16/08/2024
रायगानी
मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से
फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हुं
के तू जा चुकी है
तुझे रायगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
तुझे याद है वो ज़माना
जो कैंपस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था?
तुझे याद है जब क़दम चल रहे थे?
के इक पैर तेरा था और इक मेरा
क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते के जैसे हो रागा कोई मुतरिबों का
क़दम जैसे सा पा, गमा पा गा सारे
वो तबले की तिरकठ पे
तक धिन
धिनक धिन
तिनक धिन, धना धिन
बहम चल रहे थे
क़दम चल रहे थे
क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे
तो कितने गवय्यों के घर चल रहे थे
मगर जिस घड़ी तूने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया
उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई
कितनी फ़नकारियां, कितनी बारीकियां
कितने "कलियां,बिलावल" गवय्यों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए
कितने नुसरत फ़त्ह, कितने मेहंदी हसन मुंतज़िर रह गए के हमारे क़दम फिर से उठने लगें
तुझ को मा'लूम है
जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के
तू इक ज़ाविये पे पलट कर मुड़ी थी
वहां से
रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था
के उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़ी सब ज़मानों की तरतीब बरबाद कर के
तुझे देखने आ गए थे
के तेरे झुकाव की तमस़ील पे
अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें
अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए
अपने वक़्तों में पलटे
ज्योमेट्री को जन्म दे सकें
अब भी कुछ फ़लसफ़ी, अपने फीके ज़मानों से भागे हुए
मेरे रस्तों पे आंखे बिछाए हुए
अपनी दानिस्त में यूं खड़े हैं
के जैसे वो दानिश का मंबा'
यहीं पे कहीं है
मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है
तो कैसे फ्लोरेंस की तंग गलियों से
कोई दा विंसी उठे
कैसे हस्पानिया में पिकासु बने
उनकी आंखों को तू जो मयस्सर नहीं है
ये सब तेरे मेरे इकठ्ठे न होने की क़ीमत अदा कर रहें हैं
के तेरे न होने से हर इक ज़मां में
हर इक इल्म व फ़न में हर इक दास्तां में
कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है
तुझे रायगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
:– सुहैब