Vinay Kumar

Vinay Kumar I write on arts and I paint too.

कला की  दुनिया के खामोश  सर्जक के सौ  वर्ष  ; कृष्ण खन्ना भारतीय कला इतिहास में एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने आधुनिक क...
07/07/2025

कला की दुनिया के खामोश सर्जक के सौ वर्ष ; कृष्ण खन्ना


भारतीय कला इतिहास में एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने आधुनिक क्लासिक भारतीय कला के ‘मौन सर्जक’ की तरह प्रभावी छाप अंकित किया है। कृष्ण खन्ना का कला संसार चाय की दुकान से लेकर बैंड पार्टी और गली-कूचे की जिंदगी में फैली पड़ी है। जीवन के संघर्ष का वैविध्य कृष्ण खन्ना की अभिव्यक्ति में गुथा हुआ है।
भारतीय कला आंदोलन में कृष्ण खन्ना ऐसे चित्रकार रहे हैं जो पाश्चात्य परंपराओं से जुड़ने, उससे प्रभावित होने के बावजूद अपनी जमीन से जुड़े रहे। वे मध्यवर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय और समाज के हाशिये पर रह रहे भारतीय जन को कैनवास पर नायक बनाते रहे।
दुनिया के बहुत सारे कलाकार और रचनाकारों ने अपने व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों के विपरीत उम्मीद और संभावनाओं को अभिव्यक्त किया है, चाहे वे वान गॉग हों या सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’। अनेक सृजकों ने संघर्ष के लिए सब कुछ त्याग दिया। याद करें अवतार सिंह पाश को - हम लड़ेंगे साथी या अपनी प्रेमिका के लिए प्रेम की कविता नहीं लिख पाने के दर्द की अभिव्यक्ति।
परंतु बहुत कम कलाकार ऐसे हुए जिन्होंने सुविधाओं के बावजूद भारतीय जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्त करने की हिम्मत की है।

कृष्ण खन्ना की विशिष्टता

ऐसे में कृष्ण खन्ना भारतीय कलाकारों की जमात में सबसे अलग हैं। उनके कैनवास पर जीवन के संघर्ष की, भारतीय जन की चेतना की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति कलात्मकता के साथ राजनीतिक भी है जो अपनी जटिल परिस्थितियों को अपनी सांगीतिक आकृतियों में संप्रेषित करती है।
यह अंतर्विरोधग्रस्त चेतना की भी अभिव्यक्ति है जिसकी ओर इशारा करते हुए एंटोनियो ग्राम्शी ने ‘प्रिजन नोटबुक’ में लिखा है कि सक्रिय आम आदमी की जो सैद्धांतिक चेतनाएं होती हैं - एक जो उसकी गतिविधियों में निहित होती है और जो यथार्थ में उसे वास्तविक दुनिया का रूपांतरण करने में काम आती है तथा दूसरी ऊपरी तौर पर ओढ़ी हुई, जो उसे अतीत से विरासत में मिली होती है और बिना विचार किए स्वीकार कर ली गई होती है।
प्रमुख कृतियां
‘फ्लाइट फ्रॉम पाक पत्तन’ (1947), ‘द लास्ट सपर’ (1949), ‘डंकन पोएट’ (1978), ‘द डेड एंड द डाइंग’ (1978), ‘बैंडवाला श्रृंखला’, ‘द इंटेरोगेशन’ (1982), ‘बीट्रेयल’ (1980), ‘पीएटा’ (1948), ‘बीट्रेयल’ (2006), ‘फ्लैगेलेशन’ (2006), ‘द रेजिंग ऑफ जालूस’ (2005) और ‘द ब्लाइंड किंग एंड ब्लाइंड फोल्डेड क्वीन’ (2006) जैसे चित्र इसी क्रम में आते हैं।
ये सारे चित्र इतिहास का स्केच मात्र नहीं हैं बल्कि राजनीति, षड्यंत्र, यातना और कटु यथार्थ का अंकन हैं। ‘फ्लाइट फ्रॉम पाक पत्तन’ में भारत-पाक विभाजन की दुखद स्मृति है। एक गाड़ी और उसमें भागता एक परिवार। कागज पर पेंसिल का यह ड्राइंग दरअसल भारत-पाक विभाजन के बेहवास विस्थापन का आईना है।

विशेष श्रृंखला - बैंडवाला
‘बैंडवाला’ श्रृंखला कृष्ण खन्ना की खास पहचान बन जाती है। यह दरअसल ग्राम्शी की पहली चेतना के कारण सृजित हुई श्रृंखला है जो अपनी अभिव्यक्ति से वास्तविक दुनिया के यथार्थ को दुनिया के रूपांतरण के औजार के रूप में काम आती है।
रंग-बिरंगे, आकर्षक वस्त्र विन्यास तथा मधुर संगीत के पीछे का घुटन और उससे उपजे असंतोष तथा उसकी संवेदना को कैनवास पर आप महसूस कर लेते हैं। रंग-बिरंगा कैनवास सहसा आपको उदास, कोरा और धूसर दिखने लगता है।

जनपक्षधरता
यह महत्वपूर्ण बात है कि कृष्ण खन्ना ने अपने को सदैव करोड़ों वंचित जनों को अपने सृजन का नायक बनाए रखा है। मैक्सिम गोर्की ने 1932 में अपने एक लेख में दुनिया के संस्कृतिकर्मियों से एक सवाल पूछा था:
“संस्कृति के महारथियो, आप किसके साथ हैं? क्या आप संस्कृति की रचना करनेवाले आम मेहनतकश लोगों के साथ हैं और जीवन के नए रूपों का निर्माण करने के पक्ष में हैं? या आप इन लोगों के विरुद्ध हैं और गैर-जिम्मेदार लुटेरों की जात-ऐसी जात को बचाए रखने के पक्ष में हैं जो ऊपर से नीचे तक सड़ गई है और बस मरने के ही जोर में हरकत कर रही है?”
कृष्ण खन्ना का उत्तर उनके कैनवास पर मौजूद है।

कलात्मक विशेषताएं
अपनी जनपक्षधरता के साथ सौंदर्यशास्त्र आवश्यकताओं और कलात्मक क्षुधा को संतुष्ट करने के कारण ही कृष्ण खन्ना अधिकतर भारतीय कलाकारों से अलग खड़े होते हैं। कृष्ण खन्ना की संवेदना उनके निजत्व तक सिमटा नहीं है। उसका काफी विस्तार है।
अपनी अंतःप्रज्ञा के बदौलत कृष्ण खन्ना सामान्य से लगनेवाले उपेक्षित विषयों को सहसा गंभीर बना देते हैं। कृष्ण खन्ना की कला दरअसल कला और जीवन के कई गंभीर मुद्दों की तरफ बहस के लिए आमंत्रित करती है।

जीवन यात्रा
कृष्ण खन्ना की जीवन यात्रा काफी विषम रही है। पाकिस्तान में आजादी से लगभग 22 वर्ष पहले जन्म के बाद रुडयार्ड किप्लिंग स्कॉलरशिप पर विंडसर (इंग्लैंड) जाना, कला का अध्ययन, लायलपुर से लाहौर विस्थापन, फिर विभाजन का दंश, भारत आना, ग्रिंडलेज बैंक में नौकरी, मुंबई, मद्रास और दिल्ली में रहना। यानी लगातार अस्थिरता।
इसी अस्थिरता और भागमभाग में जिंदगी को नजदीक से कृष्ण खन्ना ने देखा भी, उसको जिया भी और उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति भी की। इनकी रचनाओं में साठ के दशक तक काफी विविधता दिखती है। इसी बीच उन्होंने पोर्ट्रेट, म्यूजिशियन श्रृंखला, लड़कियां, सिएस्टा, शहर, व्यक्ति, टायलेट जैसे सैकड़ों विषयों पर चित्र बनाए।
परंतु यह फैलाव सत्तर के दशक में घनीभूत होता है। आम जन, उसका संघर्ष, उसके साथ छल, धोखा, उसका संत्रास सभी संवेदनाएं अभिव्यक्ति के केंद्र में आनी शुरू होती हैं।

रंग-संयोजन और तकनीक
कृष्ण खन्ना का रंग-संयोजन और स्पेस का इस्तेमाल भी अद्भुत है। उनके रंग चटक होते हुए भी अत्यंत सहज हैं, आत्मीय हैं। चाकू का उपयोग कर कई बार वे रंगों के कई आयाम सामने लाकर चमत्कृत करते हैं और सम्मोहित भी कर लेते हैं।
जब कैनवास को वे एक कुशल नाट्य-निर्देशक और स्टेज डिजाइनर की तरह उसे ‘विजुअलाइज’ करके उपयोग करते हैं। उनके पात्र कैनवास पर अभिनेता की तरह अभिनय करते हैं, कई बार संवाद के साथ तो कई बार मौन रहकर।
‘द लास्ट सपर’, ‘द ब्लाइंड्स मैन बफ’, ‘कन्वर्सेशन एट ए ढाबा’, ‘फ्लैगेलेशन’, ‘द बीट्रेयल’ जैसी उनकी कृतियां किसी नाटक के दृश्य से कम प्रभावी नहीं हैं। ये चित्र दर्शकों से सीधे संवाद करते हैं। यही संवाद एक कलाकार की निर्देशकीय प्रतिभा का परिचायक होता है। यही कलाकृति की सफलता भी है।
चित्रों में पात्रों के वस्त्र-विन्यास और रंग-योजना भी उतनी ही सजग होती है। इस तरह से देखें तो आज कृष्ण खन्ना भारतीय क्लासिकी आधुनिक कला के अग्रणी कलाकार हैं।

कलाकार का स्टूडियो विजिट एक सम्मोहित करने  वाला समय होता है । ब्रह्मदेव राम पंडित जी से जब पहली बार महात्मा गांधी के चंप...
07/07/2025

कलाकार का स्टूडियो विजिट एक सम्मोहित करने वाला समय होता है । ब्रह्मदेव राम पंडित जी से जब पहली बार महात्मा गांधी के चंपारण यात्रा यानि नील सत्याग्रह का म्यूरल हेतु आग्रह किया था और जो उन्होंने बनाया उसे बापू सभागार में देखा जा सकता है । पंडित जी मेरे प्रिय कलाकार हैं, सादगी, निच्छलता, विनम्रता , ईमानदारी, कार्य के प्रति समर्पण सब कुछ की प्रतिमूर्ति हैं । महाराष्ट्र के ठाणे ज़िला के भयंदर स्थित स्टूडियो में पिछले दिनों जाना हुआ । पंडित जी और उनके परिवार के आत्मीयता और पॉटरी का मोहपाश आपको विवश कर देता है सिरामिक की दुनिया में खो जाने के लिए. चित्रों में आप भी आनंद लीजिए ।

*अनूप कुमार चांद के चित्र*’’चांदनी सी रातसजनिया कैसे घर आऊंढ़ोला..................................’’जब शास्त्रीय संगीत के...
17/03/2025

*अनूप कुमार चांद के चित्र*

’’चांदनी सी रात
सजनिया कैसे घर आऊं
ढ़ोला..................................’’
जब शास्त्रीय संगीत के सुपरिचित घराना सीकर घराने के गायक और सारंगीवादक उस्ताद सुल्तान खान उपर्युक्त गायन और सारंगीवादन करते हैं तो चांदनी रात की विलासिता, प्रेम, विरह और बेचैनी जीवंत हो जाती है। गायन के इसी एब्स्ट्रैंक्शन को कैनवस पर हम मूर्त होते देखते हैं, देश के महत्वपूर्ण चित्रकार अनूप कुमार चांद के कैनवस पर। अनूप चांद से लगातार साक्षात्कार होता रहा है। ’’मून लाइट नाइट नाम’’ से उनके नवीन चित्रों की श्रृंखला आज से जहांगीर आर्ट गैलेरी में प्रदर्शित है।
चांदनी रात प्रारंभ से ही कवियों, कलाकारों, संगीतकारों-गीतकारों को आकर्षित करता रहा है। सिनेमा के कुछ गीतों को देखिए;
’’सुहानी चांदनी रातें, हमें सोने नहीं देती’’
या फिर
’’चांदनी रात में,
एक बार तुझे देखा है
खुद पे इतराते हुए
खुद पे शर्माते हुए.....
न सोने की बेेचैनी, चांदनी रात में प्रियतम को देखने की इच्छा, खुद पर इतराना, खुद पर शर्माना या घर वापसी की इच्छाएं, अनूप चांद के कैनवस पर सांकेतिक रूप से और लालित्यपूर्ण ढ़ंग से अभिव्यक्त होती रही हैं। अनूप चांद मूलतः उड़ीसा के बालासोर जिले के एक गांव भोगराय के रहने वाले हैं। परिवार से मिली सांस्कृतिक विरासत उन्हें अपने पारम्परिक कलाओं से गहरे सम्पृक्त रखा।
यूं भी लोक और पारम्परिक कलांए अपने रंगों और फार्म के कारण सदैव आकर्षित करते रहे हैं। फिर समकालीन कला से एनकाउंटर ने अनूप को अपनी कला-शैली विकसित करने में मदद की है। यह कहना बेमानी नहीं है कि अधिकतर समकालीन कलाकार की जड़ें उनकी परम्परागत कलाओं से प्रभावित रही हैं या उनके सृजन के उत्स परम्पराएं रही हैं।
अनूप ने ’’मूनलाइट नाइट’’ श्रृंखला को बिम्ब और प्रतीकों के सहारे चित्रित किया है। बाघ सदैव से शक्ति और सत्ता का प्रतीक रहा है पर अनूप का बाघ तो कवि केदारनाथ सिंह की लम्बी कविता ’’बाघ’’ के कुम्हार के आंखों में बसा बाघ है। जिसकी खोज में निकले हैं कवि केदारनाथ सिंह और त्रिलोचन।
बाघ का वह मन, जो प्रेम से सिक्त है, विरह में बेचैन है, जो स्नेह में पिघल रहा हैए अनूप ने देखा और कैनवस पर उन्होंने बाघ का एक कन्ट्रास्ट भी सृजित किया। कथा अंधेरे की है, पर साथ में चांदनी भी फैली है तो कठोरतम वस्तु के भीतर का मर्म भी कैनवस पर दृष्टिगोचर होता है।
बाघ के साथ तितलिया, हाथी, चिड़िया, बकरी, हिरण, वृक्ष, उल्लू सभी चांदनी रात्रि में एक परस्पर संवादी और कन्ट्रास्ट कथाएं कहती हैं। अनूप अपने फैंटेसी युक्त नैरेटिव पेंटिंग्स के लिए जाने जाते हैं।
उनके चित्रों का संसार काफी वृहत है। जो कहीं न कहीं में मिथकीय कथाओं, पात्रों, फ्लोरा और फौना से प्रभावित रहा है। अनूप के चित्रों में दरअसल संवेदनशीलता की ललित्यपूर्ण अभिव्यक्ति है। मृग, बच्चे, बकरी को लेकर श्रृंखलावद्ध सृजन किया है तो वहीं उन्हें महात्मा गांधी, बुद्ध और महावीर भी आकर्षित करते हैं और उनके सृजनात्मक कर्म का हिस्सा भी बनते रहे हैं।
अनूप के चित्रों के विविधताएं हैं। विषयवस्तु की विविधता से लेकर रंग, स्पेस और ट्रीटमेंट की विविधता मौजूद है।
अनूप चांद के चित्रों से गुजरना कला-अरण्य से गुजरने जैसा है, जो न आपकों मोहित करता है, बल्कि सम्मोहित भी करता है।

09/07/2024

पटना कलम

मैंने १९९४ में एक लेख लिखा था द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ;Why revive Patna Qalam.

पटना कलम एक ख़ास समय की उपज थी। जो कुछ कंपनी शैली और कुछ मुग़ल शैली और कुछ अपनी स्थानीयता के समन्वय से उपजी थी। भले ही ये एक ख़ास ज़रूरत के तहत बनारस कलम और लखनऊ कलम की तरह सामने आयी थी पर पर उसने एक ख़ास शैली तो विकसित की थी . ये परंपरागत कला बनते बनते रह गई।

पटना क़लम हमारा गौरवमय अतीत है उसे सहेजने और उससे सीखकर समकालीन कला यानी आधुनिक कलाओं में और आगे जाने की ज़रूरत है।

विसुअलआर्ट्स काफ़ी प्रोग्रेसिव है अन्य कलाओं की तुलना में । गुफा चित्र, अजंता एलोरा के चित्र, पट चित्र , मूर्तिशिल्प, टेराकोटा, मेटल कास्टिंग, मुग़ल पेंटिंग्स , पहाड़ी पेंटिंग्स , कंपनी पेंटिंग्स, केरल के मातनचेरी के म्युरल्स, तंजोर शैली, राजपूत शैली, वाश पेंटिंग्स और फिर मॉडर्न आर्ट्स , अमूर्तन , प्रिंटमेकिंग से लेकर एशियाई कला के आइकन सुबोध गुप्ता तक.

काफ़ी आगे बढ़ गई कला अब. अपनी पुरानी शैलियों को एप्रिसिएट करना सीखें , उनके एलीमेंट्स को ग्रहण करें , उन्हें सहेजें।

पटना कलम पर कार्यशालाएँ पटना कलम की विशेषताओं को जानने में रोल प्ले करेगा। पर उसके रिवाइवल की बात करना हमारी सीमाओं को दर्शाता है .

विज़ुअल आर्ट्स की दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है भाई. थोड़ा कुएँ से बाहर आकर देखें तो पता चलेगा ।

थोड़ा उमाशंकर पाठक , मुरारी झा , अरविंद सिंह, नरेश कुमार , रंजिता , सचीन्द्रनाथझा , रवींद्र दास, नरेंद्रपाल सिंह , संजय कुमार, अरुण पंडित, अशोक कुमार , अनिल बिहारी, मिलन दास, अमरेश कुमार, भुनेश्वर भास्कर, आदर्श सिन्हाशत्रुघ्न ठाकुर , प्रभाकर आलोक, अभिजीत पाठक , राजेश राम , शिखा सिन्हा , उमेश कुमार की कला को देखिए , एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनकी कला पटना कलम की परंपरा को आगे बढ़ाती हुई दिखती है यानी वे वह रच रहे हैं जो वो देख रहे हैं एक विशिष्ट नज़र से. एक विशिष्ट समय में.

Please do come.
12/06/2024

Please do come.

श्याम शर्मा के अद्भुत प्रिंटश्याम शर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी पिछले दिनों दिल्ली के हैबिटाट सेंटर के विजुअल आर्ट गैलेर...
25/02/2024

श्याम शर्मा के अद्भुत प्रिंट

श्याम शर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी पिछले दिनों दिल्ली के हैबिटाट सेंटर के विजुअल आर्ट गैलेरी में शुरू हुयी है। श्याम शर्मा छापाकला में देश में एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। यूं तो छापाकला (प्रिंट मेंकिग) में ही देश में बहुत कम कलाकार हैं। छापाकला के बहुत कम सक्रिय केन्द्र देश में बचे हैं। इनका बाजार भी अपेक्षाकृत कम है फलतः बहुत कम कलाकार छापाकला में आना चाहते हैं। ऐसे में श्याम शर्मा ने छापाकला में लगभग पचास वर्ष समर्पित कर दिए, वह भी एक माध्यम वुडकट में काम नहीं किया बल्कि छापाकला के अधिकतर माध्यमों को अपनाया, सृजन किए और उनके नए आयाम ढूंढ़े। अकेले काष्ठ छापाकला (वुडकट) में जितना सत्यान्वेषी तरीकों से सृजन किया, वह देश में अद्वितीय है।
अस्सी के दशक के श्याम शर्मा और आज के श्याम शर्मा में कोई फर्क नहीं है। वही अदम्य ऊर्जा, शक्ति व उत्साह वाले श्याम शर्मा। वही हँसकर, स्नेह दिखाते श्याम शर्मा। किसी भी युवा कलाकार के लिए अपने कलानुशासन और प्रतिबद्धता से आज भी सम्मोहित कर लेनेवाले श्याम शर्मा, आज भी सिर्फ और सिर्फ सृजन के एकांतिक राग में व्यस्त हैं। मिट्टी के ब्लॉक और प्लास्टर के ब्लॉक बनाकर प्रिंट निकालना, यह सिर्फ और सिर्फ श्याम शर्मा के वश की ही बात है।
श्यामजी अपने माध्यम और रूपाकारों के साथ खेलते हैं, खेल। उसका सुख लेते हैं। रंगों के साथ, स्पेस के साथ, फार्म के साथ कन्टेन्ट के साथ, सभी के साथ खेल, गम्भीरता व एकाग्रता के साथ उनका यह खेल बाल-सुलभ है। कोई भी दर्शक उस सौन्दर्यानुभूति के खेल से रसास्वादन कर सकता है। श्याम शर्मा की श्रृंखलाओं पर अब बात करें - प्रारम्भ में इन्होंने ‘अंडरग्राउंड नेचर’ श्रृंखला पर काम किया। दरअसल श्री श्याम शर्मा को प्रकृति शुरू से आकर्षित करती रही है। इसलिए इनकी कृतियों में प्रकृति, प्रकृति की रचनाएं, प्रकृति के फार्म सभी कुछ इनके कैनवास पर जादुई ढंग से अभिव्यक्त होती रही हैं। अंडरग्राउंड नेचर में लकड़ी के रूपाकारों को एवं खास स्पेस में संयोजित कर सुपरिचित रूपाकार में ढालकर धरती और व्योम के सौन्दर्य को प्रिंट किया है। इनके देशज रंगो के इस्तेमाल से शर्माजी का प्रकृति से जुड़ाव परिलक्षित करती है। ‘अर्थ एंड स्पेश’ श्रृंखला में श्यामजी का अमूर्तन से मूर्तन की तरफ शिफ्ट नजर आता है। यह श्रृंखला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी जिसमें चिड़िया, धरती, चट्टान को लेकर परम्यूटेशन और कॉम्बिनेशन के जरिए बेहतर स्पेस बैलेन्स वाले प्रिन्ट्स किए। जीवन, उसकी कोमलता, उसका खुरदुरापन सभी को उनके प्रिण्ट्स में महसूस किया जा सकता है। उसमें उनका सफेद स्पेस के प्रति प्रेम भी दीखता है। ये उनके खूबसूरत प्रिण्ट्स माने जाते हैं। बाद में उन्होंने ‘फूलों का जन्म‘ श्रृंखला में भी काफी प्रिण्ट किए। भीनबेटका के गुफा चित्रों का इनपर काफी प्रभाव पड़ा। जिसके कारण वृहताकार मानव आकृतियों का उन्होंने सृजन किया। इसी तरह इनकी कला पर फिनिस (फिनलैंड की यात्रा के दौरान) कलाकारों का भी प्रभाव देखा जा सकता है। ओला, जरीन, सुखी जैसे कलाकारों से ये प्रभावित भी हुए है। इस तरह उनके छापा चित्रों में रंगों का दबाव बढ़ा पर आकृतियाँ सरलतर होती गयी। इनके चित्रों में व्यंग्य का भी प्रवेश 1975 के बाद होता है। श्यामजी थियेटर में भी व्यंग्य को अपनाते हैं। टीन की तलवार जैसा नाटक मंचित करते हैं। उनके व्यंग्यपरक चित्रों में वेजीटेरीयन लायन, 1994 (वुड प्रिन्ट), न्यू क्रिटिसिज्म (वुड प्रिंट) 1994, ग्रेट एक्सपेक्टेशन (वुड प्रिन्ट) 1965, म्यूटेबल इमेजिनेशन (वुड प्रिन्ट) 1995, इनोसेन्ट स्नेक, इन्टलेकचुअल आउल, पैकिंग कल्चर प्रमुख हैं। वे दरअसल अपने परिवेश खासतौर पर राजनीतिक परिवेश के प्रभाव में रच रहे थे। श्यामजी की एक महत्त्वपूर्ण श्रृंखला है प्रकृति का स्पंदन, जिसमें प्रकृति के द्वारा रचित आकृतियों का उत्स ढूंढने की कोशिश करते हैं।
ये अधिकतर श्रृंखलाएं वुडकट प्रिन्ट थीं। पर वुडकट श्यामजी को कब तक बांधे रखती। श्यामजी ने एक नवीन प्रयोग किया। मिट्टी के ब्लॉक बनवाये और मिक्स्ड मीडिया में छापे लिये। कभी इस्लाम का प्रभाव, तो कभी बुद्ध का चित्रण तो कभी हिन्दू दर्शन। श्यामजी ने वेा सबकुछ रचा है जो मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए जरूरी समझा। उनके चित्रों में धरती, आकाश, चिड़िया, कीड़े, चीटियां, अपनी बुश्शर्ट, अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति सभी कुछ हैं। आकांक्षा बस एक ही है कि मानवीय जीवन कैसे बेहतर हो, कैसे हम अंधेरे से उजाले में आ सकें, चाहे माध्यम जो हो। तमसो मा ज्योतिर्गमय। श्याम शर्मा के चित्रों का मूल यही है। श्याम शर्मा दरअसल तकनीक के कलाकार हैं। जहां पहले टूल्स हैं, इनके हाथ, शायद सृजन के सर्वप्रथम टूल भी यही थे। श्यामजी प्रोडक्शन के बजाय सृजन में ज्यादा विश्वास करते हैं। यही कारण है कि उनका स्टूडियो, स्टूडियो है कारखाना नहीं। वे बगैर किसी सहायक के खुद रचते हैं। कला के घोर बाजारीकरण के दौर में, जहां कला की दुनिया में संवेदनशीलता बची रहेगी और शायद इसी वजह से श्याम शर्मा जैसे कलाकार, जो निजी दीर्घाओं, कला समीक्षकों और कलाकारों के चल रहे नेक्सस से अलग रहकर सृजन कर रहे हैं, ही इस देश की कला के सच्चे संवाहक होंगे। स्कूली शिक्षा के लिए वे बाद में बरेली आ गए। वहां उनके पिता रहते थे। उनका एक प्रिंरटिंग प्रेस था। छापाकारी से श्याम शर्मा का यहां पहला प्रत्यक्ष परिचय हुआ। बरेली में ही लखनऊ आर्ट कॉलेज के कुछ छात्र-कलाकारों से परिचय हुआ। फलतः पिता की इच्छा के विरूद्ध श्याम शर्मा ने लखनऊ आर्ट कॉलेज में दाखिला लिया। जहाँ सुधीर खास्तगीर, जयकृष्ण अग्रवाल के सान्निध्य में कला की शिक्षा पायी। छापाकला की औपचारिक शिक्षा ली। हालांकि उसके निमित्त इन्हें बड़ौदा भी जाना पड़ा क्योंकि लखनऊ में प्रिटमेकिंग की पूरी सुविधा नहीं थी। लखनऊ में ही पढ़ाई के चैथे वर्ष में युवा श्याम शर्मा ने अपने वुडकट (काष्ठछापा) प्रिन्ट की एक प्रदर्शनी लगायी जिसका कैटलाग दिनकर कौशिक ने लिखा था। यह याद करते हुए श्याम शर्मा की आँखें नम हो जाती हैं। यह अपने गुरूओं के प्रति श्यामजी का समर्पण भाव था, यह ठीक वैसे है जैसे जब रजा मुंबई जाते हैं तो जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्ट्स के अपने दिवंगत गुरू की पत्नी के पैर पकड़ कर दंडवत हो जाते हैं। उनकी यही विनम्रता उन्हें श्रेष्ठ बनाती है। उसके बाद श्याम शर्मा ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। राष्ट्रीय स्तर के उपरान्त अमरीकी, कैरो (मिस्त्र) मैसिडोनिया, ओमान, जापान, नीदरलैंड, सिचेल्स, टर्की जैसे देशों में वहाँ के त्रिनाले, बिनाले कला उत्सवों में भागीदारी की है। लखनऊ के बाद श्याम शर्मा पटना कॉलेज ऑफ आर्ट्स एवं क्राफ्ट में असिस्टेंट प्रोफसर नियुक्त हुए और यहीं से प्रिसिपल के रूप में सेवानिवृत हुए। श्याम शर्मा सुरूचिपूर्ण कलाकृतियों के लिए जाने जाते हैं। उनके वैयक्तिक अनुभव कागज और कैनवास पर आकर निवैंयक्तिक हो जाते हैं। उनका सृजन विशुद्ध कला का अन्यतम उदाहरण है। श्याम शर्मा के चित्रों से गुजरना वैसे ही है जैसे किशोरी अमोनकर या पंडित जसराज के आलाप को सुनना। इसलिए श्यामजी की कृतियां सांगीतिक ज्यादा है। श्यामजी अपनी कलाकृतियों को ठुमरी की तरह मानते हैं। आरोह और अवरोह। सुरूचिपूर्ण निनाद। कभी क्रांति गीत तो कभी कथात्मक। कभी अंधेरा तो कभी अंधेरों में उजाले की किरण, ठहरकर सांस लेने जैसा। रंगों का सीमित उपयोग। पर धीरे-धीरे रंगों का मोह छूटता गया। श्यामजी ने हाल में एक और दो रंगों में प्रिन्ट लिये। लोक तत्त्वों और अमूर्तन का सौन्दर्यात्मक सुख एक साथ श्याम शर्मा के चित्रों में लिया जा सकता है। उन्होंने अपने कलाजीवन की शुरूआत वुडकट टेक्सचर से की जो काफी आकर्षक होते थे। उसमें आकार, डेप्थ, सभी को विभिन्न आकारों में संयोजित किया। फिर उनहोंने ट्रंक के सेक्शन के प्रिंट फिर फ्लैट लकड़ी के गे्रडिएशन पर काम किया। इस तरह श्याम शर्मा विविधताओं से भरे लालित्यपूर्ण रचनाओं के कलाकार रहे है जिनके चित्रों से गुजरना एक अद्भुत अनुभव होता है।

ए. रामचन्द्रन की कलाः आधुनिकतावाद को खारिज करती एक सौन्दर्य-दृष्टिरामचन्द्रन के चित्रों से गुजरना भारतीय वाङमय से गुजरने...
13/02/2024

ए. रामचन्द्रन की कलाः आधुनिकतावाद को खारिज करती एक सौन्दर्य-दृष्टि

रामचन्द्रन के चित्रों से गुजरना भारतीय वाङमय से गुजरने जैसा है। रामचन्द्रन के चित्रों को देखना भारतीयता का हिंसावलोकन करना है। रामचन्द्रन के चित्रों का अवलोकन भारतीय समाज के विकास का अवलोकन है। आप भारतीय सौन्दर्य-दृष्टि से भी परिचित होते हैं यानी समय और समाज के बदलाव के साथ-साथ रामचन्द्रन की कला भी विकसित होती नजर आती है। बदलाव का स्पन्दन रामचन्द्रन के कैनवस, प्रिण्ट और मूर्तिकला पर महसूस किया जा सकता है।
समकालीन भारतीय कला जिस तरह से पाश्चात्य कला की पिछलग्गू रही है और जिस तरह से तथाकथित एक अत्यन्त छोटे-से, औपनिवेशिक भारत के अवशेष, अंग्रेजों के आज भी मानसिक रूप से गुलाम अंगे्रजी बोलनेवाले कला समीक्षकों, कला दीर्घा के मालिकों ने भारतीय कला के घिनौने व बकवास परिदृश्य को भारतीय कला के रूप में दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है उस निरर्थक आधुनिकतावाद को खारिज करती सौन्दर्य-दृष्टि है, रामचन्द्रन की कला। रामचन्द्रन की कलात्मक परिपक्वता के तार्किक कारण हैं, रामचन्द्रन की पारिवारिक और उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि।
केरल के एक सुदूर कस्बे अट्टिगल में 1935 में जन्मे रामचन्द्रन के किशोरावस्था में शास्त्रीय संगीत की दस वर्षो तक औपचारिक शिक्षा ग्रहण की। बचपन में कृष्णस्वामी मन्दिर के भित्तिचित्रों ने इनके मानस पर गहरा असर किया। बाद में आपने मलयामल साहित्य में केरल विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। उसके बाद साहित्यिक और शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में काफी सक्रिय रहे। तिरूवन्तपुरम आकाशवाणी के लिए गाया भी। केरल विश्वविद्यालय के एक स्कॉलरशिप पर कला भवन शान्तिनिकेतन में नामांकन कराया और फाइन आर्ट की यह पढ़ाई 1961 में समाप्त हुई। यहाँ उन्होंने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किया और वह था, कला भवन के लिए मातनचेरी महल के कुमारसम्भव म्यूरल की कॉपी करना। इसके साथ इन्होंने केरल की सुदूर यात्राएँ कीं तथा वहाँ के म्यूरल पेंटग्स का सर्वे व डाक्यूमेंटेशन का काम किया। इस अध्यन का प्रभाव रामचन्द्रन की समग्र कला पर दिखता है। साहित्य और संगीत के अध्ययन के उनके व्यक्तित्व को समग्रता प्रदान की। मलयाली साहित्य के अध्ययन ने उन्हें तार्किक बनाया। इनके देखने, अवशोषण और रचनात्मक उद्गार में औरों से भिन्न दृष्टि इसी कारण बनी।
कला भवन, शान्तिनिकेतन इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा कि उनकी कला दृष्टि को बनाने में नन्दलाल बोस, रामकिंकर बैज जैसे कला आचार्यो ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। रामकिंकर बैज की वजह से इनकी दिलचस्पी सन्थालों के प्रति, आदिवासियों के प्रति बढ़ी। उन्होंने रामचन्द्रन को वह दृष्टि दी जो देशी सौन्दर्य के अवलोकन के लिए जरूरी थी। आदिवासियों में सौन्दर्य का मतलब था विशुद्ध भारतीय सौन्दर्य। रामचन्द्रन ने न सिर्फ देखा बल्कि उसकी नित नवीन व्यवस्था अपने चित्रों में करते रहे। चाहे वे झील हों या राजस्थान के सुदूर गाँवों के ग्रामीण। समकालीन भारतीय कला में भारतीय तत्त्वों का निषेध है। चाहे सुबोध गुप्ता हों या शिल्पा गुप्ता, जीतीश कलात हों या रियाज कोमू या कृष्णाचारी बोस हों सभी पाश्चात्य सौन्दर्यमुखी चित्रकार हैं।
रामचन्द्रन के विगत लगभग चार दशकों की कला-यात्रा पर एक विहंगम दृष्टि डाली जाए तो पाएँगे कि इनकी कला में सत्त विकास का एक ग्राफ दिखता है सत्त विकास के कारण यह सदैव परिवर्तनगामी रही है। साठ के दशक में यानी शान्तिनिकेतन छोड़ने और जामिया मिलिया इस्लामिया में आने के बाद इन्होंने अपने को विशुद्धतावादी बनाने का यत्न किया। एनाटॉमी, गेस्चर, ह्यूमन बाडी, मैन एण्ड सीटेड फीगर, होमेज आदि चित्रों के जरिए उन्होंने एनॉटॉमी, मानव शरीर के सौष्ठव, मांसपेशियाँ पर मास्टरी हासिल की। इसके साथ उस उम्र की स्वाभाविक जिज्ञासाओं के लिए कैनवास पर लगातार प्रयोग किए। रेखाओं, रंगों, आकृतियों, स्पेस सभी के साथ। स्त्री-पुरूष सम्बन्ध, माननीय सम्बन्ध को समझने का प्रयास किया। स्केवेंजर वूमन का पोट्रेट अभिजात्यवर्ग का सुधी दर्शक शायद एप्रीशिएट नहीं कर सकता था, पर रामचन्द्रन ने किया। उन्होंने ईसा को, गाँधी को चित्रित किया। लास्ट सपर को पुनः चित्रित किया। रामचन्द्रन के इस समय के अधिकतर चित्र हिंसा के विरूद्ध थे। एन काउण्टर, काली पूजा, मशीन, रिजरेक्शन ऐसे ही चित्र हैं। यह रामचन्द्रन का सामाजिक सरोकारों से राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ाव व उनके रचनात्मक/प्रतिक्रियाओं का प्रतिफलन था। ज्ञातव्य है कि उस दशक में भारत ने दो महत्त्वपूर्ण युद्ध भारत-चीन और भारत-पाक युद्ध को झेला था। रामचन्द्रन की रचनात्मक अभिव्यक्ति की पृष्ठभूमि में यह तात्कालिक परिवेश कहीं महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा था। इस समय रामचन्द्रन ने कुछ प्रिण्टमेकिंग (एचिंग) भी किया। इन कृतियों में द लवर्स, लास्ट सपर, स्केवेंजर वूमन का पोर्टेªट, क्रूसिफिकेशन, द क्राईस्ट महत्त्वपूर्ण हैं।
सत्तर के दशक में रामचन्द्रन की कला थोड़ी आगे बढ़ती है। यादवों का अन्त न्यूक्लिअर रागिनी, द चेज, ऑडिएन्स, सीलिंग जैसे समसामयिक विषयों का प्रवेश होता है। शहरी जीवन की भागमभाग, आतंक हिंसा उनके पसन्दीदा विषय रहे। पर सत्तर के दशक के अन्तिम वर्षों में परिवर्तन आने लगता है मिथकीय विषयों, नायकों नायिकाओं का प्रवेश होता है। जो अस्सी के दशक में परिपक्व होता है।
गान्धारी, अभिसारिका नायिका, विरहिणी नायिका जैसे नायिका श्रृंखला के चित्र, मिनिएचर श्रृंखला, द फ्लाई, द डाइंग बहादुरशाह जफर, बास्को डी गामा, सीटेड वूमन, मदर टेरेसा जैसे चित्रों के जरिए रामचन्द्रन का क्रमिक शिफ्ट दिखता है। इनके जरिए रामचन्द्रन सत्यान्वेषी तरीकों का इस्तेमाल करके ऐतिहासिक विषयों का समकालीन बनाते हैं। पर मिथकीय चरित्रों का कैनवस पर उभरना जातीय स्मृति का रंगीन अंकन माना जाना चाहिए।
अस्सी के दशक का उत्तरार्ध रामचन्द्रन का नया प्रवेश है। आँधी, ययाति, ऊषा, मध्याह्न, सन्ध्या डांसिंग वूमन, नीयर लोटस पौंड, ऑरेंज लोटस पौंड, लोटस पौंड के जरिए रामचन्द्रन भारतीय मिथ में प्रवेश कर जाते हैं। ये चित्र काल के लिए आघात की तरह हैं। अपनी चित्रभाषा दृश्यता, स्वप्नशीलता और उत्कृष्ट व उदात्त रंग-योजना के कारण भारतीय कला दर्शकों को अभिभूत कर जाते हैं। ये मिथकीय आख्यान लोक जड़ो से गहरे जुडे़ होने के कारण संवादपरक भी हैं।

नब्बे के दशक में रामचन्द्रन का सम्पूर्ण कला व्यक्तित्व निखर जाता है। अपनी खास सांगीतिक चित्र शैली को रामचन्द्रन आविष्कृत करते हैं। इस चित्र शैली में भारतीय सौन्दर्य परम्परा, भारतीयता, भारतीय विचारधारा की गूँज-अनुगूँज जादुई ढंग से सुनाई पड़ती है। रामचन्द्रन ने ययाति, उर्वशी, गान्धारी कुन्ती, कूर्मावतार, रामदेव, मानसरोवर, ऊषा, सन्ध्या सभी का पुनराविष्कार किया है। ये चरित्र संवादपरक है।
रामचन्द्रन की समूची कला यात्रा को देखें तो पाते हैं कि उनकी संवेदनशीलता लगातार विस्तार पाती रही है। न्यूक्लियर रागिनी का 1975 में सृजन हुआ जिसका विस्तार हम जेनेसिस ऑफ कुरूक्षेत्र (2005) में पाते हैं। हिरोशिमा में न्यूक्लियर विस्फोट, बंगाल में नक्सलवादी हिंसा और पोखरन न्यूक्लियर विस्फोट के बाद न्यूक्लियर रागिनी का विकास हुआ। उक्त चित्र में एक रागिनी नायिका का एक आईना दिखाया जा रहा है। जिसमें उसके खूबसूरत चेहरे के बजाय चेहरे का कंकाल ही दिख रहा है। यह आण्विक युग की सच्चाई दिखाता है। इसकी जड़ें तलाशने रामचन्द्रन जा पहुँचते हैं कुरूक्षेत्र। जिसमें वे कुन्ती और गान्धारी के जरिए, चैपड के जरिए महाभारत के युद्ध की जड़ें तलाशने का प्रयास करते हैं।
मानसरोवर श्रृंखला (1997), कमल सरोवर श्रृंखला में कमल वाले तालाबों का अद्भुत चित्रण रामचन्द्रन ने किया है। ये दरअसल रामचन्द्रन के बचपन की स्मृतियाँ हैं जिसने उन्हें सम्मोहित कर रखा है। उनके केरल के कस्बे अट्टिगल की स्मृतियाँ हैं। जिसका प्रसव मानसरोवर श्रृंखला में परिपक्व रूप में हुआ पाते हैं। जिस पर मिथकीय आवरण भी दिखता है। कमल का सरोवर में अलग-अलग काल में अलग रूप दिखता है। कृष्ण के बाँसुरी के साथ सरोवर में उड़ते कीटों का अद्भुत चित्रण है यहाँ। कीट के बहाने सरोवर और कमल की अद्भुत सौन्दर्यपरक व्याख्या का अन्यतम उदाहरण है यह।
प्रकृति से रामचन्द्रन का लगाव अनायास नहीं है। बंगाल और केरल की प्राकृतिक छटा का असर होना ही था। चाहे महुआ हो या कदम्ब, पलाश हो या कंचन उसकी पत्तियाँ, उसके फल, उनसे लगे फूल और बेल-बूटे सभी अपने बाह्य और अन्तरजगत की सुन्दरता के साथ कैनवास पर मौजूद होते हैं। रामचन्द्रन का एक रूप और है, आदिवासी चरित्रों को मिथकीय चरित्रों में अभिव्यक्त करना। राजस्थान से रामचन्द्रन का गहरा जुड़ाव रहा है। हरेक यात्राओं में उन्होंने भीलों का, भील कन्याओं, मजदूरों का रेखांकन किया है। ‘हन्ना और उसकी बकरियाँ‘ ऐसे चित्रों में प्रमुख हैं। हन्ना उन्हीं भील लड़कियों में एक थी जिनके लिए रामचन्द्रन स्नेह से मुक्त हो पाने की असमर्थता जताते हैं (रूपिका चावला एक निबन्ध में) ‘कूर्मावतार के साथ सविता‘ बनेश्वर मेला के मार्ग पर ‘नागन्धा पर पुनर्जन्म, सुखा का व्यक्ति चित्र, रत्नी का व्यक्ति चित्र, कमला का व्यक्ति चित्र, लोगर का व्यक्ति चित्र, अहल्या पीले में, युवा दुल्हन के रूप में सोल्की, जमुना/हन्ना और अमलताश, एक नयनी, सुन्दरी का व्यक्ति चित्र ऐसे ही प्रमुख चित्र हैं।
भीलों और सन्थालों के चित्रण के साथ रामचन्द्रन के चित्रों में आम आदमी स्थापित होता है। भीलों की ओर ध्यान आकृष्ट करने में रामचन्द्रन के चित्रों की भूमिका अहम रही है। यह आम आदमी सुबोध गुप्ता के आम आदमी से एकदम भिन्न है। सुबोध का आदमी जहाँ अभिजात्य वर्ग के बीच एक गुलाम हिन्दुस्तानी की तरह अभिव्यक्त होता है वहीं रामचन्द्रन का आम आदमी अपनी गरिमा का पुनः स्थापन पाता है। एक कला समीक्षक ने सही लिखा है कि वे समकालीन कला में उपेक्षित और वंचित जनों की सुधियों के कलाकार हैं।
रामचन्द्रन के अधिकतर चित्र तैल माध्यम से सृजित हैं। इसके साथ इन्होंने जल रंग और मूर्तिशिल्प में भी कार्य किया है। जल रंगों में भी रामचन्द्रन का सौन्दर्य-बोध पूरी शक्ति के साथ अभिव्यक्त होता है। गीत गोविन्द पर आधारित मानसरोवर श्रृंखला (1997), अज्ञात की मिथकीय यात्रा (1996), इन्कारनेशन श्रृंखला (1995), कदम्ब का पेड़ और नन्दी साँड़ (1995), नागलिंग का पेड़ (1995), बाकर्स एट लिलि पौंड (1995), नागदा में मत्स्य अवतार (1996), मत्स्य अवतार (1996), बनेश्वर मेला से सम्बन्धित चित्र (1998), रामदेव (1998), तूतीनामा श्रृंखला (1999), कमल का चुनना (2002) से लेकर ध्यान चित्र श्रृंखला (2007) तक रामचन्द्रन के जलरंगों का विस्तार है।
चित्रकार रामचन्द्रन की रचनात्मकता का विस्तार विगत वर्षो में मूर्तिशिल्प और इन्स्टॉलेशन में भी हुआ है। गर्ल विथ वाटर लिलिज, इन ट्रान्स, दल गर्ल विथ प्लांट एण्ड इन्सेक्ट्स, ब्राइड ट्वायलेट (2004), जेनेसिस ऑफ कुरूक्षेत्र (2005), बहुरूपी (2006) इनके महत्त्वपूर्ण मूर्तिशिल्प हैं। जेनेसिस आफ कुरूक्षेत्र के बहाने महाभारत के उत्स ढॅूढ़ने का प्रयास करते हैं रामचन्द्रन, तो बहुरूपी तक आते-आते रामचन्द्रन की सम्पूर्ण कला दृष्टि एक उच्चतम शिखर तक पहुँच जाती है यानी ध्यानस्थ रामचन्द्रन, बकरी में तो कभी स्त्री के पैरों के नीचे, कभी आईना दिखाते तो कभी मुखलिंग के रूप में रामचन्द्रन सभी जगह मौजूद होते हैं, एक समवेत् दृष्टि के साथ।
वर्तमान समकालीन कला में पश्चिम से आक्रांत भारतीय कलाकारों के मध्य रामचन्द्रन हमेशा ऐसे प्रकाश स्तम्भ की तरह रहेंगे जो अपने सृजन में कलात्मक व प्रगतिशील मानवीय मूल्यों के कारण सबसे अलग हैं।

07/12/2023
प्रो बी एन  गोस्वामी  का जाना भारतीय कला इतिहास  के लिए  बहुत   दुखद क्षण  है . पहाड़ी  कला य़ा यूँ कहें भारतीय  कलाओं  पर...
17/11/2023

प्रो बी एन गोस्वामी का जाना भारतीय कला इतिहास के लिए बहुत दुखद क्षण है . पहाड़ी कला य़ा यूँ कहें भारतीय कलाओं पर उनका लेखन एक स्कूल की तरह है . उनके इलष्ट्रेटेड व्याख्यान तो सम्मोहित करने वाले होते थे . मैं जब भी उनसे मिला मुझे उन्होने अपने बड़े होने का अहसास कभी भी नहीं होने दिया . बिहार को हमेशा याद किया .
उनका बिहार कनेक्सन भी था . अपने करियर की शुरुआत उन्होने बिहार से ही की थी . अपने भारतीय प्रशासनिक सेवा के शुरुआती वर्ष बिहार मे ही गुजारे थे. बाद मे इस्तीफा देकर वे कला इतिहास के सहायक प्रोफेसर बने .
उनका निधन भारतीय कला इतिहास के लिए अपूरणीय क्षति है . विनम्र श्रद्धांजलि .

07/11/2023

संगमन २५ में विनय कुमार का वक्तव्य

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