03/08/2024
जब सुनी मैने किसी के मन, मस्तिष्क और अंतरात्मा का विवाद...
बताया उन्होंने अपनी मोहब्बत के दौर का इंतकाल...
तो मेरे मन की संवेदनाओं ने लिया उछाल
तंत्रिकाओं का जोड़ है जो शरीर में फैला है,
लब डब करता चार कोष्टीय डब्बों का समूह
जो नीली, लाल नलियों का तंत्र है।
मोहब्बत का अंत नहीं जानते, मानव मानसिकता नहीं जानते।
व्यवहार के विज्ञान से पहले मन का विज्ञान आया है...
किसी का जाना ही किसी के आने का संकेत है,
पुरानी पतिया न गिरे तो नई पतिया नहीं आती
फूल न मुरझाए तो फल नहीं बनता ।
जाने वाला जान भी ले तो क्या...
रुकते नहीं वो मंजर, जिनके रास्ते सुहाने हो...
मंजिल आज भी कल्पना है
कल का सफर ही सत्य था
रात जो बीत गई बात में...
उसी तरह जाने वाला चला गया उगती प्रभात में...
किस बात का शोक है...
रात आई ही थी जाने को...
पीछे रहे खालीपन को भर लेगी सुबह की किरणे
जैसे भरते है घाव,
हृदय हर बार भेजता है थोड़ा अधिक प्यार उस हिस्से को
रक्त के मोटे ऊतक के रूप में
विज्ञान की इसी किताब के एक हिस्से में लाइसोसोम लिखा था जो पुरानी कोशिका का पाचन कर जाता था
ताकी फल फूल सके नई कोशिका, नई उम्मीदें
नए अंग, नया प्रेम....
मस्तिष्क को अब समझाता हूं...
नए सिरे से फिर बताता हूं...
हृदय को उसूलों में बांध न पाएगा
भावनाओं के गर्त को कहा तक छुपाएगा
मन्नत के धागे चाहें खुल जाए,
उम्मीदों के तार टूटा नहीं करते...
तुझको भी रक्त हृदय ही पहुंचाता
चाहें दर्द तूने सबसे पहले पहचाना
घाव तेरे मैने ही ठिकाने लगाए...
मन का प्रेम समाप्त हो नहीं सकता
प्रतीक्षा थक सकती है, मर नहीं सकती...
जाने वाले को भूल जाना संभव है,
आने वाले को रोक पाना नहीं...
अंतरात्मा की फिर एक नई कहानी है
हर सवाल का ज़वाब इसके मुंह जुबानी है...
ये तब से साथ है जब तुम सिर्फ़ बीज थे
हृदय, मस्तिष्क बनने में भी जब देर थी
कोई हक़ नहीं इनका की झकजोर दे उसे
खत्म होते नहीं इंतजार
मरती नहीं उम्मीदें
दौर चाहें बदल जाए
मोहब्बत रुख ज़रूर लेती
संवेदनाओ का समुंदर,
प्रेम की नदियों को रोका नहीं करते।
लेखक ~ यश कुमावत
खास दोस्त के नाम
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