27/12/2024
मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अंतिम कड़ी
अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’
श्लोक(६६)
रे त्याग सभी धर्मो को तू ,गह ले तू मात्र शरण मेरी,
मैं सब पापों को हर लूँगा, कर दूँगा दूर विपद तेरी ।
तू शोक न कर उद्विग्न न हो, उद्धार करुँगा मैं तेरा,
हे अर्जुन तू प्रिय सखा रहा, मैं बना सारथी रे तेरा ।
तज अपने सब कर्तव्यों को, आ जा तू पार्थ शरण मेरी,
कर दूँगा पापमुक्त तुझको, हर लूँगा व्याधि सकल तेरी ।
कितना दयालु परमात्मा है, कितनी उदार उसकी इच्छा,
सारे अपराध क्षमा उसके, जो आत्म-समर्पण कर देता ।
प्रभु आत्म-समर्पण चाह रहा, बदले में देता शक्ति दान
आत्मा को सबल बनाता वह, जो बदल सके सारे पुराण ।
जीवन में ऊपर उठने का, यह रहा सरलतम मार्ग श्रेष्ठ,
इसमें सब धाराएँ विलीन, यह सार-सिन्धु सुख का यथेष्ट ।
अभिमुख हम उसकी ओर हुए, रम जाने देते उसे पूर्ण,
रहता न शेष फिर करने कुछ, दायित्व वहन वह करे पूर्ण ।
करवाता जो रुचता उसको, हमको सम्हाल कर रखता है,
गिरने देता है नहीं कहीं, उद्धार हमारा करता है ।
अपनी क्षमता के उच्च शिखर, पर पहुँचा देता है हमको,
करते जब उसे समर्पण हम, बन रहे सहायक वह हमको ।
प्रभु सेवक बन सेवा करता, वह सच्चा धर्म निभाता है,
उसको करने कर्तव्य नहीं, बाकी कोई रह जाता है ।
सम्पूर्ण धर्म-कर्तव्यों को, तज, शरण एक मेरी गह ले,
मैं सर्वशक्ति, सर्वाधारी, तू मेरी शारणागति ले ले ।
तू शोक न कर चिंता तज दे, मेरे ऊपर निर्भर हो जा,
कर दूँगा पाप-मुक्त तुझको, तू मेरा आत्मरुप हो जा ।
श्लोक(६७)
अति गोपनीय यह ज्ञान परम, तपरहित पुरुष से यह न कहें
यह कहें न कभी अनिच्छुक को, यह नहीं अभक्त से कभी कहें ।
मुझसे जो द्वेष करे अर्जुन, उसको न सुनाएँ इसे कभी,
जो भक्तियोग में लगे हुए, वे ही सुनने के पात्र सही ।
गीता का यह उपदेश गुहृय, उसको न सुनाएँ जो अपात्र,
तप रहित रहे, जो भक्ति रहित, जो रहा अनिच्छुक वह कुपात्र ।
मुझमें जो द्वेषदृष्टि रखता, करता हो जो निन्दा मेरी,
वह रहा अनधिकारी अर्जुन, वह सुने न यह गीता मेरी ।
जिसमें हो समझ समझने की, जो साधक रहे समर्थ रहे,
जो अनुशासित जो प्रेमपूर्ण, जिसमें सेवा का भाव रहे ।
वह इस गीता को समझेगा, समझेगा नहीं अपात्र इसे,
जो करता हो निन्दा मेरी, उसको न सुनाना कभी इसे ।
श्लोक(६८)
गीता के परम रहस्यों को, भक्तों को जो समझायेगा,
यह वचन रहा, वह भक्ति योग, में पारंगत हो जायेगा ।
पायेगा मेरा धाम परम, पायेगा मुक्ति लाभ अर्जुन,
भगवान भक्त के वश में हैं, पर मिलें न वे श्रद्धा के बिन ।
इस परम रहस्य को जो मेरे, भक्तों को प्रमुदित सिखलाता,
मेरे प्रति अपना भक्ति भाव, जो इसको सिखला दिखलाता ।
वह मुझे प्राप्त करता अर्जुन, इसमें कोई सन्देह नहीं,
हो चलें अदीक्षित भी दीक्षित, मेरी है सार्थक भक्ति यही ।
सज्जन बन जाए दुष्ट पुरुष, सज्जन को हो उपलब्ध शान्ति,
जो शान्त मनुष्य विमुक्त बने, रह जाए मन में नहीं भ्रान्ति ।
समभाव जगे, जग सुखी रहे, नश्वरता से अमरत्व वरे,
बन्धन से पाने मुक्ति, सजग मानव का सतत प्रयास चले ।
श्लोक(६९- ७०)
गीता का जो गुणगान करे, अतिशय प्रिय वह सेवक मेरा,
उससे न अधिक प्रिय है कोई, होगा न कभी, यह मत मेरा ।
अरु रही घोषणा यह मेरी, वह ज्ञान-यज्ञ मेरा होगा,
जब पाठ पुनीता गीता का, कोई सुधिजन करता होगा ।
उससे बढ़कर न मनुज कोई, जिसने मेरा प्रिय काम किया,
उससे बढ़कर सारे जग में, प्रिय मुझे न कोई अन्य रहा ।
संवाद पवित्र हमारा यह, इसका अध्ययन करने वाला,
पूजा मेरी करता मानो, वह अपने ज्ञान-यज्ञ द्वारा ।
श्लोक(७१)
विद्वेष भाव से मुक्त पुरुष, श्रद्धा के साथ सुनेगा जो,
पावन गीता के तत्वों का, मन में भावार्थ गुनेगा जो ।
हो जायेगा वह पाप मुक्त, पायेगा गति पुण्यात्मा की,
हो गए पुरुष जो ब्रह्मभूत, उनमें उसकी होगी गिनती ।
श्लोक(७२)
अब पूछ रहा तुझसे अर्जुन, तूने यह शास्त्र सुना सारा,
एकाग्र चित्त हो एकनिष्ठ, तूने निहितार्थ गुना सारा ।
क्या अभी नहीं अज्ञान मिटा? क्या मोह अभी भी शेष रहा?
क्या रण-योद्धाओं में अपने, सम्बन्ध पुराने देख रहा?
एकाग्र चित्त से श्रवण किया, क्या तूने गीता शास्त्र पार्थ?
क्या इससे मोह मिटा तेरा? बतला मुझको अर्जुन यथार्थ?
श्लोक(७३)
अर्जुन उवाच:-
अर्जुन ने कहा कि हे अच्युत, यह कृपा कि मेरा मोह मिटा,
मेरी सुधि प्राप्त हुई मुझको, मेरा सारा सन्देह मिटा,
संशय मेरा हो गया दूर, मुझमें भगवन दृढ़ता आई,
आज्ञा दें पालॅूंगा उसको, प्रभु मैंने शरणागति पाई ।
हैं आप स्वयं परमेश्वर प्रभु, यह भली भाँति मैं जान गया,
यह कृपा स्वयं आपने की भगवन, भ्रम मिटा मोह सब दूर हुआ,
उपकार किया उपदेश दिया, मैं विस्मृति से बाहर आया,
शरणागत हॅूं आज्ञा दें प्रभु, इस सिर पर रखें सदा छाया ।
अपना नियत कर्म यह मुझको, बढ़कर पूरा करना है,
जैसी प्रभु की इच्छा होगी, वैसा मुझको चलना है,
होना है सब आप स्वयं ही, मैं तो बस उपकरण रहा,
माध्यम हूँ तेरी आज्ञा का, यह सब तेरा कार्य रहा ।
पूरा करना मुझे प्रयोजन, जो प्रभु चाह रहा मुझसे,
हृषीकेश हे अन्तर्यामी, प्रेरित हॅू तेरी इच्छा से ,
तूने भेजा है धरती पर, हो पूरी तेरी हर इच्छा,
हो आज्ञा वहीं करुँगा मैं, है लक्ष्य यही इस जीवन का ।
अज्ञान जनित अब मोह नहीं ,जागा है ज्ञान-प्रकाश दिव्य,
प्रत्यक्ष हो गया है भगवन आपका स्वरुप समग्र दिव्य,
कुछ भी अज्ञात नहीं मुझको, ऐश्वर्य, प्रभाव गुण ज्ञात हुए,
कर्तव्य अशेष हुए मेरे, लीला स्वरुप हैं कृत्य बचे ।
प्रत्यक्ष आपको देख रहा, कृतकृत्य हुआ हूँ मैं भगवन,
क्या वहाँ अँधेरा ठहरेगा, हो जहाँ विभाषित दिव्य भुवन,
पाया प्रसादवत आत्म बोध, कर्त्ता न रहा, अनुचर हूँ मैं,
तुझ परमपिता का अंशी हूँ, आज्ञा दे प्रभु सेवक हॅूं मैं ।
श्लोक(७४)
संजय उवाच-
संजय बोले, सौभाग्य रहा, जो मैंने यह अवसर पाया,
सम्वाद कृष्ण अरु अर्जुन का, मैं जो अविकल सुन पाया,
सचमुच महान ये आत्माएँ, वार्ता करतीं, विस्मकारी,
सुनकर जिसको रोमांचित मैं जो जीवन को मंगलकारी ।
श्लोक(७५)
गुरु व्यास देव की कृपा रही सामर्थ्य मिला, अवसर पाया,
अर्जुन के प्रति जो कहा गया, वह मैं अविकल सुन पाया,
श्रीकृष्ण परम योगेश्वर की साक्षात सुनी मैंने वाणी ,
व्याख्या योगों की गोपनीय सुन मुक्ति प्राप्त करता प्राणी ।
श्लोक(७६)
भगवान कृष्ण अरु अर्जुन के, राजन अद्भुत संवाद सुने,
सुधि करता उनकी बार बार, मन में आनन्द अमित उपजे,
हर्षित होता हॅूं रोमांचित, क्षण प्रतिक्षण उसकी सुधि आती,
अन्तस्तल आलोकित होता, अतिदिव्य छटा सी छा जाती ।
श्लोक(७७)
भगवान कृष्ण का दिव्य रुप, नयनों में भरता है ललकन,
उसकी मैं पुनि पुनि सुधि करता, राजन, तन में होती पुलकन,
सुधि करता, प्रभुदित होता मैं, साक्षात किया मैंने दर्शन
वह परम अनूठा रुप रहा, आश्चर्य चकित है मेरा मन ।
श्लोक(७८)
योगेश्वर हों श्री कृष्ण जहाँ, अरु जहाँ धनुर्धर हों अर्जुन,
बसती है वहाँ राजलक्ष्मी, सम्पत्ति विपुल अरु अक्षय धन,
ऐश्वर्य समस्त वहाँ होता, होती है विजय अटल, राजन!
होती है शक्ति नीति होती, ऐसा कहता है मेरा मन ।
गीता का उपदेश योग है, जिसके उपदेशक योगेश्वर,
मानव जाने हर मानव के, भीतर बसता है परमेश्वर,
आत्मा जिस क्षण जाग्रत होती, परमात्मा से जुड़ जाती है,
सौभाग्य, विजय, कल्याण, मुक्ति, नैतिकता ज्यों खिल जाती है ।
संयोग योग का ऊर्जा से, हो जहाँ, वहाँ श्री विजय रही,
संजय द्वारा अन्तिम पद में यह बात सार की कही गई,
बिगड़ा यदि योग हुए पागल, बिगड़ी ऊर्जा विघ्वंश हुआ ।
समुचित जब रहा समन्वय तब, केन्द्रीय तत्व दर्शन उभरा ।
आत्मिक उन्नयन समाज सेवा, दोनों जब चलते साथ-साथ,
पूर्णत्व प्राप्त करता मनुष्य, कल्याण परक होता विकास ।
योगेश्वर कृष्ण जहाँ होते, अर्जुन हो जहाँ धनुर्धारी,
निश्चित श्री विजय वहाँ होती, होती सुख शान्ति वहाँ सारी ।
।卐 । इति मोक्ष सन्यास योगो नाम अष्टादशोsधयः ।卐 ।
::इति श्रीमदभागवतगीता उपनिषद::