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शहर था इंदौर, जिसे लोग मिनी मुंबई भी कहते थे, पर गाँव की लड़की, श्यामा, के लिए यह बस एक बड़ा, भागता-दौड़ता, शोरगुल से भर...
06/12/2025

शहर था इंदौर, जिसे लोग मिनी मुंबई भी कहते थे, पर गाँव की लड़की, श्यामा, के लिए यह बस एक बड़ा, भागता-दौड़ता, शोरगुल से भरा पिंजरा था। उसकी शादी किशन से हुई थी, जो एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और अपने काम में दिन-रात डूबा रहता था। श्यामा गाँव की थी, जहाँ दोपहर में नीम की छाँव में खटिया बिछती थी, जहाँ गाय की घंटियों की धीमी आवाज़ एक सुकून भरी लय बनाती थी, और जहाँ हर गली-कूचे में अपनेपन की भीनी-भीनी खुशबू आती थी। मगर यहाँ, इस कांक्रीट के जंगल में, उसे केवल गाड़ियों का कर्कश हॉर्न और काम से थके हारे किशन का उदास चेहरा दिखता था।

श्यामा को इंदौर आए दो साल हो चुके थे, पर उसका मन आज भी गाँव के उस कच्चे मकान में अटका था, जहाँ पीछे वाली बाड़ी में उसके ससुर जी ने बेला और चमेली के फूल लगाए थे। यहाँ के छोटे से फ्लैट की बालकनी से सिर्फ दूसरी बिल्डिंग की दीवारें दिखती थीं, जिन पर कबूतरों के झुंड उतरते थे। श्यामा का मन, जो पहले एक चंचल तितली की तरह उड़ता था, अब एक पिंजरे में बंद हो गया था, जिसके पंखों में कोई रंगत नहीं बची थी।

किशन सुबह सात बजे निकलता और रात को दस बजे वापस आता। उसका आना भी ऐसा होता था, जैसे बस किसी ने दरवाज़े की कुंडी खोली और फिर चुपचाप अपने कमरे में चला गया। न कोई लंबी बात, न कोई प्यार भरी छेड़छाड़, बस थकान और लैपटॉप की नीली रोशनी। श्यामा रसोई में बैठी दाल-चावल की प्लेट को देखती रहती और सोचती, “क्या यही वो शहर की ज़िंदगी है, जिसके सपने देखकर किशन ने उसे ब्याह कर लाया था?”

उन दोनों के रिश्ते में एक अजीब सी भावनात्मक दूरी आ गई थी। यह दूरी किसी झगड़े की नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी की भाग-दौड़ और संवादहीनता की थी। श्यामा कोशिश करती, कभी उसके लिए गरमा-गरम जलेबी बनाती, तो कभी उसके मनपसंद आलू के पराठे, पर किशन की प्रतिक्रिया बस एक सूखी "अच्छी है" तक सिमटकर रह जाती। श्यामा को लगता था कि वह बस इस घर की दीवारों से बात कर रही है।

एक दिन, बारिश शुरू हुई। इंदौर में सावन की पहली फुहार आई तो श्यामा को गाँव के कच्चे आँगन की मिट्टी की महक याद आ गई। वह भागकर बालकनी में गई और ठंडी हवा का एक गहरा साँस लिया। हवा में भीगी हुई धरती की सोंधी गंध थी, पर उस गंध में भी उसे अपनापन नहीं मिला। तभी बगल वाली बालकनी से एक आवाज़ आई।

"भाभी, चाय मिलेगी क्या? आज तो मौसम भी गरमा-गरम पकौड़ों की माँग कर रहा है।"

वह था उनका पड़ोसी, समीर। समीर, किशन के ही ऑफिस में काम करता था, पर दूसरे विभाग में। वह अविवाहित था और अक्सर किशन के साथ ही ऑफिस जाता था। वह दिखने में हँसमुख, मिलनसार और आँखों में एक शरारत भरी चमक रखने वाला नौजवान था। श्यामा ने उसे पलट कर देखा। वह टी-शर्ट और लोअर में खड़ा था, उसके बाल बारिश की नमी से हल्के गीले थे।

"हाँ, क्यों नहीं समीर, तुम बैठो, मैं अभी लाई," श्यामा ने धीमे से कहा। उसे अच्छा लगा कि किसी ने उससे पूरे दिन में पहली बार ढंग से बात की।

चाय और गरमा-गरम प्याज के पकौड़े समीर को बहुत पसंद आए। समीर बातों-बातों में अपनी ऑफिस की कहानियाँ सुनाने लगा। उसकी बातें सुनकर श्यामा पहली बार हँसी, उसकी हँसी में एक लंबे समय बाद एक खनक थी। समीर ने महसूस किया कि इस घर में एक अजीब सी उदासी का डेरा है। उसने देखा कि श्यामा की आँखें अक्सर नम रहती हैं, भले ही वह मुस्कुराने की कोशिश करे।

कुछ दिनों बाद, यह एक रूटीन बन गया। जब भी किशन काम पर होता, समीर कभी बालकनी से, तो कभी दरवाज़े पर आकर श्यामा से हाल-चाल पूछता। वह कभी घर के काम में मदद की पेशकश करता, कभी बाज़ार से कुछ लाने को कह देता। यह सब बहुत ही साधारण और पड़ोसी जैसा था, पर श्यामा को इस साधारण सी देखभाल में एक भावनात्मक सहारा मिला। किशन के घर में रहते हुए भी उसे जो अकेलापन महसूस होता था, समीर की उपस्थिति उस अकेलेपन को दूर कर देती थी।

एक शाम, किशन को एक ज़रूरी मीटिंग के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। घर में श्यामा अकेली थी। रात का वक्त था, और जोर की बिजली कड़की। श्यामा बचपन से ही बिजली की कड़क से डरती थी। वह डर के मारे काँपने लगी और कोने में दुबक गई। तभी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई।

"भाभी, सब ठीक है? इतनी जोर से कड़क रही थी बिजली... मुझे लगा आप डर न जाएँ।"

समीर दरवाज़े पर खड़ा था, उसके चेहरे पर सच्ची चिंता थी। श्यामा की आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला और कुछ बोल नहीं पाई। समीर ने देखा कि वह कितनी डरी हुई है। उसने बिना कुछ कहे, बस धीमी आवाज़ में कहा, "मैं बस बाहर बरामदे में बैठ जाता हूँ, आपको किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो आवाज़ लगा दीजिएगा।"

समीर का यूँ दरवाज़े के बाहर बैठ जाना, श्यामा को एक बड़े और मजबूत सहारे जैसा लगा। उसके मन का डर धीरे-धीरे कम होने लगा। वह जानती थी कि यह सब गलत है, वह विवाहित है और समीर सिर्फ एक पड़ोसी है, पर किशन की भावनात्मक दूरी ने उसके मन में एक खालीपन भर दिया था, जिसे समीर की छोटी-छोटी बातों ने धीरे-धीरे भरना शुरू कर दिया था।

अगले दिन सुबह जब समीर जाने लगा, तो श्यामा ने उसे रोका। "समीर, कल रात के लिए शुक्रिया।" समीर ने बस मुस्कुरा दिया। उसकी आँखों में एक ऐसी भावना थी, जो सिर्फ एक पड़ोसी की नहीं थी। वह भावना थी किसी खाली पड़े दिल में जगह बनाने की।

समय बीतता गया। श्यामा का और समीर का रिश्ता अब एक अनकहा मोड़ ले चुका था। वे दोनों एक-दूसरे की आँखों में वो सब पढ़ लेते थे, जो ज़ुबान से कभी कहा नहीं गया। वे घंटों बालकनी में खड़े होकर बस चाय पीते और चुप रहते। उनकी खामोशी में ही सारी बातें हो जाती थीं। किशन अब भी काम में डूबा था, उसे न तो श्यामा के चेहरे की बदली हुई चमक दिखी, न ही उस घर के माहौल में आई नई सी गरमाहट।

एक दिन, श्यामा के जन्मदिन पर, किशन ने बस फोन पर विश किया और कहा कि वह रात को देर से आएगा। श्यामा उदास होकर बैठी थी, तभी दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। समीर आया, उसके हाथ में एक छोटा सा केक था और एक साधारण सी गेंदे के फूलों की माला।

"किशन भाई ने मना किया था कि मैं आपको डिस्टर्ब न करूँ, पर भाभी, आज आपका जन्मदिन है, और जन्मदिन पर कोई अकेला नहीं होना चाहिए।"

श्यामा की आँखें भर आईं। यह छोटी सी कोशिश, किशन के बड़े-बड़े तोहफ़ों से कहीं ज़्यादा कीमती थी। उसने केक काटा और समीर को खिलाया। उस पल, दोनों के बीच की दूरी टूट गई। समीर ने धीरे से श्यामा का हाथ छुआ। श्यामा ने हाथ नहीं हटाया, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने समीर की आँखों में देखा और वहाँ उसे वो अपनापन, वो प्यार और वो चाहत दिखी, जिसकी वह दो सालों से भूखी थी।

तभी, दरवाज़ा खुला और किशन अंदर आया। उसके हाथ में एक बड़ा सा गिफ्ट पैक था। उसने समीर को देखा, फिर केक को, फिर श्यामा के हाथ को, जो अभी भी समीर के पास रखा था। किशन का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया।

"समीर, तुम यहाँ? और श्यामा, ये क्या हो रहा है?" किशन की आवाज़ में आश्चर्य और क्रोध दोनों था।

श्यामा और समीर दोनों सकपका गए। समीर ने तुरंत अपना हाथ हटाया और कहा, "किशन भाई, मैं तो बस... भाभी का बर्थडे था, इसलिए एक छोटा सा केक देने आया था। अभी जा ही रहा था।"

किशन ने गुस्से में समीर की बात काटी, "नहीं, तुम अभी नहीं जा रहे। मुझे बताओ, ये सब कब से चल रहा है? तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है?" उसकी आवाज़ अब तेज हो गई थी।

श्यामा ने धीरे से कहा, "किशन, ऐसी कोई बात नहीं है। समीर बस..."

"बस क्या? बस तुम दोनों मेरे पीछे से छुप-छुपकर मिल रहे थे? श्यामा, मैं जानता हूँ, तुम शहर की ज़िंदगी से खुश नहीं हो, पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम..." किशन का गला रुंध गया। वह टूटे हुए मन से अपनी बात पूरी नहीं कर सका।

समीर ने बीच में आकर कहा, "किशन भाई, आप गलत समझ रहे हैं। श्यामा भाभी अकेली थीं और मैं बस... मैं उनका एक दोस्त बन गया था। आप हमेशा काम में डूबे रहते थे। कोई ग़लत इरादा नहीं था।"

किशन उस पर विश्वास नहीं कर सका। उसके मन में शक का बीज गहरा बोया जा चुका था। अगले कुछ दिन, घर में एक अजीब सा तनाव रहा। किशन न तो श्यामा से बात करता, न ही समीर से। उसने श्यामा पर नजर रखना शुरू कर दिया। श्यामा अंदर ही अंदर टूट रही थी। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने अनजाने में ही सही, पर अपने वैवाहिक रिश्ते की डोर को कमज़ोर कर दिया था। उसे यह भी अहसास हुआ कि समीर के साथ जो अपनापन मिला, वह सिर्फ एक खालीपन को भरने का एक सहारा था, जिसे प्यार का नाम नहीं दिया जा सकता।

एक रात, श्यामा ने हिम्मत जुटाई और किशन के पास गई। "किशन, मुझे माफ़ कर दो। मैं जानती हूँ कि मैंने तुम्हें दुख पहुँचाया है। पर तुम ये भी देखो कि मैं कितनी अकेली हो गई थी। तुम कभी मुझसे बात नहीं करते, तुम कभी पूछते नहीं कि मेरा मन क्यों उदास है। मैं घर में होते हुए भी तुम्हें खो चुकी थी। समीर ने मुझे वो अपनापन दिया, जिसकी मुझे ज़रूरत थी, पर मैंने सीमा पार नहीं की। मैंने अपने रिश्ते को धोखा नहीं दिया, पर हाँ, तुम्हारे दूर होने ने मुझे कमज़ोर कर दिया था।"

श्यामा की आँखों में सच्चा पश्चाताप था। किशन ने उसकी आँखें देखीं। उसे अपनी गलती का भी अहसास हुआ। उसने अपनी पत्नी को नज़रअंदाज़ कर दिया था। उसने उसे घर की चीज़ समझ लिया था, जिसकी अपनी भावनाएँ नहीं होतीं।

किशन ने धीरे से श्यामा का हाथ पकड़ा। "श्यामा, मैं भी माफ़ी माँगता हूँ। मैं काम में इतना डूब गया कि मैं भूल गया कि मेरा सबसे ज़रूरी काम तुम हो। मैंने तुम्हें वो वक्त नहीं दिया, जिसकी तुम हक़दार थीं। मुझे लगा कि पैसे कमाकर मैं तुम्हें खुशी दे सकता हूँ, पर मैं भूल गया कि तुम्हें पैसे से ज़्यादा मेरे साथ की ज़रूरत थी।"

उस रात, वे दोनों देर तक बैठे रहे और बहुत सी बातें कीं, जो उन्होंने पिछले दो सालों में नहीं की थीं। किशन ने अपना दिल खोला, श्यामा ने अपना अकेलापन बताया। उनके बीच की वो भावनात्मक दूरी, जो इतनी गहरी हो चुकी थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी।

अगले दिन सुबह, समीर ने बालकनी में आकर श्यामा को देखा, श्यामा ने बस मुस्कुराकर 'नमस्ते' किया। वह समझ गया। उसने भी बस सिर हिलाया और ऑफिस के लिए तैयार होने चला गया। वह जानता था कि अब उसे पीछे हट जाना चाहिए। उसने एक टूटे हुए रिश्ते को सहारा दिया, पर उसे फिर से जुड़ने का मौका देना ज़्यादा ज़रूरी था। कुछ दिनों बाद, समीर ने नौकरी बदली और वह शहर छोड़कर चला गया।

इंदौर की भागती गलियाँ अब भी भाग रही थीं, पर अब श्यामा का मन वहाँ ठहरा हुआ था। उसके पास अब किशन का वक्त था, उसका साथ था, और सबसे ज़रूरी, उनका फिर से जुड़ा हुआ, मजबूत रिश्ता था। वह समझ गई कि वैवाहिक रिश्ते की नींव किसी और की दया पर नहीं, बल्कि पति-पत्नी के आपसी संवाद और भावनात्मक निकटता पर टिकी होती है।

सर्दी की हल्की ठिठुरन वाली वह सुबह थी। इंदौर की गलियों में धूप अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी, बस आसमान हल्का सुनहरा हो रहा थ...
04/12/2025

सर्दी की हल्की ठिठुरन वाली वह सुबह थी। इंदौर की गलियों में धूप अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी, बस आसमान हल्का सुनहरा हो रहा था। मोहल्ले के कोने पर वाली दुकान से ताजा पोहे और जलेबी की खुशबू हवा में घूम रही थी। सामने वाली छत पर कोई रजाई में लिपटा खड़ा धूप नाप रहा था। इस सब के बीच, तीसरी मंजिल की उस छोटी सी बालकनी में सावित्री अपार्टमेंट का एक घर चुपचाप जाग रहा था।

रसोई में केतली से उठती भाप ने शीशे की खिड़की को थोड़ा भिगो दिया था। काव्या चाय के गिलास में अदरक मसाला डाल रही थी। उसकी उंगलियां मेज पर रखे स्टील के डिब्बे को अपनी आदत से हल्का सा थपथपा रही थीं, जैसे दिल के अंदर जमा बेचैनी ताल ढूंढ रही हो। गैस की धीमी आवाज, केतली की भनभन, और दूर कहीं से आती स्कूल की बस की सीटी, सब मिलकर एक परिचित सा शोर बना रहे थे, जिसमें आज भी एक खामोशी छुपी थी।

बैडरूम से अलमारी का दरवाजा बंद होने की आवाज आई। राघव तैयार हो चुका था। नीली शर्ट की कफ ठीक करते हुए वह हॉल में आया तो उसकी नजर एक पल के लिए काव्या पर पड़ी। पहले जहां यह नज़र मुस्कान लेकर आती थी, अब बस एक औपचारिक सी झलक भर रह गई थी।

काव्या ने बिना ऊपर देखे ही पूछा
चाय में चीनी कम रखनी है ना, डॉक्टर ने बोला था

राघव ने मोबाइल देखते हुए तेज आवाज में कहा
हां, बस थोड़ी सी डालना, तुम तो जानती हो

जानती तो बहुत कुछ थी काव्या, लेकिन आजकल जानने और मानने के बीच बहुत दूरी आ गई थी। उसने चाय के दो गिलास ट्रे में रखे, एक में कम चीनी, दूसरे में वही पुरानी आदत वाला मीठा स्वाद। ट्रे उठाते हुए उसकी नजर मेज पर पड़ी उस तीसरे गिलास पर गई, जो अक्सर खाली ही रह जाता था।

घर छोड़कर गए सपनों के लिए वह कभी तीसरा गिलास रखती थी। सोचती थी कि कभी तो बैठकर दो बातें हो जाएंगी, कभी तो यह चुप्पी टूटेगी। पर अब वह तीसरा गिलास भी धीरे धीरे एक बोझ जैसा लगने लगा था।

राघव डाइनिंग टेबल पर बैठा, पर नजरें मोबाइल में थीं। स्क्रीन पर किसी का नाम चमक रहा था, नidhi। काव्या ने अनदेखा करते हुए ट्रे रखी और धीरे से बोली
लो, चाय ठंडी होने से पहले पी लेना

राघव ने हां में सिर हिलाया, पर आंखें अभी भी संदेश पढ़ रही थीं।

संदेश की पंक्तियां छोटी थीं, पर काव्या ने उन्हें कई बार अपने मन में महसूस किया था। कुछ दिन पहले गलती से मोबाइल मेज पर पड़ा रह गया था और स्क्रीन पर उभरा था
आज फिर आप से बातें करके हल्का लग रहा है, राघव, काश घर पर भी कोई ऐसे समझता

उस दिन से चाय का स्वाद बदल गया था। अदरक की महक में शक की हल्की सुगंध घुल गई थी।

आज भी मोबाइल वाइब्रेट हुआ। राघव ने गिलास उठाने से पहले ही संदेश देख लिया और अनजाने में मुस्कुरा दिया।

काव्या की उंगलियां मेज पर रखे चम्मच के पास जाकर रुक गईं। उसने अपने गिलास से एक घूंट लिया, मसालेदार चाय की गर्मी गले से नीचे उतरी, पर दिल के भीतर तक सर्दी का मौसम ही बना रहा।

तुम आज भी जल्दी निकल रहे हो

हां, ऑफिस में प्रेजेंटेशन है, नidhi ने रात भर मदद की, थोड़ा तैयार होना है

नidhi नाम लेते हुए राघव की आवाज नर्म हो गई थी। यह वही नरमी थी जिसे काव्या पहले अपने लिए महसूस करती थी। उसके होंठों ने हल्की सी मुस्कान ओढ़ ली, पर आंखों में नमी का एक पतला पर्दा उतर आया।

तुम्हारे पास तो अब हर बात के लिए समय है, बस घर की बातें छोड़कर

राघव ने पहली बार मोबाइल नीचे रखा। उसने काव्या की तरफ देखा, पर उस नजर में थकान अधिक थी और समझ कम।

फिर से शुरू मत हो जाओ, काव्या। सुबह सुबह लड़ाई का मन है क्या तुम्हारा

लड़ाई शब्द ने काव्या को चुभो दिया। उसने बस इतना कहा
ठीक है, चाय खत्म करके निकल जाना, टिफिन रख दिया है

राघव ने एक घूंट चाय का लिया, चेहरा थोड़ा सिकुड़ा
चीनी थोड़ी ज्यादा लग रही है

काव्या ने भौंहें चढ़ाकर हल्की सी मुस्कान छुपाते हुए कहा
पता है, तुम्हें मीठा पसंद नहीं रहा, ना बात में, ना चाय में

राघव कुछ बोल पाता, उससे पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी।

दरवाजा खोलते ही सामने वाली पड़ोसन, रमा खड़ी थी। हाथ में दूध का छोटा बरतन, और चेहरे पर वैसे ही चमकती मुस्कान।

अरे भाभी, जरा दूध कम पड़ गया, सोच रही थी आप से ले लूं। वैसे सुबह सुबह कितनी अच्छी खुशबू आती है आपके घर से, चाय की, मसालों की, सब कुछ बस देसी सा लगता है

काव्या ने मुस्कुराते हुए दूध दे दिया। रमा की नजर एक पल के लिए अंदर कमरे में बैठे राघव पर पड़ी, फिर जल्दी से हट गई।

अच्छा भाभी, आज फिर अकेले जा रहे हैं जीजाजी, आप चलिए ना कभी साथ, ऊपर वाला पार्क में कितनी अच्छी धूप आती है

काव्या ने सिर्फ मुस्कान में जवाब दिया। रमा तो चली गई, पर उसके शब्द हवा में रह गए।

राघव ने बैग उठाया, जूते पहने, और दरवाजे तक पहुंचकर बिना पीछे देखे बस इतना बोला
लेट हो रहा हूं, रात को बात करेंगे

रात कब बात के लिए रुकती थी, यह दोनों ही भूल चुके थे।

चाय का गिलास आधा भरा मेज पर ही रह गया। भाप धीरे धीरे खत्म हो गई, जैसे दोनों के बीच बचे हुए भरोसे की गर्मी।

उस दिन ऑफिस की बिल्डिंग के बाहर हल्की धूप खिली हुई थी। कैफेटेरिया में लोगों की हंसी और कप प्लेट की खनखनाहट शोर कर रही थी। राघव खिड़की के पास वाली टेबल पर बैठा था। सामने नidhi बैठी थी, सलीकेदार सूट में, बाल हल्के से खुले, आंखों में वही समझ जो उसे अपने घर में नहीं मिलती थी।

आप फिर से परेशान लग रहे हो, घर से निकले तब भी चेहरे पर वही बात थी

कुछ खास नहीं, बस वही रोज वाला, घर पर सब अलग ही चलता है, ऑफिस में अलग। समझे जाने की उम्मीद अब छोड़ दी है

आप हर बार यही कहते हो, और हर बार बातें करते करते हल्के भी हो जाते हो

नidhi की आवाज में एक अपनापन था। ऐसा अपनापन जो अलग शहर में, अलग माहौल में अकेले पड़े किसी इंसान को खींच ले। राघव ने चाय का घूंट लिया और अपने मन का बोझ शब्दों में ढालने लगा।

काव्या पहले अलग थी, छोटी छोटी बातें याद रखती थी। हम दोनों छत पर बैठकर चाय पीते थे। वह अपनी तरफ से भी कोशिश करती थी कि मैं कुछ कहूं तो बीच में टोकें नहीं, बस सुनती रहे। पर अब उसके लिए हर बात ताना बन चुकी है

आपने कभी उससे खुलकर बात की

कभी कोशिश की, पर वह बस घर, किराये, राशन, टिफिन, इन सब में उलझ जाती है। उसे लगता है सिर्फ वही थकी हुई है। ऑफिस का दबाव, मेरी थकान, मेरी परेशानियां, शायद उसे दिखती ही नहीं

नidhi ने गहरी सांस ली
कभी कभी हम जिस इंसान के सबसे करीब होते हैं, उसी के सामने अपने मन की बात कहने में सबसे ज्यादा डर लगता है। शायद उसे भी डर हो कि कहीं आप यह न कह दो कि उसकी बातें फिजूल हैं

राघव चुप हो गया।

उधर घर पर, काव्या कमरे की सफाई करते करते अचानक अलमारी के ऊपरी खाने में रखी फाइलें देख रही थी। एक फाइल के बीच में उसे पुराना लिफाफा मिला। खोलकर देखा तो पुराने दिनों की कुछ तस्वीरें थीं। उज्जैन की यात्रा की तस्वीर, जहां दोनों ने पहली बार बिना किसी की चिंता किए पूरा दिन घूम लिया था।

एक फोटो में काव्या की हंसी खुलकर थी, बाल हवा में उड़े थे, और हाथ में पेपर कप में चाय थी। उस फोटो के पीछे राघव की लिखावट थी
जब तुम हंसती हो तो दुनिया की सारी परेशानियां हल्की लगती हैं

काव्या ने उंगलियों से वह लिखावट छूई। आंखों में पानी भर आया।

मेरी हंसी कब इतनी भारी हो गई कि तुम्हें दिखाई ही नहीं देती, राघव

उसी दिन दोपहर में रमा फिर आई। इस बार उसके चेहरे पर थोड़ी झिझक थी।

भाभी, अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछूं

क्यों, क्या हुआ

आज सुबह जब मैं दूध लेने आई थी ना, तब जीजाजी की कॉल पर जो नाम फ्लैश हुआ था, वह कोई नidhi थी क्या

काव्या का दिल एक पल को थम सा गया। उसने खुद को संभालते हुए कहा
हां, ऑफिस में साथ काम करती है

अच्छा, मैंने बस ऐसे ही पूछ लिया। देखो भाभी, मैं कुछ गलत नहीं कह रही, पर आजकल मोबाइल की वजह से कितने घरों में शिकायतें भर गई हैं। मैं तो बस इतना बोलूंगी, आप अपने जीजाजी से खुलकर बात किया करो। अंदर ही अंदर घुटने से अच्छा है बाहर निकाल लो

रमा के शब्दों में पहली बार हल्की जलन नहीं, बल्कि चिंता थी। काव्या ने महसूस किया कि वह अकेली नहीं है, पर वह न अपनी तकलीफ सही से किसी से कह पाती थी, न ही खुद से लड़ना छोड़ पाती थी।

रात आई तो शहर की सड़कें रोशनियों से भर गईं। इंदौर की हवा में समोसे और चाय की खुशबू और ट्रैफिक का शोर घुला था। घर की खिड़की से बाहर देखते हुए काव्या ने महसूस किया, आज की रात भी शायद वैसे ही गुजर जाएगी, कुछ बदले बिना।

राघव थोड़ा देर से आया। चेहरे पर थकान के साथ साथ अजीब सी उलझन भी थी। उसने बैग सोफे पर रखा और बिना कुछ बोले सीधे वॉशरूम की तरफ चला गया।

काव्या ने किचन में रखी चाय की केतली की तरफ देखा। आज अचानक मन हुआ कि बात शुरू की जाए।

वह दरवाजे के पास जाकर धीरे से बोली
आज चाय बनाऊं

राघव ने अंदर से ही जवाब दिया
थक गया हूं, रहने दो

थोड़ी देर बाद वह बाहर आया, बाल तौलिये से सुखाते हुए बोला
काव्या, तुमसे एक बात करनी थी

काव्या ने चौक कर उसकी तरफ देखा। कई दिनों बाद यह पहला मौका था जब बातचीत की शुरुआत उसकी तरफ से नहीं, बल्कि राघव की तरफ से हो रही थी।

बोलो

ऑफिस में जो नidhi है ना, उसी के बारे में

उसका नाम सुनते ही काव्या के सीने के भीतर कुछ भारी सा उठकर बैठ गया, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा
क्या है उसके बारे में

वह अच्छी लड़की है, समझदार है। पर तुम जो सोच रही हो, वैसा कुछ नहीं है

मैं क्या सोच रही हूं, तुम कैसे जानते हो

क्योंकि कई दिनों से तुम्हारी नजरें, तुम्हारा लहजा, तुम्हारी चुप्पी, सब कुछ मुझे एक ही बात कह रहे हैं कि तुम मुझ पर भरोसा नहीं कर रही

काव्या के होंठ कांप गए
जब तुम फोन पर मुस्कुराते हो, जब उसके मैसेज पर तुम्हारी आंखों में अलग सी चमक आती है, तब खुद को समझाना आसान नहीं होता। आज सुबह भी जब तुमने कहा कि उसने रात भर मदद की, तब भी मेरे हाथ अपने आप चाय की चीनी बढ़ा बैठे

राघव ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा, जैसे अचानक उसे वे सारे छोटे पल याद आ गए जिनमें काव्या ने चीनी, नमक, मसाले की तरह अपने मन को भी समेट समेट कर रखा था।

तुमने कभी पूछा क्यों कि मैं उससे बात क्यों करता हूं

काव्या ने धीमी आवाज में कहा
शायद डर था कि पूछने पर जवाब सुनने की हिम्मत नहीं होगी

राघव ने सोफे पर बैठते हुए गहरी सांस ली
मैं उससे इसलिए बात करता हूं क्योंकि वह मुझे सुनती है। रोज नहीं, हर बात पर नहीं, बस कभी कभी। ऑफिस का तनाव हो, घर की जिम्मेदारियां हों, सब कुछ मिलकर इतना भारी हो जाता है कि लगता है कहीं तो दिल रख दूं। वह सिर्फ सुन लेती है, समझ लेती है, कोई शिकायत नहीं करती

काव्या की आंखों से आँसू निकल कर गाल तक आ गए
और मैं क्या करती हूं, जो तुम मेरे साथ यह सब नहीं कर पाते

तुम शिकायत करती हो। जब भी मैं कुछ कहना चाहता हूं, तुम राशन, गैस, बिल, किराये, सब में उलझ जाती हो। मुझे लगता है मैं तुम्हारे लिए बस एटीएम बनकर रह गया हूं

काव्या ने अपने हाथों की तरफ देखा। उन हाथों पर रोटी के आटे की महीन सी परत जैसे अचानक भारी लगने लगी।

तुम्हें पता है, राघव, जब तुम घर से निकलते हो ना, तब मैं तुम्हारे लिए सिर्फ टिफिन नहीं बनाती। मैं हर दिन तुम्हारे मन का भी टिफिन पैक करती हूं। उसमें यादें भरती हूं, उम्मीदें भरती हूं। पर वह तुम्हारे ऑफिस पहुंचते पहुंचते कहीं गिर जाता है शायद

दोनों के बीच खामोशी छा गई। बाहर गली में सब्जी वाले की आवाज गूंज रही थी। दूर कहीं किसी घर से भजन की हल्की धुन आ रही थी।

राघव ने पहली बार ध्यान से काव्या को देखा। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे, माथे पर चिंता की अनगिनत लकीरें, बालों में उभरे कुछ सफेद बाल। उसे याद आया, जब वे इंदौर शिफ्ट हुए थे, तब काव्या कितनी खुश थी। नए शहर, नए घर, नए सपनों को लेकर। तब वह हर शाम छत पर बैठकर कहती थी
हम यहां अपनी नई कहानी लिखेंगे, है ना

आज वही कहानी बीच में कहीं उलझ गई थी।

राघव ने धीरे से कहा
मैं मानता हूं कि मैंने भी गलती की। नidhi के सामने जाकर अपने मन का बोझ हल्का करना आसान था, क्योंकि वहां कोई पुराना हिसाब किताब नहीं था। कोई पुरानी शिकायत नहीं थी। पर यह भी सच है कि दिन के अंत में जब मैं थककर घर आता हूं, तो मेरा मन सिर्फ तुम्हें ढूंढता है

तो फिर ढूंढते कहां हो, राघव, बाहर या मेरे पास

यह सवाल कमरे में गूंज गया।

कुछ पल तक दोनों चुप रहे। फिर अचानक काव्या उठी और किचन की तरफ चली गई। राघव ने सोचा, शायद फिर से वही चुप्पी शुरू हो गई। पर कुछ देर बाद वह लौटी तो उसके हाथ में केतली और दो गिलास थे।

उसने टेबल पर वही तीसरा खाली गिलास भी रख दिया, जो कई दिनों से उसकी आदत बन चुका था।

यह तीसरा गिलास क्यूं

काव्या ने धीमी मुस्कान के साथ कहा
यह हमारे अनकहे शब्दों के लिए है। जो बातें हम अभी कह नहीं पा रहे, जो शिकायतें, जो डर, जो कसक, सब इस गिलास में रख देंगे, बिना बोले। बस हर घूंट के साथ मान लेंगे कि हम दोनों गलत भी हो सकते हैं, दोनों सही भी हो सकते हैं, और फिर भी साथ रहना चाहते हैं

राघव ने उसकी बात ध्यान से सुनी।

तुम हमेशा से इतनी गहरी बातें करती थी, पर शायद मैंने सुनना ही बंद कर दिया। मुझे लगा था घर की औरत के पास सिर्फ बर्तन, झाड़ू, सब्जी की बातें होती हैं। अगर वह अपनी थकान का जिक्र करती है तो उसे मैं शिकायत समझ लेता था।

काव्या की आंखें नम थीं
और मुझे लगा था कि ऑफिस वाला आदमी घर की बातें समझ ही नहीं सकता। आज महसूस हो रहा है कि हम दोनों ने एक दूसरे पर जो ठप्पा लगा दिया था, वही हमारे बीच दीवार बन गया

राघव ने अपना गिलास उठाया
चलो, आज से एक नई शुरुआत करते हैं। नidhi से मैं अब दूरी रखूंगा, पर यह दूरी सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होगी। मैं खुद से वादा करता हूं कि घर लौटकर अपने मन की सारी थकान, सारी बातें तुम्हारे सामने ही रखूंगा। और अगर कभी मैं भटकूं, तो तुम डांटना नहीं, बस मुझे याद दिला देना कि मेरा तीसरा गिलास यहीं भरा हुआ है

काव्या ने भी गिलास उठाया
और मैं वादा करती हूं कि तुम्हारी हर बात को शिकायत नहीं, बल्कि तुम्हारे मन की चाय मानकर सुनूंगी। अगर ज्यादा उबल जाए तो आग कम कर दूंगी, अगर फीकी लगेगी तो चीनी बढ़ा दूंगी, पर उंडेलूंगी नहीं

फिर दोनों एक साथ हंस पड़े। उस हंसी में पुराने दिनों की हल्कापन था।

अगले कुछ दिनों में छोटे छोटे बदलाव आए।

राघव ने ऑफिस में नidhi को साफ साफ कह दिया
तुम्हारा साथ मेरे लिए बहुत मायने रखता है, पर मुझे अब अपने घर के रिश्ते को ठीक करना है। मैं तुम्हें गलत उम्मीद नहीं देना चाहता

नidhi ने चुपचाप सिर हिलाया
कभी कभी जो लोग हमें समझते हैं, उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए, पर अगर उन्हें पकड़ कर रखने से आपका घर टूटता हो, तो छोड़ देना ही बेहतर है। जाओ, अपने घर की चाय फिर से मीठी कर लो

उधर घर में, काव्या ने खुद के लिए थोड़ी सी जगह बनानी शुरू की। रमा के साथ सुबह पार्क जाना, कभी खुद के लिए किताब उठाना, कभी अकेले छत पर जाकर धूप में बैठना। उसने समझा कि अगर वह सिर्फ जिम्मेदारियों में ही खुद को गुम कर देगी, तो राघव को भी उसके भीतर की वह लड़की कभी दिखाई नहीं देगी, जिससे वह कभी प्रेम करता था।

एक शाम, जब इंदौर की ठंडी हवा में पत्तों की सरसराहट भर गई थी, दोनों छत पर बैठे थे। सामने आसमान में हल्का चांद था, और नीचे शहर की हलचल धीमी हो चुकी थी।

काव्या ने धीरे से पूछा
अगर सच में नidhi से तुम्हारा मन जुड़ जाता, तो क्या तुम मुझे छोड़ देते

राघव ने कुछ देर आसमान की तरफ देखा
शायद हम यहां तक पहुंचते ही नहीं। रिश्ते अचानक नहीं टूटते, धीरे धीरे दरारें पड़ती हैं। अगर तुमने तीसरा गिलास नहीं रखा होता, अगर तुमने मेरे लिए वह जगह नहीं बनाई होती, तो मैं शायद खुद को समझा देता कि जो रिश्ता नाम नहीं पा रहा, वही सच्चा है। पर आज महसूस हो रहा है कि जो रिश्ता रोज थोड़ा थोड़ा समझौते के साथ जीता है, वही असली होता है

काव्या ने आंखें बंद कर लीं।
कुछ लम्हे अधूरे ही अच्छे लगते हैं, राघव। हर बात का हिसाब हो जाए, हर दर्द का कारण मिल जाए, तो जिंदगी बहुत सूखी हो जाती है। हमें बस इतना याद रखना चाहिए कि अगर दिल में जगह बाकी है, तो रिश्ते को खत्म नहीं करना चाहिए

राघव ने उसकी हथेली पकड़ ली। स्पर्श में अनजानापन नहीं था, बल्कि पुराने अपनापन की नई पहचान थी।

उस रात चाय के तीनों गिलास खाली हुए। पहला राघव के मन का, दूसरा काव्या के दिल का, और तीसरा उन अनकहे शब्दों का, जिन्हें उन्होंने गठरी बनाकर अपने ही घर के एक कोने में सहेज लिया था।

इंदौर की सर्द रात में उस छोटे से फ्लैट की खिड़की से हल्की पीली रोशनी बाहर झांक रही थी। दूर उन रोशनियों को देखकर कोई यह नहीं समझ सकता था कि इस घर की चाय आज सच में कितनी मीठी हो गई है।

कहानी की सीख

रिश्ते हमेशा बड़े फैसलों से नहीं बचते, कभी कभी बस इतना काफी होता है कि हम अपने मन की चाय किसी अपने के साथ बैठकर धीरे धीरे पी लें। जो बात कई दिनों से दिल में फंसी हो, उसे अनकहा छोड़ देने से सिर्फ भरोसा ठंडी पड़ता है। विश्वास की गर्माहट वहीं लौटती है, जहां दो लोग अपनी गलती, अपनी थकान और अपना डर एक दूसरे की आंखों में सच सच स्वीकार कर सकें।

यही जीवन है, जो रिश्ता नाम के पीछे नहीं भागता, बल्कि रोजमर्रा की छोटी छोटी बातों में अपने होने का सबूत देता है।

28 साल की रितिका, आज फिर देर रात तक अपने क्यूबिकल में बैठी थी।उसने आज एक हल्की भूरी साड़ी पहनी थी, जिसमें उसके सुडौल बदन...
25/11/2025

28 साल की रितिका, आज फिर देर रात तक अपने क्यूबिकल में बैठी थी।

उसने आज एक हल्की भूरी साड़ी पहनी थी, जिसमें उसके सुडौल बदन की कसावट साफ झलक रही थी।

उसके वक्षों का उभार और कमर की लचक, ऑफिस के फॉर्मल माहौल में भी लोगों का ध्यान खींच लेती थी।

हैदराबाद के इस बड़े आईटी हब में रितिका एक सीनियर एनालिस्ट के तौर पर काम कर रही थी।

बाहर मानसून की पहली बारिश शुरू हो चुकी थी, और कांच की खिड़की पर बूँदें तेज़ी से गिरकर फिसल रही थीं।

पूरे फ्लोर पर बस रितिका के कीबोर्ड की धीमी टक-टक की आवाज़ थी और एसी का एक लगातार आता हुआ यांत्रिक शोर।

रितिका ने चाय का ठंडा हो चुका कप उठाया और एक कड़वा घूंट पी लिया।

उसे पता था कि घर जाकर भी उसे कोई सुकून नहीं मिलेगा।

उसका पति रोहित, एक सफल बैंकर था, लेकिन पिछले दो सालों में उनके रिश्ते में एक ऐसी भावनात्मक दूरी आ गई थी, जिसे रितिका लाख कोशिशों के बाद भी पाट नहीं पाई थी।

रोहित घर आता, खाना खाता और लैपटॉप में या फ़ोन में खो जाता।

दोनों के बीच की बातचीत अब बस "क्या खाया?" और "आज कैसा रहा?" तक सिमट कर रह गई थी।

रितिका ने काम में खुद को इतना झोंक दिया था कि अब ऑफिस उसके लिए एक मजबूरी नहीं, बल्कि उस खालीपन से बचने का एक जरिया बन गया था।

उसने अपना सारा ध्यान काम में लगा दिया, जैसे उसके कीबोर्ड की हर एक क्लिक उसके दिल के दर्द को कम कर रही हो।

तभी उसके पीछे से एक धीमी और सधी हुई आवाज़ आई।

क्या प्रोजेक्ट ख़त्म हो गया रितिका?

ये आवाज़ उसके बॉस वरुण की थी।

वरुण करीब 32 साल के थे, बेहद काबिल और शांत स्वभाव के।

वो आमतौर पर जल्दी चले जाते थे, लेकिन आज शायद किसी ज़रूरी मीटिंग के कारण देर हो गई थी।

वरुण ने देखा कि रितिका अभी भी अपनी स्क्रीन पर झुकी हुई है, उसके चेहरे पर एक थकान है, लेकिन काम खत्म करने का दृढ़ निश्चय भी है।

रितिका घबराई नहीं, क्योंकि वरुण हमेशा बहुत ही सम्मान के साथ बात करते थे।

उसने पीछे मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर एक प्रोफेशनल मुस्कान थी।

उसने कहा, बस सर, थोड़ा सा बाकी है, सबमिट करके ही जाऊँगी।

वरुण एक पल के लिए रितिका के पास खड़े रहे।

उन्होंने महसूस किया कि रितिका की आँखें थक चुकी हैं, लेकिन वो आँखें कुछ और भी कह रही हैं, कुछ अनकहा दर्द।

वरुण ने धीरे से कहा, देखिए रितिका, काम कल भी ख़त्म हो जाएगा। बाहर बहुत तेज़ बारिश हो रही है, देर मत कीजिए। मैं टैक्सी बुक करवा देता हूँ।

रितिका ने शुक्रिया कहा, लेकिन उठी नहीं।

वरुण ने देखा कि रितिका का पल्लू कुर्सी के किनारे पर थोड़ा सा अटक गया है, और उसका सुडौल बदन साड़ी में कसे होने के बावजूद, हवा में नमी के कारण और भी ज़्यादा संवेदनशील लग रहा है।

वरुण ने तुरंत अपनी नज़रें हटाईं, और फिर धीरे से उस अटके हुए पल्लू को छुड़ाया।

उस स्पर्श में कोई दुर्भावना नहीं थी, बस एक सज्जनता थी, लेकिन रितिका के लिए ये स्पर्श किसी करंट जैसा था।

उसने वरुण की तरफ देखा।

वरुण की आँखें सम्मान और सिर्फ चिंता से भरी थीं, उसमें कोई लालच या जिज्ञासा नहीं थी।

ये वरुण का वो धीमा लहज़ा और सम्मान था, जो रितिका को उसके पति रोहित से कभी नहीं मिला।

रोहित तो घर में उसे सिर्फ एक वस्तु की तरह देखते थे।

वरुण अपनी डेस्क पर गए, अपना लैपटॉप बंद किया और फिर वापस रितिका के पास आए।

उन्होंने कहा, चलो, मैं वेट कर रहा हूँ, मुझे भी अभी घर जाना है।

वरुण की मौजूदगी से रितिका को एक अजीब सी ऊर्जा मिली।

उसने जल्दी से अपना काम समेटा, सिस्टम बंद किया और पर्स उठाया।

जब रितिका उठी, तो उसके शरीर की एक धीमी सी खुशबू वरुण तक पहुँची।

कॉरिडोर की लंबी, ठंडी रोशनी में दोनों लिफ्ट की तरफ बढ़े।

लिफ्ट में वरुण ने पूछा, आपको अक्सर देर हो जाती है रितिका, क्या घर में सब ठीक है?

रितिका को लगा कि उसका दम घुट रहा है।

वो इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहती थी, क्योंकि इसका जवाब उसके पास खुद भी नहीं था।

उसने कहा, जी सर, बस काम ज्यादा रहता है।

वरुण ने लिफ्ट के कांच में रितिका के चेहरे का प्रतिबिंब देखा।

उन्होंने कहा, देखिए रितिका, मैं आपका बॉस हूँ, लेकिन मैं ये भी जानता हूँ कि जब कोई इतना खूबसूरत और काबिल इंसान इतना काम करे, तो कहीं न कहीं वो अपनी जिंदगी के किसी खालीपन को भरने की कोशिश कर रहा होता है।

वरुण की ये गहरी बात रितिका के दिल को छू गई।

उसे लगा कि इस दुनिया में कोई तो है, जिसने उसकी खूबसूरती को नहीं, बल्कि उसकी खामोशी को पढ़ा है।

लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर रुकी।

बाहर बारिश अब भी मूसलाधार थी, और हैदराबाद की सड़कों पर पानी भर चुका था।

वरुण ने अपनी कार की चाबी निकाली, लेकिन फिर रुक गए।

उन्होंने कहा, मेरी कार की सर्विसिंग होनी है, तो आज मैं कैब से जा रहा हूँ। तुम चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ देता हूँ।

रितिका ने पहले मना किया, लेकिन वरुण के आग्रह के आगे वो रुक नहीं पाई।

दोनों सड़क के किनारे एक छोटी सी कॉफी शॉप में कैब का इंतज़ार करने लगे।

कॉफी शॉप में बारिश की तेज़ आवाज़ के बीच, उन दोनों के बीच एक गहरी बातचीत शुरू हुई।

वरुण ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में बताया कि कैसे वो अपनी माँ की देखभाल करते हैं, और उन्हें किताबें पढ़ने का शौक है।

रितिका ने बिना रोहित का नाम लिए, बस इतना बताया कि वह अपने रिश्ते में बहुत अकेलापन महसूस करती है, और उसका काम ही अब उसका परिवार है।

वरुण ने रितिका के हाथों को देखा, जो कप पकड़े हुए थे, और कहा, रितिका, ज़िंदगी में कभी-कभी हमें वो सम्मान और प्यार अजनबी से मिलता है, जो अपनों से नहीं मिल पाता।

उन्होंने कहा, आप बहुत मजबूत हैं, लेकिन अपनी खुशियों को सिर्फ काम में मत ढूंढिए।

बात करते-करते, उनकी उंगलियां कॉफी शॉप की लकड़ी की मेज पर छू गईं।

इस बार भी स्पर्श अचानक हुआ था, लेकिन रितिका ने अपनी उंगलियां हटाई नहीं।

उसे उस स्पर्श में एक अनकही हमदर्दी और एक साफ दिली महसूस हुई।

वो गर्माहट उसे उस कमरे की याद दिला रही थी, जहाँ रोहित की खामोशी और उसके लैपटॉप की नीली रोशनी होती थी।

तभी वरुण की कैब आ गई।

वरुण ने दरवाजा खोला और रितिका को बैठने का इशारा किया।

कैब की पिछली सीट पर दोनों पास-पास बैठे थे।

बाहर की बारिश और ट्रैफिक की आवाज़ों के बीच, कैब के अंदर एक अजीब सी शांति थी।

कैब ड्राइवर ने रेडियो पर कोई पुराना रोमांटिक गाना लगा दिया।

गाने की धुन पर रितिका का दिल अजीब तरह से धड़क रहा था।

उसने वरुण को धन्यवाद कहा, और महसूस किया कि आज वो घर जाने से नहीं डर रही है।

वरुण ने रितिका को उसके घर के गेट तक उतारा।

बरसात की वजह से बाहर कीचड़ था।

वरुण ने धीरे से रितिका का हाथ पकड़ा ताकि वो फिसल न जाए।

रितिका ने अपना हाथ नहीं खींचा।

उसने पलटकर वरुण की आँखों में देखा।

उस पल रितिका को लगा जैसे वरुण उसके गालों को छू लेंगे, लेकिन वरुण ने तुरंत खुद को संभाला।

वरुण ने रितिका के हाथ को सम्मानपूर्वक छोड़ दिया और कहा, कल मिलते हैं।

रितिका ने सिर हिलाया, उसकी आँखों में आँसू थे।

ये आँसू अकेलेपन के नहीं थे, बल्कि उस सुकून के थे जो उसे आज मिला था।

जब रितिका घर के अंदर गई, तो रोहित हमेशा की तरह सोफ़े पर लेटा हुआ था।

रोहित ने पूछा, इतनी देर क्यों लगाई?

रितिका ने बिना कोई जवाब दिए, अपने कमरे में चली गई।

उसने आईने में खुद को देखा।

उसकी साड़ी अभी भी गीली थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक नई चमक थी।

उसने अपने पर्स से वरुण के दिए हुए कॉफी शॉप का बिल निकाला।

वो बिल सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं था, वो उस रात का सबूत था, जब किसी अजनबी ने उसे उसकी कीमत बताई थी।

उस रात रितिका ने फैसला किया कि वह अपने रिश्ते को एक और मौका देगी, लेकिन अब वो अपनी खुशी के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहेगी।

उसे पता था कि वरुण उसके जीवन में एक खूबसूरत अध्याय बनकर आए थे, जो शायद कभी पूरा न हो।

लेकिन उस अध्याय की यादें उसे ताउम्र हौसला देती रहेंगी।

अगले दिन ऑफिस में, वरुण और रितिका ने सामान्य तरीके से बात की, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन उन दोनों की आँखों में एक दूसरे के लिए एक गहरा सम्मान था, एक ऐसा राज़ जो सिर्फ उन दोनों को पता था।

हैदराबाद के तेज़ रफ़्तार जीवन में, रितिका को अपनी भागमभाग से एक छोटा सा ठहराव मिल गया था।

और वो ठहराव वरुण की नम्रता में था।

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