07/07/2025
कला की दुनिया के खामोश सर्जक के सौ वर्ष ; कृष्ण खन्ना
भारतीय कला इतिहास में एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने आधुनिक क्लासिक भारतीय कला के ‘मौन सर्जक’ की तरह प्रभावी छाप अंकित किया है। कृष्ण खन्ना का कला संसार चाय की दुकान से लेकर बैंड पार्टी और गली-कूचे की जिंदगी में फैली पड़ी है। जीवन के संघर्ष का वैविध्य कृष्ण खन्ना की अभिव्यक्ति में गुथा हुआ है।
भारतीय कला आंदोलन में कृष्ण खन्ना ऐसे चित्रकार रहे हैं जो पाश्चात्य परंपराओं से जुड़ने, उससे प्रभावित होने के बावजूद अपनी जमीन से जुड़े रहे। वे मध्यवर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय और समाज के हाशिये पर रह रहे भारतीय जन को कैनवास पर नायक बनाते रहे।
दुनिया के बहुत सारे कलाकार और रचनाकारों ने अपने व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों के विपरीत उम्मीद और संभावनाओं को अभिव्यक्त किया है, चाहे वे वान गॉग हों या सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’। अनेक सृजकों ने संघर्ष के लिए सब कुछ त्याग दिया। याद करें अवतार सिंह पाश को - हम लड़ेंगे साथी या अपनी प्रेमिका के लिए प्रेम की कविता नहीं लिख पाने के दर्द की अभिव्यक्ति।
परंतु बहुत कम कलाकार ऐसे हुए जिन्होंने सुविधाओं के बावजूद भारतीय जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्त करने की हिम्मत की है।
कृष्ण खन्ना की विशिष्टता
ऐसे में कृष्ण खन्ना भारतीय कलाकारों की जमात में सबसे अलग हैं। उनके कैनवास पर जीवन के संघर्ष की, भारतीय जन की चेतना की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति कलात्मकता के साथ राजनीतिक भी है जो अपनी जटिल परिस्थितियों को अपनी सांगीतिक आकृतियों में संप्रेषित करती है।
यह अंतर्विरोधग्रस्त चेतना की भी अभिव्यक्ति है जिसकी ओर इशारा करते हुए एंटोनियो ग्राम्शी ने ‘प्रिजन नोटबुक’ में लिखा है कि सक्रिय आम आदमी की जो सैद्धांतिक चेतनाएं होती हैं - एक जो उसकी गतिविधियों में निहित होती है और जो यथार्थ में उसे वास्तविक दुनिया का रूपांतरण करने में काम आती है तथा दूसरी ऊपरी तौर पर ओढ़ी हुई, जो उसे अतीत से विरासत में मिली होती है और बिना विचार किए स्वीकार कर ली गई होती है।
प्रमुख कृतियां
‘फ्लाइट फ्रॉम पाक पत्तन’ (1947), ‘द लास्ट सपर’ (1949), ‘डंकन पोएट’ (1978), ‘द डेड एंड द डाइंग’ (1978), ‘बैंडवाला श्रृंखला’, ‘द इंटेरोगेशन’ (1982), ‘बीट्रेयल’ (1980), ‘पीएटा’ (1948), ‘बीट्रेयल’ (2006), ‘फ्लैगेलेशन’ (2006), ‘द रेजिंग ऑफ जालूस’ (2005) और ‘द ब्लाइंड किंग एंड ब्लाइंड फोल्डेड क्वीन’ (2006) जैसे चित्र इसी क्रम में आते हैं।
ये सारे चित्र इतिहास का स्केच मात्र नहीं हैं बल्कि राजनीति, षड्यंत्र, यातना और कटु यथार्थ का अंकन हैं। ‘फ्लाइट फ्रॉम पाक पत्तन’ में भारत-पाक विभाजन की दुखद स्मृति है। एक गाड़ी और उसमें भागता एक परिवार। कागज पर पेंसिल का यह ड्राइंग दरअसल भारत-पाक विभाजन के बेहवास विस्थापन का आईना है।
विशेष श्रृंखला - बैंडवाला
‘बैंडवाला’ श्रृंखला कृष्ण खन्ना की खास पहचान बन जाती है। यह दरअसल ग्राम्शी की पहली चेतना के कारण सृजित हुई श्रृंखला है जो अपनी अभिव्यक्ति से वास्तविक दुनिया के यथार्थ को दुनिया के रूपांतरण के औजार के रूप में काम आती है।
रंग-बिरंगे, आकर्षक वस्त्र विन्यास तथा मधुर संगीत के पीछे का घुटन और उससे उपजे असंतोष तथा उसकी संवेदना को कैनवास पर आप महसूस कर लेते हैं। रंग-बिरंगा कैनवास सहसा आपको उदास, कोरा और धूसर दिखने लगता है।
जनपक्षधरता
यह महत्वपूर्ण बात है कि कृष्ण खन्ना ने अपने को सदैव करोड़ों वंचित जनों को अपने सृजन का नायक बनाए रखा है। मैक्सिम गोर्की ने 1932 में अपने एक लेख में दुनिया के संस्कृतिकर्मियों से एक सवाल पूछा था:
“संस्कृति के महारथियो, आप किसके साथ हैं? क्या आप संस्कृति की रचना करनेवाले आम मेहनतकश लोगों के साथ हैं और जीवन के नए रूपों का निर्माण करने के पक्ष में हैं? या आप इन लोगों के विरुद्ध हैं और गैर-जिम्मेदार लुटेरों की जात-ऐसी जात को बचाए रखने के पक्ष में हैं जो ऊपर से नीचे तक सड़ गई है और बस मरने के ही जोर में हरकत कर रही है?”
कृष्ण खन्ना का उत्तर उनके कैनवास पर मौजूद है।
कलात्मक विशेषताएं
अपनी जनपक्षधरता के साथ सौंदर्यशास्त्र आवश्यकताओं और कलात्मक क्षुधा को संतुष्ट करने के कारण ही कृष्ण खन्ना अधिकतर भारतीय कलाकारों से अलग खड़े होते हैं। कृष्ण खन्ना की संवेदना उनके निजत्व तक सिमटा नहीं है। उसका काफी विस्तार है।
अपनी अंतःप्रज्ञा के बदौलत कृष्ण खन्ना सामान्य से लगनेवाले उपेक्षित विषयों को सहसा गंभीर बना देते हैं। कृष्ण खन्ना की कला दरअसल कला और जीवन के कई गंभीर मुद्दों की तरफ बहस के लिए आमंत्रित करती है।
जीवन यात्रा
कृष्ण खन्ना की जीवन यात्रा काफी विषम रही है। पाकिस्तान में आजादी से लगभग 22 वर्ष पहले जन्म के बाद रुडयार्ड किप्लिंग स्कॉलरशिप पर विंडसर (इंग्लैंड) जाना, कला का अध्ययन, लायलपुर से लाहौर विस्थापन, फिर विभाजन का दंश, भारत आना, ग्रिंडलेज बैंक में नौकरी, मुंबई, मद्रास और दिल्ली में रहना। यानी लगातार अस्थिरता।
इसी अस्थिरता और भागमभाग में जिंदगी को नजदीक से कृष्ण खन्ना ने देखा भी, उसको जिया भी और उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति भी की। इनकी रचनाओं में साठ के दशक तक काफी विविधता दिखती है। इसी बीच उन्होंने पोर्ट्रेट, म्यूजिशियन श्रृंखला, लड़कियां, सिएस्टा, शहर, व्यक्ति, टायलेट जैसे सैकड़ों विषयों पर चित्र बनाए।
परंतु यह फैलाव सत्तर के दशक में घनीभूत होता है। आम जन, उसका संघर्ष, उसके साथ छल, धोखा, उसका संत्रास सभी संवेदनाएं अभिव्यक्ति के केंद्र में आनी शुरू होती हैं।
रंग-संयोजन और तकनीक
कृष्ण खन्ना का रंग-संयोजन और स्पेस का इस्तेमाल भी अद्भुत है। उनके रंग चटक होते हुए भी अत्यंत सहज हैं, आत्मीय हैं। चाकू का उपयोग कर कई बार वे रंगों के कई आयाम सामने लाकर चमत्कृत करते हैं और सम्मोहित भी कर लेते हैं।
जब कैनवास को वे एक कुशल नाट्य-निर्देशक और स्टेज डिजाइनर की तरह उसे ‘विजुअलाइज’ करके उपयोग करते हैं। उनके पात्र कैनवास पर अभिनेता की तरह अभिनय करते हैं, कई बार संवाद के साथ तो कई बार मौन रहकर।
‘द लास्ट सपर’, ‘द ब्लाइंड्स मैन बफ’, ‘कन्वर्सेशन एट ए ढाबा’, ‘फ्लैगेलेशन’, ‘द बीट्रेयल’ जैसी उनकी कृतियां किसी नाटक के दृश्य से कम प्रभावी नहीं हैं। ये चित्र दर्शकों से सीधे संवाद करते हैं। यही संवाद एक कलाकार की निर्देशकीय प्रतिभा का परिचायक होता है। यही कलाकृति की सफलता भी है।
चित्रों में पात्रों के वस्त्र-विन्यास और रंग-योजना भी उतनी ही सजग होती है। इस तरह से देखें तो आज कृष्ण खन्ना भारतीय क्लासिकी आधुनिक कला के अग्रणी कलाकार हैं।