16/08/2025
बीते दो साल : उम्मीदें, हकीकत और असल तस्वीर
1. क्या-क्या थीं उम्मीदें…
हर नई सरकार, हर चुनाव, हर गारंटी—उम्मीद थी कि “अब आदिवासी-ग्रामीण क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ेंगे”, “युवा को रोजगार मिलेगा”, “महिलाओं को आत्मनिर्भरता के असली मौके मिलेंगे”।
योजनाओं में पारदर्शिता, जनता की सीधी भागीदारी और हर घोटाले पर त्वरित सख्त कार्रवाई की बात।
अधूरी परियोजनाओं को अगले चुनाव से पहले हर हाल में पूरा करने की घोषणा।
2. लेकिन दो साल बाद सच कैसा है…
भ्रष्टाचार का साया बना रहा: शराब, गोधन, ट्रांसपोर्ट, स्कीम आवंटन—हर सेक्टर में पुराने-नए घोटालों के मामले सामने आए।
अधूरी परियोजनाओं की फेहरिस्त लंबी: रायपुर का स्कायवॉक, स्मार्ट सिटी, ग्रामीण रोड, स्वास्थ्य केंद्र—कई काम या तो अटके हैं या पूरी गुणवत्ता से अधूरे हैं।
भूतपूर्व, मौजूदा, और विपक्ष सभी दल: बयानबाज़ी, परस्पर आरोप, लेकिन न जनता को त्वरित राहत, न भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस।
जनभागीदारी = दिखावटी पूछताछ: सुनवाई फॉर्मेलिटी, समाधान में बड़ी देरी, बार-बार नए आवेदन।
मीडिया और सोशल प्लेटफार्म पर: असली मुद्दों को प्राइम टाइम पर जगह कम, घोटालों और योजनाओं पर "सेंसेशनल" दावे-जवाब ज्यादा।
3. आशाएं टूटती क्यों हैं?
हर दल जनता की आवाज़ को चुनाव तक सीमित रखता है—चुनाव के बाद मुद्दे फाइलों, पोर्टल्स या जनदर्शन तक ही सिमट जाते हैं।
न जांच निष्पक्ष, न शिकायतों पर ऐक्शन की गारंटी, न ही स्थायी ब्लैकलिस्टिंग, सिर्फ "आश्वासन" और लंबी प्रक्रियाएं।
तकनीक और एप्स के नाम पर पारदर्शिता का दिखावा, लेकिन उसी सिस्टम में ‘लीकेज’ और दलाल सक्रिय।
नई स्कीम = नया झुनझुना, पुराने सिरे से भ्रष्टाचार जारी।
जनता क्या महसूस करती है?
“आज राजनीति मूल्यों की जगह मजाक बन गई है—
हर कोई जनता का नाम लेकर खुद का फायदा खोजता है,
और जनता वही पुरानी खामोशी, लंबी लाइन, बार-बार प्रार्थना और इंतजार की स्थिति में फंसी रहती है।”
हर नई “घोषणा” अब आम जनता को उम्मीद से ज्यादा एक नई अफसोस या संशय की तरह लगती है।
अब और बर्दाश्त नहीं:
जनता की सहनशीलता हथियार नहीं, जनशक्ति बननी चाहिए।
सोशल मीडिया, जनसुनवाई, आरटीआई—हर मंच से सतत सवाल पूछिए।
जब तक हरेक "अधूरी परियोजना" पर मातहत जिम्मेदारी तय नहीं होती—कोई वादा, कोई स्कीम नई उम्मीद नहीं, नई कड़ी परीक्षा है।
सत्ताधारी या विपक्ष—किसी को भी आपको वोट बैंक मानने की ताकत न दें;
आवाज़ और कार्रवाई दोनों से हिसाब लें।
अंत में…
छत्तीसगढ़ की जनता की बात, हर नेता के लिए चेतावनी होनी चाहिए:
“हमें विकास नहीं चाहिए जिसकी नींव भ्रष्टाचार है।
हमें सियासत नहीं चाहिए जो जनता के नाम पर प्रदेश का मजाक बनाए।”
अब या कभी नहीं—जनता की आवाज़, असली व्यवस्था बदलने वाला बने।
बिना दबाव एक सजग भारत की नई तस्वीर मोर छत्तीसगढ़।
EiT Zone News 36 Chhattisgarh Property छत्तीसगढ़ राज्य परिषद