18/06/2025
कविता क्या है ?
आम धारणा है कि कविता गद्य से श्रेष्ठ होती है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। कुछ कविताएं श्रेष्ठ होती हैं, कुछ गद्य श्रेष्ठ होते हैं। दोनों में किसी एक को सर्वश्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता है । दोनों का अपना -अपना महत्व है, अपनी -अपनी विशेषताएं हैं। कोई भी किसी की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता। जीवन में दोनों की जरूरत है। मगर भूलवश कविता को श्रेष्ठ समझ लिए जाने के कारण जो लोग गद्य में ठीक से दो वाक्य नहीं बना सकते , वे भी कविता पर पिल पड़ते हैं और टांगुर -मांगुर आधे-आधे वाक्य एक पंक्ति में लिखकर और जहां -तहां तुक मिलाकर कवि बन बैठते हैं ।
मेरी समझ है जो बढ़िया गद्य नहीं लिख सकता, वह बढ़िया कवि नहीं हो सकता। निश्चित ही मैं आधुनिक काल की बात कह रहा हूं। मध्यकाल में जब गद्य विकसित नहीं हुआ तो सारा काम पद्य में ही चलता था। डॉक्टर का पुर्जा भी पद्य में ही लिखा जाता था, जबकि वह कविता नहीं था । पहली बात तो यह कि हर छंदोबद्ध रचना कविता नहीं होती ।
अगर कहूं कि कविता में एक लय होती है तो यह भी कहना पड़ेगा कि गद्य की भी एक लय होती है। गद्य में भी एक प्रवाह होता है। अगर कहूं कि जिसे गाया जा सके, वह कविता है तो कहना पड़ेगा कि गद्य भी गाया जा सकता है। अनेक फिल्मी गीतों में गद्य ही गाये गये हैं । जैसे - समझ गया मैं तेरा बहाना
देर से आना और ये कहना कि
वादा तो निभाया।
इसी बात को गद्य में कहा जा सकता है। अर्थ में कोई कमी नहीं आयेगी --- मैं तेरा बहाना समझ गया। तुम देर से आती हो और झुठमूठ का कहती हो कि वादा तो पूरा कर दिया ।
तब सवाल उठता है कि अगर तुक में कविता नहीं है, लय में नहीं है, प्रवाह में नहीं है, गेयता में नहीं है तो कविता है कहां ? निश्चित ही ये सारी चीजें कविता में होती हैं, लेकिन इनके होने से रचना कविता नहीं हो सकती, क्योंकि ये सारी चीजें गद्य में भी होती हैं। तब ऐसी कौन-सी चीज है जो कविता में तो होती है, लेकिन गद्य में नहीं होती ? वह चीज है सांद्रता, प्रगाढ़ता, अर्थ के अनेक स्तरों का संक्षेप में ध्वनित होना। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। निराला की प्रसिद्ध रचना "राम की शक्ति -पूजा"की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है --
है अमानिशा, उगलता गगन, घन अंधकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन चार
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल
भूधर ज्यों ध्यान -मग्न, केवल जलती मशाल।
इस कविता को आप गद्य में नहीं कह पायेंगे। अगर कहेंगे तो कुछ बातें छूट जायेंगी। इसकी व्याख्या हो सकती है । समीक्षा हो सकती है। इस कविता के एक -एक रेशे को खोला जा सकता है। लेकिन तब वह कविता नहीं रह जायेगी। भाष्य हो जायेगा, व्यावहारिक आलोचना हो जायेगी, कविता नहीं। अब इस कविता को गद्य में रूपांतरित कर आपको दिखलाता हूं ।
"अमावस्या की रात है। गगन घना अंधकार उगल रहा है। दिशा का पता नहीं चल रहा है कि किधर है पूरब, किधर पश्चिम, किधर उत्तर, किधर दक्षिण ? पीछे विशाल सागर अनवरत घोर गर्जना कर रहा है। ऐसा लगता है कि पर्वत ध्यान में मग्न है। केवल एक मशाल जल रही है !"
क्या समझे ? कुछ समझ में आया ? जो भी समझ में आया वो सब ऊपरी बातें हैं। ऊपरी बातों के माध्यम से कवि कुछ भीतरी बातें कह रहे हैं।
राम -रावण के बीच जो युद्ध हुआ है आज, उसमें रावण का पलड़ा भारी रहा है। रावण ने राम की एक भी न चलने दी । राम के सारे बाण विफल कर दिये गये हैं। कोई भी योद्धा रावणी सेना के समक्ष टिक नहीं पाये। हनुमान जरूर लड़ते रह गये !
रात्रि का समय है। पर्वत प्रदेश में राम का शिविर है। उनके आसपास सारे योद्धा गण यथास्थान बैठे हैं। कल के युद्ध के बारे में सोचा जा रहा है। अमावस्या की रात जो अंधकार वमन कर रही है, वह राम और उनके सेनापति और सैनिकों की भीतर के अंधकार को दर्शा रहा है। अनिर्णय की स्थिति है। कोई उपाय नहीं सूझ रहा है । समुद्र की गर्जना रण में रावण के अट्टहास की अभिव्यक्ति कर रही है। भूधर स्वयं भगवान राम हैं। पहाड़ की तरह अचल रहनेवाला व्यक्ति सोच में पड़ा है। वे किसी ध्यान में डूबे हैं । इस गहन अंधकार के विरुद्ध बाहर जो एक मशाल जल रही है वह राम की आशा की प्रतीक है। आज के युद्ध के बारे में कहा जा सकता है कि राम हारने की कगार पर हैं। लेकिन राम के भीतर जो आत्मा की एक ज्योति जल रही है जो राम को थकने या हारने नहीं दे रही है; वह आशा की क्षीण किरण जीत की आशा है, लड़ने का बल है । वह अगर न हो तो आदमी सरेंडर कर जाता है। आत्महत्या भी कर सकता है । अंदर एक मशाल जलती रहनी चाहिए। पता नहीं हमारे राजा की मशाल जल रही है या बुझ गयी है।
ऊपर कुछ बातें काव्यांश को समझने के लिए कही गयी हैं। लेकिन यह कविता नहीं है। कविता तो उन्हीं चार पंक्तियों में है जो सांद्र है। सांद्र माने गाढ़ा । गद्य को अगर दूध माना जाय तो कविता राबड़ी है, खोआ भी कह सकते हैं ।
इस कविता में तुक भी है, लय भी, छंद भी, प्रवाह भी और सबसे बढ़कर ध्वनि है। ध्वनि का मतलब है कि स्थूल बाह्य जगत के चित्रण के माध्यम से कवि सूक्ष्म अंतर्जगत की स्थिति की अभिव्यंजना कर रहा है ।
✍️✍️ आदर्श ओंकार