Sahir Ludhiyanvi

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16/03/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 11/70

अछांदस जैसी दिखती प्रस्तुत कविता की हरेक पंक्ति में ‘ग़ालगां’ संधि के दो या चार या छह आवर्तनों का प्रयोग किया गया है।

कविता :-

आप क्या जाने मुझको समझते हैं क्या
मैं तो कुछ भी नहीं

इस क़दर प्यार इतनी बड़ी भीड़ का
मैं रखूँगा कहाँ
इस क़दर प्यार रखने के क़ाबिल नहीं मेरा दिल, मेरी जाँ
मुझको इतनी मुहब्बत ना दो दोस्तों,
सोच लो दोस्तों
इस क़दर प्यार कैसे सँभालूँगा मैं
मैं तो कुछ भी नहीं

प्यार इक शख़्स का भी अगर मिल सके
तो बड़ी चीज़ है ज़िन्दगी के लिए
आदमी को मगर ये भी मिलता नहीं, ये भी मिलता नहीं,
मुझको इतनी मुहब्बत मिली आपसे
ये मेरा हक़ नहीं, मेरी तक़दीर है
मैं ज़माने की नज़रो में कुछ भी ना था
मेरी आँखों में अब तक वो तस्वीर है
इस मुहब्बत के बदले मै क्या नज़्र दूँ
मैं तो कुछ भी नहीं

इज्ज़तें, शुहरतें, चाहतें, उल्फ़तें,
कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं
आज मै हूँ जहाँ कल कोई और था
ये भी इक दौर है, वो भी इक दौर था

आज इतनी मुहब्बत ना दो दोस्तों
के मेरे कल के ख़ातिर न कुछ भी रहे
आज का प्यार थोड़ा बचा कर रखो
मेरे कल के लिए

कल जो गुमनाम है, कल जो सुनसान है
कल जो अनजान है, कल जो वीरान है
मैं तो कुछ भी नहीं
मैं तो कुछ भी नहीं

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 391/2)
फ़िल्म : दाग़
संगीत : लक्ष्मीकान्त – प्यारेलाल
कंठ : राजेश खन्ना
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=WXYUMdrLNzA
(फ़िल्म में यह कविता संवाद के रूप में ही है।)

कहीं-कहीं पर रदीफ़-क़ाफ़िया का प्रयोग हुआ है। यहाँ पर पंक्ति के कुछ अंतिम शब्दों को तथा कौंस में उसके क़ाफ़िया और क़ाफ़िया-व्यवस्था को दर्शाया है, रदीफ़ नहीं। मगर इससे आप रदीफ़ का भी अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हैं।
ना दो दोस्तों - सोच लो दोस्तों
(दो-लो = ओकारांत)
मिल सके – के लिए – आपसे
(सके-लिए-से = एकारांत)
तक़दीर है – तस्वीर है
(तक़दीर-तस्वीर = ईकार+र)
इज्ज़तें – शुहरतें – चाहतें – उल्फ़तें
(अकार+तें)
और था – दौर था
(और-दौर = औकार+र)
ना दो दोस्तों - बचा कर रखो
(दोस्तों-रखो = ओकारांत)
न कुछ भी रहे - कल के लिए
(रहे-लिए = एकारांत)
सुनसान है – वीरान है
(सुनसान-वीरान = ईकार+न)

बहर (छंद) : हरेक पंक्ति में ‘ग़ालगां’ संधि के दो या चार या छह आवर्तनों का प्रयोग।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/
आ, प, क्या/ जा, ने, मुझ/ को, स, मझ/ ते, हैं, क्या/
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/
मैं, तो, कुछ/ भी, न, हीं/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

Welcome to my website. My Research On TaalShastra, ChhandShastra and KafiyaShastra of Ghazal In Hindi & Gujarati (1) ग़ज़लधारा : ग़ज़ल का छंदशास्त्र एवं तालशास्त्र ग़ज़ल का तालशास्त्र प्रस्तु....

09/03/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 10/70

ग़ज़ल :-

तोड़ लेंगे हर इक शै से रिश्ता, तोड़ देने की नौबत तो आए
हम क़यामत के ख़ुद मुंतज़िर हैं, पर किसी दिन क़यामत तो आए
(शै = चीज़, पदार्थ
मुंतज़िर = प्रतीक्षक, राह देखने वाला, आस लगाने वाला)

हम भी सुक़रात हैं अहद-ए-नौ के, तिश्ना-लब ही न मर जाएँ यारों
ज़हर हो या मय-ए-आतशीं ही, कोई जाम-ए-शहादत तो आए
(सुक़रात = यूनान का एक प्रसिद्ध दार्शनिक
अहद-ए-नौ = नवयुग
तिश्ना-लब = प्यासा
मय-ए-आतशीं = आग जैसी तेज़ और लाल मदिरा
जाम-ए-शहादत = बलिदान का प्याला)

एक तहज़ीब है दोस्ती की, एक मेयार है दुश्मनी का
दोस्तों ने मुरव्वत न सीखी, दुश्मनों को अदावत तो आए
(तहज़ीब = रहन-सहन, रहने-सहने का ढंग, संस्कृति
मेयार = स्तर
मुरव्वत = अच्छा बर्ताव करना, दिल में दूसरों के लिए जगह होना
अदावत = दुश्मनी)

रिन्द रस्ते में आँखें बिछाएँ, जो कहे बिन सुने मान जाएँ
नासेह-ए-नेक-तीनत किसी शब, सू-ए-कू-ए-मलामत तो आए
(रिन्द = शराबी
नासेह-ए-नेक-तीनत = अच्छे स्वभाव वाला सदुपदेशक
शब = रात
सू-ए-कू-ए-मलामत = निन्दा की गली की ओर)

इल्म-ओ-तहज़ीब तारीख़-ओ-मंतिक़, लोग सोचेंगे इन मसअलों पर
ज़िंदगी के मशक़्क़त-कदे में, कोई अहद-ए-फ़राग़त तो आए
(इल्म-ओ-तहज़ीब = ज्ञान और सभ्यता
तारीख़-ओ-मंतिक़ = इतिहास और तर्कशास्त्र
मसअला = विषय
मशक़्क़त-कदे = कष्टों का घर
अहद-ए-फ़राग़त = सुख का समय)

काँप उठें क़स्र-ए-शाही के गुंबद, थरथराए ज़मीं माबदों की
कूचा-गर्दों की वहशत तो जागे, ग़मज़दों को बग़ावत तो आए
(उठें क़स्र-ए-शाही = शाही महल
गुंबद = भवन की छत पर बना गोलाकार हिस्सा
माबदों = उपासना-गृह
कूचा-गर्दों = गलियों में मारा-मारा फिरने वाला
वहशत = पागलपन, उन्माद
ग़मज़दों = दुखी
बग़ावत = अवज्ञा, विद्रोह)

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 148)
ग़ैरफ़िल्मी ग़ज़ल

रदीफ़ : तो आए
क़ाफ़िया : नौबत, क़यामत, शहादत, अदावत, मलामत, फ़राग़त, बग़ावत।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+त

‘नौबत’ क़ाफ़िया को छोड़ कर बाक़ी सभी क़ाफ़िया में दो प्रकार की अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था को निभाया गया है।
क़ाफ़िया : क़यामत, शहादत, अदावत, मलामत, फ़राग़त, बग़ावत।
अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था 1 : आकार+अकार+त
अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था 2 : अकार+आकार+अकार+त
अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था को पूरी ग़ज़ल में निभाना ज़रूरी नहीं है, फिर भी अगर अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था को पूरी ग़ज़ल में निभाया जाए तो ग़ज़ल और भी निखर जाती है।

बहर (छंद) : ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ा ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ा
‘ग़ालगां’ संधि के चार आवर्तनों का प्रयोग करने के बाद अंतिम संधि के अंतिम लघु और गुरु का लोप करने से प्राप्त स्वरूप ‘ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ा’ के दो आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा/
तो, ड़, लें/ गे, ह, रिक/ शै, से, रिश्/ ता/
तो, ड़, दे/ ने, की, नौ/ बत, तो, आ/ ए/
हम, क़, या/ मत, के, ख़ुद/ मुं, त, ज़िर/ हैं/
पर, कि, सी/ दिन, क़, या/ मत, तो, आ/ ए/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
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Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
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02/03/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 9/70

प्रस्तुत गीत में स्थायी (पहला बंद) में दो पंक्ति है और दोनों पंक्ति में रदीफ़-क़ाफ़िया को निभाया गया है तथा अंतरे (स्थायी के बाद अन्य बंद) में पहली दो पंक्ति में अलग रदीफ़-क़ाफ़िया को निभा कर तीसरी पंक्ति में स्थायी के रदीफ़-क़ाफ़िया को निभाया गया है। गीत की इस शैली को सबसे अधिक प्रचलित शैली कहा जा सकता है।

गीत :-

स्थायी
तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं यूँ ही मस्त नग़्मे लुटाता रहूँ
तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो, मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ

अंतरा-1
कितने जलवे फिज़ाओं में बिखरे मगर, मैंने अब तक किसी को पुकारा नहीं
तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं, हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं
तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो, मैं हर इक शै से नज़रें चुराता रहूँ

अंतरा-2
मैंने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे, तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो
तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं, मैं समझता हूँ तुम मेरी तक़दीर हो
तुम अगर मुझको अपना समझने लगो, मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ

अंतरा-3
मैं अकेला बहुत देर चलता रहा, अब सफ़र ज़िन्दगानी का कटता नहीं
जब तलक कोई रंगीं सहारा न हो, वक़्त काफ़िर जवानी का कटता नहीं
तुम अगर हमक़दम बनके चलती रहो, मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूँ

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 350)
फ़िल्म : हमराज़
संगीत : रवि
कंठ : महेन्द्र कपूर
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=xFeCXuGqEvc

स्थायी :-
मूल रदीफ़ : रहूँ
मूल क़ाफ़िया : लुटता – गाता
मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ता

अंतरा-1
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : नहीं
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : पुकारा – गवारा
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+रा
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : रहूँ
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : चुराता (लुटता – गाता)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ता

अंतरा-2
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : हो
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : तस्वीर – तक़दीर
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकार+र
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : रहूँ
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : सजाता (लुटता – गाता)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ता

अंतरा-3
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : का कटता नहीं
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : ज़िन्दगानी – जवानी
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+नी
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : रहूँ
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : बिछाता (लुटता – गाता)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ता

बहर (छंद) : ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां
‘ग़ालगां’ संधि के आठ आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/
तुम, अ, गर/ सा, थ, दे/ ने, का, वा/ दा, क, रो/
मैं, यूँ, ही/ मस्, त, नग़्/ मे, लु, टा/ ता, र, हूँ/
तुम, मु, झे/ दे, ख, कर/ मुस्, कु, रा/ ती, र, हो/
मैं, तु, म्हें/ दे, ख, कर/ गी, त, गा/ ता, र, हूँ/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
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24/02/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 8/70

ग़ज़ल :-

मेरी चाहत रहेगी हमेशा जवाँ, जिस्म ढलने से जज़्बात ढलते नहीं
मौत आने से भी प्यार मरता नहीं, दम निकलने से अरमाँ निकलते नहीं

लाख तूफ़ान हो हम न घबराएँगे, तू न आएगी मिलने तो हम आएँगे
जान पर खेलने से झिझकते हैं जो, वो मुहब्बत की राहों पे चलते नहीं

हमने छोड़ा न छोड़ेंगे दामन तेरा, जिसको अपना लिया उसको अपना लिया
हो सके तो हमें उम्र-भर आज़मा, मौसमों की तरह हम बदलते नहीं

तू मिले ना मिले पर सलामत रहे, दूर ही की सही तुझसे निस्बत रहे
ज़िन्दगी-भर तेरी मुझको हसरत रहे, हसरतों के बिना ख़्वाब पलते नहीं

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 399)
फ़िल्म : मेहमान
संगीत : रवि
कंठ : मोहम्मद रफ़ी
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=MwbP-A48rDM

रदीफ़ : नहीं
क़ाफ़िया : ढलते, निकलते, चलते, बदलते, पलते।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+लते
(चलते क़ाफ़िया के साथ रखते, भरते, तकते जैसे क़ाफ़िया के प्रयोग को क़ाफ़ियादोष कहा जाता है। यहाँ पर ऐसा कोई क़ाफ़ियादोष नहीं है, मगर सिर्फ़ आपकी जानकारी के लिए ही यह बात की है।)

बहर (छंद) : ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां
‘ग़ालगां’ संधि के आठ आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/
मे, री, चा/ हत, र, हे/ गी, ह, मे/ शा, ज, वाँ/
जिस्, म, ढल/ ने, से, जज़्/ बा, त, ढल/ ते, न, हीं/
मौ, त, आ/ ने, से, भी/ प्या, र, मर/ ता, न, हीं/
दम, नि, कल/ ने, से, अर/ माँ, नि, कल/ ते, न, हीं/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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17/02/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 7/70

यहाँ पर प्रस्तुत गीत की शैली को सबसे अधिक प्रचलित शैली कहा जा सकता है। इस में स्थायी (पहला बंद) में दो पंक्ति होती है और दोनों पंक्ति में रदीफ़-क़ाफ़िया को निभाया जाता है तथा अंतरे (स्थायी के बाद अन्य बंद) में पहली दो पंक्ति में अलग रदीफ़-क़ाफ़िया को निभा कर तीसरी पंक्ति में स्थायी के रदीफ़-क़ाफ़िया को निभाया जाता है।

गीत :-

स्थायी
रात भर का है मेहमाँ अँधेरा
किसके रोके रुका है सवेरा

अंतरा-1
रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
ग़म न कर गर है बादल घनेरा
किसके रोके रूका है सवेरा

अंतरा-2
लब पे शिकवा न ला, अश्क पी ले
जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले
अब उखड़ने को है ग़म का डेरा
किसके रोके रूका है सवेरा

अंतरा-3
यूँ ही दुनिया में आ कर न जाना
सिर्फ़ आँसू बहा कर न जाना
मुस्कुराहट पे भी हक़ है तेरा
किसके रोके रूका है सवेरा

अंतरा-4
आ कोई मिलके तदबीर सोचें
सुख के सपनों की तामीर सोचें
जो तेरा है वो ही ग़म है मेरा
किस के रोके रूका है सवेरा

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 227/8)
फ़िल्म : सोने की चिड़िया
संगीत : ओ. पी. नैयर
कंठ : मोहम्मद रफ़ी, आशा भोंसले
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=mobmoEJk8PI

स्थायी :-
मूल रदीफ़ : *
मूल क़ाफ़िया : अँधेरा – सवेरा
मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकार+रा

अंतरा-1
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : होगी
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : संगीन – रंगीन
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : अंकार+गीन
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : *
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : घनेरा (अँधेरा – सवेरा)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकार+रा

अंतरा-2
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : ले
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : पी – जी
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकारांत
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : *
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : डेरा (अँधेरा – सवेरा)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकार+रा

अंतरा-3
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : कर न जाना
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : आ – बहा
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : *
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : तेरा (अँधेरा – सवेरा)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकार+रा

अंतरा-4
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : सोचें
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : तदबीर – तामीर
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकार+र
तीसरी पंक्ति में मूल रदीफ़ : *
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : मेरा (अँधेरा – सवेरा)
तीसरी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकार+रा

बहर (छंद) : ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ा
‘ग़ालगां’ संधि के चार आवर्तनों का प्रयोग करने के बाद अंतिम संधि के अंतिम लघु और गुरु का लोप करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा/
रा, त, भर/ का, है, मेह/ माँ, अँ, धे/ रा/
किस, के, रो/ के, रु, का/ है, स, वे/ रा/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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10/02/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 6/70

प्रस्तुत गीत में हरेक बंद (स्थायी और अंतरा) में अंतिम दो पंक्ति एकसमान है और उसमें रदीफ़-क़ाफ़िया भी नहीं है, मगर इसमें अंतिम पंक्ति में आधी-आधी पंक्ति में रदीफ़-क़ाफ़िया को निभाया गया है। हरेक बंद में बाक़ी की पंक्तियों में हर दो पंक्ति में रदीफ़-क़ाफ़िया या सिर्फ़ क़ाफ़िया को निभाया गया है।

हर बहर (छंद) में जहाँ तक हो सके, ग़ज़ल और गीत/नज़्म दोनों प्रस्तुत करने की कोशिश रहेगी; ताकि गीत और नज़्म की अलगअलग शैली को भी समझा जा सके।

गीत :-

स्थायी
कोई दिल कोई चाहत से मजबूर है
जो भी है वो ज़रूरत से मजबूर है
कोई माने न माने मगर जान-ए-मन
कुछ तुम्हें चाहिए कुछ हमें चाहिए

अंतरा-1
छुप के तकते हो क्यों सामने आओजी
हम तुम्हारे हैं हमसे न शर्माओजी
ये न समझो कि हमको ख़बर कुछ नहीं
सब इधर ही इधर है उधर कुछ नहीं
तुम भी बेचैन हो हम भी बेताब हैं
जब से आँखें मिलीं दोनों बेख़्वाब हैं
कोई माने न माने मगर जान-ए-मन
कुछ तुम्हें चाहिए कुछ हमें चाहिए

अंतरा-2
इश्क़ और मुश्क छुपते नहीं है कभी
इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं हम-तुम सभी
अपने दिल की लगी को छुपाते हो क्यों
ये मुहब्बत की घड़ियाँ गँवाते हो क्यों
प्यास बुझती नहीं है नज़ारे बिना
उम्र कटती नहीं है सहारे बिना
कोई माने न माने मगर जान-ए-मन
कुछ तुम्हें चाहिए कुछ हमें चाहिए

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 240)
फ़िल्म : चार दिल चार राहें
संगीत : अनिल बिस्वास
कंठ : लता मंगेश्कर
Youtube Link :
फ़िल्म की लिंक उपलब्ध है मगर गीत की लिंक उपलब्ध नहीं है। फ़िल्म में 41 मिनट और 45 सेकंड से इस गीत की शुरूआत होती है। यहाँ पर फ़िल्म की लिंक प्रस्तुत है।
https://www.youtube.com/watch?v=O8fmaKBLcbU

स्थायी
पहली दो पंक्ति
रदीफ़ : से मजबूर है
क़ाफ़िया : चाहत – ज़रूरत
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+त

स्थायी
अंतिम पंक्ति
रदीफ़ : चाहिए
क़ाफ़िया : तुम्हें – हमें
क़ाफ़िया-व्यवस्था : एंकारांत

अंतरा-1
पहली दो पंक्ति
रदीफ़ : *
क़ाफ़िया : आओजी – शर्माओजी
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ओजी

अंतरा-1
दूसरी दो पंक्ति
रदीफ़ : कुछ नहीं
क़ाफ़िया : ख़बर – उधर
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+र

अंतरा-1
तीसरी दो पंक्ति
रदीफ़ : हैं
क़ाफ़िया : बेताब - बेख़्वाब
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ब

अंतरा-2
पहली दो पंक्ति
रदीफ़ : *
क़ाफ़िया : कभी - सभी
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+भी

अंतरा-2
दूसरी दो पंक्ति
रदीफ़ : हो क्यों
क़ाफ़िया : छुपाते – गँवाते
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ते

अंतरा-2
तीसरी दो पंक्ति
रदीफ़ : बिना
क़ाफ़िया : नज़ारे – सहारे
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+रे
अतिचुस्त क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+आकार+रे

बहर (छंद) : ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां ग़ालगां
‘ग़ालगां’ संधि के चार आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/ ग़ा, ल, गां/
को, ई, दिल/ को, ई, चा/ हत, से, मज/ बू, र, है/
जो, भी, है/ वो, ज़, रू/ रत, से, मज/ बू, र, है/
को, ई, मा/ ने, न, मा/ ने, म, गर/ जा, ने, मन/
कुछ, तु, म्हें/ चा, हि, ए/ कुछ, ह, में/ चा, हि, ए/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

Welcome to my website. My Research On TaalShastra, ChhandShastra and KafiyaShastra of Ghazal In Hindi & Gujarati (1) ग़ज़लधारा : ग़ज़ल का छंदशास्त्र एवं तालशास्त्र ग़ज़ल का तालशास्त्र प्रस्तु....

03/02/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 5/70

आज ‘लगांग़ा’ संधि के आवर्तित स्वरूप की दो बहरों (छंदों) के प्रयोग वाला एक युगल-गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस गीत में नायक-नायिका की मीठी नोकझोंक को प्रस्तुत किया गया है। स्थायी की पहली दो पंक्ति नायक की ओर से है तथा दूसरी दो पंक्ति नायिका की ओर से है। पहला और तीसरा अंतरा नायक की ओर से है तथा दूसरा अंतरा नायिका की ओर से है।

युगल-गीत :-

स्थायी
तुम्हारी नज़र क्यों ख़फ़ा हो गई
ख़ता बख़्श दो गर ख़ता हो गई
हमारा इरादा तो कुछ भी न था
तुम्हारी ख़ता ख़ुद सज़ा हो गई

अंतरा-1
सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है
सज़ा में भी इक प्यार का सिलसिला है
मुहब्बत का अब कुछ भी अंजाम हो
मुलाक़ात की इब्तिदा हो गई

अंतरा-2
मुलाक़ात पर इतने मग़रूर क्यों हो
हमारी ख़ुशामद पे मजबूर क्यों हो
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई
सताने की तालीम क्या हो गई

अंतरा-3
सताते न हम तो मनाते ही कैसे
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे
इसी दिन का चाहत को अरमान था
क़ुबूल आज दिल की दुआ हो गई

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 363)
फ़िल्म : दो कलियाँ
संगीत : रवि
कंठ : मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेश्कर
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=0aMYlPkoXEE

स्थायी :-
मूल रदीफ़ : हो गई
मूल क़ाफ़िया : ख़फ़ा – ख़ता – सज़ा
मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत

अंतरा-1
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : है
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : मिला – सिलसिला
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : इकार+ला
चौथी पंक्ति में मूल रदीफ़ : हो गई
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : इब्तिदा (ख़फ़ा – ख़ता – सज़ा)
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत

अंतरा-2
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : क्यों हो
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : मग़रूर – मजबूर
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : ऊकार+र
चौथी पंक्ति में मूल रदीफ़ : हो गई
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : क्या (ख़फ़ा – ख़ता – सज़ा)
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत

अंतरा-3
पहली दो पंक्ति में रदीफ़ : ही कैसे
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया : मनाते – लाते
पहली दो पंक्ति में क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ते
चौथी पंक्ति में मूल रदीफ़ : हो गई
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया : दुआ (ख़फ़ा – ख़ता – सज़ा)
चौथी पंक्ति में मूल क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत

बहर (छंद) :-
स्थायी और हरेक अंतरे की तीसरी और चौथी पंक्ति की बहर (छंद) ‘लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगां’ है तथा हरेक अंतरे की पहली और दूसरी पंक्ति की बहर (छंद) ‘लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा’ है। दोनों बहरों (छंदों) रचना के बारे में पिछले लेख में बता ही चुका हूँ।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां/
तु, म्हा, री/ न, ज़र, क्यों/ ख़, फ़ा, हो/ ग, ई/
ख़, ता, बख़्/ श, दो, गर/ ख़, ता, हो/ ग, ई/
ह, मा, रा/ इ, रा, दा/ तो, कुछ, भी/ न, था/
तु, म्हा, री/ ख़, ता, ख़ुद/ स, ज़ा, हो/ ग, ई/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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30/01/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 4/70

इस लेख में रदीफ़-क़ाफ़िया की व्यवस्था के हिसाब से एक विशिष्ट गीतनुमा ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ। ऐसी रचना बहुत ही कम और शायद ही देखने को मिलती है।

प्रस्तुत गीतनुमा ग़ज़ल में ‘गांग़ा लगांग़ा’ के तीन आवर्तनों का प्रयोग हुआ है। इस गीतनुमा ग़ज़ल में स्थायी (मतला) और अंतरे (अन्य शेर) की हरेक पंक्ति में ‘गांग़ा लगांग़ा’ के दुसरे और तीसरे आवर्तन के बीच में भी सिर्फ़ क़ाफ़िया का या रदीफ़-क़ाफ़िया दोनों का प्रयोग किया गया है।

यहाँ पर मैं एक बात की स्पष्टता करना चाहूँगा कि हर लेख में उदाहरण के लिए, जहाँ तक मुमकिन हो फ़िल्मी रचना को ही पहली पसंद दी है। इसलिए अब से हरेक लेख में प्रस्तुत की गई फ़िल्मी रचना की Youtube Link भी प्रस्तुत करता रहूँगा, ताकि उसे सुना और देखा भी जा सके।

गीतनुमा ग़ज़ल :-

तेरी जवानी तपता महीना, ऐ नाज़नीना
छू ले नज़र तो आए पसीना, ऐ नाज़नीना

हाए ये तेरा लहराके चलना, इठलाके चलना
रह-रह के धड़के धरती का सीना, ऐ नाज़नीना

तेरे बदन में फूलों की नर्मी, शोलों की गर्मी
हर अंग तेरा तरशा नगीना, ऐ नाज़नीना

आंखों में बिजली, ज़ुल्फों में बादल, सांसों में हलचल
तुझ-सी नहीं कोई क़ातिल हसीना, ऐ नाज़नीना

जीने का कोई सामान कर दे, एहसान कर दे
तेरे बग़ैर अब मुश्किल है जीना, ऐ नाज़नीना

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 411)
फ़िल्म : अमानत
संगीत : रवि
कंठ : मोहम्मद रफ़ी
Youtube Link : https://www.youtube.com/watch?v=Ruqs1b0H9es&pp=ygUYdGVyaSBqYXdhbmkgdGFwdGEgbWFoaW5h

रदीफ़ : ऐ नाज़नीना
क़ाफ़िया : महीना, पसीना, सीना, नगीना, हसीना, जीना।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकार+ना

अब हरेक पंक्ति में ‘गांग़ा लगांग़ा’ के दुसरे और तीसरे आवर्तन के बीच में भी क़ाफ़िया के प्रयोग को दर्शाता हूँ।

स्थायी :-
पहली पंक्ति : महीना – नाज़नीना (ईकार+ना)
स्थायी की दूसरी पंक्ति : पसीना – नाज़नीना (ईकार+ना)

अंतरा-1 :-
पहली पंक्ति : लहराके चलना - इठलाके चलना (आकार+के)
दूसरी पंक्ति : सीना – नाज़नीना (ईकार+ना)

अंतरा-2 :-
पहली पंक्ति : नर्मी – गर्मी (अकार+र्मी)
दूसरी पंक्ति : नगीना – नाज़नीना (ईकार+ना)

अंतरा-3 :-
पहली पंक्ति : बादल – हलचल (अकार+ल)
दूसरी पंक्ति : हसीना – नाज़नीना (ईकार+ना)

अंतरा-4 :-
पहली पंक्ति : सामान कर दे - एहसान कर दे (आकार+न)
दूसरी पंक्ति : जीना – नाज़नीना (ईकार+ना)

बहर (छंद) : गांग़ा लगांग़ा गांग़ा लगांग़ा गांग़ा लगांग़ा
‘लगांग़ा’ संधि के दो आवर्तनों का प्रयोग करने के बाद पहली संधि के पहले लघु का लोप करने से प्राप्त स्वरूप ‘गांग़ा लगांग़ा’ के तीन आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

‘तुझ-सी नहीं कोई क़ातिल हसीना, ऐ नाज़नीना’ पंक्ति में बीच में एक लघु अधिक होने की वजह से सिर्फ़ इस पंक्ति की बहर (छंद) ‘गांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा गांग़ा लगांग़ा’ होगी।

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/
ते, री/ ज, वा, नी/ तप, ता/ म, ही, ना/ ऐ, ना/ ज़, नी, ना/
छू, ले/ न, ज़र, तो/ आ, ए/ प, सी, ना/ ऐ, ना/ ज़, नी, ना/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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30/01/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 3/70

ग़ज़ल :-

मैं ज़िन्दा हूँ ये मुश्तहर कीजिए
मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए
(मुश्तहर = इश्तिहार, प्रसिद्ध)

ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है
बसर हो सके तो बसर कीजिए
(बसर = गुज़ारा)

सितम के बहुत से हैं रद्द-ए-अमल
ज़रूरी नहीं चश्म तर कीजिए
(रद्द-ए-अमल = अस्वीकार्य बरताव
चश्म तर करना = आँख गीली करना)

वही ज़ुल्म बार-ए-दिगर है तो फिर
वही जुर्म बार-ए-दिगर कीजिए
(बार-ए-दिगर = दोबारा, दूसरी बार)

क़फ़स तोड़ना बाद की बात है
अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए
(क़फ़स = पिंजरा
बाल-ओ-पर = बाज़ू और पंख अर्थात शक्ति)

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 138)
ग़ैरफ़िल्मी ग़ज़ल

रदीफ़ : कीजिए
क़ाफ़िया : मुश्तहर, ख़बर, बसर, तर, दिगर, पर।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+र

बहर (छंद) : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगां
‘लगांग़ा’ संधि के चार आवर्तनों का प्रयोग करने के बाद अंतिम संधि के अंतिम गुरु का लोप करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां/
मैं, ज़िन्, दा/ हूँ, ये, मुश्/ त, हर, की/ जि, ए/
मे, रे, क़ा/ ति, लों, को/ ख़, बर, की/ जि, ए/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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30/01/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन - 2/70

पिछले लेख में फ़िल्म ‘दिल ही तो है’ का एक युगल गीत प्रस्तुत किया था, उसी फ़िल्म में उसी ज़मीन में एक ग़ज़ल भी प्रस्तुत की गई थी। इस यहाँ पर वह ग़ज़ल प्रस्तुत है।

ग़ज़ल :-

यूँ ही दिल ने चाहा था रोना-रुलाना
तेरी याद तो बन गई इक बहाना

हमें भी नहीं इल्म हम जिस पे रोए
वो बीती रुतें हैं कि आता ज़माना

ग़म-ए-दिल भी है और ग़म-ए-ज़िन्दगी भी
न इसका ठिकाना, न उसका ठिकाना

कोई किस पे तड़पे, कोई किस पे रोए
इधर दिल जला है उधर आशियाना

- साहिर लुधियानवी
(साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 291)
फ़िल्म : दिल ही तो है
संगीत : रौशन
कंठ : सुमन कल्याणपुर

रदीफ़ : *
क़ाफ़िया : रुलाना, बहाना, ज़माना, ठिकाना, आशियाना।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ना

बहर (छंद) : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा
‘लगांग़ा’ संधि के चार आवर्तनों का प्रयोग करने से इस बहर (छंद) की प्राप्ति होती है।
ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/
यूँ, ही, दिल/ ने, चा, हा/ था, रो, ना/ रु, ला, ना/
ते, री, या/ द, तो, बन/ ग, ई, इक/ ब, हा, ना/

Uday Shah
115/A, Dharmin Nagar,
Kabilpore,
Navsari – 396424 (Gujarat).
(M) +91-9428882632
Website : https://sites.google.com/site/udayshahghazal/
Youtube Link : https://www.youtube.com/user/udaysshah10/videos

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30/01/2024

‘साहिर समग्र’ : साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में
बहर (छंद) एवं क़ाफ़िया का अध्ययन – 1/70

आज से मैं साहिर लुधियानवी की रचनाओं के माध्यम से ग़ज़ल, नज़्म और गीतों में बहर (छंद) और क़ाफ़िया के प्रयोजन के अध्ययन की साप्ताहिक लेखमाला (हर शनिवार) की शुरूआत कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप सबको ये लेखमाला पसंद आएगी।

साहिर लुधियानवी का कविता जगत में अलग ही मक़ाम है। फ़िल्मों में गीतकार की हैसियत से मशहूर होने से पहले ही वो कविता-जगत में शायर की हैसियत से काफ़ी मशहूर हो चुके थे। साहिर लुधियानवी की ग़ैर-फ़िल्मी और फ़िल्मी रचनाओं में ग़ज़ल, नज़्म और गीत काफ़ी लोकप्रिय हुए हैं। साहिर लुधियानवी और उनकी बहुत सारी रचनाएँ मेरे पसंददीदा शायरों और रचनाओं में समाविष्ट है।

मैंने आशा प्रभात द्वारा सम्पादित और राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित की गई हिन्दी पुस्तक ‘साहिर समग्र’ का अभ्यास किया है। इसमें साहिर लुधियानवी की ग़ैर-फ़िल्मी और फ़िल्मी सभी रचनाओं का समावेश करने का बहुत ही अच्छा प्रयास किया गया है। ‘साहिर समग्र’ पुस्तक में साहिर लुधियानवी के संग्रह तल्ख़ियाँ, परछाइयाँ, आओ कि कोई ख़्वाब बुनें और गाता जाए बंजारा का संकलन किया गया है। गाता जाए बंजारा में साहिर लुधियानवी की लगभग तमाम फ़िल्मी रचनाओं का संकलन करने की कोशिश की गई है। सभी काव्य-रसिकों को इसका अध्ययन करना चाहिए। ‘साहिर समग्र’ से आप साहिर लुधियानवी की ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों का लुत्फ़ उठा सकते हैं। नवोदित शायरों को ग़ज़ल, नज़्म और गीत के संदर्भ में इसमें से काफ़ी कुछ सिखने को मिलेगा। ‘साहिर समग्र’ पुस्तक amazon और flipkart से भी ख़रीदी जा सकती है।

‘साहिर समग्र’ पुस्तक के अभ्यास के दरमियान ग़ज़ल की 40 से अधिक बहरों (छंदों) का प्रयोग मेरे ध्यान में आया है कि जिसमें लगभग तमाम प्रचिलित बहरों (छंदों) का समावेश हो जाता है। ग़ज़ल की बहरों का प्रयोग नज़्म और गीत में भी किया जा सकता है और साहिर लुधियानवी ने यह बखूबी किया भी है। इसके अलावा जिन स्वरों की समानता वाले क़ाफ़िया प्रचार में है उन सभी स्वरों की समानता वाले क़ाफ़िया का प्रयोग कहीं न कहीं मिल जाएगा।

हरेक लेख में एक-एक रचना को उसकी बहर (छंद) और क़ाफ़िया-व्यवस्था के साथ प्रस्तुत करता रहूँगा कि जिसमें हरेक रचना के पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) भी प्रस्तुत करता रहूँगा। ‘साहिर समग्र’ पुस्तक में से साहिर लुधियानवी की कुल मिलाकर 70 रचनाओं को इस तरह प्रस्तुत करने का उपक्रम रक्खा है।

आज एक युगल-गीत से इस लेखमाला की शुरूआत कर रहा हूँ। इस गीत में नायक-नायिका की मीठी नोकझोंक को प्रस्तुत किया गया है। हरेक बंद 2+2=4 पंक्ति के हैं। हरेक बंद में पहली दो पंक्ति में नायक, नायिका को छेड़ता है और दूसरी दो पंक्ति में नायिका उसका जवाब देती है। पहले बंद में चारों पंक्तियों में क़ाफ़िया को निभाया गया है और बाक़ी दोनों बंद में दूसरी और चौथी पंक्ति में ही क़ाफ़िया को निभाया गया है। इससे स्थायी (पहला बंद) और अंतरे (स्थायी के बाद वाले अन्य बंद) अलग दिखाई देंगे। इस रचना में रदीफ़ का प्रयोग नहीं किया गया है।

युगल-गीत :-

चुरा ले न तुमको ये मौसम सुहाना
खुली वादियों में अकेली न जाना
लुभाता है मुझको ये मौसम सुहाना
मैं जाउँगी तुम मेरे पीछे न आना

लिपट जाएगा कोई बेबाक़ झोंका
जवानी की रौ में न आँचल उड़ाना
मेरे वास्ते तुम परेशाँ न होना
मुझे ख़ूब आता है दामन बचाना

घटा भी कभी चूम लेती है चेहरा
समझ-सोच कर रुख़ से ज़ुल्फ़ें हटाना
घटा मेरे नज़दीक आकर तो देखें
इन आँखों ने सीखा है बिजली गिराना

- साहिर समग्र : पृष्ठ क्रमांक 290
फ़िल्म : दिल ही तो है
संगीत : रौशन
कंठ : मुकेश और सुमन कल्याणपुर

रदीफ़ : *
क़ाफ़िया : सुहाना, जाना, आना, उड़ाना, बचाना, हटाना, गिराना।
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकार+ना

बहर (छंद) : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा
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ल = लघु = 1 मात्रा
गा = गुरु = 2 मात्रा
ऊपर बिंदी मुख्य पद्यभार
नीचे बिंदी गौण पद्यभार

पहले बंद की तक़्ती (गणविभाजन) :-
ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/ ल, गां, ग़ा/
चु, रा, ले/ न, तुम, को/ ये, मौ, सम/ सु, हा, ना/
खु, ली, वा/ दि, यों, में/ अ, के, ली/ न, जा, ना/
लु, भा, ता/ है, मुझ, को/ ये, मौ, सम/ सु, हा, ना/
मैं, जा, उँ/ गी, तुम, मे/ रे, पी, छे/ न, आ, ना/

Uday Shah
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