Suman tiwari

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"सुना है अब वो स्कूल में पढ़ाती है..............,और मेरे नाम के बच्चों को बेमतलब कूटती है"
19/11/2021

"सुना है अब वो स्कूल में पढ़ाती है..............,
और मेरे नाम के बच्चों को बेमतलब कूटती है"

एक वही है जो पूर्ण है  पुराने जमाने में एक राजा हुए थे, भर्तृहरि। वे कवि भी थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थी।भर्तृहरि ने ...
17/11/2021

एक वही है जो पूर्ण है

पुराने जमाने में एक राजा हुए थे, भर्तृहरि। वे कवि भी थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थी।

भर्तृहरि ने स्त्री के सौंदर्य और उसके बिना जीवन के सूनेपन पर 100 श्लोक लिखे, जो श्रृंगार शतकम् के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्हीं के राज्य में एक ब्राह्मण (योगी गोरखनाथ) भी रहता था, जिसने अपनी नि:स्वार्थ पूजा से देवता को प्रसन्न कर लिया।

देवता ने उसे वरदान के रूप में अमर फल देते हुए कहा कि इससे आप लंबे समय तक युवा रहोगे। ब्राह्मण ने सोचा कि भिक्षा मांग कर जीवन बिताता हूं, मुझे लंबे समय तक जी कर क्या करना है। हमारा राजा बहुत अच्छा है, उसे यह फल दे देता हूं। वह लंबे समय तक जीएगा तो प्रजा भी लंबे समय तक सुखी रहेगी। वह राजा के पास गया और उनसे सारी बात बताते हुए वह फल उन्हें दे आया।

राजा फल पाकर प्रसन्न हो गया। फिर मन ही मन सोचा कि यह फल मैं अपनी पत्नी को दे देता हूं। वह ज्यादा दिन युवा रहेगी तो ज्यादा दिनों तक उसके साहचर्य का लाभ मिलेगा। अगर मैंने फल खाया तो वह मुझ से पहले ही मर जाएगी और उसके वियोग में मैं भी नहीं जी सकूंगा। उसने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया। लेकिन, रानी तो नगर के कोतवाल से प्यार करती थी। वह अत्यंत सुदर्शन, हृष्ट-पुष्ट और बातूनी था। अमर फल उसको देते हुए रानी ने कहा कि इसे खा लेना, इससे तुम लंबी आयु प्राप्त करोगे और मुझे सदा प्रसन्न करते रहोगे।

फल ले कर कोतवाल जब महल से बाहर निकला तो सोचने लगा कि रानी के साथ तो मुझे धन-दौलत के लिए झूठ-मूठ ही प्रेम का नाटक करना पड़ता है। और यह फल खाकर मैं क्या करूंगा। इसे मैं अपनी परम मित्र राज नर्तकी को दे देता हूं। वह कभी मेरी कोई बात नहीं टालती। मैं उससे प्रेम भी करता हूं। और यदि वह सदा युवा रहेगी, तो दूसरों को भी सुख दे पाएगी। उसने वह फल अपनी उस नर्तकी मित्र को दे दिया।

राज नर्तकी ने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप वह अमर फल अपने पास रख लिया। कोतवाल के जाने के बाद उसने सोचा कि कौन मूर्ख यह पाप भरा जीवन लंबा जीना चाहेगा। हमारे देश का राजा बहुत अच्छा है, उसे ही लंबा जीवन जीना चाहिए। यह सोच कर उसने किसी प्रकार से राजा से मिलने का समय लिया और एकांत में उस फल की महिमा सुना कर उसे राजा को दे दिया। और कहा कि महाराज, आप इसे खा लेना।

राजा फल को देखते ही पहचान गया और भौंचक्का रह गया। पूछताछ करने से जब पूरी बात मालूम हुई, तो उसे वैराग्य हो गया और वह राज-पाट छोड़ कर जंगल में चला गया। वहीं उसने वैराग्य पर 100 श्लोक लिखे जो कि वैराग्य शतकम् के नाम से प्रसिद्ध हैं।

यही इस संसार की वास्तविकता है। एक व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे उतना ही प्रेम करे। परंतु विडंबना यह कि वह दूसरा व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है। इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण हैं। सब में कुछ न कुछ कमी है। सिर्फ एक ईश्वर पूर्ण है। एक वही है जो हर जीव से उतना ही प्रेम करता है,जितना जीव उससे करता है। बस हम ही उसे सच्चा प्रेम नहीं करते ।

साभार

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समा...
26/10/2021

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर :------

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं।

ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है।

ऋषि शब्द का अर्थ

ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि।

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है।

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।

मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।

मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं।

मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं

साधु कौन होते हैं

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।

कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।

साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं।

संन्यासी किसे कहते हैं

सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है।

सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है।

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है

परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे।

परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है।

यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है।

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

11/10/2021

: माँ के प्रेम की पराकाष्ठा

गाँव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे।

तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।

सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।

आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।

पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।

सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।

एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।

उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।

एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया - गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?

गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा - नहीं, यह मोह नहीं है अपितु माँ के प्रेम की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।प्रेम और मोह में जमीन आसमान का फर्क है।

मोह में स्वार्थ निहित होता है और प्रेम में त्याग होता है।

भगवान ने माँ बाप को प्रेम की मूर्ति बनाया है और इस दुनिया में माँ बाप के प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

माँ बाप के उपकारो से हम कभी भी उपकृत नहीं हो सकते। इसलिए दोस्तों मां बाप के आँखों में कभी आंसू मत आने देना!!

: *जय श्री राम*
_*"वही जीवित है जिसका मस्तिक ठंडा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है...!*

*सुप्रभातम........*
*आपका दिन मंगलमय हो*सुमन

मेरे कान्हा...एक उम्र बीत चली है तुझको चाहते हुए, और तू आज भी बेखबर है,  मुझसे कल कि तरह।
10/10/2021

मेरे कान्हा...
एक उम्र बीत चली है तुझको चाहते हुए, और
तू आज भी बेखबर है, मुझसे कल कि तरह।

03/10/2021

ब्राह्मण के नौ गुण :-

रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूर दयालुश्च ब्राम्हणों नवभिर्गुणैः।।

● रिजुः = सरल हो
● तपस्वी = तप करनेवाला हो
● संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट रहनेवाला हो
● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो
● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो
● दाता= दान करनेवाला हो
● शूर = बहादुर हो
● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो
● ब्रह्मज्ञानी
इन नौ गुणों से सम्पन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण होता है।

भगवान श्री राम जी ने श्री परशुराम जी से कहा भी है→

"देव एक गुन धनुष हमारे।
नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे।।"

देवा धीनम जगत सर्वम ,मन्त्रा धीनश्च देवता:।
ते मंत्रा ब्राम्हणा धीनाश्च ,तस्माद ब्राम्हण देवता:।।

धिगबलम क्षत्रिय बलम ब्रम्ह तेजो बलम बलम।
एकेन ब्रम्ह दण्डेन सर्व शस्त्राणि हतानि च ।।
इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं त्याग तपस्या गायत्री सन्ध्या के बल से और आज लोग उसी को त्यागते जा रहे हैं, और पुजवाने का भाव जबरजस्ती रखे हुए हैं ,
*विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
*वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
*तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
*छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*

भावार्थ -- वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल (जड) दिन के तीन विभागों प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या (गायत्री मन्त्र का जप) करना है, चारों वेद उसकी शाखायें हैं, तथा वैदिक धर्म के आचार विचार का पालन करना उसके पत्तों के समान हैं । अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,, इस सन्ध्यारूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें, क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे ।।सुमन।।

श्री SUMAN JIWANI , आई०डी०- SYS-COV-BI-PTN-20-40039108 , दिनांक - 27-Sep-2021 को आपका कोरोना वायरस की जाँच के लिए सैंपल ...
29/09/2021

श्री SUMAN JIWANI , आई०डी०- SYS-COV-BI-PTN-20-40039108 , दिनांक - 27-Sep-2021 को आपका कोरोना वायरस की जाँच के लिए सैंपल लिया गया था |Antigen जाँच में वह निगेटिव पाया गया है | मास्क पहने और सामाजिक दूरी बनाये रखें | किसी भी चिकित्सकीय सहायता के लिए 104 पर कॉल करें | ओटीपी नंबर : 46060699 अधिक जानकारी के लिए संजीवन एप डाउनलोड करें : https://play.google.com/store/apps/details?id=com.bihar.covid19.app धन्यवाद | -Bihar Government.

एक बार संख्या 9 ने 8 को थप्पड़ मारा.               8 रोने लगा.         पूछा ~ मुझे क्यों मारा ?9 बोला ~ मैं बड़ा हूँ , इ...
09/09/2021

एक बार संख्या 9 ने 8 को थप्पड़ मारा.
8 रोने लगा.
पूछा ~ मुझे क्यों मारा ?
9 बोला ~ मैं बड़ा हूँ , इसलिए मारा.

इतना सुनते ही 8 ने 7 को मारा,
और 9 वाली बात दोहरा दी.
👇

7 ने 6 को.
6 ने 5 को.
5 ने 4 को.
4 ने 3 को.
3 ने 2 को.
2 ने 1 को.

बचा 1 , अब 1 किसको मारे ?
1 के नीचे तो 0 था.

1 ने उसे मारा नहीं, बल्कि
प्यार से उठाया, और उसे
अपनी बगल में बैठा लिया.
जैसे ही बैठाया ...
उसकी ताक़त 10 हो गयी.
और 9 की हालत खराब हो गई.
📍
जिन्दगी में किसी का साथ काफी है
कंधे पर किसी का हाथ काफी है.
दूर हो या पास , क्या फर्क पड़ता है
अनमोल रिश्तों का तो बस ...
"एहसास" ही काफी है.
📍
किसी की मजबूरियों पर न हँसिये,
कोई मजबूरियाँ ख़रीद कर नहीं लाता.
डरिये वक़्त की मार से,
बुरा वक़्त किसी को ...
बताकर नही आता.
📍
अक्ल कितनी भी तेज ह़ो,
नसीब के बिना नहीं जीत सकती.
बीरबल अक्लमंद होने के बावजूद ...
कभी बादशाह नही बन सका.
📍
ना तुम अपने आप को
गले लगा सकते हो,
ना ही तुम अपने कंधे पर सर रखकर
रो सकते हो.

एक दूसरे के लिये जीने का नाम ही
★ जिंदगी है ★
इसलिये ... वक़्त उन्हें दो,
जो तुम्हें चाहते हों दिल से.
📍

आपके पास मारुति हो
या बीएमडब्ल्यू
◆ सड़क वही रहेगी ◆

आप टाइटन पहने या रोलेक्स
◆ समय वही रहेगा ◆

आपके पास मोबाइल
एप्पल का हो या सेमसंग का
आपको कॉल करने वाले लोग
नहीं बदलेंगे.

आप इकॉनामी क्लास में सफर करें
या बिज़नेस में
◆ समय तो उतना ही लगेगा ◆

★ भव्य जीवन की लालसा रखने
या जीने में कोई बुराई नहीं हैं,
लेकिन सावधान रहें , क्योंकि
आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं।
◆ तृष्णा नहीं. ◆
* जयसियाराम *
* Sumanji ❤️ *

04/09/2021

*श्री राम कथा अंक - 5*

श्री रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी लिखते हैं -
रामकथा कलि कामद गाई ।
सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ।।
सोई बसुधातल सुधा तरंगिनि ।
भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ।।
सरलार्थ - श्री राम कथा कलियुग में सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय है और सज्जनों के लिए संजीवनी जड़ी है । पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है एवं जन्म - मरणरूपी भय का नाश करने वाली और भ्रमरूपी मेढ़कों को खाने के लिए सर्पिणी है ।

निहितार्थ - तुलसीदास जी में साहित्य सृजनशीलता है। वे उपमा देने में पारंगत हैं। वे रामकथा की उपमा उपर्युक्त चौपाई के चार चरणों में चार ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। वे रामकथा की तुलना सर्वप्रथम कामधेनु से कर रहे हैं।
उत्तरकांड में गरुड़ जी को काग भुसुंडि जी प्रभु श्रीराम के बारे में बताते हैं -
कामधेनु सत कोटि समाना ।
सकल काम दायक भगवाना ।।
अर्थ - भगवान अरबों कामधेनु के समान सभी कामनाओं को देने वाले हैं।
जब प्रभु श्रीराम ही अरबों कामधेनु के समान हैं , तो उनकी कथा भी कामधेनु के ही समान होगी - यह स्वाभाविक है ।
स्कंद पुराण में लिखा है - " कलौ रामायणकथा कामधेनूपमा स्मृता "। अर्थात् कलियुग में रामायण कथा कामधेनु के समान स्मरणीय है ।

कामधेनु का वर्णन पौराणिक कथाओं में एक ऐसी चमत्कारी एवं विभूतिमय गाय के रूप में मिलता है , जिसमें दैवीय शक्तियां थी और जिसके दर्शन मात्र से ही लोगों के दु:ख व पीड़ा दूर हो जाती थी। यह लोक प्रसिद्ध है कि इससे जो मांगा जाता है , वही मिल जाता है । यह स्वर्ग में रहती है। इस गाय में समस्त देवताओं का वास था। समुद्र - मंथन से निकले 14 रत्नों में से यह एक थी।

जब इसी से कामनाएं पूरी हो जाती हैं , तो फिर अन्य स्थानों पर जाने की क्या जरूरत है ? इस बात की ओर इंगित करते हुए कागभुशुंडिजी गरुड़ जी को कहते हैं -
ते जड़ कामधेनु गृह त्यागी ।
खोजत आकु फिरहिं पय लागी ।।
अर्थ - वह मूर्ख हैं ,जो घर पर रखी हुई कामधेनु को छोड़कर दूध के लिए मदार के पेड़ को खोजता फिरता है।

हम सभी जानते हैं कि केवल अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए लोग दरगाह - पीर - मजारों एवं ढोंगी बाबाओं के द्वार तक भटकते रहते हैं।
तुलसीदास जी हमें सचेत करते हुए कहते हैं कि कामना की पूर्ति भी रामकथा से ही हो जाती है। जीवन के चार पुरुषार्थ हैं - धर्म , अर्थ , काम एवं मोक्ष। अर्थ एवं काम की प्राप्ति धर्म के माध्यम से हो - संत तुलसीदास जी इसकी ओर संकेत कर रहे हैं।

सकाम व्यक्तियों के लिए श्री राम कथा को तुलसीदास जी ने कामधेनु -सम कहा और सज्जनों अर्थात् निष्कामियों के लिए सजीवन - मूरि - सम कहा।

' सोई वसुधा तल ' का भाव यह है कि प्रथम यह श्रीराम - कथामृत सरिता देवलोक कैलाश में भगवान शंकर के निकट रही । उसके पश्चात् श्री याज्ञवल्क्य जी के माध्यम से याज्ञवल्क्य - भरद्वाज संवाद के रूप में यह भूलोक में आई।
यहां भय से जन्म - मरण आदि का भय अर्थात् भव -भय समझना चाहिए । यह राम कथा सर्पिणीरूपा होकर भ्रमरूपी मेढ़कों को खा जाती है अर्थात् रामकथा से भ्रम का विलोप हो जाता है।

आप सभी भक्तों का कल्याण हो।
।। श्री राम जय राम जय जय राम।। suman🙏🌹

01/09/2021

श्री राम कथा अंक - 3 (तीन)

भक्त तुलसीदास जी की दृष्टि में राम कथा : -

श्री रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी लिखते हैं -
निज संदेह मोह भ्रम हरनी ।
करउं कथा भव सरिता तरनी।।
सरलार्थ - मैं अपने संदेह ,मोह एवं भ्रम को हरने वाली कथा रचता हूं , जो संसार रूपी नदी के पार करने के लिए नाव है।

निहितार्थ -जब तुलसीदास रामचरितमानस लिख रहे होंगे , तब अनेक लोग आकर तुलसी को कहते होंगें कि ऐसा नहीं लिखना चाहिए , आपको तो वैसा लिखना चाहिए । उन्हें अनेक सुझाव देते होंगे , तब तुलसीदास जी ने सब को यह कहकर चुप करा दिया होगा कि मैं तो मात्र कथा लिखने जा रहा हूं , वह भी केवल अपनी अज्ञानता , संशय एवं भ्रम को दूर करने के लिए । आप सभी विद्वत् - जनों के लिए तो मैं राम कथा लिखने नहीं जा रहा हूं। एक तरह से यह एक करारा व्यंग रहा होगा , जो तुलसीदास को रामकथा लिखने में बाधा पहुंचा रहे होंगें ।
हम सभी जानते हैं कि प्रारंभ में ही तुलसीदास ने " स्वान्त:सुखाय " कहकर रामचरितमानस लिखने का अभिप्राय स्पष्ट कर दिया था।

साधारणत: इस संसार की तुलना भवसागर से की जाती है। ऐसे भवसागर को कोई स्वयं पार नहीं कर सकता। उत्तरकाण्ड में काकभुशुंडि जी गरुड़ जी को कहते हैं -
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।
पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।
अर्थ - वह मूर्ख ही होगा , जो महासिंधु को बिना नौका के तैरकर ही पार होना चाहता है।

भवसागर पार करने के लिए कैसी नाव चाहिए ? इसे स्पष्ट करती हुई माता पार्वती महादेव शंकर से कहती हैं -
भवसागर चह पार जो पावा ।
रामकथा ता कहं दृढ़ नावा।।
अर्थ - जो संसार रूपी सागर को पार करना चाहता है , उसके लिए तो श्री राम की कथा दृढ़ नौका के समान है अर्थात् ऐसी मजबूत है कि काम-क्रोधादि षड् - विकार रूपी लहरों से उसके डूबने का भय नहीं रहता ।

तुलसीदास जी द्वारा भवसागर न कहकर भव सरिता कहने का भाव यह है कि रामकथा के आगे भवसागर कुछ नहीं रह जाता , वह एक नदी के समान जान पड़ता है , जिसके लिए एक नाव ही पर्याप्त है । तुलसीदास के लिए भव सरिता है , लेकिन हम सभी के लिए तो भवसागर ही है।

हम सभी जानते हैं कि संशय , मोह एवं भ्रम के रहते हुए हम भव को पार नहीं कर सकते। जब यह कथा तुलसीदास जी के संशय , मोह एवं भ्रम को दूर कर सकती है , तो क्या हम लोगों के संदेह , भ्रम को दूर नहीं करेगी ?
राम कथा सुनने से ही संशय ,मोह सारे दूर हो जाते हैं ।
काग भुसुंडि जी से राम कथा सुनकर गरुड़ जी कहते हैं -
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं।
संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।
अर्थ - प्रभु ! आपकी कृपा से मेरे हृदय में संशय ,मोह ,शोक व भ्रम अब नहीं रह गए।

प्रभु श्रीराम से विनती है कि उनकी कृपा से हम सभी के भी संशय ,मोह व भ्रम दूर हो जाएं।
आप सभी राम - भक्तों को वंदन एवं नमन।
🙏 suman🌹

*🌸 चाणक्य नीति 🌸*♦️चाणक्य सूत्र :- २९ ।। मन्त्र सम्पदा हि राज्यं वर्धते ।। ♦️भावार्थ : मन्त्र का रहस्य गुप्त रखने से ही ...
01/09/2021

*🌸 चाणक्य नीति 🌸*

♦️चाणक्य सूत्र :- २९

।। मन्त्र सम्पदा हि राज्यं वर्धते ।।

♦️भावार्थ : मन्त्र का रहस्य गुप्त रखने से ही राज्य के धन, धान्य की वृद्धि होती है।

राज्य के कार्यों से संबंधित सभी मंत्रणाओं और योजनाओं को सुरक्षित रखने के कारण ही राष्ट्र समृद्ध हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि अपनी योजना को गुप्त रखने में पूर्ण सतर्कता बरती जाए।।२९।।
🌹 suman🙏

करों को जोड़कर हमने,लगाकर ध्यान ईश्वर मेंतुम्हारी बाँह का अनमोल-अनुपम हार माँगा है,नहीं माँगा कनक-कुंदन, न माँगा रत्न-आभू...
11/08/2021

करों को जोड़कर हमने,लगाकर ध्यान ईश्वर में
तुम्हारी बाँह का अनमोल-अनुपम हार माँगा है,
नहीं माँगा कनक-कुंदन, न माँगा रत्न-आभूषण
हृदय ने वंदना में बस तुम्हारा प्यार माँगा है!

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