25/07/2026
बौद्धिस्ट समारोह
# **बौद्ध एवं कबीर की समकालीन प्रासंगिकता**
# # **25 जुलाई 2026 को आयोजित बौद्ध-कबीर संगोष्ठी पर आधारित विस्तृत उद्बोधन**
# # # **जय बुद्ध। जय कबीर। जय मानवता।**
आदरणीय संत-महात्माओं, पूज्य बौद्ध भिक्षुओं, विद्वान आचार्यों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, देश के विभिन्न भागों से पधारे हुए श्रद्धालु भक्तों, मातृशक्ति एवं युवा साथियों,
आज 25 जुलाई 2026 का यह दिन श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी अवसर के रूप में स्मरण किया जाएगा। "बौद्ध एवं कबीर की समकालीन प्रासंगिकता" विषय पर आयोजित यह समारोह केवल एक वैचारिक गोष्ठी नहीं, बल्कि करुणा, समता, प्रेम, सत्य और मानवता के दो महान प्रकाश स्तंभ—भगवान गौतम बुद्ध और संत शिरोमणि कबीर साहब—के विचारों के पुनर्स्मरण और उनके जीवन-दर्शन को समाज तक पहुँचाने का एक ऐतिहासिक प्रयास है।
मैं इस पावन अवसर पर आप सभी का हृदय की गहराइयों से स्वागत, अभिनंदन एवं आभार व्यक्त करता हूँ।
आज के इस महत्वपूर्ण आयोजन को सफल बनाने में श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा के पीठाधीश्वर **महंत श्री गोविंद दास शास्त्री जी** का विशेष मार्गदर्शन, संरक्षण और प्रेरणा रही। उनके सतत प्रयासों के कारण यह पवित्र स्थल आज भी संत परंपरा, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र बना हुआ है। इस समस्त आयोजन का श्रेय उनके दूरदर्शी नेतृत्व, सेवा-भाव और संत परंपरा के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को जाता है।
# # लहरतारा की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्ता
लहरतारा केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा की अमूल्य धरोहर है। यह वह पवित्र भूमि है जिसे संत कबीर साहब के प्राकट्य से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यह स्थान जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता, प्रेम और समानता का संदेश देता आया है।
आज जब विश्व हिंसा, आतंकवाद, सामाजिक विभाजन, मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और नैतिक पतन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब लहरतारा जैसी आध्यात्मिक भूमि से बुद्ध और कबीर का संयुक्त संदेश सम्पूर्ण विश्व के लिए आशा की नई किरण बन सकता है।
# # बुद्ध और कबीर : दो युग, एक संदेश
भगवान बुद्ध और संत कबीर दो अलग-अलग कालखंडों में अवतरित हुए, किंतु उनके विचारों में अद्भुत समानता दिखाई देती है। दोनों ने मनुष्य को बाहरी आडंबरों से मुक्त होकर आत्मज्ञान, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
भगवान बुद्ध ने कहा—
**"अप्प दीपो भव"**
अर्थात् *स्वयं अपने दीपक बनो।*
संत कबीर ने कहा—
**"मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।"**
दोनों महापुरुषों का संदेश यही है कि सत्य, मुक्ति और परम शांति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में विद्यमान है।
# # करुणा और प्रेम का दर्शन
भगवान बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन करुणा का पर्याय है। उन्होंने समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री और दया का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा—
**"घृणा से घृणा समाप्त नहीं होती; घृणा केवल प्रेम से समाप्त होती है।"**
यही विचार संत कबीर की वाणी में भी मिलता है।
कबीर कहते हैं—
**"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"**
आज जब समाज में वैमनस्य, कटुता और असहिष्णुता बढ़ रही है, तब बुद्ध की करुणा और कबीर का प्रेम ही सामाजिक सौहार्द का सबसे प्रभावी आधार बन सकता है।
# # समता का संदेश
भगवान बुद्ध ने जन्म आधारित ऊँच-नीच का विरोध किया। उन्होंने मनुष्य का मूल्य उसके कर्म और चरित्र से निर्धारित किया।
संत कबीर ने भी यही कहा—
**"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"**
यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सैकड़ों वर्ष पहले था। यदि समाज वास्तव में समरस बनाना है तो बुद्ध और कबीर के समतामूलक विचारों को शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक जीवन में स्थान देना होगा।
# # अंधविश्वास और पाखंड का विरोध
भगवान बुद्ध ने कर्मकांड, अंधविश्वास और निरर्थक परंपराओं का विरोध किया तथा तर्क, विवेक और अनुभव को महत्व दिया।
संत कबीर ने भी निर्भीक होकर कहा—
**"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर॥"**
दोनों महापुरुषों ने यह स्पष्ट किया कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के चरित्र का निर्माण है, न कि केवल बाहरी आडंबर।
# # कर्म की महत्ता
बुद्ध और कबीर दोनों ने कर्म को जीवन का आधार माना।
कबीर कहते हैं—
**"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥"**
यह दोहा केवल समय प्रबंधन का संदेश नहीं, बल्कि सक्रिय जीवन जीने की प्रेरणा है।
भगवान बुद्ध ने भी कहा कि मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
# # युवाओं के लिए प्रेरणा
आज का युवा तकनीकी रूप से सक्षम है, लेकिन मानसिक रूप से अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रतिस्पर्धा, तनाव, अवसाद और भौतिक आकर्षण के बीच बुद्ध का ध्यान, संयम और मध्यम मार्ग तथा कबीर का निर्भीक सत्य और आत्मविश्वास युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
यदि नई पीढ़ी बुद्ध की करुणा और कबीर की स्पष्टवादिता को अपनाती है, तो वह केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक भी बनेगी।
# # पर्यावरण और मानवता
भगवान बुद्ध ने प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दी। संत कबीर ने भी प्रकृति को ईश्वर की सृष्टि मानकर उसका सम्मान किया।
आज पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के दौर में दोनों महापुरुषों की शिक्षाएँ सतत विकास और प्रकृति संरक्षण का मार्ग दिखाती हैं।
# # सामाजिक समरसता की आवश्यकता
आज समाज अनेक स्तरों पर विभाजित दिखाई देता है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक विषमता के कारण सामाजिक दूरी बढ़ रही है।
ऐसे समय में बुद्ध और कबीर का संयुक्त संदेश हमें याद दिलाता है कि मानवता किसी भी पहचान से बड़ी है। यदि समाज को स्थायी शांति चाहिए तो समता, करुणा और संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी।
# # समारोह का उद्देश्य
आज आयोजित यह बौद्ध-कबीर संगोष्ठी केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संकल्प है। हमारा उद्देश्य है कि भगवान बुद्ध और संत कबीर की शिक्षाओं को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, धार्मिक स्थलों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया जाए।
श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल, पुराना कबीर मठ, लहरतारा को हम भविष्य में एक ऐसे वैश्विक संवाद केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते हैं जहाँ करुणा, समता, शांति और मानवता पर निरंतर चिंतन और शोध होता रहे।
# # सांस्कृतिक प्रस्तुति
इस समारोह का एक अत्यंत प्रेरणादायी और भावपूर्ण पक्ष रहा **ताना-बाना समूह** की संगीतमय प्रस्तुति।
प्रख्यात कबीर भजन गायक **श्री देवेंद्र दास जी**, **डा भागीरथी जी** तथा उनके सहयोगी कलाकारों ने कबीर साहब के भजनों की ऐसी मनमोहक प्रस्तुति दी जिसने उपस्थित सभी श्रोताओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया। उनके गायन में कबीर की वाणी की आत्मा, लोकसंगीत की मधुरता और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
कबीर के निर्गुण भजनों ने यह अनुभव कराया कि संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने वाली साधना भी है। उपस्थित श्रद्धालु लंबे समय तक इस प्रस्तुति की सराहना करते रहे।
# # आयोजन के प्रति आभार
मैं इस अवसर पर सभी पूज्य बौद्ध भिक्षुओं, संत-महात्माओं, विद्वानों, शोधार्थियों, सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवकों तथा सभी श्रद्धालुओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।
विशेष रूप से मैं पुनः आदरणीय **महंत श्री गोविंद दास शास्त्री जी** के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनके मार्गदर्शन और संरक्षण में यह प्रेरणादायी आयोजन अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उनका जीवन संत परंपरा, सेवा, समरसता और मानव कल्याण के प्रति समर्पित है।
# # हमारा सामूहिक संकल्प
आइए, आज इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें—
* हम जाति, धर्म, भाषा और संप्रदाय के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे।
* हम करुणा, प्रेम, सत्य और सेवा को अपने जीवन का आधार बनाएँगे।
* हम भगवान बुद्ध और संत कबीर के मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार करेंगे।
* हम समाज में शांति, समरसता, नैतिकता और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु निरंतर कार्य करेंगे।
* हम लहरतारा स्थित श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल को विश्व स्तर पर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी संवाद का केंद्र बनाने में अपना सहयोग देंगे।
अंत में संत कबीर की अमर वाणी—
**"साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥"**
और भगवान बुद्ध का कालजयी संदेश—
**"बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।"**
इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं आप सभी का पुनः अभिनंदन करता हूँ। आइए, हम सब मिलकर करुणा, समता, सत्य, अहिंसा और प्रेम पर आधारित ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें, जहाँ प्रत्येक मनुष्य सम्मान, स्वतंत्रता और भाईचारे के साथ जीवन जी सके।
**जय बुद्ध।
जय कबीर।
जय मानवता।**
**महंत गोविंद दास शास्त्री**
**पीठाधीश्वर**
**श्री सद्गुरु कबीर प्रकट्य स्थल**
**पुराना कबीर मठ, लहरतारा, वाराणसी**
**संपर्क : 8177000070**