Adarsh omkar

Adarsh omkar साहित्य समाज का दर्पण है !

25/03/2026

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दिनांक :- 18- O1 - 2026 'को 'नीतु बाबू ' की पुस्तक **मानविका** का लोकार्पण हुआ ।जिसमें पूर्णिया के तमाम बड़े साहित्यकार ...
21/01/2026

दिनांक :- 18- O1 - 2026 'को 'नीतु बाबू ' की पुस्तक **मानविका** का लोकार्पण हुआ ।जिसमें पूर्णिया के तमाम बड़े साहित्यकार से मिलने का मौका मिला ।जिसमें साहित्य की विशेषताओं पर एवं स्त्री विमर्श की मूल पर चर्चा की गई । जिसका मुख्य श्रेय आदरणीय Sanjay kumar singh प्राचार्य महोदय (के.वी . झा कॉलेज , कटिहार )एवं गुरुदेव जितेंद्र वर्मा . (प्राध्यापक दर्शन साह महाविद्यालय ,कटिहार )का वक्तव्य रहा ।इनके अतिरिक्त पूर्व सांसद महोदय श्री दुलाल चंद गोस्वामी एवं हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ मनोज पाराशर ,पूर्व विभागाध्यक्ष सुरेश मंडल सर एवं वहाँ उपस्थित सभी सम्मानित अतिथि एवं छात्र-छात्राओं के सहयोग से कार्यक्रम सकुशल संपन्न हुआ ।

कभी खुश रहकर भी तुझे भुलाया होगासमाज की बेड़ियों को दिल से लगाया होगापरदेश में अपनत्व का एहसास कभी कराया होगासच कहकर भी ...
19/07/2025

कभी खुश रहकर भी तुझे भुलाया होगा
समाज की बेड़ियों को दिल से लगाया होगा
परदेश में अपनत्व का
एहसास कभी कराया होगा
सच कहकर भी कभी
झूठ की बात बताया होगा।
क्यांकि ,
ये झरोखें हैं यादों के,
कभी न कभी तो आया होगा।

तिलस्मी बातों का वो संसार
अब छूट रहा है।
उम्मीदों से पड़े वो सपनों का प्यार
अब छूट रहा है।
नई उमंग की करुणा ,
अब मलिन हो रही है ।
पुरानी बातों को सहेजकर
अब क्यों रो रहे हैं '
क्योंकि,
झरोखे हैं यादों के
सब ख्वाबों में सो रहें है।

तुझसे बिछड़ने का गम
मुझे अब से ही सता रहे हैं
हरी घास और कॉलेज की दीवारें
मेरे स्वप्नों में आ रहे हैं।
मस्तियों के दिन अब जा रहे हैं
लोग अफसर बनने की खुशी में
एक दूसरे को भुला रहे हैं।
क्योंकि,
ये झरोखे हैं यादों के
संवेदना में ही संकोच जगा रहे हैं।

तुम भूलकर भी भुलाओगे
तो हम तब भी ... .
तुम्हारे पास आऐंगे ।
तुम देखकर अनदेखा कर देना
फिर भी हम मुस्कुराएँगें
तुम शादी में न्योता मत देना
हम बिन बुलाए जाएँगे
क्योंकि,
ये झरोखे हैं यादों के
ऐसे ही थोरी भूल जाएंगे।

©️✍️ आदर्श ओंकार
Matuknath Choudhary

18/06/2025

कविता क्या है ?

आम धारणा है कि कविता गद्य से श्रेष्ठ होती है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। कुछ कविताएं श्रेष्ठ होती हैं, कुछ गद्य श्रेष्ठ होते हैं। दोनों में किसी एक को सर्वश्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता है । दोनों का अपना -अपना महत्व है, अपनी -अपनी विशेषताएं हैं। कोई भी किसी की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता। जीवन में दोनों की जरूरत है। मगर भूलवश कविता को श्रेष्ठ समझ लिए जाने के कारण जो लोग गद्य में ठीक से दो वाक्य नहीं बना सकते , वे भी कविता पर पिल पड़ते हैं और टांगुर -मांगुर आधे-आधे वाक्य एक पंक्ति में लिखकर और जहां -तहां तुक मिलाकर कवि बन बैठते हैं ।
मेरी समझ है जो बढ़िया गद्य नहीं लिख सकता, वह बढ़िया कवि नहीं हो सकता। निश्चित ही मैं आधुनिक काल की बात कह रहा हूं। मध्यकाल में जब गद्य विकसित नहीं हुआ तो सारा काम पद्य में ही चलता था। डॉक्टर का पुर्जा भी पद्य में ही लिखा जाता था, जबकि वह कविता नहीं था । पहली बात तो यह कि हर छंदोबद्ध रचना कविता नहीं होती ।
अगर कहूं कि कविता में एक लय होती है तो यह भी कहना पड़ेगा कि गद्य की भी एक लय होती है। गद्य में भी एक प्रवाह होता है। अगर कहूं कि जिसे गाया जा सके, वह कविता है तो कहना पड़ेगा कि गद्य भी गाया जा सकता है। अनेक फिल्मी गीतों में गद्य ही गाये गये हैं । जैसे - समझ गया मैं तेरा बहाना
देर से आना और ये कहना कि
वादा तो निभाया।
इसी बात को गद्य में कहा जा सकता है। अर्थ में कोई कमी नहीं आयेगी --- मैं तेरा बहाना समझ गया। तुम देर से आती हो और झुठमूठ का कहती हो कि वादा तो पूरा कर दिया ।
तब सवाल उठता है कि अगर तुक में कविता नहीं है, लय में नहीं है, प्रवाह में नहीं है, गेयता में नहीं है तो कविता है कहां ? निश्चित ही ये सारी चीजें कविता में होती हैं, लेकिन इनके होने से रचना कविता नहीं हो सकती, क्योंकि ये सारी चीजें गद्य में भी होती हैं। तब ऐसी कौन-सी चीज है जो कविता में तो होती है, लेकिन गद्य में नहीं होती ? वह चीज है सांद्रता, प्रगाढ़ता, अर्थ के अनेक स्तरों का संक्षेप में ध्वनित होना। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। निराला की प्रसिद्ध रचना "राम की शक्ति -पूजा"की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है --
है अमानिशा, उगलता गगन, घन अंधकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन चार
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल
भूधर ज्यों ध्यान -मग्न, केवल जलती मशाल।

इस कविता को आप गद्य में नहीं कह पायेंगे। अगर कहेंगे तो कुछ बातें छूट जायेंगी। इसकी व्याख्या हो सकती है । समीक्षा हो सकती है। इस कविता के एक -एक रेशे को खोला जा सकता है। लेकिन तब वह कविता नहीं रह जायेगी। भाष्य हो जायेगा, व्यावहारिक आलोचना हो जायेगी, कविता नहीं। अब इस कविता को गद्य में रूपांतरित कर आपको दिखलाता हूं ।
"अमावस्या की रात है। गगन घना अंधकार उगल रहा है। दिशा का पता नहीं चल रहा है कि किधर है पूरब, किधर पश्चिम, किधर उत्तर, किधर दक्षिण ? पीछे विशाल सागर अनवरत घोर गर्जना कर रहा है। ऐसा लगता है कि पर्वत ध्यान में मग्न है। केवल एक मशाल जल रही है !"
क्या समझे ? कुछ समझ में आया ? जो भी समझ में आया वो सब ऊपरी बातें हैं। ऊपरी बातों के माध्यम से कवि कुछ भीतरी बातें कह रहे हैं।
राम -रावण के बीच जो युद्ध हुआ है आज, उसमें रावण का पलड़ा भारी रहा है। रावण ने राम की एक भी न चलने दी । राम के सारे बाण विफल कर दिये गये हैं। कोई भी योद्धा रावणी सेना के समक्ष टिक नहीं पाये। हनुमान जरूर लड़ते रह गये !
रात्रि का समय है। पर्वत प्रदेश में राम का शिविर है। उनके आसपास सारे योद्धा गण यथास्थान बैठे हैं। कल के युद्ध के बारे में सोचा जा रहा है। अमावस्या की रात जो अंधकार वमन कर रही है, वह राम और उनके सेनापति और सैनिकों की भीतर के अंधकार को दर्शा रहा है। अनिर्णय की स्थिति है। कोई उपाय नहीं सूझ रहा है । समुद्र की गर्जना रण में रावण के अट्टहास की अभिव्यक्ति कर रही है। भूधर स्वयं भगवान राम हैं। पहाड़ की तरह अचल रहनेवाला व्यक्ति सोच में पड़ा है। वे किसी ध्यान में डूबे हैं । इस गहन अंधकार के विरुद्ध बाहर जो एक मशाल जल रही है वह राम की आशा की प्रतीक है। आज के युद्ध के बारे में कहा जा सकता है कि राम हारने की कगार पर हैं। लेकिन राम के भीतर जो आत्मा की एक ज्योति जल रही है जो राम को थकने या हारने नहीं दे रही है; वह आशा की क्षीण किरण जीत की आशा है, लड़ने का बल है । वह अगर न हो तो आदमी सरेंडर कर जाता है। आत्महत्या भी कर सकता है । अंदर एक मशाल जलती रहनी चाहिए। पता नहीं हमारे राजा की मशाल जल रही है या बुझ गयी है।
ऊपर कुछ बातें काव्यांश को समझने के लिए कही गयी हैं। लेकिन यह कविता नहीं है। कविता तो उन्हीं चार पंक्तियों में है जो सांद्र है। सांद्र माने गाढ़ा । गद्य को अगर दूध माना जाय तो कविता राबड़ी है, खोआ भी कह सकते हैं ।
इस कविता में तुक भी है, लय भी, छंद भी, प्रवाह भी और सबसे बढ़कर ध्वनि है। ध्वनि का मतलब है कि स्थूल बाह्य जगत के चित्रण के माध्यम से कवि सूक्ष्म अंतर्जगत की स्थिति की अभिव्यंजना कर रहा है ।
✍️✍️ आदर्श ओंकार

प्रेमचंद के फटे जूते प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का निबंध "प्रेमचंद के फटे जूते" प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध तस्वीर से...
04/04/2025

प्रेमचंद के फटे जूते

प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का निबंध "प्रेमचंद के फटे जूते" प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध तस्वीर से प्रेरित है, जिसमें वे फटे जूते पहने हुए नजर आते हैं। परसाई इस प्रतीक के माध्यम से समाज, साहित्य और आर्थिक असमानता पर गहरी चोट करते हैं।

वे बताते हैं कि प्रेमचंद जैसा महान साहित्यकार भी आर्थिक तंगी से जूझता रहा, जबकि उसका साहित्य समाज को दिशा दे रहा था। यह केवल प्रेमचंद की गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि समाज की उस मानसिकता का भी प्रतिबिंब है, जो लेखकों की प्रशंसा तो करता है, लेकिन उनके जीवन-यापन की चिंता नहीं करता। प्रेमचंद के फटे जूते साहित्यकारों की उपेक्षा और उनकी संघर्षशीलता का प्रतीक बन जाते हैं।

परसाई कटाक्ष करते हैं कि समाज लेखक के जीवित रहते उसकी कद्र नहीं करता, लेकिन मरने के बाद उसे महान घोषित कर देता है। यह निबंध हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने बुद्धिजीवियों का सम्मान तभी करना सीखेंगे, जब वे दुनिया छोड़ चुके होंगे?

✍️✍️ हरिशंकर परसाई की बात ......

आज मेरे जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन है । क्योंकि आज मेरा स्वरचित कविता संग्रह में से 2 काव्य संग्रह को पूर्णियाँ विश्वविद्...
19/03/2025

आज मेरे जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन है । क्योंकि आज मेरा स्वरचित कविता संग्रह में से 2 काव्य संग्रह को पूर्णियाँ विश्वविद्यालय के 8 वें स्थापना दिवस पर 'स्मारिका' में जगह मिला ।

जिसके संपादक मनोज परासर सर हैं। जो पूर्णियाँ विश्वविद्यालय में सात्तकोत्तर हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं ।

एक नए लेखक जो अभी लिखना सीख रहा है उसको इतनी बड़ी उपलब्धि , मान्यता रखती है। इसके लिए मैं गुरुजी मनोज सर ,जितेन्द्र सर , पुरंदरदास सर , बंदना भारती मेडम , अनामिका सिंह मेडम एवं अन्य सभी गणमान्य शिक्षक का आभारी रहूंगा।

🚩🚩  #प्रेम  # Matuknath Choudhary  # middleschool # kavita tivari
12/03/2025

🚩🚩 #प्रेम
# Matuknath Choudhary
# middleschool
# kavita tivari

तुम हो मेरी जान प्रिये !तुम मेरा  हो सम्मान प्रिये !आज तुम्हारे खातिर ,मैं करता हूँ ,कुछ गुणगान प्रिये !तुम सर्दी की विश...
11/03/2025

तुम हो मेरी जान प्रिये !
तुम मेरा हो सम्मान प्रिये !
आज तुम्हारे खातिर ,
मैं करता हूँ ,
कुछ गुणगान प्रिये !

तुम सर्दी की विश्वास हो
तो, मैं गर्मी की वो प्यास प्रिय,
तुम हो हेमंत की खिली दुपहरी तो
मैं हूँ पतझड़ का विश्वास प्रिय?

तुम भू मंडल के जड़ -चेतन की
अद्भुत ,अमिट अभास प्रिय !
मैं मोहजाल का पक्षी हूँ ,
रहता हूँ तेरे पास प्रिय !

तुम नक्षत्रमाणि सी प्यारी हो,
मैं कंकड़ सा कालीदास प्रिय !
तुम दुर्गा सी हो रोद्र रूप,
मैं शंकर सा भोला आस प्रिय !

~ आदर्श ओंकार

05/03/2025

अब तेरे शहर का कोना ढूंढ रहा हूँ,
स्मरण भूत का है, पर वर्तमान का,
सिरहोना ढूँढ रहा हूँ।
मैं ढूँढ रहा हूँ,....
तेरै अलको की वो लहराते पतंगो को,
तेरे ख्वाबों के सुनहरे रंगों को,
तेरी खामोशी पर, उषा की तरंगों को,
तेरे पल्लू की स्पर्श और उमंगो को,
और मेरे लिए हुए पीड़ाओं को,
जो मुझे आज भी, नींद में,
तेरे होने का एहसास दिलाती है,
और सिरहाने का प्यास बुझाती है।

~~आदर्श ओंकार

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PURNEA BIHAR

854301

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