Chirag Jain

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The Complete Poet

Poet of Epic "Purushottam"

राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
(5)

'बशीर' लफ़्ज़ के मआनी हैं, 'अच्छी ख़बर लानेवाला' और 'बद्र' लफ़्ज़ के मआनी हैं 'चौदहवीं रात का चांद'।और ख़बर ये है कि ईद ...
28/05/2026

'बशीर' लफ़्ज़ के मआनी हैं, 'अच्छी ख़बर लानेवाला' और 'बद्र' लफ़्ज़ के मआनी हैं 'चौदहवीं रात का चांद'।
और ख़बर ये है कि ईद के ठीक पहले 'बशीर बद्र' नहीं रहे।

न जाने कितने ही अशआर से लोगों के ज़ेह्न में रास्ता करनेवाले इस सुख़नवर ने आमफ़हम एहसासात को अपनी ग़ज़लों में ज़ुबान दी है।

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

मैंने मीर और ग़ालिब को नहीं देखा, नज़ीर को महसूस ख़ूब किया है, लेकिन देखा उन्हें भी नहीं। अपने होश-ओ-हवास में जिस पहले जीते-जागते सुख़नवर से मेरा तआर्रुफ़ हो सका, वो बशीर हैं।
आज शायरी का एक इदारा ख़ामोश हो गया है।
उनकी विदाई की इस घड़ी में उनके सैंकड़ों मिसरे मन में गूँज रहे हैं। उन्हें व्यक्तिगत रूप से जाननेवाले लोग उनकी किस्सागोई को बहुत Miss करेंगे।

अलविदा बशीर साहेब!

✍️ चिराग़ जैन

28/05/2026

राघव से बैर नहीं करना 🔥



Purushottam By Kavi Chirag Jain

41 वर्ष का जीवन जी लेने के बाद इतना सीख पाया हूँ कि ज़िन्दगी में केवल वे ही पल ज़िन्दगी हैं, जो आपने ख़ुशी से बिताए हैं।...
28/05/2026

41 वर्ष का जीवन जी लेने के बाद इतना सीख पाया हूँ कि ज़िन्दगी में केवल वे ही पल ज़िन्दगी हैं, जो आपने ख़ुशी से बिताए हैं। बाकी की उम्र तो समय को मापने की इकाई भर है।
कल मैंने दिन भर उन लोगों का धन्यवाद ज्ञापित किया, जिन्होंने अपनी तमाम व्यस्तता में से समय चुराकर, मुझे Birthday Wishes भेजी।
शाम होते-होते दोस्तों ने drawing room को महफ़िल की शक़्ल दे दी। देर रात तक उत्सव रहा।
सोशल मीडिया पर भी मेरी खूब प्रशंसा लिखी गई। प्रशंसा शक्कर की तरह है, यह शरीर के लिए ज़रूरी भी है और इसका आधिक्य शरीर को नष्ट भी करता है। सो, मैंने प्रशंसा का उतना ही हिस्सा absorb किया जो जीवन के 4 दशक पूरे कर चुके आदमी के लिए आवश्यक था।
कुछ फोन रिसीव हुए, कुछ call waiting में missed हो गए। कुछ संदेशों का उत्तर दिया, काफ़ी सारे अभी भी अनुत्तरित हैं।
तीन दोस्त केक लेकर आए, मैंने तीनों केक एक साथ काटे खूब आनंद आया।
और इन दिनों पुरुषोत्तम के सृजन सुख में उतरा हुआ हूँ, सो पुरुषोत्तम के सद्यसृजित कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
मेरे जन्मदिन पर मेरी मुस्कान बड़ी करनेवाले हर प्रयास को धन्यवाद, और इस दिन मेरी आँखें नम करनेवाले हर लम्हे को प्रणाम!

❤️ चिराग़ जैन

Happy Birthday Chirag Sir ❤️From Team CJ
27/05/2026

Happy Birthday Chirag Sir ❤️
From Team CJ

26/05/2026

राम मनुष्य रूप में ✨

जो आँखें परधन तकती हैं उनकी निद्रा खो जाती है चोरों के हाथों से सुख की रेखा धूमिल हो जाती है ✍️ चिराग़ जैन
26/05/2026

जो आँखें परधन तकती हैं उनकी निद्रा खो जाती है
चोरों के हाथों से सुख की रेखा धूमिल हो जाती है
✍️ चिराग़ जैन

जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो नाउससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
25/05/2026

जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है

24/05/2026

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुर्ख़ियाँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’... ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।

✍️ चिराग़ जैन

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार प...
23/05/2026

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा खोजना, अपनी अलग कहन तैयार करना और अपनी पठन्त के प्रभाव से अपनी विधा के नवागन्तुकों की महत्वाकांक्षा का लक्ष्य बन जाना किसी को ‘विशेष’ बनाता है। इसी वैशिष्ट्य का नाम है, डॉ. हरिओम पंवार।
मैं जब से कवि-सम्मेलन जगत् में प्रविष्ट हुआ हूं, तब से अब तक इनके लिए अनेक विशेषण और उपाधियां सुनने को मिलीं। किसी ने इन्हें ‘ओज का हिमालय कहा’ तो किसी ने ‘वीर रस का भीष्म पितामह’। किसी ने इन्हें ‘कवि-सम्मेलन की सफलता की गारण्टी’ कहा तो किसी ने ‘अग्नि की लपटों का शब्दानुवाद’। इन सब उपाधियों से सहमति प्रकट करते हुए मैं डॉ. हरिओम पंवार को एक ऐसे कवि के रूप में देखता हूं, जो जनमन की सबसे सटीक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं।
सामान्य-जन की चर्चा से जनमत का सबसे सटीक अनुमान सुन लेने की दक्षता हैं, डॉ. हरिओम पंवार। अख़बार की सुर्खियों में राजनीति का भविष्य टटोल लेने की दृष्टि का नाम है डॉ. हरिओम पंवार। हवा की दिशा देखकर देश की दशा भांप लेने का कौशल हैं डॉ. हरिओम पंवार।
उनकी इसी प्रतिभा ने उन्हें आधी सदी से भी अधिक समय से अनवरत अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बनाए रखा है। डॉ. हरिओम पंवार की कविताओं का यदि देश-काल-समय के मापदण्ड पर विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि वे हमेशा उस वृक्ष को सिंचित करते दिखाई दिए हैं, जिसमें सशक्त हो जाने की क्षमता हो। यही कारण है कि वे किसी भी मुद्दे पर सत्ता या विपक्ष के साथ खड़े होने की बजाय जनमन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
समकालीन विषयों पर लेखनी चलाना, तलवार की धार पर चलने से अधिक दुष्कर कार्य है। घट रही घटना पर कलम चलाने से यश मिलने की जितनी प्रबल संभावना होती है, अपयश की भी उतनी ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे में आलोचना से अक्षुण्ण रहकर आधी सदी का सामाजिक जीवन बिता देना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है।
डॉ. हरिओम पंवार के अमृत महोत्सव पर मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि स्वस्थ रहने का नुस्खा इस व्यस्त कवि की जीवनगाथा में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। सामाजिक जीवन जीते हुए सहयात्रियों के साथ मतभेद और कटुता के क्षण पूरी तरह समाप्त नहीं किये जा सकते। लेकिन इन क्षणों को डील करने के लिए जो सूत्र चाहिए, वह डॉ. हरिओम पंवार के पास नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। वे परस्पर व्यवहार में अपने किसी मनोभाव को अभिव्यक्त करने में लीपापोती करने में विश्वास नहीं करते। मन के भीतर कड़वाहट का विष निर्माण करने से बेहतर है, शब्दों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करके सहज हो जाया जाए।
यही कारण है कि उनके साथ यात्राएं करनेवाले जानते हैं कि वे जितनी जल्दी क्रुद्ध होते हैं, उतनी ही सरलता से क्रोध को बिसार भी देते हैं। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ की नीति का सबसे सटीक चित्रण कहीं मिलता है तो वह उनका आचरण है। किसी बात पर अड़ने की उनकी अवधि कुछ मिनिटों का दायरा कभी नहीं लांघती।
मैं डॉ. हरिओम पंवार जी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनके दीर्घायु और स्वस्थायु होने की कामना करता हूं। तथा एक युग का अमृतग्रंथ तैयार करने का विचार संजोनेवाले संपादन मण्डल के श्रम का अभिनंदन करता हूं।
✍️ चिराग़ जैन

पेपर लीक की महान परम्पराचूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम ...
23/05/2026

पेपर लीक की महान परम्परा

चूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हैं, जिसमें परीक्षाओं की घोषणा होते ही विद्यार्थियों की नींद उड़ जाए और अध्यापक तथा अधिकारी मज़े से सोते रहें।
हमने अनवरत मेहनत और लगन से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है, जिसमें परीक्षा की तिथि घोषित होते ही अधिकारी जागने लगते हैं। कुछ अधिकारी इस चिंता में जागते हैं कि कहीं पेपर लीक न हो जाए। और कुछ अधिकारी इस जुगाड़ में जागते हैं कि पेपर लीक हो जाए।

जैसे ‘रस्सी के आने-जाने से सिल पर निशान पड़ जाते हैं’ वैसे ही हमारे विद्यार्थियों को भी व्यवस्था ने यह विश्वास दिलाया है कि परीक्षा हो या न हो, पेपर ज़रूर लीक होगा। मानसून के आने में देरी हो सकती है, गर्मी-सर्दी-बरसात के शिड्यूल में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन पेपर लीक होने का मौसम किसी सूरत नहीं टल सकता। परीक्षा टल सकती है पर लीकेज नहीं टलेगी।

परीक्षा घोषित होते ही परीक्षार्थियों में शर्त लगती है, ‘बताओ पेपर ठीक होगा या लीक होगा?’ सट्टा बाज़ार में ‘ठीक होगा’ पर मुफ़्त में भी कोई दांव नहीं लगा रहा है और ‘लीक होगा’ के दांव की कीमत आसमान छूने लगी है।

हमारे समय में परीक्षाएं किसी युद्ध से कम नहीं होती थीं। परीक्षा की तैयारियों के लिए छात्र-छात्राएं अपने घर-परिवार के ब्याह-शादियों का मोह छोड़कर मन-मसोसकर किताबों से चिपके रहते थे। सड़ी गर्मी में दूर-दूर पड़नेवाले परीक्षा केन्द्रों पर जैसे-तैसे पहुंचते थे। परीक्षा केन्द्र पर इतनी सघन चैकिंग होती थी, मानो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष हमारे परीक्षा केन्द्र में घुसे बैठे हों। जेब से चूरण की पुड़िया तक निकलवा ली जाती थी।

इतनी सघन सुरक्षा के बीच पेपर लीक करानेवाले धुरंधरों को अंडरकवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। ये लोग देश की धरोहर हैं। इनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने की ज़रूरत है।

पूरी धरती को काग़ज़ बनाकर, सातों समुद्रों को स्याही बना लिया जाए, तो भी इन हुनरमंद लोगों के हुनर का बखान करना मुमकिन नहीं होगा। इसलिए मैं आजकल सीधे मोबाइल पर टाइप करने लगा हूं। कौन काग़ज़ और स्याही का टंटा पाले।

डिजिटल क्रांति से याद आया। हमारे यहां परीक्षा का फॉर्म भरते समय वेबसाइटों का सर्वर हांफने लगता है। तीन घंटे की फिल्म सवा दो मिनिट में डाउनलोड करनेवाले वाईफाई को भी दो पेज का फॉर्म भरने में तीन बार हार्टअटैक आ जाता है। पेमेंट गेटवे की कुशलता ऐसी है कि पेमेंट कटने के बाद नेटवर्क प्रॉब्लम उत्पन्न होती है और ट्रांज़िक्शन फेल हो जाती है। फिर कैप्चा कोड डालकर यह सिद्ध करना होता है कि हम रोबोट नहीं हैं।

फॉर्म भरने का किला फ़तह करने के बाद परीक्षार्थी फिंगर क्रॉस करके भगवान से मनाते हैं कि हे भगवान इस बार पेपर लीक न हो। परीक्षा करानेवाली एजेंसियां पेपर को किसी अनजान टापू पर किसी अंधेरी गुफ़ा में रखकर निश्चिंत हो जाती हैं। लेकिन परीक्षा के एक दिन पहले ही यह गोपनीय दस्तावेज, व्हाट्सएप्प पर फ्री डिलीवरी की तरह विचरण करने लगता है।

जिस देश में दूध की डिलीवरी फेल हो जाती है। रिटेल एप्लीकेशन्स की डिलीवरी लेट हो जाती है। वहाँ ‘पेपर लीक वॉरियर्स’ समय के इतने पाबन्द हैं कि आंधी आए या तूफ़ान इनके नेटवर्क कभी फेल नहीं होते। इसे कहते हैं डिजिटल क्रांति का सही उपयोग।

पेपर लीक होने के बाद जांच समितियों का गठन होता है। प्रभावित छात्र-छात्राएं बिलखते हुए प्रदर्शन करते हैं। अखबारों में बेरोज़गारी के आंकड़े छापे जाते हैं। टेलीविज़न पर बहस होती हैं कि कांग्रेस के शासन में ज़्यादा पेपर लीक हुए या भाजपा के ज़माने में। शोर-शराबा होता है। हंगामा मचने लगता है। लेकिन हमारी योग्य जांच समितियां बड़े सलीके से इस हंगामे को ठण्डे बस्ते में डाल देती हैं।

कुछ दिनों में परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्न बदलने लगेंगे।
प्रश्न 1. वर्ष 2025 मे कुल कितने राज्यों में पेपर लीक हो पाया?
प्रश्न 2. यदि एक पेपर 10 लाख रुपये में लीक हुआ है, तो नीचेवाले बिचौलियों और उपरवाले साहबों के कमीशन के बाद मुख्य कर्मवीर को कितना मुनाफ़ा होगा?
प्रश्न 3. क्या महाभारत काल में पितामह भीष्म ने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बताकर पेपरलीक की महान परंपरा का प्रादुर्भाव किया था?
प्रश्न 4. जब पेपरलीक की प्रक्रिया कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाती है, तो इसके दोषियों को सज़ा मिलने में दस-बीस साल क्यों लग जाते हैं?

वह दिन दूर नहीं जब परीक्षा की तैयारी करते परीक्षार्थी से उसका बेटा कहेगा, ‘इतनी टेंशन न लो यार पापा, भरोसा रखो, इस बार फिर पेपर लीक होगा।’

✍️ चिराग़ जैन

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