10/10/2025
मुझे लगता है कि जब एक स्त्री किसी से सच्चा प्रेम करती है, तो वह ईश्वर से भी ज्यादा पूजनीय और वंदनीय हो जाती है, क्योंकि वह सच्चे प्रेम में पार्वती हो जाती है, राधा हो जाती है, सीता हो जाती है, और हमारे यहां देवियों का स्थान देवों से भी अधिक ऊंचा होता है। इस दिव्य प्रेम की शक्ति और तेज की ऊर्जा इतनी होती है की अगला व्यक्ति भी ईश्वर की उपाधि प्राप्त कर लेता है। ऐसी ही पतिव्रता पवित्र देवियों की आत्मा और हृदय में बसे हुए अपने प्रियतम के लिए प्रेम को कुछ शब्दों में पिरोती हुई मैं लिखती हूं कि
(शीर्षक: तेरी राधा)
हसरतों की कश्ती में
दो चार पलों की मस्ती में
आने की तेरी आहटें
और चले जाने के सन्नाटों से
मैं गुफ्तगू सी करती हूं
सायों में तेरे पलती हूं
ओढ़ के चुनरी यादों की
मैं बेहिसाब सा सजती हूं
रख लेती हूं खुद को सम्भाल
तो कभी
लापरवाह सी बिखरती हूं
तेरी हस्ती की पाक तरंगों से
मैं बिन बात बेताब मचलती हूं
दुनिया के सब आघातों से
गुमसुम चोटिल सी रहती हूं
सिर्फ तेरे प्रेम की गंगा में
हो तर मैं नई निखरती हूं
तुम देखो गर इन आंखों में
तो सपनों की जानी अनजानी
धुनों सरगमों पर थिरकती हूं
तुझ तक जो आ पूरी हो जाए
उस दिशा सफर में चलती हूं
मैं बस तेरी पूजा करती हूं
मैं तेरी हस्ती को पाकर
सौ गुना कद में बढ़ जाती हूं
तेरी कोमल नजरों की छांवों में
सुगंधित उपवन सा खिल जाती हूं
तेरे बिन बोले ही मैं तेरी प्रियसी कहलाती हूं
सब छोड़ जगत की रीतें तोड़
मीरा- राधा हो जाती हूं
~अनु
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