ACFC - Aslam Chishti Friend Circle, Pune

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दीबाचा असलम चिश्ती पूने (इंडिया) डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल का नाम Fine Arts की दुनिया - ए - उफ़क़ पर कई हवालों से मशहूर है...
15/06/2026

दीबाचा

असलम चिश्ती पूने (इंडिया)

डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल का नाम Fine Arts की दुनिया - ए - उफ़क़ पर कई हवालों से मशहूर है - उन के नाम की तरह उन का काम भी आर्टस की दुनिया में चमक दमक रखता है - उन की शख़्सियत हमा रंगी, हमा सिफ़ात की हामिल है बयक वक़्त यह शाइरा , कवयित्री भी हैं और मौलिम्मा (अध्यापिका ) भी, अदाकारा भी रक़्क़ासा भी गायिका भी एनाउंसर भी - अदाकारी, गायकी और रक़्स उन का शौक़ रहा है - शौक़ में फ़न के जलवों ने उन्हें इनआमात और एवार्डस से भी नवाज़ा - पैशे के लिहाज़ से डाक्टर ऋचा सिन्हा मौलिम्मा ( अध्यापिका) हैं - इस शोबे में उन्होंने नाम कमाया नतीजतन Best Teacher Award से भी नवाज़ी गईं - लेकिन उन की शख़्सियत का पैकर उन की शाइरी की वजह से नुमायां नज़र आता है - जिस का सबूत उन के कविताओं के मजमुए टुकड़ा टुकड़ा चांद, क्षितिज से क्षितिज तक, और गूंजती ख़ामोशियां की इशाअत और मक़बूलियत है - यह मजमुए हिंदी रस्म - उल - ख़त में शाया हुए थे - इस के इलावा मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उन की शिरकत और Performance ने उन के शेरी किरदार को फ़ायदा पहुंचाया -

डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल की पैदाइश 13 अगस्त को एक मोहज़्ज़ब कायस्त घराने में केसर गंज ज़िला बहराइच उत्तर प्रदेश में हुई वालिद ( श्री सरकार स्वरूप श्रीवास्तव) और वालिदा ( श्रीमती सुरत प्यारी श्रीवास्तव)
की बहतर तरबियत में उन की शख़्सियत को जिला मिली - उन के ज़ाती ज़ौक़ - ओ - शौक़ को हौसला अफ़ज़ाई बचपन से ही नसीब हुई जिस की वजह से उन्होंने कला के मैदान में तरक़्क़ी की - आज यह किसी तआरूफ़ की किसी बेसाखी की मोहताज नहीं - अपने बल पर तरक़्क़ी करने वाली डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल ने गोल्डन बुक आफ़ वर्ड में अपना नाम दर्ज करवाया - ओनलाइन पोयट्री शो आन थीम रामायण के ज़रिए उन की शोहरत में चार चांद लग गए -

आला तालीम याफ़ता डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल जो अंग्रेज़ी से एम - ए - बी - एड - पी एच डी हैं और मुंबई के ( तिलक एजुकेशन सोसायटीज़ ) में अंग्रेज़ी की उस्तादनी हैं - उन्हें हिन्दी और उर्दू से यकसां प्यार है इस लिए दोनों ज़बानों में यह गीत, ग़ज़ल, छंद, कविता, दोहे, मुक्तक, संस्मरण, माहिया और कहानियां लिखतीं हैं और छपती रहतीं हैं - आकाश वाणी प्रसार भारती और टीवी के प्रोग्रामों में यह अपनी रचनाओं का पाठ करती रहती हैं - उन की कहानियों को कभी मेंने पढ़ा नहीं हां उन की शायरी से ख़ूब वाक़िफ़ हूं और उन की तख़लीक़ी सलाहयतों से मुतआसिर भी हूं - उन से ए सी एफ़ सी (असलम चिश्ती फ्रेंड सर्कल) पूने के आल इंडिया मुशायरे में मेरी एक मुलाक़ात भी हो चुकी है साफ़ सुथरा अदबी ज़ौक़ रखने वाली डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल के ख़्यालात सेहतमंद हैं तो ज़ाहिर है उन का पैश करदा अदब भी मरीज़ाना नहीं सेहतमंदाना होगा - मुझे यह जानकर ख़ुशी हुई के उन का नया मजमु -ए-कलाम "आरती है ग़ज़ल" उर्दू ज़बान में शाया हो रहा है और साथ में इस का हिन्दी एडिशन भी रोशनी में आने वाला है - इस ख़ुशी को Share करने के लिए पहले में उन के अपनी पसंद के कुछ अशआर पेश करना चाहूंगा - मुलाहिज़ा फ़रमायें -

उलझनें बनने लगी हैं जब भी पल पल की लकीर
खींच ली माथे पे मैं ने अपने संदल की लकीर
चाहती हूँ इश्क़ में जानाँ कभी गीली न हो
मैं ने आँखों मे जो खींची है ये काजल की लकीर

जो बनके साया मिरे आस पास रहता है
उसी से दिल भी मिरा बदहवास रहता है
क़दम क़दम पे जिसे करती रहती हूँ महसूस
न जाने पाके मुझे क्यूँ उदास रहता है

रंज की दर्द की इंतिहा हो गए
इश्क़ में डूब कर हम फ़ना हो गए
उनको भी शौक़ सजने सँवरने का था
इसलिए दोस्त हम आईना हो गए

यादों के अब्र छाने लगे, रात आ गई
पलकें भी कह रही हैं कि बरसात आ गई
रोने लगी है मुफ़लिसी कच्चे मकान में
ऊँची हवेलियों में जो बारात आ गई

जैसे शामिल हो सदा वो मिरी परछाई में
उसके होने का भी एहसास है तन्हाई में
पहले डरती थी,तिरे नाम से ,मंसूब हूँ अब
इन दिनों लुत्फ़ बहोत आता है रुसवाई में

रंग उभर आए मन की रंगोली में
प्रेम का आँगन भीग गया है होली में
प्रेम की पिचकारी को उठाया है ,जैसे
बैठी हो रंगों की दुल्हन डोली में

आईने से नज़र मिलाते हुए
उसको सोचा है मुस्कुराते हुए
वो नज़र आ रहा था साहिल पर
कितनी उभरी मैं डूब जाते हुए

गर इरादा है पास आने का
पहले वादा करो निभाने का
ज़िंदगी बन के पास आए हो
अब ना ढूँढो बहाना जाने का

बुझा सकते हैं दरिया प्यास मेरी
मिरी मिट्टी में इतनी तो नमी है
किसी ने दी नहीं थी जो अभी तक
अभी आवाज़ वो मैंने सुनी है

ज़माने बाद मेरा मुझ से राब्ता हुआ है
वो शख़्स मेरे लिए जैसे आईना हुआ है

इश्क़ के पहले पायदान में हूं
इन दिनों सख़्त इम्तेहान में हूं
लम्हा लम्हा सवाल करता है
में' न' और ' हां' के दरमियान में हूं

रस्म - ए - उल्फ़त हमेशा निभाते चलो
इश्क़ के लम्हे यूं ही बिताते चलो

उठ रहे हैं ग़ुरूर के शोले
आग से क्या कहेगा पानी सुन

ख़ुद ग़रज़ बन के तुम जिया न करो
हम तुम्हारे हैं मेहरबां जानां

माँ, बेटी, मौसी, मामी, बेटी सी बहु, बहना होती है
इक औरत से, पूछो घर की, ज़िम्मेदारी क्या होती है
शौक़ से बाहर, जाओ लेकिन, सब की लाज समेटे रखना
हर घर की दहलीज़ के बाहर, फैली हुई दुनिया होती है

किसी के इश्क़ का मुझ पर ख़ुमार है तारी
किसी की याद मिरे आस पास डोलती है

इन अशआर को दर्ज करने का मक़सद डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल की सुख़न सोच को क़ारईन पर रोशन करना है और इन अशआर में शायरा के लहजे की निशानदही करना है - उन की सोच और उन का लहजा क़ारईन की गिरफ़्त में आ जायेगा तो क़ारईन को इस किताब के पढ़ने में लुत्फ़ का एहसास होगा - और यह भी मुमकिन है के क़ारईन उन के शेरी मवाद में खोकर अपनी ज़ात की झलक देखें -

" आरती है ग़ज़ल" मजमु - ए-कलाम में मानवियत के कई पहलू हैं महब्बत, अक़ीदत, इबादत वग़ैरह और इस " वग़ैरह" को में सामईन के लिए छोड़ रहा हूं क्योंकि हर सामे हर क़ारी की पसंद अलग होती है - मेरा यह ख़्याल है के " आरती है ग़ज़ल " हर सुख़न आशना को मुतमईन करेगा - क्योंकि डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल के कलाम में जहां तग़ज़्ज़ुल का रंग चोखा है वहां ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रंग कलाम के एज़ल पर लफ़्ज़ों से paint किये गये हैं - इस Painting में एहसासात के रंग सच्चे और जज़्बात के रंग अच्छे नज़र आते हैं - शाइरा के तजरेबात से ज़्यादा इर्द-गिर्द के मुशाहिदात क़ारईन को सोचने पर मजबूर करते हैं -

मेरी नज़र में डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल असरे हाज़िर की शाइरात और शौअरा में अपना एक अलग नाम और मक़ाम रखती हैं - यक़ीन न आये तो " आरती है ग़ज़ल " का बारीक बीनी से मुतआला करें - आप भी वालेहाना तौर पर वही कहेंगे जो मेंने कहा है -

डाक्टर ऋचा सिन्हा ग़ज़ल को में तहेदिल से मुबारकबाद पेश करता हूं - और उम्मीद रखता हूं के यह अपना शेरी सफ़र जारी रखेंगीं और उर्दू - हिन्दी अदब के सरमाये में इज़ाफ़ा करेंगीं - उन्हीं के एक पुर मग़्ज़ शेर पर में अपने दीबाचे का इख़्तिताम करता हूं -

दिल-ओ- दिमाग़ से है खेलती हर इक लम्हा
बड़ी ही शोख़ बहुत ही शरारती है ग़ज़ल

"  ادبی شذرات "  مصنّف ڈاکٹر جاوید احمد کامٹوی - - - - - -- "اجمالی جائزہ" اسلم چشتی پونے( انڈیا) اُردو زبان میں بہت سار...
13/06/2026

" ادبی شذرات " مصنّف ڈاکٹر جاوید احمد کامٹوی - - - - - -- "اجمالی جائزہ"

اسلم چشتی پونے( انڈیا)

اُردو زبان میں بہت سارے ایسے لکھنے والے ہیں جو ادبی سیاستوں سے دور رہ کر ادبی خدمات کو ترجیح دیتے ہیں ایسے لوگ ادب کے main stream میں نہیں ہوتے ہوئے بھی اپنے وجود کا احساس دلاتے رہتے - انھیں میں سے ایک جاوید احمد بھی ہیں جن کا پیشہ درس و تدریس اور جن کا موضوع سائنس رہا ہے - اُردو زبان کی دلچسپی کی وجہ سے انھوں نے اُردو اور فارسی کی اعلٰی تعلیم حاصل کی اور پی ایچ ڈی ناگپور یونیورسٹی سے کی - رفیع احمد قدوائی جونیئر کالج آف سائنس چندر پور ( مہاراشٹرا) میں پرنسپل کے خدمات انجام دینے کے بعد وظیفہ پر سبکدوش ہوئے - سروس کے دوران ان کے سائنسی اور ادبی مضامین اور بچّوں کے لیے کہانیاں ادبی رسائل میں شایع ہوتے رہے - ہمیشہ درسی ، علمی ، ادبی ، سنجیدہ حلقوں میں پذیرائی سے نوازے گئے - وظیفہ کے بعد بھی لکھنے کا سلسلہ جاری رہا - " ادبی شذرات " سے پہلے ان کی دو کتابیں " ماحولیات اور انسان " اور" اصلی پونجی " شایع ہو چُکی ہیں - ان کتابوں کے بارے میں اقتباسات مُلاحظہ فرمائیں -

" مشمولات پر ایک نظر ڈالی ہے جس سے بخوبی اندازہ کیا جاسکتا ہے کہ آپنے سلگتے موضوعات پر خامہ فرسائی کی ہے - اُردو میں سائنسی اور ماحولیاتی کتابیات کا فقدان تو نہیں مگر اس طرف لوگوں نے کم توجہ دی ہے - آپنے اپنی اس کتاب کے ذریعے ایک حوصلہ افزا اقدام کیا ہے"

( مُختار ٹونکی ، پُشت پر چھپی مُشاہیر کی آراء سے )

" میں آپ کی مُختلف کہانیاں دیر تک پڑھتا رہا بڑا لُطف آیا - یہ محسوس کر کے مزید خوشی ہوئی کہ ادبِ اطفال کے سلسلے میں میری اور آپ کی ترجیحات یکساں ہیں - آپ کی تحریریں معیاری اور بڑی شگفتہ ہیں - اس کے لیے مبارکباد قبول فرمائیں"

( ضمیر کاظمی ممبئی ، پُشت پر چھپی مُشاہیر کی آراء سے )

سائنس اور بچّوں کی کہانیوں کی یہ کتابیں جاوید احمد کا قابلِ ذکر کام ہے - اب" ادبی شذرات " کی اشاعت نے ادبی حلقوں کو چونکا دیا ہے - اس میں ان کے وقفے وقفے سے لکھے گئے مُختلف ادبی موضوعات پر مضامین ہیں اور انشائیے بھی - یہ انتخاب معیاری اور مطالعہ کے قابل ہے - آسان زبان میں موثر انداز میں قارئین کے لیے پیش کیا گیا ہے - مصنّف نے جن موضوعات پر لکھا ہے سبھی اہم ہیں اور جس زاویئے سے اظہار کیا وہ بھی توجہ طلب ہے - میرے اس خیال کی دلیل کے طور پر اقتباس مُلاحظہ فرمائیں -

" ادب الاطفال سے مراد ادب کی وہ شق جس کا تعلق بالخصوص بچّوں سے ہو - دُنیا کی ترقّی یافتہ زبانوں میں اسے اہم مقام دیا جا تا ہے - بچّوں کا ذہن کچّا ہوتا ہے - ان میں نقالی ، تجسّس کا جذبہ بہت زیادہ ہوتا ہے - نئے نظریات اور خیالات کو سمو لینے کی بڑی صلاحیت ہوتی ہے - تخیّل ایک ایسے مرحلے میں ہوتا ہے کہ اسے کسی بھی رنگ سے بھرا جا سکتا ہے - اس اعتبار سے ان ننھے ذہنوں کو جو دیا جائے وہ بالغوں کے ادب سے قطعی مُختلف ہو - لہذا بچّوں کے ادب کی تیاری اور پیش کش میں غایت درجہ احتیاط لازم ہے - ایک ترقّی یافت سماج اس سے غفلت برتنے کا تصوّر بھی نہیں کر سکتا "

( ص 49 کتاب ہذا )

یہ اقتباس" ودربھ میں ادب الاطفال کی روایت " سے لیا گیا ہے - اس سے اندازہ لگایا جا سکتا ہے کہ جاوید احمد موضوع کے ساتھ انصاف کس طرح کرتے ہیں اور ان کا طریقئہ کار کیا ہے - یہ اقتباس بطور مثال پیش کیا گیا ہے - مشمولات میں شامل ہر مضمون میں مصنّف نے حوالوں مثالوں کے ساتھ جو اپنے خیالات کا اظہار کیا ہے وہ ان کے مطالعہ ، تجربے اور مشاہدے کا نچوڑ ہے - بُنیادی طور پر سائنسی ذہن رکھنے والے جاوید احمد کا ادبی مضامین لکھنا فالِ نیک اس لیے بھی ہے کہ سائنسی اُصولوں کے تحت جس طرح موضوع کی تہہ تک پہنچا جا سکتا ہے اسی طرح جاوید احمد نے ادبی موضوعات میں تہہ تک پہنچ کر قارئین کے لیے زرّین خیالات کے موتی نکالنے کی سعئ کی ہے -

اجمالی جائزے میں مثالوں کی گنجائش کم ہوتی ہے ورنہ تہہ تک پہنچ کر موتی نکالنے کی کئی باتیں میرے ذہن میں ہیں قارئین غور کریں تو ان مضامین میں وہ ساری باتیں مُنکشف ہو جائیں گی یہ وہ باتیں ہوں گی جو ان موضوعات پر لکھے گئے مضامین میں کم ہی پائی جاتی ہیں - اہلِ نظر اس سے ضرور فیضیاب ہوں گے -

فہرستِ مضامین کے عنوانات یہاں پیش کیے جا رہے ہیں - یہ عنوانات ہی موضوعات ہیں اور موضوعات کی اپنی اہمیت ہے جو مصنّف کے قوّتِ اظہار سے روشن ہے -

حصّہ ( الف) ادبی و تنقید مضامین -
) 1) اُردو گیت - مُختصر جائزہ (2) اُردو ڈرامہ کے پسِ پردہ(3) اُردو اور جنگِ آزادی (4) مُختصر افسانہ - مُختصر تاریخ و تعریف (5) ودربھ میں ادب الاطفال کی روایت (6) ودربھ میں اُردو صحافت کے خد و خال (7) انیس کے مراثی میں نسوانی کردار -

حصّہ ( ب) گوشئہ صالحہ عابد حسین
) 8) یادگارِ حالی - صالحہ عابد حسین (9) صالحہ عابد حسین کی افسانہ نگاری (10) صالحہ عابد حسین کی ناول نویسی (11( بچّوں کی ادیبہ صالحہ عابد حسین -

حصّہ ( ج)
) 12) الفاظ کے افسوں ، جذبات کے جادو کا شاعر - راز (13( واحد علی بانگے کی غزل گوئی (14) شکیل شاہجہاں کی ڈرامہ نویسی - " کنویں کی چوری" کی روشنی میں (15) علی سردار جعفری اور ترقّی پسند تحریک (16) علی سردار جعفری اور مرثیہ نویسی (17) جدید ہندوستانی ادب کے معمار - قاضی نذر السلام -

اس کے علاوہ حصّہ ( د) انشائیے کے عنوانات ہیں - ہم نے بھی کُتّا پالا ، کچھ انتظار کے بارے میں ، ہیلمیٹ پر ہنگامہ ، تھیلی ، لوٹ پیچھے کی طرف - یہ انشائیے مصنّف کی شوخ مزاجی کی غمّازی کرتے ہیں اور صفتِ انشائیہ پر پورے اترتے ہیں - ہلکا پھلکا مزاح اور لطیف طنز مصنّف کے فنِ تحریر کو قاری پر روشن کرتا ہے - انشائیے کے موضوعات عصر کے سماج کی پرچھائیاں پیش کرتے ہیں - رواں زبان میں دلچسپ اظہار خوب تر ہے - کچھ اقتباسات مُلاحظہ فرمائیں -

" بھلے سماج کے دوسرے طبقے بجلی کی بے وفائی سے ناراض ہوں مگر ہمارے طلبہ کے حق میں تو یہ کسی نعمت سے کم ثابت نہیں ہوئی کہ چلو کسی بہانے تو اسٹڈی سے چھٹکارا ملا - نہ نو من تیل ہوگا، نہ رادھا ناچے گی"

( انشائیہ " لوٹ پیچھے کی طرف" ص 230 (

" دادی اور نانی اماں کی تھیلیوں کے تو کیا کہنے ! یہ تھیلیاں سکّے اور روپے رکھنے کے لیے کم سپاری ، لونگ ، الائچی اور بعض دفعہ کچھ جڑی بوٹیاں رکھنے کے زیادہ کام آتی ہیں - وہ موخر الذکر اشیاء کا استعمال موقعہ ملتے ہی کرنا چاہتی ہیں مگر آج کے زمانے میں ان پر یقین کون لاتا ہے ؟ آج تو انجکشن ، گولیوں ، کیپسول اور آپریشن پر ہمارا ایمان ہے اس لیے ان ضعیفوں کی جڑی بوٹیاں ، ویسے ہی دھری رہ جاتی ہیں "

( انشائیہ" تھیلی " ص 222 (

جاوید احمد انشائیہ نگاری میں بھی کامیاب نظر آتے ہیں ناچیز کا خیال ہے کہ انھیں اس دلچسپ صنف میں بھی لکھتے رہنا چاہئے اور ان کے انشائیوں کا انتخاب بھی کتابی صورت میں شایع ہونا چاہئے -

" ادبی شذرات " ادبی ذوق رکھنے والوں کے لیے " سوغات " ہے - اس کی حفاظت کے لیے قرطاس کے علاوہ برقی آلات کی مدد سے کمپیوٹر کے خزانے کا استعمال کرنا چاہئے تاکہ آنے والی نسلیں بھی مصنّف کی صلاحیتوں سے فائدہ اٹھا سکیں - آخر میں اپنی گفتگو میں فیروز حیدری کی اس رائے پر ختم کرتا ہوں -

" ناچیز کو ڈاکٹر جاوید صاحب کے تقریباً سبھی مضامین کو بغور پڑھنے کا موقع ملا ہے - موضوع کے ساتھ انصاف کرنا آسان کام نہیں مگر ڈاکٹر جاوید یہ کام بہتر ، عُمدہ اور اور آسانی سے کر لیتے ہیں"

قومی میزان کے تمام اراکین کا دل کی گہرائیوں سے بہت بہت شکریہ -" کلامِ فائق " ( فائق علی خاں فائق) مُرتبین : عبادت اللہ ا...
07/06/2026

قومی میزان کے تمام اراکین کا دل کی گہرائیوں سے بہت بہت شکریہ -

" کلامِ فائق " ( فائق علی خاں فائق)

مُرتبین : عبادت اللہ انصاری جاوید رانا
محمد الطاف انصاری ( اجمالی جائزہ )

اسلم چشتی پونے ( انڈیا)

" کلامِ فائق " 112 صفحات پر مشتمل ہے جو استادِ فن مجاز آشنا کی نگرانی میں 2022.ء کو برہانپور سے شایع ہوئی ہے ناشر ہیں ڈاکٹر شہزاد انجم برہانی اور مرتّب ہیں عبادت اللہ انصاری جاوید رانا اور محمد الطاف انصاری ان مخلصانِ ادب نے فائق مرحوم کی اندھیرے میں پڑی شاعری کو اجالے میں لانے کا بیڑہ اٹھایا ہے جو قابلِ تحسین ہے - ان حضرات کا خلوص ہے کہ انھوں نے ماضی قریب کے ایک ایسے شاعر کو موجودہ ادب پسند حلقوں سے روشناس کروایا ورنہ یہ خاندانی ادبی بیک گراؤنڈ رکھنے والا اعلیٰ تعلیم یافتہ شاعر گمنامی کی غار کی نذر ہو جاتا اور ادب کی وسع دنیا میں اس کا نام لیوا خاندان کے لوگوں کے سوا کوئی نہیں رہتا - اب ان شاء اللہ ایسا نہیں ہوگا - آگے اور بھی گفتگو ہوگی پہلے ایک اقتباس ملاحظہ فرمائیں -

" فائق صاحب 1921.ء میں پیدا ہوئے - والد محترم خان بہادر مشتاق علی خان صاحب نے فائق علی خان نام رکھا - فائق صاحب تعلیم و تربیت کی منزلوں سے گذرتے ہوئے 1947.ء میں سیول سروس سے اپنی ملازمت کی ابتداء کی اور ترقّی کرتے ہوئے- آئی اے ایس بنے - 1972.ء میں لکھنؤ یونیورسٹی سے فارسی میں ایم اے کیا - امتیازی نمبرات کی وجہ سے گولڈ میڈل سے بھی نوازے گئے - 1977.ء میں اس جہانِ فانی کو خیر باد کہہ گئے آپ کے دو نورِ نظر لائق علی خان اور تائق علی خان ہیں "

( ص 9 ، کتاب ہذا ،عبادت اللہ انصاری جاوید رانا برہانپور )

اس اقتباس سے فائق صاحب کی تعلیمی اور علمی زندگی کی جدوجہد اور تدریس کی لیاقت واضع ہو جاتی ہے مُرتب عبادت اللہ انصاری نے اسی مضمون میں شاعر کی ادبی خوبیوں پر بھی روشنی ڈالی ہے - وہ بھی ملاحظہ فرمائیں -

" فائق علی خان فائق کا اسلوب نگارش منفرد ہے - لفظوں کا انتخاب اور ان کی بندش انوکھی ہے - ثقیل لفظوں کے استعمال سے شعری خیالات و مضامین مبہم ہو جاتے ہیں مگر کبھی کبھی شعری اعتبار اور فارسی آمیز ترکیب لفظی سے شعر کے مفہوم و معانی کو وسعت دے کر دوبالا کر دیتا ہے - فائق صاحب نے اپنی شاعری میں قدیم شعری روایت کو بھرپور اور کامیاب طریقے سے نبھانے کی کوشش کی ہے - روایتی علامات، استعارات، تشبیہات و تراکیب کے استعمال سے ان کی شاعری میں قدیم رنگ ابھر کر سامنے آ جاتا ہے - مشکل زمینیں بنانا تنگ ردیف و قوافی کا استعمال کرنا اور بھاری بھر کم لفظوں کو شعری پیکر عطا کرنا فائق صاحب کی شاعری کا خاص حصّہ ہے - انھوں نے غزل اور نظم دونوں اصناف میں یکساں لہجہ استعمال کیا ہے - غزلوں کے مقابلے نظمیں زیادہ کامیاب انداز میں لکھی ہیں - کہیں کہیں نامانوس لفظوں کے استعمال نے شعر کو بوجھل ضرور بنا دیا ہے - جس سے معنی و مفاہیم کی شفّافیت پر دھند سی چھا جاتی ہے - تحریر سے اسی دھند کو صاف کرنے میں جو شاعر و ادیب کامیاب ہو جاتے ہیں - انہیں ادب عالیہ میں حیات ابدی کے ساتھ سر فہرست مقام بھی حاصل ہو جاتا ہے - فائق صاحب نے اس دھند کو صاف کرنے کی حتیٰ الامکان کوششیں کی ہیں "

( ص 10 ، کتاب ہذا، )

اسی طرح اس کتاب کے دوسرے مُرتب نے شاعر کی بھرپور حمایت سے کام لیا ہے - ان کے مضمون سے بھی ایک اقتباس ملاحظہ فرمائیں -

" فائق علی خان فائق بنیادی طور پر غزل کے شاعر ہیں - وہ نہ صرف غزل کی صالح اقدار کے امین کی حیثیت سے غزل کی بیش قیمت روایات کو آگے بڑھانے اور نئی نسل تک پہنچانے میں اپنی کوششوں کو بروئے کار لاتے ہیں - ان کی شاعری میں ثقیل و نامانوس لفظوں کا استعمال، فارسی آمیز تراکیب،. تشبیہات و استعارات اور داخلی و باطنی کیفیات کی جلوہ گری بھی ہے جو ان کی انفرادیت متعین کرنے میں معاون ثابت ہوتی ہے - درجِ ذیل غزل کے مطلع میں صنعتِ تلمیح کا استعمال کیا گیا ہے - جو اپنے آپ میں کئی معنی اور مفہوم رکھتی ہے - موصوف نے شورشِ معرکات کہہ کر اپنے جنوں کی خلش کا اظہار کیا ہے - اور کسی کے حسن کو غزنوی سے منسوب کرتے ہوئے اپنے خانہء دل کو سومنات بنایا ہے - اس غزل میں لفظوں کی ترتیب سے جو فضا قائم ہوتی ہے وہ ایمائیت کی خوبصورت مثال ہے - شورشِ معرکات، درد کش فغاں اور کلفت با مراد جیسی اضافت لفظی قدیم اور جدید شعری لہجے کا اچھوتا امتزاج ہے "

( ص 17-18 ، کتاب ہذا )

اس کے علاوہ ڈاکٹر شہزاد انجم برہانی کی فلیپ کی رائے بھی اہمیت کی حامل ہے - غرض کہ یہ آراء پڑھ کر قاری کو یہ معلوم ہو جاتا ہے کہ فائق صاحب کون تھے اور ان کا شعری فن کیا تھا اور اس کتاب کی شاعری سے ان کا کیا مقام ہے مَیں ناچیز کسی کے مقام کا کیا تعین کر سکتا ہوں مگر یہ کہنے کا حق ضرور رکھتا ہوں کہ فائق صاحب کا ذوقِ سُخن رائیگاں نہیں گیا کیونکہ انھوں نے اپنے سُخن میں کلاسیکی ادب کی بھی پاسداری کی ہے اور زبان و فن کا بھی لحاظ رکھا ہے! ان کی غزلیہ شاعری سے چند اشعار جو مجھے اچھّے لگے پیشِ خدمت ہیں -

تسلّی پھر تسلّی ہے، تشفّی پھر تشفّی ہے
بھلا اب کیا کریں گے آپ، ہم پر مہرباں ہو کر

جہاں سے عشق کا افسانہء طلب ٹوٹا
وہیں سے حُسن کو پایا ہے مدعی مَیں نے

مُجھے ڈبونے کی کوشش نہ کر سفینے میں
مَیں خوف کھا کے کہیں، نا خدا نہ ہو جاؤں

حُسنِ بے پروا کے ناموس کا رکھتے ہیں خیال
ہم دیوانوں میں وہ عالی نسب ہوتے ہیں

شام جن پھولوں کو ہنستا ہُوا چھوڑا تھا انہیں
اوس نے ایسا رُلایا ہے کہ جی جانے ہے

سہم سہم کے نگاہوں سے عرضِ حال کیا
جو بات ہم نے کہی وہ بھی ان کہی کی طرح

جب ہنسے، دنیا ہنسی، روئے تو تنہا رو دیئے
واہ وا کے لاکھ بھائی ، آہ اکلوتی رہی

اشکوں کی راہ میں پڑی بادِ سموم آہ
اس کارواں کے ساتھ بھی قزّاق ہو لیے

چھوڑی نہیں ہے یاروں نے طرزِ ستم کوئی
کس منھ سے ہم شکایت جورِ عدو کریں

طغیانیوں میں دیکھے تھے جن ساحلوں کے خواب
دریا کی تہہ میں وہ بھی کنارے اُتر گئے

مجھ کو تنہائی کی راتوں میں سہارا دینے
چشمِ پُرنم میں یہی تارے اُتر آتے ہیں

" کلامِ فائق " کے آخر میں کچھ پابند نظمیں بھی شایع کی گئی ہیں - یہ نظمیں ان کی غزلیہ شاعری کی لفظیات ، آہنگ اور لہجے سے الگ ہیں - ان کی فضا بندی اور اظہار کا طریق ترقّی پسند شعراء سے بڑی حد تک قریب نظر آتا ہے لیکن موضوعات ان کے اپنی پسند کے ہیں جنہیں انھوں نے خوبصورتی سے برتا ہے - نظموں کی تعداد بہت ہی کم ہے کچھ زیادہ ہوتیں تو فائق کی نظم گوئی کھُل کر سامنے آتی اور قاری، ناقد یا مبصر کو منصفانہ طریقے سے رائے دینے میں آسانی ہوتی - ان ہی نظموں کے چند بند ملاحظہ فرمائیں -

اداس رُخصتِ سرما کی شام میں اشجار
کھڑے ہیں یوں کوئی رہ گیر جیسے لٹ جائے
بکھر رہے ہیں سرِ شاخ برگ دست بسر
وداعی ہاتھوں سے رومال جیسے چھٹ جائے

( نظم موسم سرما کی آخری شام، ص 93 )

تیری دنیا میں شب و روز مہکتے ہیں گلاب
تیری دنیا میں حسیں بوسوں سے ڈھلتی ہے شراب
تیری دنیا میں ہے بدمست جوانی پہ شباب
تیری دنیا سے دبے پاؤں چلا جاؤں گا مَیں

( نظم دبے پاؤں ، ص 99 )

دن تو دنیا کے بکھیڑوں میں گذر جاتے ہیں
اِن سے اُن سے یونہی باتوں میں بِسر جاتے ہیں
شام جھکتے ہی دبے زخم اُبھر آتے ہیں
جھلملا اٹھتی ہیں داغوں کی قطاریں ماہم

( نظم ماہم ، ص 105 )

شکوہ آنکھوں سے کرو اور نہ گلہ ہونٹوں سے
مَیں اب آ ہی گیا ، اے جانِ جہاں کوسوں سے
آؤ کچھ بھی نہ حدیثِ نگہہ و حرف سنیں
بند کر لیں بہم آنکھیں تو دہن بوسوں سے

( نظم :نذرِ ماہم ، ص 112 )

مجموعی طور پر کتاب بھی پسند آئی اور کلام بھی - مُرتبین کو مبارکباد دیتے ہوئے یہ کہنے کو جی چاہتا ہے کہ ماضی قریب اور ماضی بعید کے اور بھی گمنام شاعروں کو سامنے لائیں تاکہ تحقیق کا حق بھی ادا ہو جائے اور ان کے نام شعری تاریخ کا حصّہ بن جائیں - آخر میں مُرتب محمد الطاف انصاری کی چند سطروں پر مَیں اپنی گفتگو ختم کرتا ہوں کہ مَیں ان کے لفظ لفظ سے متفق بھی ہوں اور مطمئن بھی - ملاحظہ فرمائیں -

" فائق علی خاں فائق کا ادبی شعور پختہ و بالیدہ ہے - وہ اپنے کلام کے آئینے میں خالص روایتی رنگ کے قائل نظر آتے ہیں - تاہم ان کی غزلوں میں کہیں کہیں بدلتی قدروں اور عصری حقیقتوں کا پاس و لحاظ بھی پایا جاتا ہے - ان کے کلام میں کلاسیکیت اور جدیدیت کے امتزاج سے ایک نئی معنویت اور جامعیت پیدا ہو گئی ہے - یقین ہے کلامِ فائق کی خوب خوب پذیرائی ہوگی - اور قارئین اسے پڑھ کر خراجِ عقیدت پیش کریں گے "

( ص 20 ، محمد الطاف انصاری، کتاب ہذا )

قومی میزان کے تمام اراکین کا دل کی گہرائیوں سے بہت بہت شکریہ -
23/05/2026

قومی میزان کے تمام اراکین کا دل کی گہرائیوں سے بہت بہت شکریہ -

اے سی ایف سی کی ایک خوبصورت شام سنجے مصرا شوق کے نام پونے کی مشہور اَدَبی تنظیم اے سی ایف سی (اسلم چشتی فرینڈ سرکل پونے)...
21/05/2026

اے سی ایف سی کی ایک خوبصورت شام سنجے مصرا شوق کے نام

پونے کی مشہور اَدَبی تنظیم اے سی ایف سی (اسلم چشتی فرینڈ سرکل پونے) نے اَدَبی روایت کو آگے بڑھاتے ہوئے گزشتہ شب 14 مئی 2026. ء بروز جمرات (Yknot - your content space) وائی ناٹ یور کنٹینٹ اِسپیس - این آئی بی ایم روڈ پونے میں عصرِ حاضر کے ممتاز شاعِر و ادیب سنجے مصرا شوق کے اعزاز میں ایک با وَقَار مُشاعرے کا اہتمام کیا ساتھ ہی ساتھ (ACFC) یوٹیوب چینل بھی لانچ کیا گیا جس میں پونہ شہر کے ممتاز اہلِ قلم، دانشور،شعراء اور اَدَب نواز سامعین نے بڑی تعداد میں شرکت کی یہ تقریب نہ صرف ایک مشاعرے کی حیثیت رکھتی تھی بلکہ اُردو ادب کی ترویج و اشاعت کے لیے ایک اہم اَدَبی اجتماع ثابت ہوئی - اس مشاعرے کی صدارت مشہور سماجی کارکن اقبال انصاری نے فرمائی، جبکہ نظامت کے فرائض عامر مسعود بہرائچی نے نہایت سلیقے اور روانی کے ساتھ انجام دیے -اس مشاعرے میں شرکت کرنے والے شعرائے کرام کے اسمائے گرامی ہیں سنجے مصرا شوق ، ساگر ترپاٹھی ، مولانا شبیہ احسن کاظمی ،حسام الدین شعلہ، اسلم چشتی ، ڈاکٹر ذاکر خان ذاکر، ضیاء باغپتی ،عامر مسعود بہرائچی، خوشبو رامپوری ، ڈاکٹر شیلجا دوبے ، پوجا کرشنا ، شِروتی بھٹاچاریہ ،کوثر جہاں کوثر ،ڈاکٹر طوبیٰ چودھری ،شوبھا لِنڈے اور عبداللہ انصاری - اس تقریب کے چیف گیسٹ جاوید انصاری (مالیگاؤں) تھے جب کہ اسپیشل گیسٹ سنجے مصرا شوق( لکھنؤ) تھے - مہمانان اور شعرائے کرام کا استقبال پھولوں اور شال سے کیا گیا اس کے بعد سنجے مصرا شوق کی اَدَبی خدمات، ان کے منفرد شعری اُسلوب اور اُردو ادب کے لیے ان کی گراں قدر کوششوں پر روشنی ڈالی گئی - اس مشاعرے کی خاص بات یہ تھی پونہ کے معتبر شعراء کے ساتھ ساتھ نوجوان شعراء بھی شریک ہوئے ہر شاعر نے اپنے کلام کے ذریعے سامعین کو متاثر کیا - مگر سنجے مصرا شوق کا کلام سننے کے لیے خصوصی جوش و خروش پایا گیا - سامعین نہایت باوقار سنجیدہ اور ادب فہم تھے جنہوں نے ہر عمدہ شعر پر بھرپور داد دے کر محفل کو زندہ و تابندہ رکھا اس طرح پوری فضاء شعری لطافت، فکری گہرائی اور تہذیبی شائستگی سے معمور نظر آئی - چیف گیسٹ جاوید انصاری ( مالیگاؤں) نے اپنے خطاب میں کہا سنجے مصرا شوق عہدِ حاضر کے ان اہم ادبی ناموں میں شامل ہیں جنہوں نے اپنی تخلیقات کے ذریعے اُردو شاعری کو نئی جہت عطا کی انہوں نے اس امر پر بھی زور دیا کہ اُردو زبان و اَدَب کی ترقّی کے لیے اس نوعیت کی محفلیں بے حد ضروری ہیں - اسپیشل گیسٹ سنجے مصرا شوق ( لکھنؤ) نے اپنے خطاب میں اے سی ایف سی کی ادبی روایت کو اُردو تہذیب کا قیمتی سرمایہ قرار دیتے ہوئے کہا کہ مَیں اس اعزاز کے لیے ممنون و مشکور ہوں - صدرِ مُشاعرہ اقبال انصاری نے اپنے خطاب میں کہا اَدَب انسانی معاشرے کی فکری و اخلاقی تربیت کا سب سے مؤثر ذریعہ ہے انہوں نے نوجوان نسل کو اُردو زبان سے وابستہ رہنے اور مطالعے کی عادت اپنانے کی تلقین کی ان کا خطاب علمی نکات، ادبی مثالوں اور فکری بصیرت سے بھرپور تھا جسے حاضرین نے بے حد پسند کیا - اور جب ناظم مشاعرہ نے آخر میں اس عہد کے اہم شاعر سنجے مصرا شوق کو کلام سنانے کی دعوت دی تالیوں کی گونج میں وہ مائک پر آئے اور اپنا کلام سنایا اور سامعین سے خوب خوب داد حاصل کی - مشاعرے کے اختتام پر اسلم چشتی نے تمام مہمانانِ ذی وقار اطہر قریشی، وقار احمد شیخ، اے آر ڈی خطیب، مسرور تمنّا ، شعرائے کرام، اور با ذوق سامعین کا شکریہ ادا کیا انہوں نے اس کامیاب مشاعرے کے انعقاد میں تعاون کرنے والے تمام افراد کی خدمات کو سراہا دعاؤں کے ساتھ یہ یادگار کامیاب مشاعرہ رات ساڑھے گیارہ بجے (11:30) اختتام کو پہنچا مگر حاضرین کے دلوں میں اس مشاعرے میں پڑھے گئے اشعار کی خوشبو دیر تک باقی رہے گی -

( اے سی ایف سی پریس ریلیز)

اے سی ایف سی (اسلم چشتی فرینڈ سرکل پونے) کی ایک شام انتظار حُسین اور ندا فاضلی کے نام عالمی مشاعرہ 2017 ایوان غالب دہلی ...
21/05/2026

اے سی ایف سی (اسلم چشتی فرینڈ سرکل پونے) کی ایک شام انتظار حُسین اور ندا فاضلی کے نام عالمی مشاعرہ 2017 ایوان غالب دہلی -
ए सी एफ़ सी(असलम चिश्ती फ्रेंड सर्कल पूने) की एक शाम इंतज़ार हुसैन और निदा फ़ाज़ली के नाम आलमी मुशायरा एवान - ए -ग़ालिब दिल्ली
2017

मुलाहिज़ा फ़रमायें मरहूम ताहिर फ़राज़ को

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18/05/2026

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تین نسلوں، تین رجحانات کو متاثر کرنے والا شاعر - - - - - - - - - جاں نثار اختر (مجموعہء کلام پچھلے پہر کےحوالے سے) اسلم ...
18/05/2026

تین نسلوں، تین رجحانات کو متاثر کرنے والا شاعر - - - - - - - - - جاں نثار اختر
(مجموعہء کلام پچھلے پہر کےحوالے سے)

اسلم چشتی پونے (انڈیا)

جاں نثار اختر دورِ حاضر کے ممتاز شاعر مانے جاتے ہیں - ان کی پہچان کئی حوالوں سے ہے - اُستادِ سُخن مستند کلاسیکل شاعر مضطر خیر آبادی کے صاحبزادے، ترقّی پسند مشہور شاعر مجاز لکھنوی کے دوست اور بہنوئی جاوید اختر اور سلمان اختر کے والد، ترقّی پسند شعراء میں پہلی صف کے شاعر، فلمی گیت کار اور ایک اُردو معلّم - ممبئی آنے سے پہلے بحیثیت شاعر ان کی شہرت ہو گئی تھی - ان کی نظموں کی گونج علی گڑھ کے علاوہ بھوپال ، گوالیار اور اردگرد کے شہروں کی سرحدیں پھلانگ کر ملک عزیز کے ہر علاقے میں پھیل گئی ممبئی آنے کے بعد تو اس شہرت میں جیسے چار چاند لگ گئے - ان کے فلمی گانے بھی عوام میں مقبول ہوئے، مشاعروں میں بھی سامعین انہیں پسند کرنے لگے - اتنی ہنگامہ خیز زندگی کے باوجود جاں نثار اختر کی ادبی سرگرمیاں جاری رہیں - ایک خاص بات یہ کہ ممبئی آنے کے بعد انھوں نے صنفِ غزل پر توجہ دی اور غزل کی روایت کو قائم رکھتے ہوئے زبان بیان اور مواد میں اپنے طور پر اضافے کیے اور ترقّی پسندی کے مضامین کو بھی اپنی نئی غزل میں نظر انداز نہیں کیا بلکہ غزل کی اشارتی زبان میں نئی معنویت کے ساتھ پیش کیا - جدیدیت کے رجحان کی انھوں نے مخالفت نہیں کی یہ اور کہ کچھ باتوں کو خاموشی سے در کیا اور کچھ باتوں کو چپکے سے قبول کر کے اپنے اشعار میں جگہ دی - اس طرح جاں نثار اختر نے مختلف اُردو کے مختلف ادبی رجحانات کے سامعین اور قارئین کو متاثر کیا - گویا انھوں نے غزل کو تازہ دم کر کے توانائی بخشی - ان کی شعری خدمات کا اعتراف صرف قارئین اور سامعین نے ہی نہیں تینوں رجحانات کے ناقدین نے بھی کیا - اسی کتاب سے ایک اقتباس ملاحظہ فرمائیں -

" جاں نثار اختر میرے نہایت عزیز دوست رہے ہیں - ان کی بیوی مرحومہ صفیہ بھی مُجھے بہت عزیز تھیں - ان کی یاد میں انھوں نے جو نظمیں لکھی ہیں وہ فکر و فن کے ایسے مرقعے ہیں جن کی رعنائی اور لالہ کاری کبھی مانند نہیں ہو سکتی - ان کے یہاں ایک شاعرانہ مزاج اور قلندرانہ انداز ہے جو ان کی شخصیت کے کھرے پن کو ظاہر کرتا ہے - انھوں نے کالج میں اُردو کی تعلیم بھی دی ہے، فلمیں بھی بنائی ہیں ، ہر طرف لپکے ہیں اور ہر شعلے کی طرف ہاتھ بڑھایا ہے ، اس کے ساتھ ہاتھ
اور دامن جلائے بھی ہیں - ہر ہوا کی موج ، ہر روشنی کی کرن ، ہر خوشبو کے جھونکے کے لیے دیدہء و دل کھُلے رکھے ہیں مگر انھوں نے اپنے آپ کو کبھی کسی چوکھٹے میں اسیر نہیں کیا - ان کی نگاہ منزل پر ضرور رہی ہے مگر اس کے لیے راستہ انھوں نے خود بنایا ہے - انھوں نے کبھی کبھار نعرے بھی لگائے ہیں - مگر ان کی شاعری نعروں کی شاعری نہیں ہے - ان کے دل کی آواز ہے - آپ ان سے اختلاف کر سکتے ہیں لیکن ان سے متاثر ہوئے بغیر نہیں رہ سکتے "

( کتاب ہذا ، ص 6 ، آل احمد سرور )

آل احمد سرور کا اُردو ادب میں جو کام ہے اس سے اہلِ ادب خوب واقف ہیں ان کے یہ الفاظ قابلِ قدر اور قابلِ قبول ہیں - اقتباس کا آخری جملہ دیکھئے کہ ان کی شاعری نعروں کی شاعری نہیں ہے - ان کے دل کی آواز ہے - آپ ان سے اختلاف کر سکتے ہیں لیکن ان سے متاثر ہوئے بغیر نہیں رہ سکتے - بطور مثال کچھ اشعار ملاحظہ فرمائیں -

ہم سے پوچھو کہ غزل کیا ہے، غزل کا فن کیا
چند لفظوں میں کوئی آگ چھپا دی جائے

ہماری قدر کرو اے سُخن کے متوالو
غزل کو کل نہ ملیں گے مزاج داں ہم سے

پتا نہیں کہ مرے بعد ان پہ کیا گزری
مَیں چند خواب زمانے میں چھوڑ آیا تھا

لکھنؤ! کیا تری گلیوں کا مقدّر تھا یہی
ہر گلی آج تری خاک بسر لگتی ہے

اور کیا اس سے زیادہ کوئی نرمی برتوں
دل کے زخموں کو چھُوا ہے ترے گالوں کی طرح

سستے داموں لے تو آتے لیکن دل تھا بھر آیا
جانے کس کا نام کھُدا تھا پیتل کے گلدانوں پر

یہ علم کا سودا، یہ رسالے، یہ کتابیں
اک شخص کی یادوں کو بھلانے کے لیے ہیں

دِلّی! کہاں گئیں ترے کوچوں کی رونقیں
گلیوں سے سر جھکا کے گذرنے لگا ہوں مَیں

کھو گیا آج کہاں رزق کا دینے والا
کوئی روٹی جو کھڑا مانگ رہا ہے مجھ سے

ایک اور اقتباس ملاحظہ فرمائیں -

" حالی و اقبال نے غزل کو حدیث دلبراں سے صحیفہء کائنات بنایا - غزل کی بساط بہت چھوٹی ہے مگر اس کی لطیف چاندنی میں معنی خیز اشاروں کی ایک کائنات آباد کی جا سکتی ہے - حسرت، فانی، اصغر، جگر اور یگانہ سب نے غزل کو اپنے خونِ جگر کی دولت دی اور اِدھر دس پندرہ سال سے جو غزل لکھی جا رہی ہے اس سے یہ بات بالکل واضح ہو جاتی ہے کہ گو غزل ساری شاعری نہیں ہے اور نہ ہمیں اسے اُردو شاعری کی آبرو کہتے رہنا چاہیے مگر یہ ہر دور کے سوز و ساز کو اپنے نشتروں کے ذریعے سے ظاہر کر سکتی ہے اور ہر سمندر اُس کا تلاطم اِس کوزے میں آ سکتا ہے "

جاں نثار کا ایک مطع دیکھئے

انقلابوں کی گھڑی ہے
ہر" نہیں "ہاں سے بڑی ہے

( ص 6-7 کتاب ہذا ، آل احمد سرور )

کتاب" پچھلے پہر " کی اشاعت 2011.ء میں عمل میں آئی مکتبہ جامعہ لمیٹڈ نئی دہلی نے اسے قومی کونسل برائے فروغ اُردو زبان نئی دہلی کے اشتراک سے 95 صفحات کی یہ کتاب شایع کی ہے - اس میں غزلیں ہی غزلیں ہیں، اس کتاب میں آل احمد سرور کے مضمون کے علاوہ ایک اور مستند نام محمد حسن کا بھی مضمون شامل ہے - محمد حسن نے جاں نثار اختر کی غزل کی خصوصیات کو بڑی خوبی سے سمجھایا ہے - کتاب پڑھنے سے پہلے قاری اگر یہ مضمون پڑھ لے تو
جاں نثار اختر کی غزل کا ہر زاویہ قاری کے ذہن میں پوری طرح روشن ہو جائے گا - اس مضمون سے اس کی معنویت کے لیے صرف ایک اقتباس کافی ہے ملاحظہ فرمائیں -

" جاں نثار اختر کی شاعری صرف نئے زاویوں سے عبارت ہے نہ محض نئے پیرایہء بیان سے - اس کے پیچھے ایک نئی فضا جگمگاتی ہے، یہاں دہلیز کی متلاشی لاشیں بھی ہیں، زندگی کی کڑی دھوپ میں تیز قدموں سے چلنے والے راہی بھی ، ہاتھوں پر چھالوں کی طرح چمکتے ہوئے سکّے بھی ، رات گئے دل کی اُبھرتی ہوئی چوٹیں بھی ہیں ، اخبار کے دفتر کی خبریں بھی ، شانے پر ہاتھ رکھ کر ساڑیوں کی دکانوں پر روکنے والی محبوبائیں بھی ، غرض ایک عجیب و غریب دنیا ہے جس میں آوازیں، چیخیں، سرگوشیاں، اور ارمانوں کے نہ جانے کتنے روپ نگر آباد ہیں - یہ دنیا غزل کے دوسرے مشاہیر کی دنیا سے الگ تھلگ اور انوکھی ہے - اور اس دنیا کی تعمیر سے اُردو غزل کو نئی امیجری نئی لفظیات بھی ارزانی ہوئی ہیں نئی بحریں بھی ملی ہیں نئی تشبیہیں اور استعارے بھی "

(ص 14 ، کتاب ہذا ،محمد حسن)

اب مَیں یہاں اپنی پسند کے اشعار پیش کرنا چاہوں گا جو مُجھے بے حد پسند ہیں مُجھے اُمیّد ہے آپ کو بھی پسند آئیں گے - ملاحظہ فرمائیں -

دنیائے سیاست ہو کہ دنیائے ادب ہو
دیوانے تو ہر حال میں نایاب رہے ہیں

نئی تہذیب کیسے لکھنؤ کو راس آئے گی
اُجڑ جائے گا یہ شہرِ غزالاں ہم نہ کہتے تھے

اوڑھے ہوئے تاروں کی چمکتی ہوئی چادر
ندّی کوئی بَل کھائے تو لگتا ہے کہ تم ہو

ہم عشق کر کے مفت میں بدنام ہو گئے
ورنہ شمار اپنا بھی تھا دیوتاؤں میں

ہم سے اس درجہ تغافل بھی نہ برتو صاحب
ہم بھی کچھ اپنی دعاؤں میں اثر رکھتے ہیں

عمر بھر قتل ہُوا ہوں مَیں تمہاری خاطر
آخری وقت تو سولی نہ چڑھاؤ یارو

یہ دوستی ، یہ مراسم ، یہ چاہتیں یہ خلوص
کبھی کبھی مُجھے سب کچھ عجیب لگتا ہے

ایک اور نقّادِ فن خواجہ احمد فاروقی کا بھی ایک مضمون اسی کتاب میں ہے جس کی شروعات میں ہی جاں نثار اختر کا اختصار میں ادبی تعارف اہمیت رکھتا ہے - ملاحظہ فرمائیں -

" جاں نثار اختر سے میرے 32 برس کے مراسم ہیں - مَیں نے ان کو گوالیار میں دیکھا ہے جب وہ وکٹوریہ کالج میں اُردو کے لکچرار تھےاور" گرلز کالج کی لاری "
" بگولے " اور" کون سا گیت سنوگی انجم " کی وجہ سے مشہور تھے - مَیں نے ان کو بمبئی میں بھی دیکھا ہے جب امن نامہ، خاکِ دل، خاموش آواز اور آخری ملاقات کی بدولت ان کی شہرت بوئے گُل کی طرح عام ہو چکی تھی - اور کوئی پڑھا لکھا گھرانا ایسا نہیں تھا جہاں ان کی ان خوبصورت نظموں یا صفیہ کے خوں چکاں خطوں کا بار بار ذکر نہ ہوتا ہو - مَیں نے ان کو " گھر آنگن " کے اُس شاعر کے روپ میں بھی دیکھا جس کی بدولت انھوں نے اُردو شاعری کی تخلیقی رَو کو موڑ دیا اور اس میں ہندی کی سپردگی، نرمی اور شیرنی بھر دی اور آخر میں ان کو غزل گو کی حیثیت سے دیکھا جہاں انھوں نے غزل ہی کو نیا رنگ و آہنگ نہیں بخشا بلکہ اپنی شہرت کو بھی نئی عظمتوں سے روشناس کیا - اس ربع صدی میں بہت سے شاعر ابھرے اور ختم ہو گئے - بہت سے شاعر کچھ دیر کے لیے چمکے اور غائب ہو گئے لیکن جاں نثار اختر کی شاعری کا گراف برابر مائل بہ ترقی رہا "

( ص 16 ، کتاب ہذا ، خواجہ احمد فاروقی)

مجموعی طور پر" پچھلے پہر " کی منتخب غزلیں جاں نثار اختر کی بہترین غزلیں ہیں یہ اُردو کے شعری ادب کا ایک ایسا سرمایہ ہے جسے دل کھول کر خرچ کرتے رہیئے آپ کے ذہن کے خزانے میں کبھی بھی کوئی کمی واقع نہیں ہوگی، یہ جاں نثار اختر کے فن کی جادوگری ہے جو بڑی مشکل سے ان کے بس میں آئی اور وہ ہم اُردو والوں کے حوالے کر کے اس فانی دنیا سے رخصت ہو گئے اور بتا گئے دنیا کو غزل کا فن کیا ہے -

ہم سے پوچھو کہ غزل کیا ہے، غزل کا فن کیا
چند لفظوں میں کوئی آگ چھپا دی جائے

(جاں نثار اختر )

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