18/05/2020
एक नजर बनमनखी चीनी मिल पर..
बनमनखी चीनी मील की स्थापना दि पूर्णिया को-आपरेटिव सुगर फैक्ट्री लि., बनमनखी के नाम से 28.4.1956 को हुई थी, जो 3 जून 1977 तक सहकारिता के अधीन रहा। 2 फरवरी 1970 से इस मील में चीनी का उत्पादन शुरू हुआ, परंतु इस बीच बिहार सरकार द्वारा भारत के राष्ट्रपति से अनुमति प्राप्त करते हुए बिहार सरकार के अधिनियम संख्या 13/1977 बिहार राज्यपाल द्वारा सहकारिता से बिहार राज्य चीनी मील निगम को सौंप दिया गया। इस मील की क्षमता एक हजार टन प्रतिदिन थी। मील की अपनी 119.76 एकड़ की अचल संपत्ति है, जिसमें से 64.76 एकड़ में मील, आवासीय कॉलोनी एवं गोदाम आदि अवस्थित है। एशिया के सबसे बड़़े इस मिल के कारण पूर्णिया और कोसी प्रमंडल के लाखों किसान और कामगार खुशहाल थे. हजारों लोगों को चीनी मिल के कारण रोजगार मिला था लेकिन पर्याप्त मात्रा में गन्ना, बिजली और पानी उपलब्ध न हो पाने की वजह से 1997 में घाटा की बात कहकर लालू यादव की सरकार ने चीनी मिल को सदा के लिये बंद कर दिया. अब तो हालत ये है कि चीनी मिल खंडहर में तब्दील हो गयी है.एसबीआई कैपिटल मार्केट्स लिमिटेड (एसबीआईसीएपी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 1980 में बिहार में 28 चीनी मिलें थीं, जिनकी क्रसिंग कैपेसिटी 34 हज़ार टन थी। इन सभी मिलों के यूनिट्स की प्रगति के लिए बिहार सरकार ने 1974 में बिहार स्टेट सुगर कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया। शुरू में कुछ सालों तक मिल से चीनी का अच्छा उत्पादन हुआ, लेकिन यह ज़्यादा समय तक बरक़रार नहीं रह सका। कम फायदा और अधिक ख़र्च का हवाला देते हुए सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और 1996-97 तक कई चीनी मिलें एक के बाद एक करके बंद होती चली गईं।
नीतीश सरकार ने इन चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने के वादे कई बार किए, लेकिन बात स़िर्फ वादे तक ही सीमित रह गई।
आज की स्थिति मिल की कीमती मशीनें चोर ले जा रहे हैं. यहां की 119 एकड़ जमीन को सरकार ने बियाडा को सौंप दिया है लोगो में इस बात को लेकर उत्साह है कि जल्द बियाडा द्वारा इस जमीन पर कृषि आधारित उद्योग लगाए जाए ताकि इलाके के किसानो को फसल का सही मूल्य मिल सके।
यहां के मजदूरों को अपने गृह राज्य और और जिले में काम मिल सकें जिनसे उन्हें पलायन कर अन्य राज्यों में ना जाना पड़े