21/09/2026
हिन्दी और हिन्दी रंगमंच के अभिनेता
साभार: Parvez Akhtar साहब के फेसबुक वॉल से
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आज हम अनुस्वार की चर्चा करते हैं और अनुनासिक ध्वनियों के बारे में बात करते हैं।
युवा-अभिनेता मित्रो,
स्वर-वर्णमाला में 'अं' को अनुस्वार कहते हैं। जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास को सप्रयास, किन्तु सहज रूप से नाक से निकाला जाता है, यथा - ङ, ञ, ण, न, म; उन्हें नासिक्य या अनुनासिक व्यंजन कहा जाता है। लिखने में प्रायः ङ, ञ, ण, न, म के नासिक्य ध्वनियों के लिए 'अं' यानि अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है, जिसका चिह्न – शिरोरेख के ऊपर एक बिन्दी (ॱ) है। बोलने के अभ्यास और अनुभव के आधार पर अभिनेता इन अनुनासिक ध्वनियों का उच्चारण करते हैं; जैसे - गंगा (गङ्गा : ग + ङ् + गा), व्यंजन (व्यञ्जन : व् + य + ञ् + ज + न), कंठ (कण्ठ : क + ण् + ठ), परंपरा (परम्परा : प + र + म् + प + रा), संबंध (सम्बन्ध : स + म् + ब + न् + ध) ।
अब समस्या कहाँ आती है ? जब हम हर नासिक्य ध्वनि को अनुस्वार (ॱ) के ज़रिए लिखते हैं; अब लिखते हैं, तो बोलने में कई बार द्विविधा होती है। 'गंगा' - गम्गा है या गन्गा या गङ्गा ? 'परंपरा' - परन्परा या परम्परा। इसी तरह संबंध - सन्बन्ध होगा या सम्बम्ध अथवा सम्बन्ध होगा। ऐसी कई अनुनासिक ध्वनियाँ हैं, जिनके उच्चारण में अहिन्दी भाषी को ही दिक़्क़त नहीं होती, जो हिन्दी सीख रहा होता है; बल्कि हिन्दी अभिनेता की भी प्रायः इस सम्बन्ध में स्पष्ट अवधारणा नहीं होती है। वे मात्र अपने अनुभव के आधार पर इसे उच्चारित करते हैं। उर्दू (नस्तालिक) और रोमन आदि लिपियों में यह अस्पष्टता होती है, पाठकर्ता अपने रियाज़ और अनुभव से यह तय करता है कि अमुक शब्द 'ख़ुदा' (خدا) है अथवा 'ख़िदा' (خدا)। या फिर अपने अभ्यास से वह, put या but को पुट और बट उच्चारित करता है, 'पुट-बुट' या 'पट-बट' नहीं।
हिन्दी (देवनागरी) की यह प्रकृति नहीं है। हिन्दी में जो सुना जाता है, वही लिखा जाता है और जो लिखा जाता है, वही बोला भी जाता है।
वैयाकरणों के अनुसार, अनुस्वार (ॱ) का प्रयोग सामान्यतः य, र, ल, व, श, ष, स और ह के साथ किया जाना चाहिए; हालाँकि अब लिखने में प्रत्येक अक्षर के साथ इसका प्रयोग किया जाने लगा है और साहित्य में इसे मान्यता भी मिल गयी है। लेकिन अभिनेताओं को इसको लेकर द्विविधा हमेशा बनी रहती है कि वे 'परंपरा' को परम्परा क्यों बोलें, परन्परा क्यों नहीं ? इसी तरह कई अनुभवी अभिनेता 'बूँद' (ब् + ऊँ + द) को 'बून्द' (बू न् द) कहते सुने जाते हैं। या फिर उन्हें 'हंस' और 'हँस' में अंतर नहीं समझ में आता है ! इसलिए ज़रूरी है कि अभिनेता लिखित पाठ का अपने लिए एक अलग 'परफॉर्मिंग-टेक्स्ट' तैयार करे।
आइए जानते हैं, हिन्दी और उसकी लिपि देवनागरी में अनुस्वार और नासिक्य ध्वनियों के संयोजन की क्या और कैसी व्यवस्था है ?
य, र, ल, व, श, ष, स और ह के साथ अनुस्वार (ॱ) का प्रयोग व्याकरण-सम्मत है। शेष व्यञ्जन, यथा - 'क' से लेकर 'म' तक; 25 व्यञ्जन-ध्वनियाँ, उच्चारण-स्थल के आधार पर 5 वर्गों में विभाजित हैं - कंठ्य : क ख ग घ ङ, तालव्य : च छ ज झ ञ, मूर्धन्य : ट ठ ड ढ ण, दन्त्य : त थ द ध न और ओष्ठ्य : प फ ब भ म। हर वर्ग का अन्तिम अक्षर या उसकी अन्तिम ध्वनि नासिक्य है। अब अगर कंठ्य वर्ग (क ख ग घ) के साथ अनुस्वार का प्रयोग करना है, तो उसके साथ 'ङ' का प्रयोग होगा, जैसे - गङ्गा, जङ्घा, पङ्खा। इसी तरह तालव्य (च छ ज झ) के लिए ञ, मूर्धन्य (ट ठ ड ढ) लिए ण, दन्त्य (त थ द ध) लिए न और ओष्ठ्य (प फ ब भ) के लिए म का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था का अनुसरण करने पर अभिनेता को गङ्गा और 'गन्गा'; किञ्चित और 'किन्चित'; दण्ड और 'दन्ड' आदि शब्दों को लेकर कोई द्विविधा नहीं रहेगी। सामान्यतः अनुस्वार (ॱ) को हम आधा 'न' (न्) की ध्वनि मान लेते हैं, जबकि यह नासिक्य ध्वनि है और अलग-अलग अक्षरों के साथ इसका भिन्न उच्चारण होता है। इस अवधारणा के स्पष्ट होजाने पर हम यह समझ सकते हैं कि संबंध, दरअसल सम्बन्ध क्यों है और पंत (पन्त), दंभ (दम्भ) का उच्चारण क्या होगा।
थोड़ी चर्चा चन्द्र-बिन्दु की भी कर लेते हैं। हिन्दी में अनुनासिकता को चन्द्र-बिन्दु के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। जिस ध्वनि-अक्षर के साथ इसका प्रयोग किया जाता है, उस ध्वनि के साथ ही अनुनासिक का उच्चारण होगा, जैसे - चाँद, यहाँ च् + आँ + द का उच्चारण होता है, न कि 'चान्द', उसी तरह बूँद का उच्चारण ब् + ऊँ + द होता है, 'बून्द' नहीं। 'हंस' एक प्रकार का पक्षी है, तो 'हँस' का सम्बन्ध हँसने से है।
【अभिनेताओं के लिए हिन्दी / देवनागरी के कुछ अन्य पक्षों पर, फिर किसी दूसरे पोस्ट में चर्चा करेंगे।】