21/01/2026
ओशो (चन्द्रमोहन जैन), 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले के कुचवाड़ा गाँव में जन्म हुआ और वे जैन परिवार के 11 बच्चों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही उनकी प्रवृत्ति तीखे सवाल करने और धार्मिक‑सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने की थी; वे अक्सर स्कूल के शिक्षकों और गाँव के पंडितों से बहस करते थे, जिस कारण घर वालों को भी उन्हें संभालना मुश्किल लगता था। आगे चलकर उन्होंने जबलपुर में पढ़ाई की, दर्शनशास्त्र में स्नातक के बाद सागर विश्वविद्यालय से एमए किया और काफी अच्छे अंकों के साथ पास हुए, जिसके आधार पर वे रायपुर के संस्कृत कॉलेज और बाद में जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के व्याख्याता बने। विश्वविद्यालय में पढ़ाते समय भी वे परंपरागत “न्यूट्रल प्रोफेसर” की भूमिका के बजाय छात्रों में बहस और आलोचनात्मक सोच को भड़काने के लिए जाने जाते थे, और यही समय था जब वे पूरे भारत में सार्वजनिक व्याख्यान देने लगे, जहाँ वे गांधीवाद, समाजवाद, संगठित धर्म और पारंपरिक नैतिकता की खुलकर आलोचना करते थे
1960 के दशक में वे “आचार्य रजनीश” के नाम से पहचाने जाने लगे और ध्यान‑शिविरों के ज़रिए अपना अलग आध्यात्मिक–दार्शनिक आंदोलन खड़ा करने लगे। उनका कहना था कि मनुष्य तभी सचमुच ध्यान में उतर सकता है जब पहले वह दबे हुए भावों और दमन से मुक्त हो; इसी तर्क से उन्होंने “डायनैमिक मेडिटेशन” जैसी सक्रिय ध्यान‑पद्धतियाँ विकसित कीं जिनमें तेज़ साँस, जोर से रोना‑चिल्लाना, शरीर को मुक्त रूप से हिलाना‑डुलाना, फिर अचानक रुककर मौन में बैठना शामिल था। 1970 के आसपास उन्होंने स्वयं को एक स्वतंत्र आध्यात्मिक नेता के रूप में स्थापित कर लिया था, और 1974 में पुणे के कोरेगांव पार्क क्षेत्र में श्री रजनीश आश्रम की स्थापना की, जहाँ देश‑विदेश से लोग “नव‑संन्यास” लेने और ध्यान‑शिविरों में भाग लेने आने लगे। इस आश्रम की खासियत यह थी कि यहाँ पारंपरिक संन्यास जैसा त्याग नहीं, बल्कि रंगीन वस्त्र, हँसी‑मजाक, काम, रचनात्मकता और ध्यान साथ‑साथ चलते दिखते थे; यही मिश्रण उन्हें एक ओर पश्चिमी युवाओं के लिए आकर्षक बनाता था, दूसरी ओर भारत के परंपरागत धार्मिक समाज के लिए बेहद विवादास्पद
ओशो के प्रवचन विषयों की दृष्टि से बहुत व्यापक थे वे गीता, उपनिषद, महावीर, बुद्ध, कृष्ण, सुकरात, ज़ेन मास्टर्स, सूफ़ियों, यीशु और कबीर पर बोलते, साथ ही सेक्स, प्रेम, विवाह, राष्ट्रवाद, कम्युनिज़्म, पूँजीवाद और मनोविज्ञान जैसे आधुनिक मुद्दों पर भी खुलकर टिप्पणी करते। वे ब्रह्मचर्य‑केन्द्रित पारंपरिक आध्यात्मिक मॉडल की आलोचना करते हुए कहते थे कि दबाया हुआ काम और क्रोध अंततः अधिक हिंसा और पाखंड पैदा करते हैं, इसलिए सजगता के साथ भोग और प्रेम भी मार्ग का हिस्सा हो सकते हैं; इसी तरह वे संगठित धर्मों और राष्ट्रवाद को मनोवैज्ञानिक “कंडीशनिंग” मानते थे और व्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखते थे। उनके रोज़ाना दिए गए प्रवचन टेप पर रिकॉर्ड होते और बाद में सैकड़ों पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किए जाते, जो आज भी “ओशो” नाम से अलग‑अलग भाषाओं में उपलब्ध हैं
1981 में स्वास्थ्य कारणों और भारत में बढ़ते राजनीतिक‑प्रशासनिक दबावों के बीच वे अपने अनुयायियों के साथ अमेरिका के ओरेगन राज्य चले गए, जहाँ उनके लोगों ने लगभग 100 वर्ग मील के रैंच पर “रजनीशपुरम” नाम का एक विशाल कम्यून बसाया। यह कम्यून अपने आकार, संसाधनों और व्यवस्थागत नियंत्रण के कारण व्यावहारिक रूप से एक शहर जैसा बन गया था; यहाँ पर हजारों “सन्न्यासी” सामूहिक जीवन, सामूहिक श्रम, ध्यान और प्रयोगात्मक सामाजिक संरचना के तहत रहते थे। समय के साथ स्थानीय ग्रामीणों, प्रशासन और मीडिया के साथ टकराव तेज़ होने लगे – ज़मीन के अधिग्रहण, स्थानीय राजनीति में दखल, हथियारों के ख़रीदने और सुरक्षा दलों की गतिविधियों को लेकर विवाद बढ़ा। 1984 में ऐसा सामने आया कि उनकी मुख्य सचिव मा आनंद शीला और सहयोगियों पर नज़दीकी शहर द डैल्स में सल्मोनेला फैलाकर स्थानीय चुनाव परिणाम प्रभावित करने की “बायोटेरर” साज़िश के आरोप लगे, साथ ही इमिग्रेशन फ्रॉड और वायरटैपिंग जैसे मामलों में भी उनकी टीम फँसती गई। इन मामलों में शीला और कई अन्य अनुयायियों को अमेरिकी अदालतों ने दोषी ठहराया, जबकि ओशो स्वयं 1985 में गिरफ़्तार हुए और इमिग्रेशन से जुड़े आरोपों पर प्लीड‑बार्गेन करते हुए जुर्माना और छोटी सज़ा लेकर अमेरिका छोड़ने पर राज़ी हुए
अमेरिका से निर्वासन के बाद वे कई देशों में शरण या अस्थायी निवास की कोशिश करते रहे, लेकिन दर्जनों देशों ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार किया; अंततः 1986 में वे भारत लौटे और फिर से पुणे आश्रम में बस गए। इस नई अवधि में उन्होंने “भगवान” और “रजनीश” जैसे संबोधनों से दूर होते हुए खुद के लिए “ओशो” नाम अपनाया, जिसका संबंध वे “ओशनिक एक्सपीरियंस” अस्तित्व के साथ एकत्व की भावना से जोड़ते थे। 1986 से 1990 तक उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता रहा; उन्हें ज़हर दिए जाने की आशंका स्वयं उन्होंने व्यक्त की थी, जबकि समर्थक और आलोचक इसके पीछे अलग‑अलग कारण और सिद्धांत बताते रहे। अंततः 19 जनवरी 1990 की शाम को पुणे में उनका निधन हो गया, आधिकारिक तौर पर हृदयाघात को कारण बताया गया। उनका दाह संस्कार पुणे में ही हुआ और आश्रम के भीतर बने समाधि‑स्थल पर वह प्रसिद्ध पंक्ति लिखी गई: “OSHO – Never Born, Never Died. Only visited this planet Earth between 11 Dec 1931 – 19 Jan 1990.” यह वाक्य उनके जीवन‑दर्शन के उस पहलू को दर्शाता है जिसमें वे शरीर और व्यक्तित्व को अस्थायी और “साक्षी चेतना” को शाश्वत मानते थे
ओशो की विरासत दो ध्रुवों पर फैली हुई दिखती है। एक ओर, लाखों लोग उनकी किताबों और ध्यान‑पद्धतियों से प्रेरित होकर उन्हें आधुनिक ज़ेन‑मास्टर या अत्यंत मौलिक दार्शनिक मानते हैं, जिनकी भाषा ने आध्यात्मिकता को आधुनिक, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता‑केन्द्रित रूप दिया। दूसरी ओर, आलोचक उन्हें “सेक्स‑गुरु”, व्यक्तिपूजा‑केंद्रित पंथ‑नेता और खतरनाक सामाजिक‑राजनीतिक प्रयोगकर्ता के तौर पर देखते हैं, जिनके कम्यून ने सत्ता, धन, नियंत्रण और अपराध के जटिल सवाल भी खड़े किए। पुणे का आश्रम आज भी ध्यान‑केंद्र और रिट्रीट के रूप में सक्रिय है, जबकि ओशो पर बनी डॉक्यूमेंट्रीज़, किताबें और अदालत के रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि उनका जीवन सिर्फ़ आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि 20वीं सदी की वैश्विक काउंटर‑कल्चर, राजनीति, कानून और मीडिया के साथ टकराव की भी कहानी है