर की समता, मानवता, सामाजिक सद्भाव, आध्यात्मिक चेतना तथा भारतीय संस्कृति में उनके अमूल्य योगदान पर चर्चा हुई। श्री जाजू जी ने स्मारिका का अवलोकन करते हुए इसके प्रकाशन की सराहना की और कहा कि संत कबीर का संदेश आज भी समाज को एकता, सद्भाव और मानवीय मूल्यों की दिशा में प्रेरित करता है।
बैठक के दौरान सामाजिक समरसता, युवा पीढ़ी में राष्ट्रीय चेतना, भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण, संत परंपरा की प्रासंगिकता तथा समाज में सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने जैसे अनेक समसामयिक विषयों पर भी विचार-विमर्श हुआ। सभी ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि राष्ट्र निर्माण केवल शासन का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक जागरूक नागरिक की सहभागिता से ही संभव है। भारतीय संस्कृति, सेवा, समर्पण और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।
इस अवसर पर एडवोकेट श्री राजकुमार जी भी उपस्थित रहे। यह शिष्टाचार भेंट सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई और सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर भविष्य में भी निरंतर संवाद एवं सहयोग बनाए रखने का संकल्प व्यक्त किया गया।
जय कबीर।
प्रबंधक
श्री सदगुरु कबीर सेवा संस्थान रजिस्टर्ड,
कबीरपुर करते स्थल लहरतारा वाराणसी।
फोन नंबर 8177000070

**पांडवकालीन भगवान महर्षि वाल्मीकि आश्रम, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में भव्य गुरु पूजा एवं सत्संग कार्यक्रम सम्पन्न**नई दिल्...
02/08/2026

**पांडवकालीन भगवान महर्षि वाल्मीकि आश्रम, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में भव्य गुरु पूजा एवं सत्संग कार्यक्रम सम्पन्न**

नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक **पांडवकालीन भगवान महर्षि वाल्मीकि आश्रम, चाणक्यपुरी** में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण के मध्य भव्य **गुरु पूजा एवं सत्संग कार्यक्रम** का आयोजन सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में देश के अनेक संत-महात्माओं, समाजसेवियों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों तथा विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता कर गुरु परंपरा के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की।

कार्यक्रम के मुख्य संचालक **महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी विवेक नाथ जी महाराज** ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि मनुष्य के जीवन को सत्य, सेवा, सदाचार और आत्मबोध की दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के जीवन का स्मरण करते हुए कहा कि उनके आदर्श आज भी समाज को समरसता, करुणा और मानवता का संदेश देते हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से गुरु के बताए मार्ग पर चलकर राष्ट्र एवं समाज की सेवा करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर **विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी** ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में आश्रमों और संत परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि के आदर्श सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना के सशक्त आधार हैं। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इन आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का आग्रह किया।

प्राचीन कबीर पप्रकाट्या स्थलीं लहरतारा वाराणसी के **पीठाधीश्वर महंत गोविंद दास शास्त्री जी** ने सभी संतों, अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का ऐसा महापर्व है जो गुरु के प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण की भावना को सुदृढ़ करता है। उन्होंने कहा कि पांडवकालीन भगवान महर्षि वाल्मीकि आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि समाज में आध्यात्मिक जागरण, संस्कार, सेवा और सामाजिक समरसता का प्रेरणा केंद्र है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में **डॉ. मनोज कुमार सिंह**, **सेवानिवृत्त एस.डी.एम. श्री मानसिंह गुर्जर**, विभिन्न संत-महात्माओं, समाजसेवियों, शिक्षाविदों तथा अनेक गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता कर गुरु पूजा में सम्मिलित होकर आशीर्वाद प्राप्त किया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति-भाव से सत्संग, भजन-कीर्तन एवं आध्यात्मिक प्रवचनों का श्रवण किया। पूरे आश्रम परिसर में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का वातावरण बना रहा।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक गुरु वंदना, आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। इस अवसर पर उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों के अनुरूप समाज में प्रेम, समरसता, सेवा, शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन का संकल्प लिया। यह आयोजन श्रद्धा, आध्यात्मिकता और सामाजिक एकता का प्रेरणादायी उदाहरण सिद्ध हुआ।जय वाल्मीकि, जय कबीर।
संकलनकर्ता
डॉ मनोज कुमार सिंह

 # **गुरु पूर्णिमा पर परम पूज्य महंत गोविंद दास शास्त्री जी का संदेश***जय सद्गुरु कबीर साहेब।**गुरु पूर्णिमा के पावन अवस...
29/07/2026

# **गुरु पूर्णिमा पर परम पूज्य महंत गोविंद दास शास्त्री जी का संदेश**
*जय सद्गुरु कबीर साहेब।**
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री सद्गुरु कबीर प्राकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी की ओर से समस्त संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं, साधकों, भक्तों एवं कबीर प्रेमियों को हार्दिक मंगलकामनाएँ।

गुरु पूर्णिमा केवल गुरु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन में गुरु के बताए सत्य, प्रेम, करुणा, समता और मानवता के मार्ग को अपनाने का संकल्प लेने का पावन दिवस है। संत कबीर साहेब ने गुरु की महिमा को सर्वोच्च स्थान देते हुए कहा है—

**“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”**

कबीर साहेब की वाणी हमें बताती है कि गुरु वह प्रकाश है जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अहंकार से विनम्रता और भेदभाव से मानवता की ओर ले जाता है। गुरु केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि अपने आचरण से जीवन का मार्ग दिखाता है।
लहरतारा की यह पावन धरती संत कबीर साहेब की प्राकट्यस्थली के रूप में श्रद्धा और आस्था का महत्वपूर्ण केन्द्र है। यह स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि **सत्य, समता, सामाजिक चेतना, सद्भाव और मानव एकता की जीवंत धरोहर** है। संत कबीर की वाणी ने सदियों पहले जिस समाज की कल्पना की थी, उसमें जाति-पंथ, ऊँच-नीच और बाहरी आडंबर के लिए कोई स्थान नहीं था।

कबीर साहेब ने स्पष्ट कहा—

**“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥”**

आज आवश्यकता है कि हम कबीर की इस अमर वाणी को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि अपने जीवन और समाज में उतारें।

#**लहरतारा प्राकट्य स्थल के विकास में योगदान**
श्री सद्गुरु कबीर प्राकट्य स्थल, लहरतारा के संरक्षण, संवर्धन, सुंदरीकरण और विकास के कार्यों को आगे बढ़ाने में **परम पूज्य महंत गोविंद दास शास्त्री जी, पीठाधीश्वर** का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने इस पावन स्थल की धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्ता को जन-जन तक पहुँचाने, श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएँ विकसित करने तथा स्थल को आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के केन्द्र के रूप में स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किया है।
उनके मार्गदर्शन में प्राकट्य स्थल के **सुंदरीकरण, स्वच्छता, धार्मिक वातावरण, संत-सेवा, श्रद्धालु सुविधाओं, सत्संग, आध्यात्मिक कार्यक्रमों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों** को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

महंत जी का उद्देश्य केवल भवनों और परिसर का विकास करना नहीं है, बल्कि लहरतारा को ऐसा आध्यात्मिक केन्द्र बनाना है जहाँ देश-विदेश से आने वाला प्रत्येक व्यक्ति कबीर साहेब की वाणी, विचार और मानवतावादी संदेश को अनुभव कर सके।
उनकी दृष्टि में विकास का अर्थ केवल भौतिक निर्माण नहीं, बल्कि **“स्थल का विकास + विचारों का विकास + समाज का विकास”** है।

# # # **संत निवास, साधु निवास और भक्त निवास की भावना**
लहरतारा प्राकट्य स्थल पर आने वाले संतों, साधुओं, भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार भी इसी सेवा-भावना का हिस्सा है। संत निवास, साधु निवास एवं भक्त निवास जैसी व्यवस्थाएँ केवल भवन नहीं हैं, बल्कि वे **संत सेवा और अतिथि सेवा की भारतीय परंपरा** को मजबूत करने के माध्यम हैं।

कबीर साहेब की परंपरा में सेवा का विशेष महत्व है। संत कबीर ने कहा—
**“साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥”**

यह दोहा हमें बताता है कि जीवन का उद्देश्य केवल अपने लिए संग्रह करना नहीं, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सेवा करना है।

# # # **महंत गोविंद दास शास्त्री जी का उपदेश**
आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मेरा सभी श्रद्धालुओं से आग्रह है कि हम कबीर साहेब के संदेश को अपने जीवन का आधार बनाएं। धर्म का वास्तविक अर्थ किसी दूसरे व्यक्ति से घृणा करना नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य में उसी परम सत्य का दर्शन करना है।

कबीर साहेब ने कहा—

**“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥”**
इसलिए सबसे पहले हमें अपने भीतर सुधार करना चाहिए। समाज को बदलने की शुरुआत स्वयं से होती है।
आज समाज को कबीर की सबसे अधिक आवश्यकता है—क्योंकि कबीर हमें **सत्य बोलना, प्रेम करना, अन्याय का विरोध करना, अंधविश्वास से बचना, जातिगत भेदभाव को समाप्त करना और मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मान देना** सिखाते हैं।
हमारा संकल्प होना चाहिए कि लहरतारा केवल एक तीर्थस्थल न रहे, बल्कि यह **कबीर दर्शन, मानवता, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय केन्द्र** बने।

यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ कबीर की एक सीख लेकर जाए—
**“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”**

गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम संकल्प लें कि अपने जीवन में अहंकार के स्थान पर विनम्रता, घृणा के स्थान पर प्रेम, भेदभाव के स्थान पर समता और स्वार्थ के स्थान पर सेवा को स्थान देंगे।
लहरतारा की पवित्र भूमि से संत कबीर का संदेश पूरे विश्व तक पहुँचे—**“सत्य, प्रेम, समता और मानवता।”**

परम पूज्य महंत गोविंद दास शास्त्री जी के मार्गदर्शन में श्री सद्गुरु कबीर प्राकट्य स्थल का विकास और सुंदरीकरण इसी व्यापक आध्यात्मिक एवं सामाजिक उद्देश्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
आइए, गुरु पूर्णिमा पर हम सब मिलकर संकल्प लें—

**कबीर की वाणी घर-घर पहुँचे।
कबीर का विचार जन-जन तक पहुँचे।
लहरतारा की पावन धरोहर सुरक्षित रहे।
और मानवता के इस महान संदेश को विश्वभर में प्रतिष्ठित किया जाए।**
**सद्गुरु कबीर साहेब की जय।
गुरुदेव महाराज की जय।
मानवता और समता की जय।**
**— परम पूज्य महंत गोविंद दास शास्त्री जी**
**पीठाधीश्वर**
**श्री सद्गुरु कबीर प्राकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी**

**प्रबंधक**
**श्री सद्गुरु कबीर सेवा संस्थान रजिस्टर्ड
प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थल**लहरतारा, वाराणसी**

बौद्धिस्ट समारोह  # **बौद्ध एवं कबीर की समकालीन प्रासंगिकता** # # **25 जुलाई 2026 को आयोजित बौद्ध-कबीर संगोष्ठी पर आधारि...
25/07/2026

बौद्धिस्ट समारोह

# **बौद्ध एवं कबीर की समकालीन प्रासंगिकता**
# # **25 जुलाई 2026 को आयोजित बौद्ध-कबीर संगोष्ठी पर आधारित विस्तृत उद्बोधन**

# # # **जय बुद्ध। जय कबीर। जय मानवता।**
आदरणीय संत-महात्माओं, पूज्य बौद्ध भिक्षुओं, विद्वान आचार्यों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, देश के विभिन्न भागों से पधारे हुए श्रद्धालु भक्तों, मातृशक्ति एवं युवा साथियों,
आज 25 जुलाई 2026 का यह दिन श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी अवसर के रूप में स्मरण किया जाएगा। "बौद्ध एवं कबीर की समकालीन प्रासंगिकता" विषय पर आयोजित यह समारोह केवल एक वैचारिक गोष्ठी नहीं, बल्कि करुणा, समता, प्रेम, सत्य और मानवता के दो महान प्रकाश स्तंभ—भगवान गौतम बुद्ध और संत शिरोमणि कबीर साहब—के विचारों के पुनर्स्मरण और उनके जीवन-दर्शन को समाज तक पहुँचाने का एक ऐतिहासिक प्रयास है।

मैं इस पावन अवसर पर आप सभी का हृदय की गहराइयों से स्वागत, अभिनंदन एवं आभार व्यक्त करता हूँ।
आज के इस महत्वपूर्ण आयोजन को सफल बनाने में श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा के पीठाधीश्वर **महंत श्री गोविंद दास शास्त्री जी** का विशेष मार्गदर्शन, संरक्षण और प्रेरणा रही। उनके सतत प्रयासों के कारण यह पवित्र स्थल आज भी संत परंपरा, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र बना हुआ है। इस समस्त आयोजन का श्रेय उनके दूरदर्शी नेतृत्व, सेवा-भाव और संत परंपरा के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को जाता है।

# # लहरतारा की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्ता
लहरतारा केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा की अमूल्य धरोहर है। यह वह पवित्र भूमि है जिसे संत कबीर साहब के प्राकट्य से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यह स्थान जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता, प्रेम और समानता का संदेश देता आया है।
आज जब विश्व हिंसा, आतंकवाद, सामाजिक विभाजन, मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और नैतिक पतन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब लहरतारा जैसी आध्यात्मिक भूमि से बुद्ध और कबीर का संयुक्त संदेश सम्पूर्ण विश्व के लिए आशा की नई किरण बन सकता है।

# # बुद्ध और कबीर : दो युग, एक संदेश
भगवान बुद्ध और संत कबीर दो अलग-अलग कालखंडों में अवतरित हुए, किंतु उनके विचारों में अद्भुत समानता दिखाई देती है। दोनों ने मनुष्य को बाहरी आडंबरों से मुक्त होकर आत्मज्ञान, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

भगवान बुद्ध ने कहा—
**"अप्प दीपो भव"**
अर्थात् *स्वयं अपने दीपक बनो।*

संत कबीर ने कहा—
**"मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।"**

दोनों महापुरुषों का संदेश यही है कि सत्य, मुक्ति और परम शांति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में विद्यमान है।

# # करुणा और प्रेम का दर्शन
भगवान बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन करुणा का पर्याय है। उन्होंने समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री और दया का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा—

**"घृणा से घृणा समाप्त नहीं होती; घृणा केवल प्रेम से समाप्त होती है।"**
यही विचार संत कबीर की वाणी में भी मिलता है।
कबीर कहते हैं—

**"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"**

आज जब समाज में वैमनस्य, कटुता और असहिष्णुता बढ़ रही है, तब बुद्ध की करुणा और कबीर का प्रेम ही सामाजिक सौहार्द का सबसे प्रभावी आधार बन सकता है।

# # समता का संदेश
भगवान बुद्ध ने जन्म आधारित ऊँच-नीच का विरोध किया। उन्होंने मनुष्य का मूल्य उसके कर्म और चरित्र से निर्धारित किया।

संत कबीर ने भी यही कहा—
**"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"**

यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सैकड़ों वर्ष पहले था। यदि समाज वास्तव में समरस बनाना है तो बुद्ध और कबीर के समतामूलक विचारों को शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक जीवन में स्थान देना होगा।

# # अंधविश्वास और पाखंड का विरोध
भगवान बुद्ध ने कर्मकांड, अंधविश्वास और निरर्थक परंपराओं का विरोध किया तथा तर्क, विवेक और अनुभव को महत्व दिया।

संत कबीर ने भी निर्भीक होकर कहा—
**"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर॥"**

दोनों महापुरुषों ने यह स्पष्ट किया कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के चरित्र का निर्माण है, न कि केवल बाहरी आडंबर।

# # कर्म की महत्ता
बुद्ध और कबीर दोनों ने कर्म को जीवन का आधार माना।

कबीर कहते हैं—
**"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥"**

यह दोहा केवल समय प्रबंधन का संदेश नहीं, बल्कि सक्रिय जीवन जीने की प्रेरणा है।
भगवान बुद्ध ने भी कहा कि मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।

# # युवाओं के लिए प्रेरणा
आज का युवा तकनीकी रूप से सक्षम है, लेकिन मानसिक रूप से अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रतिस्पर्धा, तनाव, अवसाद और भौतिक आकर्षण के बीच बुद्ध का ध्यान, संयम और मध्यम मार्ग तथा कबीर का निर्भीक सत्य और आत्मविश्वास युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

यदि नई पीढ़ी बुद्ध की करुणा और कबीर की स्पष्टवादिता को अपनाती है, तो वह केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक भी बनेगी।

# # पर्यावरण और मानवता
भगवान बुद्ध ने प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दी। संत कबीर ने भी प्रकृति को ईश्वर की सृष्टि मानकर उसका सम्मान किया।

आज पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के दौर में दोनों महापुरुषों की शिक्षाएँ सतत विकास और प्रकृति संरक्षण का मार्ग दिखाती हैं।

# # सामाजिक समरसता की आवश्यकता
आज समाज अनेक स्तरों पर विभाजित दिखाई देता है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक विषमता के कारण सामाजिक दूरी बढ़ रही है।

ऐसे समय में बुद्ध और कबीर का संयुक्त संदेश हमें याद दिलाता है कि मानवता किसी भी पहचान से बड़ी है। यदि समाज को स्थायी शांति चाहिए तो समता, करुणा और संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी।

# # समारोह का उद्देश्य
आज आयोजित यह बौद्ध-कबीर संगोष्ठी केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संकल्प है। हमारा उद्देश्य है कि भगवान बुद्ध और संत कबीर की शिक्षाओं को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, धार्मिक स्थलों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया जाए।

श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा को हम भविष्य में एक ऐसे वैश्विक संवाद केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते हैं जहाँ करुणा, समता, शांति और मानवता पर निरंतर चिंतन और शोध होता रहे।

# # सांस्कृतिक प्रस्तुति
इस समारोह का एक अत्यंत प्रेरणादायी और भावपूर्ण पक्ष रहा **ताना-बाना समूह** की संगीतमय प्रस्तुति।
प्रख्यात कबीर भजन गायक **श्री देवेंद्र दास जी**, **डा भागीरथी जी** तथा उनके सहयोगी कलाकारों ने कबीर साहब के भजनों की ऐसी मनमोहक प्रस्तुति दी जिसने उपस्थित सभी श्रोताओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया। उनके गायन में कबीर की वाणी की आत्मा, लोकसंगीत की मधुरता और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
कबीर के निर्गुण भजनों ने यह अनुभव कराया कि संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने वाली साधना भी है। उपस्थित श्रद्धालु लंबे समय तक इस प्रस्तुति की सराहना करते रहे।

# # आयोजन के प्रति आभार
मैं इस अवसर पर सभी पूज्य बौद्ध भिक्षुओं, संत-महात्माओं, विद्वानों, शोधार्थियों, सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवकों तथा सभी श्रद्धालुओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

विशेष रूप से मैं पुनः आदरणीय **महंत श्री गोविंद दास शास्त्री जी** के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनके मार्गदर्शन और संरक्षण में यह प्रेरणादायी आयोजन अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उनका जीवन संत परंपरा, सेवा, समरसता और मानव कल्याण के प्रति समर्पित है।

# # हमारा सामूहिक संकल्प
आइए, आज इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें—

* हम जाति, धर्म, भाषा और संप्रदाय के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे।
* हम करुणा, प्रेम, सत्य और सेवा को अपने जीवन का आधार बनाएँगे।
* हम भगवान बुद्ध और संत कबीर के मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार करेंगे।
* हम समाज में शांति, समरसता, नैतिकता और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु निरंतर कार्य करेंगे।
* हम लहरतारा स्थित श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल को विश्व स्तर पर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी संवाद का केंद्र बनाने में अपना सहयोग देंगे।

अंत में संत कबीर की अमर वाणी—
**"साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥"**

और भगवान बुद्ध का कालजयी संदेश—
**"बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।"**

इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं आप सभी का पुनः अभिनंदन करता हूँ। आइए, हम सब मिलकर करुणा, समता, सत्य, अहिंसा और प्रेम पर आधारित ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें, जहाँ प्रत्येक मनुष्य सम्मान, स्वतंत्रता और भाईचारे के साथ जीवन जी सके।

**जय बुद्ध।
जय कबीर।
जय मानवता।**
**महंत गोविंद दास शास्त्री**
**पीठाधीश्वर**
**श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल**
**पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी**
**संपर्क : 8177000070**

 # **गुरु पूर्णिमा का पावन संदेश एवं आमंत्रण**आदरणीय संत-महात्माओं, श्रद्धालु भक्तजनों एवं कबीर प्रेमियों,गुरु पूर्णिमा ...
19/07/2026

# **गुरु पूर्णिमा का पावन संदेश एवं आमंत्रण**

आदरणीय संत-महात्माओं, श्रद्धालु भक्तजनों एवं कबीर प्रेमियों,
गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व भारतीय संस्कृति की महान गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा, समर्पण एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का दिव्य अवसर है। गुरु ही वह ज्योति हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर सत्य, प्रेम, सेवा और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करते हैं। संत शिरोमणि सद्गुरु कबीर साहेब ने अपने जीवन एवं अमृतमयी वाणी के माध्यम से समस्त मानव समाज को सत्य, समता, करुणा और मानवता का अमर संदेश दिया। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं प्रेरणादायी हैं, जितनी उनके समय में थीं।
गुरु पूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि हमारे जीवन को सही दिशा, विवेक और आध्यात्मिक चेतना प्रदान करते हैं। सद्गुरु कबीर साहेब ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है—
> **"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
> बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"**
यह दोहा गुरु की सर्वोच्च महिमा का अमर संदेश है। गुरु ही वह सेतु हैं, जिनके माध्यम से साधक ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करता है।
इस पावन अवसर पर मैं आप सभी श्रद्धालु भक्तों से सादर आग्रह करता हूँ कि अपने परिवार सहित **प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली, पश्चियाना गली, लहरतारा, वाराणसी** पधारें तथा गुरु पूर्णिमा महोत्सव में सहभागी बनकर सद्गुरु कबीर साहेब के श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करें। इस अवसर पर संत-वाणी, सत्संग, भजन-कीर्तन, गुरु पूजन तथा प्रसाद वितरण सहित अनेक आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संतों का सान्निध्य एवं कबीर वाणी का रसपान आपके जीवन में शांति, सद्भाव, आत्मबल और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगा।
आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता संत कबीर के प्रेम, समरसता, भाईचारे और मानवता के संदेश को आत्मसात करने की है। जाति, धर्म, भाषा और ऊँच-नीच के सभी भेदभावों से ऊपर उठकर यदि हम मानवता को अपना सर्वोच्च धर्म मानें, तो यही सद्गुरु कबीर साहेब के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम सब प्रेम, सत्य, सेवा, सदाचार और समभाव के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
मैं सभी संत-महात्माओं, विद्वानों, समाजसेवियों, युवा साथियों, मातृशक्ति एवं समस्त श्रद्धालु भक्तों से सादर निवेदन करता हूँ कि गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस आध्यात्मिक महापर्व को सफल एवं भव्य बनाएँ। आपका पावन आगमन हम सभी के लिए प्रेरणा, सौभाग्य और सद्गुरु कबीर साहेब की कृपा का प्रतीक होगा।
सद्गुरु कबीर साहेब की असीम कृपा आप सभी पर बनी रहे। आपके जीवन में सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रकाश सदैव आलोकित रहे—इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ।

**जय कबीर। सतनाम।**
**सादर आमंत्रण सहित,**
**महंत श्री गोविंद दास शास्त्री**
**पीठाधीश्वर**
**प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली**
**पश्चियाना गली, लहरतारा, वाराणसी**

 # **जगतगुरु बालक देवाचार्य जी महाराज का कबीर प्राकट्य स्थली, लहरतारा में भव्य स्वागत****"संतन में रविदास संत हैं, संतन ...
17/07/2026

# **जगतगुरु बालक देवाचार्य जी महाराज का कबीर प्राकट्य स्थली, लहरतारा में भव्य स्वागत**

**"संतन में रविदास संत हैं, संतन में कबीर।
संतन में जो श्रेष्ठ हैं, सो हैं सबके पीर॥"**

वाराणसी की पावन धरती, जहाँ आध्यात्मिक चेतना की अविरल धारा हजारों वर्षों से प्रवाहित हो रही है, वहीं स्थित **सद्गुरु कबीर साहब की प्राकट्य स्थली, लहरतारा** एक ऐसा तीर्थ है जो मानवता, समता, प्रेम और सत्य का संदेश सम्पूर्ण विश्व को प्रदान करता है। इसी पावन धाम पर **पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर, जगद्गुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज** का आगमन अत्यंत हर्ष एवं गौरव का विषय रहा।

इस शुभ अवसर पर **कबीर प्राकट्य स्थली, लहरतारा, वाराणसी के पीठाधीश्वर** ने जगद्गुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज का वैदिक एवं संत परंपरा के अनुरूप **अंगवस्त्र ओढ़ाकर, पुष्पमाला एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन** किया। समस्त संत समाज, श्रद्धालुओं एवं उपस्थित भक्तों ने "जय कबीर", "सतगुरु कबीर साहब की जय" तथा "हरि नाम सत्य है" के जयघोष से सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

यह केवल दो संत परंपराओं का मिलन नहीं था, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति, सामाजिक समरसता और मानवता के महान आदर्शों का संगम था। कबीर साहब ने सदैव समाज को जाति, पंथ, ऊँच-नीच और बाह्य आडंबरों से ऊपर उठकर सत्य एवं प्रेम का मार्ग अपनाने का संदेश दिया।

कबीर साहब कहते हैं—

> **"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
> मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"**

इस वाणी का सार यही है कि मनुष्य का सम्मान उसके ज्ञान, चरित्र और कर्म से होना चाहिए, न कि जन्म अथवा बाहरी पहचान से। यही संदेश आज भी समाज को जोड़ने की प्रेरणा देता है।

जगद्गुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज के आगमन ने इस पवित्र स्थल की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक बढ़ाया। संत समाज ने एक स्वर में मानव कल्याण, विश्व शांति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संकल्प दोहराया। कबीर साहब का संपूर्ण जीवन ही सत्य, प्रेम, करुणा और सेवा का जीवंत उदाहरण है।

कबीर कहते हैं—

> **"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
> ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"**

यह दोहा आज भी हमें यह सिखाता है कि केवल ज्ञान का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और मानव सेवा ही सच्चे ज्ञान की पहचान है। संतों का जीवन इसी आदर्श का मूर्त रूप होता है।

लहरतारा की यह पावन भूमि उस दिव्य घटना की साक्षी है जहाँ लोकमान्यता के अनुसार माता नीमा और पिता नीरू को कमल पुष्प पर बालक कबीर का दर्शन हुआ। यही स्थान आज विश्वभर के कबीर प्रेमियों के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र है। यहाँ आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करता, बल्कि अपने भीतर मानवता, समरसता और आध्यात्मिक जागरण का नया संकल्प लेकर लौटता है।

कबीर साहब का एक और प्रसिद्ध दोहा है—

> **"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
> जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"**

यह वाणी आत्मचिंतन और आत्मसुधार का संदेश देती है। समाज परिवर्तन का आरंभ स्वयं से होता है। यही कारण है कि कबीर का दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।

जगद्गुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज एवं कबीर प्राकट्य स्थली के पीठाधीश्वर के इस पावन मिलन ने यह संदेश दिया कि भारत की संत परंपरा सदैव समाज को जोड़ने, मानवता को जागृत करने और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए समर्पित रही है। विभिन्न परंपराओं के संत जब एक मंच पर आते हैं तो वह राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समन्वय और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

कबीर साहब कहते हैं—

> **"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
> मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"**

यह दोहा संतोष, सेवा और परोपकार की भावना का सर्वोत्तम संदेश देता है। यही भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन भी है।

इस अवसर पर उपस्थित संतों ने कबीर साहब के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने, लहरतारा स्थित प्राकट्य स्थली के संरक्षण, आध्यात्मिक पर्यटन के विकास तथा युवा पीढ़ी को संत साहित्य से जोड़ने का आह्वान किया। यह भी संकल्प व्यक्त किया गया कि कबीर की वाणी केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के व्यवहार और जीवन मूल्यों का आधार बने।

कार्यक्रम के अंत में सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से **"जय कबीर"** का उद्घोष करते हुए विश्व शांति, सामाजिक सद्भाव और मानव कल्याण की प्रार्थना की।

कबीर साहब की अमर वाणी आज भी समस्त मानवता का मार्गदर्शन करती है—

> **"कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
> जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ॥"**

अर्थात जो मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और अज्ञान को त्याग देता है, वही सच्चे आध्यात्मिक मार्ग का अधिकारी बनता है।

**सद्गुरु कबीर साहब की प्राकट्य स्थली, लहरतारा** आज भी प्रेम, समरसता, सत्य और मानवता का जीवंत तीर्थ है। जगद्गुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज का यह मंगलमय आगमन आने वाली पीढ़ियों के लिए संत परंपरा की एक प्रेरणादायक स्मृति रहेगा। यह मिलन केवल सम्मान का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा की उस अखंड धारा का प्रतीक है जो संपूर्ण विश्व को प्रेम, सद्भाव और आध्यात्मिक एकता का संदेश देती है।

**जय कबीर।
सतगुरु कबीर साहेब की जय।**
प्रबंधक
प्राचीन कबीर प्रकाट्य स्थली लहरतारा वाराणसी
फ़ोन -8177000070

 # **कबीर तालाब, लहरतारा : जलाशयों का पौराणिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय महत्व तथातालाब के पुनर्जीवन की आवश्यकता**भारत क...
16/07/2026

# **कबीर तालाब, लहरतारा : जलाशयों का पौराणिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय महत्व तथातालाब के पुनर्जीवन की आवश्यकता**

भारत की सभ्यता का विकास नदियों, सरोवरों, तालाबों और जलाशयों के तट पर हुआ है। भारतीय संस्कृति में जल को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि **जीवन, धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का आधार** माना गया है। वेदों में जल को "अमृत" की संज्ञा दी गई है— *"आपो हि ष्ठा मयोभुवः"* अर्थात् जल ही सुख और समृद्धि का स्रोत है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने प्रत्येक नगर और ग्राम में तालाब, बावड़ी, कुएँ तथा सरोवरों का निर्माण कराया और उन्हें समाज की अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा।

# # जलाशयों का पौराणिक महत्व

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में अनेक पवित्र सरोवरों का उल्लेख मिलता है। मानसरोवर, पुष्कर सरोवर, ब्रह्मसरोवर, बिंदु सरोवर और पंपा सरोवर जैसे जलाशय केवल जल संग्रहण के स्थान नहीं रहे, बल्कि आध्यात्मिक साधना, तपस्या और लोककल्याण के केंद्र रहे हैं। ऐसी मान्यता रही है कि जलाशयों के समीप ऋषि-मुनि यज्ञ, ध्यान और शिक्षा का कार्य करते थे। जलाशय प्रकृति और मानव के बीच संतुलन का प्रतीक रहे हैं।

पुराणों में कहा गया है कि **एक तालाब का निर्माण हजारों यज्ञों के समान पुण्यदायी होता है**, क्योंकि इससे केवल वर्तमान पीढ़ी ही नहीं, बल्कि आने वाली अनेक पीढ़ियाँ लाभान्वित होती हैं। जल का संरक्षण भारतीय जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग रहा है।

# # हमारे जीवन में तालाबों का महत्व

आज जब जल संकट विश्वव्यापी समस्या बन चुका है, तब तालाबों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। एक स्वस्थ जलाशय—

* भूजल स्तर को बढ़ाता है।
* वर्षा जल का संचयन करता है।
* पेयजल एवं सिंचाई का स्रोत बनता है।
* जैव विविधता को संरक्षण देता है।
* स्थानीय तापमान को नियंत्रित करता है।
* वायु की आर्द्रता बनाए रखता है।
* पक्षियों, मछलियों और अन्य जीवों का प्राकृतिक आवास बनता है।
* सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होता है।

यदि किसी क्षेत्र के तालाब समाप्त हो जाएँ, तो कुछ वर्षों में वहाँ का भूजल स्तर गिरने लगता है, हरियाली कम हो जाती है और गर्मी का प्रभाव बढ़ जाता है। इसलिए तालाबों का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है।

# # लहरतारा का कबीर तालाब : इतिहास और आध्यात्मिक विरासत

वाराणसी स्थित **श्री सद्गुरु कबीर प्राकट्य स्थली, लहरतारा** भारतीय संत परंपरा का अत्यंत पवित्र स्थल है। जनश्रुति और संत परंपरा के अनुसार इसी पावन लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन संत कबीर का दिव्य प्राकट्य हुआ था। नीरू और नीमा ने इसी स्थल से बालक कबीर को प्राप्त किया और उनका पालन-पोषण किया।

उस समय लहरतारा का तालाब लगभग **17 एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्रों ** में विस्तृत, स्वच्छ और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण रहा होगा। चारों ओर वृक्षों की हरियाली, स्वच्छ जल, कमल के फूल, पक्षियों का कलरव और शांत वातावरण इसे साधना एवं आध्यात्मिक चिंतन का आदर्श केंद्र बनाते होंगे। यही प्राकृतिक परिवेश संत कबीर के सार्वभौमिक चिंतन, समता और मानवता के संदेश का मौन साक्षी रहा।

कबीर ने प्रकृति को ईश्वर की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति माना। उनका जीवन सादगी, श्रम, संतुलन और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है।

# # कबीर के दोहों में प्रकृति और जीवन

संत कबीर ने मानव को प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दी। उनका प्रसिद्ध दोहा—

> **"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
> मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"**

यह दोहा केवल संतोष का संदेश नहीं देता, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के सीमित एवं न्यायपूर्ण उपयोग की शिक्षा भी देता है।

इसी प्रकार—

> **"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
> पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥"**

यह दोहा हमें बताता है कि जीवन और प्रकृति का वास्तविक महत्व तभी है जब उससे समाज का कल्याण हो। वृक्ष, जलाशय और प्राकृतिक संसाधन तभी सार्थक हैं जब वे सभी के लिए उपयोगी बनें।

कबीर का एक और संदेश—

> **"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
> ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"**

यह हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति के प्रति प्रेम, जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और पर्यावरण के संरक्षण का भाव ही वास्तविक ज्ञान है।

# # 17 एकड़ कबीर तालाब के पुनर्जीवन का पर्यावरणीय प्रभाव

यदि लहरतारा का ऐतिहासिक **17 एकड़ कबीर तालाब** पूर्ण रूप से पुनर्जीवित होता है, तो इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे।

सबसे पहले, वर्षा जल का विशाल संग्रह होगा जिससे आसपास के क्षेत्रों का भूजल स्तर उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा। आज वाराणसी सहित अनेक नगरों में भूजल लगातार नीचे जा रहा है। यह तालाब प्राकृतिक रिचार्ज केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

दूसरे, आसपास का तापमान नियंत्रित होगा। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बड़े जलाशय स्थानीय वातावरण को ठंडा रखते हैं तथा हीट आइलैंड प्रभाव को कम करते हैं।

तीसरे, हजारों पक्षियों, तितलियों, मछलियों और अन्य जीवों को प्राकृतिक आवास मिलेगा। इससे जैव विविधता का संरक्षण होगा।

चौथे, तालाब के चारों ओर यदि देशी प्रजातियों के वृक्ष लगाए जाएँ, तो कार्बन अवशोषण बढ़ेगा और वायु गुणवत्ता में सुधार होगा।

पाँचवें, यह क्षेत्र धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु संत कबीर के जीवन, दर्शन और पर्यावरण संरक्षण के संदेश से प्रेरित होंगे।

# # सामाजिक एवं सांस्कृतिक लाभ

कबीर तालाब का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय परियोजना नहीं होगा, बल्कि सामाजिक जागरण का अभियान भी बनेगा।

* स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
* धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
* स्थानीय हस्तशिल्प एवं बुनकर समुदाय को लाभ होगा।
* पर्यावरण शिक्षा का जीवंत केंद्र विकसित होगा।
* विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण स्थल बनेगा।
* संत कबीर की समता, सद्भाव और मानवता की शिक्षाओं का व्यापक प्रचार होगा।

# # भविष्य की दिशा

आज आवश्यकता है कि लहरतारा के इस ऐतिहासिक जलाशय को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों तथा पारंपरिक भारतीय जल संरक्षण पद्धतियों के समन्वय से विकसित किया जाए। वर्षा जल संचयन, जैविक जल शुद्धिकरण, देशी पौधों का रोपण, पक्षी संरक्षण, कमल एवं अन्य जलीय वनस्पतियों का पुनर्स्थापन तथा पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन की योजनाएँ इस परियोजना का अभिन्न अंग बनें।

यदि समाज, शासन, पर्यावरण विशेषज्ञ, संत समाज तथा स्थानीय नागरिक मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो लहरतारा का कबीर तालाब पुनः अपनी ऐतिहासिक गरिमा प्राप्त कर सकता है।

# # निष्कर्ष

लहरतारा का कबीर तालाब केवल एक जलाशय नहीं है; यह भारतीय संस्कृति, संत परंपरा, पर्यावरण संरक्षण और मानवता की साझा विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसका पुनर्जीवन जल संरक्षण, जैव विविधता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सतत विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा।

संत कबीर ने जीवन भर प्रेम, समानता और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का संदेश दिया। आज उनके प्राकट्य स्थल से जुड़े इस पावन तालाब का संरक्षण वास्तव में उनके संदेश को व्यवहार में उतारने का सर्वोत्तम माध्यम है।

कबीर का यह दोहा आज भी हमें प्रेरित करता है—

> **"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
> पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥"**

यदि हम आज अपने जलाशयों को बचाने का संकल्प नहीं लेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। अतः लहरतारा के 14 एकड़ ऐतिहासिक कबीर तालाब का पुनर्जीवन केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी, पर्यावरणीय आवश्यकता और भविष्य की सुरक्षा का संकल्प है।

**प्रबंधक**
**श्री सद्गुरु कबीर सेवा संस्थान,
प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली, लहरतारा, वाराणसी**
**मो.: 8177000070**

Address

प्राचीन कबीर प्रकट स्थल लाहरतारा वाराणसी
Ramnagar
221002

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