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दो दुनिया, दो लोग, दो कहानियां मिलन की घड़ी, एक काल का अंत।
02/12/2024

दो दुनिया, दो लोग, दो कहानियां
मिलन की घड़ी, एक काल का अंत।

नदियों का न आना तकलीफदेह नहीं है, आकर चले जाना है
26/10/2024

नदियों का न आना तकलीफदेह नहीं है, आकर चले जाना है



वक्त, जज़्बात, प्रेम, यादें कभी प्रकाशित नहीं हुए खाली रहा उनके हिस्से का अख़बार मोड़ कर जो डाल दिया घर के बाहर क्रोध, श...
11/09/2024

वक्त, जज़्बात, प्रेम, यादें
कभी प्रकाशित नहीं हुए
खाली रहा उनके हिस्से का अख़बार
मोड़ कर जो डाल दिया घर के बाहर

क्रोध, शंका, लालच
सालों से जो लड़ते आए
कागज़ की अदालत में वो आए
उस अख़बार में और अपना हक़ जो चाहें

एक दिन हुआ ऐसा विवाद
हो गया बहुत बवाल
एक क्रूर राजा था,
गुस्सा उस पर छा जाता था
उसकी प्यारी रानी थी
जो प्रेम को बड़ा सुहाती थी

राजा ने फैसला दे डाला
थोड़ी ईर्ष्या और दुःख को भी हिस्सा दे डाला
क्रोध को फिर क्रोध आया
लालच ने उसे बहुत समझाया
दुःख और ईर्ष्या है दो साथी
राजा के है मुलाकाती

रानी इतना सुन ही पाती
जज़्बात फिर संभाल न पाती
बारी बारी हर को समझाती
उनको उनकी हदे दिखाती
खाली को खाली ही सुहाती

राजा के गुस्से ने, रानी के प्रेम को धमकाया
ईमानदारी ने कान लगाया,
अवैध जगह का मतलब समझाया
प्रेम, वक्त के पास आया
यादों को भी थोड़ा जगाया

घुठ जो आपस में ही उलझाया
अवैध को अपना जो बतलाया
सच्चे हकदार ने फिर पैर जमाया
सब्र का वकील फिर वो भी लाया

गरज गरज के हुई लड़ाई
पर बीच में जो छुट्टी आई
फैसला जो सुनना चाहो
अगली पेशी पर फिर तुम आओ

लेखक - यश कुमावत

आगमी हिस्सा जी की कलम से आयेगे, मुझे और सभी पाठक जन को इंतजार रहेगा
सधन्यवाद

जो सोचे तू तो सुबह भी निकला जा सकता है हे प्रिय रुक भी जा
21/08/2024

जो सोचे तू तो सुबह भी निकला जा सकता है

हे प्रिय रुक भी जा

रक्त से सनी आखों में जब देखता हूं चिंगारिया सक्त मांसल  हाथों में जब देखता हूं मोमबत्तियां!तो याद करता हूं बस में बैठे उ...
16/08/2024

रक्त से सनी आखों में जब देखता हूं चिंगारिया
सक्त मांसल  हाथों में जब देखता हूं मोमबत्तियां!

तो याद करता हूं
बस में बैठे उस लड़के को जो एक लड़की के लिए बोल रहा था, "क्या माल है"

पार्क में बैठे अंकल लोगों की टोली को जो अभी अभी सामने से गुजरी लड़की को देख कर आखों ही आखों में इशारा कर जोर से हस दिए थे।

शादी में भाई लोगों के घेरे को जो तय कर रहें होते थे की ब्लू वाली मेरी और पिंक वाली तेरी।

पापा लोगों के ऑफिस कलीग को जो ऑफिस में आई इंटर्न को नमस्ते जी!, नमस्ते जी! कह कर बोलते है व एक दूसरे को कहते हैं,"भाई तेरा तो काम हो गया"

दोस्त लोगों की पार्टी को जो  बोला करते थे की "इतना क्यू चीड़ रहा है, तेरी बहन है क्या?"

ऑटो वाले की महफ़िल को जो  आपस में कह रहे होते है "आज क्या कंटाप माल आया की क्या बताऊं, उसको उतारने की भी इच्छा नहीं हुई"

लड़को के झुंड को जिसमें एक कह रहा था की "मुझे क्या, मुझे तो बस एक बार लेनी है"

Oyo के रजिस्ट्रार की काली हसीं और गहरी ख़ामोशी को जो कुछ न कह कर भी बहुत कह रही थीं।

कॉलेज के उन सीनियर को जो बोलते है "कौनसी पसंद आई, जल्दी पसंद कर लो, चार साल अच्छे से निकलेंगे"।

Note - मुस्कुराइए, आप एक प्रोटेस्ट प्रधान देश में है।

लेखन - Yash Kumawat

फूलों की बात है, खुशबू को कैसे भूले
15/08/2024

फूलों की बात है, खुशबू को कैसे भूले






एक समय के पश्चात, जब महसूस हो जाए...किसी के जीवन में, तुम्हारे अस्तिव का,शून्य हो जाना...तब तुम थोड़ा निगल लेना दुःख,थाम...
07/08/2024

एक समय के पश्चात,
जब महसूस हो जाए...
किसी के जीवन में,
तुम्हारे अस्तिव का,
शून्य हो जाना...

तब तुम थोड़ा निगल लेना दुःख,
थामे रहना साहस का हाथ
बांधना एक पुल,
जो तुम्हें ले जाए...
विध्वंस से सृजन की तरफ

प्रतिक्षा तो प्रलय को भी करनी पड़ती है,
नव सृजन समय से पूर्व नहीं हों पाता
गर्म दिनों में जो पानी उड़ा था,
वो फिर बादल बन बरस जाएगा
जो रात के अंधेरे में पनपा था,
जो दिन के उजाले में बदल जाएगा।

अस्तित्व सदा अमर था, आंधी रुकने को है, सृजन बस होने को है।

सप्रेम
लेखक ~ यश कुमावत


खास दोस्त

07/08/2024
जब सुनी मैने किसी के मन, मस्तिष्क और अंतरात्मा का विवाद...बताया उन्होंने अपनी मोहब्बत के दौर का इंतकाल...तो मेरे मन की स...
03/08/2024

जब सुनी मैने किसी के मन, मस्तिष्क और अंतरात्मा का विवाद...
बताया उन्होंने अपनी मोहब्बत के दौर का इंतकाल...
तो मेरे मन की संवेदनाओं ने लिया उछाल

तंत्रिकाओं का जोड़ है जो शरीर में फैला है,
लब डब करता चार कोष्टीय डब्बों का समूह
जो नीली, लाल नलियों का तंत्र है।
मोहब्बत का अंत नहीं जानते, मानव मानसिकता नहीं जानते।

व्यवहार के विज्ञान से पहले मन का विज्ञान आया है...
किसी का जाना ही किसी के आने का संकेत है,
पुरानी पतिया न गिरे तो नई पतिया नहीं आती
फूल न मुरझाए तो फल नहीं बनता ।

जाने वाला जान भी ले तो क्या...
रुकते नहीं वो मंजर, जिनके रास्ते सुहाने हो...
मंजिल आज भी कल्पना है
कल का सफर ही सत्य था
रात जो बीत गई बात में...
उसी तरह जाने वाला चला गया उगती प्रभात में...
किस बात का शोक है...
रात आई ही थी जाने को...

पीछे रहे खालीपन को भर लेगी सुबह की किरणे
जैसे भरते है घाव,
हृदय हर बार भेजता है थोड़ा अधिक प्यार उस हिस्से को
रक्त के मोटे ऊतक के रूप में

विज्ञान की इसी किताब के एक हिस्से में लाइसोसोम लिखा था जो पुरानी कोशिका का पाचन कर जाता था
ताकी फल फूल सके नई कोशिका, नई उम्मीदें
नए अंग, नया प्रेम....

मस्तिष्क को अब समझाता हूं...
नए सिरे से फिर बताता हूं...

हृदय को उसूलों में बांध न पाएगा
भावनाओं के गर्त को कहा तक छुपाएगा

मन्नत के धागे चाहें खुल जाए,
उम्मीदों के तार टूटा नहीं करते...
तुझको भी रक्त हृदय ही पहुंचाता
चाहें दर्द तूने सबसे पहले पहचाना
घाव तेरे मैने ही ठिकाने लगाए...

मन का प्रेम समाप्त हो नहीं सकता
प्रतीक्षा थक सकती है, मर नहीं सकती...
जाने वाले को भूल जाना संभव है,
आने वाले को रोक पाना नहीं...

अंतरात्मा की फिर एक नई कहानी है
हर सवाल का ज़वाब इसके मुंह जुबानी है...

ये तब से साथ है जब तुम सिर्फ़ बीज थे
हृदय, मस्तिष्क बनने में भी जब देर थी
कोई हक़ नहीं इनका की झकजोर दे उसे

खत्म होते नहीं इंतजार
मरती नहीं उम्मीदें
दौर चाहें बदल जाए
मोहब्बत रुख ज़रूर लेती
संवेदनाओ का समुंदर,
प्रेम की नदियों को रोका नहीं करते।

लेखक ~ यश कुमावत

खास दोस्त के नाम

#हिंदी

असीमित संभावनो से भरे आसमान के लिए लेखक समाज के साथियों के उद्धरण(quote) को इस प्रकार तोड़ मोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है...
30/07/2024

असीमित संभावनो से भरे आसमान के लिए लेखक समाज के साथियों के उद्धरण(quote) को इस प्रकार तोड़ मोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है विद्यार्थी वर्ग तथा उनके सरक्षक, कोचिंग को ही संसार मान बैठते हैं एव अपने बच्चे की जवानी उसमें ही फूक देते हैं।

"कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों"
दुष्यंत कुमार जी की ये प्रेरणादायक कविता उन्होंने यूवा वर्ग को उदासीनता से बाहर निकालने के लिए लिखी थीं परंतु इसका प्रयोग कर कोचिंग संस्थान इसकी आत्मा का हनन कर रहें है।
अब आसमान में तो सुराख का पता नहीं पर विद्याथी के एक जीवन में सुराख हो गया ।
अनंत संभावनों से सीमित और संकुचित जीवन को बदलने वाली ये नकली संस्थान भारत का जीवन ही संकट में डाल रहे हैं।
कही सारे संस्थान और उनके शिक्षक इतने नालायक है की वो भी कोई परीक्षा पास न कर सके परंतु माहौल ऐसा बनाते हैं की उनके होने से ही शिक्षा जगन में क्रांति हुई है
no to coching culture
लेखन - Yash Kumawat


ऐसी कुछ राते जो सोकर न गुजारी गई हो फिर भी नहीं थकाती , जाग कर गुज़ार देनी चाहिए ~यश कुमावत
07/07/2024

ऐसी कुछ राते जो सोकर न गुजारी गई हो फिर भी नहीं थकाती , जाग कर गुज़ार देनी चाहिए

~यश कुमावत

बताए आप कोन से यूं तो........ है और आपसे...... क्या नहीं हुआ।धन्यवाद    #व्यंग्य  #व्यंग्यात्मक_कटाक्ष    #लेखन
11/05/2024

बताए आप कोन से यूं तो........ है
और आपसे...... क्या नहीं हुआ।

धन्यवाद


#व्यंग्य
#व्यंग्यात्मक_कटाक्ष

#लेखन

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