जहां तक सुन्दर बनने की बात है तो फिर आप भीतर से सुन्दर बनें। सिर्फ बाहरी आवरण को सुन्दर बनाने का प्रयास तो बेकार ही है, क्योंकि बाहरी सुन्दरता तो आपके भीतर की सुन्दरता का प्रकाश है। आपका यह सजा-धजा शरीर किस काम का है, जो तमाम दुष्प्रवृत्तियों का दास बना है। इसलिए आपका बाहरी शरीर तो बहुत सुन्दर लग रहा है, लेकिन आचरण और प्रवृत्ति गंदी है, तो फिर आप कैसे सुन्दर हो सकते हैं? जो व्यक्ति चमड़े का व्यापार
ी है, उससे तो आप अपनी सुन्दरता की तारीफ सुन सकते हैं, लेकिन जो आत्मा, चेतना का व्यापारी है और जो मर्यादा, अस्मिता और चरित्र की बात करता है, उसके लिए आपकी इस सुन्दरता की कोई कीमत नहीं।
यदि किसी का चेहरा सुन्दर है तो वह सुन्दर तो कहलाएगा, लेकिन वह संपूर्ण रूप से सुन्दर कैसे कहलाएगा? क्योंकि यदि उसका चेहरा सुन्दर है तो यह जरूरी तो नहीं कि उसके विचार भी सुन्दर हैं। उसके हाव-भाव, उसकी अस्मिता गंदी हो सकती है। कोई भी व्यक्ति तभी सुन्दर हो सकता है, जब वह चारित्रिक रूप से उत्कृष्ट हो, उसके विचार उच्चकोटि के हों। उसका आचरण, रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान एवं मित्रता आदि उत्कृष्ट हों तथा वह आदर्शवादी भी हो, तभी हम उस व्यक्ति को सुन्दर कह सकते हैं। बाकी तमाम चीजें असुन्दर, कुरुप के अलावा और कुछ नहीं हो सकतीं।