Uttarakhand Popular Trend

Uttarakhand Popular Trend लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला देखी जा सकती है http://www.webgatewayindia.com/

उत्तराखंड का कई दानवीरू की असली हकीकत। अगर आप उत्तराखंडी है तो इस वीडियो को एक बार जरूर देखें॥ https://youtu.be/K6LaOew4...
08/02/2026

उत्तराखंड का कई दानवीरू की असली हकीकत। अगर आप उत्तराखंडी है तो इस वीडियो को एक बार जरूर देखें॥ https://youtu.be/K6LaOew4ogQ अगर वीडियो अच्छा लगे तो इस वीडियो को शेयर जरूर करें जी ॥

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आज के उत्तराखंड कि हकीकत॥अगर आप उत्तराखंडी है तो इस वीडियो को एक बार जरूर देखें॥ https://youtu.be/wAUoSzyXONo इस वीडियो ...
25/12/2025

आज के उत्तराखंड कि हकीकत॥अगर आप उत्तराखंडी है तो इस वीडियो को एक बार जरूर देखें॥ https://youtu.be/wAUoSzyXONo इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करके हमारे उत्तराखंड के भोले भाले लोगों को सचेत जरूर करें जी ॥

#मनखियों कि #डैर अब गौं का #दाना #स्याँ...

19/11/2025

उत्तराखंड का सबसी जनप्रिय कलाकार सुमन गौड़ और भगवान चंद जी का मशहूर गढ़वाली चुटकुला॥

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01/10/2025

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Uttarakhand Popular Trend  #नये  #प्रधान ,  #जिला_पंचायत  #क्षेत्र  #पंचायत सदस्य ध्यान दे....
05/08/2025

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उत्तराखंड का चुनावी घपरोल॥
26/07/2025

उत्तराखंड का चुनावी घपरोल॥

08/07/2025

गौं मा चुनौ का मजा॥मजेदार गढ़वाली कॉमेडी॥

01/05/2025

उत्तराखंडी जनप्रिय कलाकार सुमन गौड़ जी और भगवान चंद जी का मशहूर लोकप्रिय हास्य व्यंग॥

22/01/2025

छोटी सी बात कु बडू मतलब ॥उत्तराखंड का जनप्रिय कलाकार सुमन गौड़ जी अर भगवान चंद जी का दगड

गढ़वाली शुभ प्रभात |            )गढ़वाली सुविचार |कुमाउनी सुविचार | शुभप्रभात गढ़वाली वाले स्टेटस |best gadwali Quotes, ...
21/01/2025

गढ़वाली शुभ प्रभात | )गढ़वाली सुविचार |कुमाउनी सुविचार | शुभप्रभात गढ़वाली वाले स्टेटस |best gadwali Quotes, garhwaliStatus, garhwali Thoughts |

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About the uttarakhand lok kalaye...

लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण (अल्पना) बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है। चावल को भिगोकर उसे पीसा जाता है। उसके लेप से आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं। विभिन्न अवसरों पर नामकरण चौकी, सूर्य चौकी, स्नान चौकी, जन्मदिन चौकी, यज्ञोपवीत चौकी, विवाह चौकी, धूमिलअर्ध्य चौकी, वर चौकी, आचार्य चौकी, अष्टदल कमल, स्वास्तिक पीठ, विष्णु पीठ, शिव पीठ, शिव शक्ति पीठ, सरस्वती पीठ आदि परम्परागत गाँव की महिलाएँ स्वयं बनाती है। इनका कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। हरेले आदि पर्वों पर मिट्टी के डिकारे बनाए जाते है। ये डिकारे भगवान के प्रतीक माने जाते है। इनकी पूजा की जाती है। कुछ लोग मिट्टी की अच्छी-अच्छी मूर्तियाँ (डिकारे) बना लेते हैं। यहाँ के घरों को बनाते समय भी लोक कला प्रदर्षित होती है। पुराने समय के घरों के दरवाजों व खिड़कियों को लकड़ी की सजावट के साथ बनाया जाता रहा है। दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्र नक्काशी करके बनाए जाते है। पुराने समय के बने घरों की छत पर चिड़ियों के घोंसलें बनाने के लिए भी स्थान छोड़ा जाता था। नक्काशी व चित्रकारी पारम्परिक रूप से आज भी होती है। इसमें समय काफी लगता है। वैश्वीकरण के दौर में आधुनिकता ने पुरानी कला को अलविदा कहना प्रारम्भ कर दिया। अल्मोड़ा सहित कई स्थानों में आज भी काष्ठ कला देखने को मिलती है। उत्तराखण्ड के प्राचीन मन्दिरों, नौलों में पत्थरों को तराश कर (काटकर) विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र बनाए गए है। प्राचीन गुफाओं तथा उड्यारों में भी शैल चित्र देखने को मिलते हैं।

उत्तराखण्ड की लोक धुनें भी अन्य प्रदेशों से भिन्न है। यहाँ के बाद्य यन्त्रों में नगाड़ा, ढोल, दमुआ, रणसिंग, भेरी, हुड़का, बीन, डौंरा, कुरूली, अलगाजा प्रमुख है। यहाँ के लोक गीतों में न्योली, जोड़, झोड़ा, छपेली, बैर व फाग प्रमुख होते हैं। इन गीतों की रचना आम जनता द्वारा की जाती है। इसलिए इनका कोई एक लेखक नहीं होता है।

यहां प्रचलित लोक कथाएँ भी स्थानीय परिवेश पर आधारित है। लोक कथाओं में लोक विश्वासों का चित्रण, लोक जीवन के दुःख दर्द का समावेश होता है। भारतीय साहित्य में लोक साहित्य सर्वमान्य है। लोक साहित्य मौखिक साहित्य होता है। इस प्रकार का मौखिक साहित्य उत्तराखण्ड में लोक गाथा के रूप में काफी है। प्राचीन समय में मनोरंजन के साधन नहीं थे। लाकगायक रात भर ग्रामवासियों को लोक गाथाएं सुनाते थे। इसमें मालसाई, रमैल, जागर आदि प्रचलित है। अभी गांवों में रात्रि में लगने वाले जागर में लोक गाथाएं सुनने को मिलती है। यहां के लोक साहित्य में लोकोक्तियां, मुहावरे तथा पहेलियां (आंण) आज भी प्रचलन में है। उत्तराखण्ड का छोलिया नृत्य काफी प्रसिद्ध है। इस नृत्य में नृतक लबी-लम्बी तलवारें व गेंडे की खाल से बनी ढाल लिए युद्ध करते है। यह युद्ध नगाड़े की चोट व रणसिंह के साथ होता है। इससे लगता है यह राजाओं के ऐतिहासिक युद्ध का प्रतीक है। कुछ क्षेत्रों में छोलिया नृत्य ढोल के साथ श्रृंगारिक रूप से होता है। छोलिया नृत्य में पुरूष भागीदारी होती है। कुमाऊँ तथा गढ़वाल में झुमैला तथा झोड़ा नृत्य होता है। झौड़ा नृत्य में महिलाएँ व पुरूष बहुत बड़े समूह में गोल घेरे में हाथ पकड़कर गाते हुए नृत्य करते है। विभिन्न अंचलों में झोड़ें में लय व ताल में अन्तर देखने को मिलता है। नृत्यों में सर्प नृत्य, पाण्डव नृत्य, जौनसारी, चांचरी भी प्रमुख है।