GEETA GYAAN Prabha

GEETA GYAAN Prabha geeta gyaan prabha wirretn by famous poet Dr.ramesh kumar budholiya Its padyanuvaad of bhagwat geeta

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
27/12/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अंतिम कड़ी

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’
श्लोक(६६)
रे त्याग सभी धर्मो को तू ,गह ले तू मात्र शरण मेरी,
मैं सब पापों को हर लूँगा, कर दूँगा दूर विपद तेरी ।
तू शोक न कर उद्विग्न न हो, उद्धार करुँगा मैं तेरा,
हे अर्जुन तू प्रिय सखा रहा, मैं बना सारथी रे तेरा ।

तज अपने सब कर्तव्यों को, आ जा तू पार्थ शरण मेरी,
कर दूँगा पापमुक्त तुझको, हर लूँगा व्याधि सकल तेरी ।
कितना दयालु परमात्मा है, कितनी उदार उसकी इच्छा,
सारे अपराध क्षमा उसके, जो आत्म-समर्पण कर देता ।

प्रभु आत्म-समर्पण चाह रहा, बदले में देता शक्ति दान
आत्मा को सबल बनाता वह, जो बदल सके सारे पुराण ।
जीवन में ऊपर उठने का, यह रहा सरलतम मार्ग श्रेष्ठ,
इसमें सब धाराएँ विलीन, यह सार-सिन्धु सुख का यथेष्ट ।

अभिमुख हम उसकी ओर हुए, रम जाने देते उसे पूर्ण,
रहता न शेष फिर करने कुछ, दायित्व वहन वह करे पूर्ण ।
करवाता जो रुचता उसको, हमको सम्हाल कर रखता है,
गिरने देता है नहीं कहीं, उद्धार हमारा करता है ।

अपनी क्षमता के उच्च शिखर, पर पहुँचा देता है हमको,
करते जब उसे समर्पण हम, बन रहे सहायक वह हमको ।
प्रभु सेवक बन सेवा करता, वह सच्चा धर्म निभाता है,
उसको करने कर्तव्य नहीं, बाकी कोई रह जाता है ।

सम्पूर्ण धर्म-कर्तव्यों को, तज, शरण एक मेरी गह ले,
मैं सर्वशक्ति, सर्वाधारी, तू मेरी शारणागति ले ले ।
तू शोक न कर चिंता तज दे, मेरे ऊपर निर्भर हो जा,
कर दूँगा पाप-मुक्त तुझको, तू मेरा आत्मरुप हो जा ।
श्लोक(६७)
अति गोपनीय यह ज्ञान परम, तपरहित पुरुष से यह न कहें
यह कहें न कभी अनिच्छुक को, यह नहीं अभक्त से कभी कहें ।
मुझसे जो द्वेष करे अर्जुन, उसको न सुनाएँ इसे कभी,
जो भक्तियोग में लगे हुए, वे ही सुनने के पात्र सही ।

गीता का यह उपदेश गुहृय, उसको न सुनाएँ जो अपात्र,
तप रहित रहे, जो भक्ति रहित, जो रहा अनिच्छुक वह कुपात्र ।
मुझमें जो द्वेषदृष्टि रखता, करता हो जो निन्दा मेरी,
वह रहा अनधिकारी अर्जुन, वह सुने न यह गीता मेरी ।

जिसमें हो समझ समझने की, जो साधक रहे समर्थ रहे,
जो अनुशासित जो प्रेमपूर्ण, जिसमें सेवा का भाव रहे ।
वह इस गीता को समझेगा, समझेगा नहीं अपात्र इसे,
जो करता हो निन्दा मेरी, उसको न सुनाना कभी इसे ।
श्लोक(६८)
गीता के परम रहस्यों को, भक्तों को जो समझायेगा,
यह वचन रहा, वह भक्ति योग, में पारंगत हो जायेगा ।
पायेगा मेरा धाम परम, पायेगा मुक्ति लाभ अर्जुन,
भगवान भक्त के वश में हैं, पर मिलें न वे श्रद्धा के बिन ।

इस परम रहस्य को जो मेरे, भक्तों को प्रमुदित सिखलाता,
मेरे प्रति अपना भक्ति भाव, जो इसको सिखला दिखलाता ।
वह मुझे प्राप्त करता अर्जुन, इसमें कोई सन्देह नहीं,
हो चलें अदीक्षित भी दीक्षित, मेरी है सार्थक भक्ति यही ।

सज्जन बन जाए दुष्ट पुरुष, सज्जन को हो उपलब्ध शान्ति,
जो शान्त मनुष्य विमुक्त बने, रह जाए मन में नहीं भ्रान्ति ।
समभाव जगे, जग सुखी रहे, नश्वरता से अमरत्व वरे,
बन्धन से पाने मुक्ति, सजग मानव का सतत प्रयास चले ।
श्लोक(६९- ७०)
गीता का जो गुणगान करे, अतिशय प्रिय वह सेवक मेरा,
उससे न अधिक प्रिय है कोई, होगा न कभी, यह मत मेरा ।
अरु रही घोषणा यह मेरी, वह ज्ञान-यज्ञ मेरा होगा,
जब पाठ पुनीता गीता का, कोई सुधिजन करता होगा ।

उससे बढ़कर न मनुज कोई, जिसने मेरा प्रिय काम किया,
उससे बढ़कर सारे जग में, प्रिय मुझे न कोई अन्य रहा ।
संवाद पवित्र हमारा यह, इसका अध्ययन करने वाला,
पूजा मेरी करता मानो, वह अपने ज्ञान-यज्ञ द्वारा ।
श्लोक(७१)
विद्वेष भाव से मुक्त पुरुष, श्रद्धा के साथ सुनेगा जो,
पावन गीता के तत्वों का, मन में भावार्थ गुनेगा जो ।
हो जायेगा वह पाप मुक्त, पायेगा गति पुण्यात्मा की,
हो गए पुरुष जो ब्रह्मभूत, उनमें उसकी होगी गिनती ।
श्लोक(७२)
अब पूछ रहा तुझसे अर्जुन, तूने यह शास्त्र सुना सारा,
एकाग्र चित्त हो एकनिष्ठ, तूने निहितार्थ गुना सारा ।
क्या अभी नहीं अज्ञान मिटा? क्या मोह अभी भी शेष रहा?
क्या रण-योद्धाओं में अपने, सम्बन्ध पुराने देख रहा?

एकाग्र चित्त से श्रवण किया, क्या तूने गीता शास्त्र पार्थ?
क्या इससे मोह मिटा तेरा? बतला मुझको अर्जुन यथार्थ?
श्लोक(७३)
अर्जुन उवाच:-
अर्जुन ने कहा कि हे अच्युत, यह कृपा कि मेरा मोह मिटा,
मेरी सुधि प्राप्त हुई मुझको, मेरा सारा सन्देह मिटा,
संशय मेरा हो गया दूर, मुझमें भगवन दृढ़ता आई,
आज्ञा दें पालॅूंगा उसको, प्रभु मैंने शरणागति पाई ।

हैं आप स्वयं परमेश्वर प्रभु, यह भली भाँति मैं जान गया,
यह कृपा स्वयं आपने की भगवन, भ्रम मिटा मोह सब दूर हुआ,
उपकार किया उपदेश दिया, मैं विस्मृति से बाहर आया,
शरणागत हॅूं आज्ञा दें प्रभु, इस सिर पर रखें सदा छाया ।

अपना नियत कर्म यह मुझको, बढ़कर पूरा करना है,
जैसी प्रभु की इच्छा होगी, वैसा मुझको चलना है,
होना है सब आप स्वयं ही, मैं तो बस उपकरण रहा,
माध्यम हूँ तेरी आज्ञा का, यह सब तेरा कार्य रहा ।

पूरा करना मुझे प्रयोजन, जो प्रभु चाह रहा मुझसे,
हृषीकेश हे अन्तर्यामी, प्रेरित हॅू तेरी इच्छा से ,
तूने भेजा है धरती पर, हो पूरी तेरी हर इच्छा,
हो आज्ञा वहीं करुँगा मैं, है लक्ष्य यही इस जीवन का ।

अज्ञान जनित अब मोह नहीं ,जागा है ज्ञान-प्रकाश दिव्य,
प्रत्यक्ष हो गया है भगवन आपका स्वरुप समग्र दिव्य,
कुछ भी अज्ञात नहीं मुझको, ऐश्वर्य, प्रभाव गुण ज्ञात हुए,
कर्तव्य अशेष हुए मेरे, लीला स्वरुप हैं कृत्य बचे ।

प्रत्यक्ष आपको देख रहा, कृतकृत्य हुआ हूँ मैं भगवन,
क्या वहाँ अँधेरा ठहरेगा, हो जहाँ विभाषित दिव्य भुवन,
पाया प्रसादवत आत्म बोध, कर्त्ता न रहा, अनुचर हूँ मैं,
तुझ परमपिता का अंशी हूँ, आज्ञा दे प्रभु सेवक हॅूं मैं ।
श्लोक(७४)
संजय उवाच-
संजय बोले, सौभाग्य रहा, जो मैंने यह अवसर पाया,
सम्वाद कृष्ण अरु अर्जुन का, मैं जो अविकल सुन पाया,
सचमुच महान ये आत्माएँ, वार्ता करतीं, विस्मकारी,
सुनकर जिसको रोमांचित मैं जो जीवन को मंगलकारी ।
श्लोक(७५)
गुरु व्यास देव की कृपा रही सामर्थ्य मिला, अवसर पाया,
अर्जुन के प्रति जो कहा गया, वह मैं अविकल सुन पाया,
श्रीकृष्ण परम योगेश्वर की साक्षात सुनी मैंने वाणी ,
व्याख्या योगों की गोपनीय सुन मुक्ति प्राप्त करता प्राणी ।
श्लोक(७६)
भगवान कृष्ण अरु अर्जुन के, राजन अद्भुत संवाद सुने,
सुधि करता उनकी बार बार, मन में आनन्द अमित उपजे,
हर्षित होता हॅूं रोमांचित, क्षण प्रतिक्षण उसकी सुधि आती,
अन्तस्तल आलोकित होता, अतिदिव्य छटा सी छा जाती ।
श्लोक(७७)
भगवान कृष्ण का दिव्य रुप, नयनों में भरता है ललकन,
उसकी मैं पुनि पुनि सुधि करता, राजन, तन में होती पुलकन,
सुधि करता, प्रभुदित होता मैं, साक्षात किया मैंने दर्शन
वह परम अनूठा रुप रहा, आश्चर्य चकित है मेरा मन ।
श्लोक(७८)
योगेश्वर हों श्री कृष्ण जहाँ, अरु जहाँ धनुर्धर हों अर्जुन,
बसती है वहाँ राजलक्ष्मी, सम्पत्ति विपुल अरु अक्षय धन,
ऐश्वर्य समस्त वहाँ होता, होती है विजय अटल, राजन!
होती है शक्ति नीति होती, ऐसा कहता है मेरा मन ।

गीता का उपदेश योग है, जिसके उपदेशक योगेश्वर,
मानव जाने हर मानव के, भीतर बसता है परमेश्वर,
आत्मा जिस क्षण जाग्रत होती, परमात्मा से जुड़ जाती है,
सौभाग्य, विजय, कल्याण, मुक्ति, नैतिकता ज्यों खिल जाती है ।

संयोग योग का ऊर्जा से, हो जहाँ, वहाँ श्री विजय रही,
संजय द्वारा अन्तिम पद में यह बात सार की कही गई,
बिगड़ा यदि योग हुए पागल, बिगड़ी ऊर्जा विघ्वंश हुआ ।
समुचित जब रहा समन्वय तब, केन्द्रीय तत्व दर्शन उभरा ।

आत्मिक उन्नयन समाज सेवा, दोनों जब चलते साथ-साथ,
पूर्णत्व प्राप्त करता मनुष्य, कल्याण परक होता विकास ।
योगेश्वर कृष्ण जहाँ होते, अर्जुन हो जहाँ धनुर्धारी,
निश्चित श्री विजय वहाँ होती, होती सुख शान्ति वहाँ सारी ।

।卐 । इति मोक्ष सन्यास योगो नाम अष्टादशोsधयः ।卐 ।
::इति श्रीमदभागवतगीता उपनिषद::

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
13/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(६३)
यह ज्ञान रहा अति गोपनीय, मैंने जो तेरे लिए कहा,
यह गीता शास्त्र सुना तूने, तुझपर इसका क्या असर पड़ा?
तू पूर्ण रुप से सोच समझ, फिर अपना निर्णय कर अर्जुन,
जैसी इच्छा हो वैसा कर, वह कर जो कहता तेरा मन ।

यह ज्ञान तुझे बतलाया है, जो रहा रहस्यों से बढ़कर,
इस पर विचार कर भलीभाँति, फिर जैसी इच्छा, वैसा कर ।
परमात्मा करता है पुकार, हम सुनें उसे या नहीं सुनें,
हम हैं स्वतंत्र निर्णय करने, हम पर उसके न दबाव रहें ।

वह नहीं हाँकता है हमको, वह हमको नहीं विवश करता,
तैयार मनाकर करता है, वह निर्णय को स्वतन्त्र रखता ।
आदेश नहीं देता है वह, धीरज देता जब हम गिरते,
धीरज धर करे प्रतीक्षा वह, जब तक उस ओर न हम मुड़ते ।

स्वेच्छा से ही पहुंचे मनुष्य, उस तक ऐसी प्रभु की चिंता,
इसलिए तटस्थ, निरपेक्ष रहे, वह तानाशाह नहीं बनता ।
संकल्प शक्ति, मानवीय यत्न, का करे समर्थन, बल देता,
साधक बनता उस साधक का जो अपनी नाँव स्वयं खेता ।

करना चाहे वह कृपा मगर, उन पर जो कृपापात्र बनते,
अनुभूति अखण्डता की करते, अपने विवेक पर जो चलते ।
विश्वास उचित कितना इसका, ढूँढा करते हैं समाधान,
रखते विवेक की दृष्टि तीव्र, बँधकर न रहे जो पशु समान ।

जो कह सकता था, ज्ञान-तत्व, वह तेरे प्रति मैं सुना चुका
यह ज्ञान रहस्यमय रहा पार्थ, कहने को अब कुछ नहीं बचा
ये ज्ञान, कर्म अरु भक्तिभोग, जो भाए, उसका कर पालन
या समझे जो कुछ ठीक वहीं, अपना निर्णय कर तू अर्जुन ।
श्लोक(६४)
अति गोपनीय से भी बढ़कर, जो गोपनीय मम सार वचन
तेरे प्रति फिर दुहराता हॅूं, दे ध्यान उन्हें तू फिर से सुन
तू मुझको है अतिशय प्यारा, इसलिए चाहता हित तेरा
मेरा नित चिन्तन मनन रहे, कल्याण सदा होगा तेरा ।
श्लोक(६५)
तू भक्ति भावना भावित हो, मेरा पूजन अरु वन्दन कर,
मेरी गीता का सार रहा, तू कर्म समर्पित मुझको कर ।
तू मेरा प्रियतम सखा रहा, यह सत्य प्रतिज्ञा है मेरी
तू पूर्ण काम हो जायेगा, तू प्राप्त करेगा मुझको ही ।

तू सबसे प्रिय मुझको अर्जुन, सुन तेरे हित की बात कहूँ,
यह सबसे अधिक रहस्यपूर्ण, जो शब्दों में अभिव्यक्त करुँ ।
मुझमें अपना मन सुस्थिर कर, तू मेरा अटल-भक्त बन जा,
कर मेरे लिए यज्ञ-याजन, तू कर प्रणाम, अर्पित हो जा ।

मुझको अवश्य तू पा लेगा, यह मेरा वचन रहा तुझको,
कुछ भी न दुराव रहा तुझसे प्रिय सदा भक्त होता मुझको ।
जो आत्म समर्पण करता है, अविचल आस्था रखता मुझमें,
तेरे हाथों में सौंप रहा, हे देव, मात्र तेरा बनने ।

लाने को अपने निकट हमें, उत्सुक रहता परमात्मा भी,
अपना स्वभाव वह प्रगट करे, दे अपना प्रेम, दयालुता भी ।
वह करे प्रतीक्षा खड़ा, खड़ा, कब हम अपना उर-पट खोलें,
वह समा सके उर-अन्तस में, परिपूरित हम उससे होलें ।

आत्मिक जीवन उस तक पहुँचे निर्भर हम पर, निर्भर उस पर,
हम उस तक आरोहण करते, अवरोहण वह करता हम पर ।
वह सुन पुकार, पा खुला हृदय, आ अन्तस में भर जाता है,
पदचाप नहीं हम सुन पाते, वह रग-रग में खिल जाता है ।

वह बन्द कपाटों के बाहर अनवरत प्रतीक्षा रत रहता,
खुलते कपाट उर के जिस क्षण, वह अन्तस में प्रवेश करता ।
देता सहायता बढ़ आगे, सुनता वह जब अपनी पुकार,
भक्तों कोगले लगा लेता, अपने प्रण का करता निबाह ।

अपनी श्रद्धा, अपने विचार, अपनी पूजा, सब यज्ञ कर्म,
परमात्मा से जोड़ें विनम्र, यह रहा हमारा प्रथम धर्म ।
ले सरल हृदय, विश्वास अडिग, उसके अर्पित जो हो जाते,
अर्जुन वे दयासिन्धु प्रभु की, शरणागति का प्रसाद पाते ।

अपने सारे व्यवहारों का, मुझ सर्व व्याप्त को विषय बना,
रह सके न द्वैत भाव मन में, तू मुझसे ऐसी लगन लगा ।
मेरी प्रसन्नता का अर्जुन, हो जायेगा तू अधिकारी,
होगा स्वरुप को प्राप्त, हटेगी रे मन से दुविधा सारी । ।
क्रमशः

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
12/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(५८)
भावित मेरी सुधि से होकर, अर्जित कर मेरी कृपा पार्थ,
सब बाधाएँ तय कर लेगा, यह मेरी है वाणी यथार्थ ।
यदि अहंकार वश यह वाणी, तू नहीं सुनेगा तो फिर सुन,
तेरा होगा उद्धार नहीं, तू नष्ट हुआ अपने को गिन ।

यदि मुझमें चित्त लगायेगा, संकट होंगे सब दूर पार्थ,
जो पात्र कृपा का बनता है, वह पार उतरता अनायास ।
रहता घमण्ड में चूर, नहीं देता जो मेरी ओर ध्यान,
होता है लोक नष्ट उसका, परलोक भ्रष्ट होता तमाम ।

वह मुक्ति चुने या नरकवास, इस हेतु रहा मानव स्वतंत्र,
प्रतिरोध करे प्रभु-इच्छा का, तो होता उसका दुखद अन्त ।
हो अहंकार के वशीभूत, वह करे अवज्ञा ईश्वर की,
वह रोक सके अपनी अवनति, इतनी न शक्ति उसमें रहती ।

मुझमें सुस्थिर कर चित्त पार्थ, हर कठिनाई हल होवेगी,
कुछ भी न तुझे करना होगा, हर बात स्वयं पूरी होगी ।
विश्वास न कर यदि रहा स्वयं, अपने में भूला दर्प भरा,
तो पतन अवश्यंभावी है, कोई न किनारा हाथ लगा ।

अर्जुन तुम मेरे परम भक्त, अपने भक्तों का ध्यान रखूँ,
कर सके अवज्ञा जो मेरी, उसको मैं भक्त नहीं समझॅूं ।
जो करे अवज्ञा पार्थ सुनो, उससे न रहा मेरा नाता,
अभिमान रहा जितना उसका, उतने वह गहरे धँस जाता ।

भर दूँगा चित्त तुम्हारा मैं, उस भक्तिभाव से जो अभेद,
मेरा प्रसाद पाकर इसको, मिट जाते मन के पाप खेद ।
पीड़ित कर सके न जग उसको, पाया जिसने मेरा प्रसाद,
दुर्गति से तारण हो जाता, आनन्द बने सारा विषाद ।
श्लोक(५९)
हो अहंकार के वश में तू, मत समझ उपेक्षा कर सकता,
मेरी आज्ञा अवहेलित कर, तू युद्ध किए बिन रह सकता ।
तो समझ कि यह निश्चय मिथ्या, ऐसा न करेगा तू अर्जुन,
तेरा स्वभाव तुझसे बलात, यह युद्ध करा लेगा, तू सुन ।

यह तेरा अहंकार होगा, यदि कहता नहीं लडूँगा मैं,
निश्चय न कभी पूरा होगा, यदि कहे न धनुष गहॅूंगा मैं ।
कर देगी विवश प्रकृति तुझको, तू अपना धनुष उठायेगा,
जिनको तू समझ रहा अपना, उन पर ही बाण चलायेगा ।

यह प्रकृति निम्नतर होती जो, भ्रम और पतन का हेतु बने,
पर तत्व बोध जिसका जागा, वह सत्य प्राप्ति का सेतु बने ।
बनता विकास का साधक वह, पोषण करता मानवता का,
करता विरोध वह नहीं, निषेध वह करता नहीं, जगत हित का ।

उसका न स्वार्थ अपना कोई, उसको है, राम काज करना,
आत्मा आदेशित करती है, उसको अधर्म का क्षय करना ।
जाग्रत रहता उसका प्रकाश, अन्तर्मन से जिसका उद्गम,
उपकरण बना परमात्मा का, करता पूरे अपने उद्यम ।

परमात्मा रखता है विकल्प, जिनमें हमको चुनना होता,
उल्टे बहाव के चलने में, क्या नहीं निपट अपव्यय होता?
स्वाभाविकता है सहज भाव, उसमें होती प्रभु की इच्छा,
खो देता समय शक्ति दोनों, जो रखे प्रमुख अपनी इच्छा ।

ले अहंकार का आश्रय तू, कह रहा' करुँगा युद्ध नहीं',
निश्चय यह तेरा मिथ्या है, तू प्रकृति धर्म से मुक्त नहीं ।
क्षत्रिय कुल जन्मा तू अर्जुन, तेरा अपना क्षत्रिय स्वभाव,
यह तुझसे युद्ध करा लेगा, यह सहज कर्म तेरा स्वभाव ।

अज्ञान जनित यह अहंकार, अपने को पण्डित मान रहा,
समझे समर्थ, समझे स्वतंत्र, अपने को कर्त्ता मान रहा ।
आधीन प्रकृति के है मनुष्य होता उसका अपना स्वभाव,
वैसे ही उसके कर्म रहे, जैसा उसका होता स्वभाव ।

'ये सब मेरे सम्बन्धी हैं', इनसे कैसे मैं लड़ सकता?
इनका बध करना पाप तुझे, यह माया के कारण कहता ।
यह तत्व रुप से सही नहीं, जीवात्मा मुक्त स्वतंत्र रहा,
यह नहीं जिलाने से जीता, यह नहीं मारने से मरता ।
श्लोक(६०)
हे कुंतीनंदन, कर्म पूर्वकृत, रचते हैं तेरा स्वभाव
उसके आश्रित तू कर्म करे, कर्मो पर जो डाले प्रभाव
अपने स्वभाव की शक्ति मुझे, कर देगी बाध्य कर्म करने
वह कर्म, मोह के वशीभूत, तू नहीं प्रवृत जिसको करने ।

क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना, यह प्रकृत कर्म, यह पाप नहीं
क्षत्रिय का युद्ध विमुख होना, यह क्षात्र-धर्म के उचित नहीं
इच्छा न रहे, फिर भी स्वभाव, अपना जो कार्य करा लेता
पर मुक्ति वही पाता अर्जुन, जो मेरा कर्माश्रय लेता ।

मैं धान न जैसा ऊगूँगा, यदि कहे धान का कण ऐसा,
क्या सम्भव है यह, हे अर्जुन, वह होगा ही स्वभाव जैसा ।
होती स्वभाव की अपनी गति, विपरीत दिशा दुष्वार रहे,
हो युक्ति युक्त संवाहन तब, धारा से कोई पार लगे ।

होती न अनिच्छा अर्थवती, प्रारब्ध कार्य करवा लेता,
बिन चले पैर से ज्यों मनुष्य, बहुतेरा पथ तय कर लेता ।
जो हाथ-पैर से बँधा मगर, अर्जुन रथ पर आसीन रहा,
बिन चले पैर से अपने वह, कितनी ही दूर बलात चला ।

चलने चलने में अंतर है, इच्छा से चलना अलग रहा,
फिर कर्मयोग का यदि पालन, हो मन में सात्विक भाव जगा ।
वह कर्म विहित कर्तव्य बने, जिसमें हरि इच्छा विद्यमान,
कल्याण निहित उसमें रहता, हैं आप्तवाक्य जिसके प्रमाण ।

हे अर्जुन मोह ग्रसित होकर, तू भले उपेक्षा कर मेरी,
आज्ञा का पालन नहीं करे, मत करे कर्म मति का मेरी ।
पर कर्म वही तुझको बरबस, कुंतीनंदन करना होगा
तेरा स्वभाव जैसा उसके अनुसार तुझे चलना होगा ।
श्लोक (६१)
हे अर्जुन हृदयों में सबके, बैठा होता अन्तर्यामी,
जग-जीवों का जीवन सारा, वह चला रहा अन्तर्यामी ।
वह देह यन्त्र का चालक बन, जग जीवन मात्र को घुमा रहा,
माया की उसकी शक्ति रही, जिससे वह सबको चला रहा ।

रे प्राणिमात्र के अन्तस में, बसता है ईश्वर सुन अर्जुन,
वह सबको ऐसे घुमा रहा, ज्यों किसी यन्त्र पर करें भ्रमण ।
वह मार्ग प्रदर्शक बनता है, निर्धारित करता है विकास,
घटनाएँ करता संचालित, जीवन देता, देता प्रकाश ।

वह भाग्य नियामक बनता है, करता स्वभाव का निर्धारण,
कर्मो का लेखा रखता है, करता गतिविधि का संचालन ।
वह आत्म आन्तरिक तम सबका, अस्तित्ववान करता सबको,
हम भले भूल जाएँ उसको, वह नहीं भूलता हम सबको ।

होकर सचेत जुड़कर उससे, जीवन यापन यदि हम करते ,
कर्मो का अर्पण कर उसको, अपना सब अहम भाव तजते ।
यदि ऐसा नहीं किया फिर भी, जो सत्य वही विजयी होता,
उससे रह दूर अहंकारी, जीवन की सही दृष्टि खोता ।

विश्वात्मा के आगे हमको, यदि आज नहीं कल झुकना है,
पर अंतराल में छूट रही, निर्णय हमको ही करना है ।
सहयोग चाहता स्वेच्छा से, प्रभु नहीं विवशता है कोई,
जब बनें पारदर्शक माध्यम, हम भासित करते उसको ही ।

बिन कर्म किए कोई प्राणी, क्षण मात्र नहीं रह सकता है,
वह हो स्वभाव के पराधीन, अपने कर्मो को करता है ।
लेकिन स्वतंत्रता है उसको, वह मार्ग मुक्ति का चुन सकता,
कर ग्रहण शरण परमेश्वर की, उद्धार स्वयं का कर सकता ।
श्लोक(६२)
हे अर्जुन उस परमेश्वर की, शरणागत हो तू सभी तरह,
उसकी ही कृपा प्राप्त कर तू, यश पायेगा तू सभी तरह ।
पायेगा मन की शान्ति परम, तू परमधाम भी पायेगा,
जो दिव्य सनातन शाश्वत है, वह तुझे प्राप्त हो जायेगा ।

अपने सारे अस्तित्व सहित, उसकी ही शरण ग्रहण कर तू,
पायेगा उसकी परम कृपा, वह परम धाम पायेगा तू ।
पायेगा शाश्वत शान्ति पार्थ, परमात्मा का सहयोगी बन,
अपना निर्धारित कर्म समझ, कर्तव्य, उसे तू पूरा कर ।
क्रमशः

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
11/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(५५)
मुझ पुरुषोत्तम का क्या स्वरुप, क्या तत्व वही जन जान सके,
जो भक्तियोग मेरा पाकर, मुझको तात्विक पहिचान सके ।
पहिचान लिया जिसने मुझको, या पूर्ण रुप से जान लिया,
वैकुण्ठ जगत में कर प्रवेश, उसने मेरा तादात्म्य किया ।

वह भक्तिभाव से जान सके, मैं हूँ यथार्थ में कौन पार्थ,
मैं कितना हूँ कि मैं कैसा हूँ,वह जान सके मेरा यथार्थ ।
मुझमें प्रवेश करने पाता, वह तत्व रुप पहिचान मुझे,
रे रहे ज्ञान या भक्तिमार्ग, दोनों ये रहे समान मुझे ।

होता स्वरुप का ज्ञान उसे, परमात्मा उसको मिल जाता,
पा जाता रविकर परस पद्म, पखुरी पखुरी वह खिल जाता ।
व्यवधान न कोई पड़ता है, वह पाता प्रभु को ज्ञान साथ,
परमात्मा में करके प्रवेश, वह उनमें ही करता निवास ।

साधक अपना कर परा भक्ति, पा जाता मुझ परमात्मा को,
वह तत्व रुप से जान सके, मैं कैसा क्या, मुझ आत्मा को ।
ममगत होकर ममरुप हुआ, इसमें न तनिक अन्तर पड़ता
जैसा भी वह जीवन जीता, उसमें मेरा अनुभव करता ।
श्लोक(५६)
मेरा आश्रित निष्काम भक्त, अनुकम्पा मेरी पा जाता,
सब कर्मो का निर्वाह करे, पर अविनाशी पद पा जाता ।
पा जाता परमधाम मेरा, जो रहा सनातन दिव्य परम,
जिसमें न विकार कहीं कोई अव्यय सत चित आनन्द चरम ।

सब भाँति कर्म करता अपने, शरणागत मेरा भक्त पार्थ,
मैं उस पर कृपा किया करता, देता हॅूं उसको मुक्ति पार्थ ।
वह शाश्वत पद को पाता है, पाता है परमधाम मेरा,
वह भक्त कर्मयोगी मुझको, अतिशय प्रिय भक्त रहा मेरा ।

हो ज्ञान भक्ति या कर्म योग, ये साथ-साथ मिलकर रहते
यह ज्ञान कि प्रकृति शक्ति उसकी, जिसको परमात्म ब्रह्म कहते
है व्यक्ति पात्र उसका ऐसा, जिसको वह स्वयं नचाता है
यह ध्यान जिसे सध जाता वह रे मुक्त कर्म हो जाता है ।

साधन हैं सारे योग पार्थ, फल जिनका तत्वज्ञान केवल,
योगी पाकर यह तत्वज्ञान, पा लेता मुझको उसके बल ।
कर लेता है मुझमें प्रवेश, मेर स्वरुप को वह पाता,
यह सहज रुप से होता है, व्यवधान नहीं कोई आता ।

सारे परिग्रह का त्याग करे, भोगों से विरत रहे योगी ,
एकान्त देश में ध्यान करे, तब पाए जिसे सांख्य योगी ।
वर्णोचित कर्मो को करके, वह फल स्वाभाविक पा लेता,
योगी जो भक्तिभाव रखकर, रे कर्मयोग को अपनाता ।

करता है प्राप्त ज्ञाननिष्ठा, अभिव्यक्त भक्ति मेरी होती,
समरस वह शान्त प्रसन्न रहे, उपलब्धि उसे मेरी होती ।
जग रहा प्रकाशित जिससे वह, आत्मा, मैं हॅूं यह भाव लिए,
वह भक्त भजन करता मेरा, मेरी प्रसन्नता प्राप्त किए ।
श्लोक(५७)
हे अर्जुन अपने कर्म सभी, मुझको अनन्य हो अर्पण कर,
मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हो, तू भक्ति योग का पालन कर ।
अविनन्तर मेरा ध्यान किए, अपने कर्तव्य निभाता चल,
हो पूर्ण परायण मेरे तू, जीवन को सफल बनाता चल ।

अपने सब कर्म समर्पित कर, मुझको भगवान समझ अर्जुन,
दृढ़ता पूर्वक मति मुझमें रख, मुझमें एकाग्र किए चल मन ।
मन से, संकल्प, चेतना से, जुड़कर, कर्तव्य किए जा तू,
इस भक्ति योग के पालन से, निज का कल्याण करेगा तू ।

अर्जुन तुम ऐसा यत्न करो, त्यागे मन अपनी चंचलता,
मुझमें एकाग्र चित्त होवे, मेरा ही सतत भजन करता ।
ऐसी अनन्य यह भक्ति साध, हो जाओ मुक्त अविद्या से,
अपने कर्तव्य करो पूरे, मुझको उर में धारण करके ।

होती न दूर तन से छाया, त्यों प्रकृति पुरुष का साथ रहा,
यह ज्ञान अविद्या दूर करे, यह कर्मो से सन्यास रहा ।
आत्मा में रहती लीन बुद्धि, मुझमें अपने को देखोगे,
कर्मो की जननी प्रकृति उसे, तुम नहीं आत्मवत लेखोगे ।

हो सिद्धि-असिद्धि कि सुख-दुख हो, हो हानि लाभ कुछ भी हो,
इच्छा से प्रभु की होता है, इसलिए न मन में विचलित हो ।
यह बुद्धि योग समभाव रखे, हे कौन्तेय, कर अवलम्बन,
तू ध्यान हटा सारे जग से, हो जा बस मेरे पारायण ।

सोते-जगते, खाते-पीते, चलते-फिरते तू भज मुझको,
मुझमें ही अपनी बुद्धि लगा, मन में धारण कर तू मुझको ।
सब कर्म मुझे ही अर्पित कर, मुझमें ही तेरा चित्त रहे,
तू अपना जो भी कर्म करे, वह कर्म न तेरा कर्म रहे ।
क्रमशः

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
10/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(५१-५२-५३)
जो निर्मल मति संयुक्त हुआ, अपने मन को वश में करता,
सात्विक प्रवृत्तियों के द्वारा, अपने मन का निग्रह करता ।
इन्द्रिय विषयों का त्याग करे, अरु राग द्वेष से मुक्त रहे,
करता स्वरुप साक्षात्कार, वह ब्रह्मभूत होकर विहरे ।

एकान्तवास का जो सेवी, अरु रहता जो स्वल्पाहारी,
मनवाणी तन पर कर संयम, कर चुका चित्त जो अविकारी ।
भगवच्चिन्तन में जो निमग्न, मानो समाधि में नित रहता
करता स्वरुप साक्षात्कार, वह ब्रह्मभूत होकर रहता ।

वैराग्य वृत्ति धारण करता, तजता वह मिथ्या अहंकार,
मिथ्या बल, वह मिथ्याभिमान, तज देता वह मन के विकार ।
वह काम तजे, वह क्रोध तेज, वह तजे वस्तुओं का संग्रह,
होकर असंग वह शान्त रहे, वह ब्रह्मभूत प्रभु का विग्रह ।

जो रखे विशुद्ध बुद्धि अपनी, जो सहज सरल बोले प्राणी,
सात्विक सादा भोजन करता, शब्दादि विषय का जो त्यागी ।
एकान्त चुने वह शुद्ध देश, सात्विकता का करता पालन,
संयम मन वाणी तन पर कर, वैराग्य अटल करता धारण ।

रखता न किसी से राग द्वेष, जीते वह अपना अहंकार,
वह काम क्रोध मद को छोड़े, कर ले मन वह परिष्कार ।
सारे परिग्रह छोड़े अपने, कर चले सतत प्रभु का चिन्तन,
वह ब्रह्मप्राप्ति का पात्र बने, निर्मल प्रशान्त वह अविचल मन ।

पूर्वार्जित पापों से विमुक्त, हो अन्त:करण शुद्ध जिसका,
युक्ताहारी विहार युक्त, अपना न पराया हो जिसका ।
देहाभिमान का त्याग किए, अपने बल का न घमण्ड करे,
वह काम क्रोध परिग्रह छोड़े, वह ममता रहित प्रसन्न रहे ।

पहिचाने आत्मा का स्वरुप, मन को उस पर एकाग्र करे,
यह ध्यान योग, वैराग्य वृत्ति, इनको दृढ़तापूर्वक पाले ।
पाना चाहे पद परम उसे, दुख रहे न सब कुछ तजने का,
त्रिभुवन का राज्य मिले फिर भी, हो गर्व न अधिपति बनने का ।

समभाव रखे, न द्वेष पाले, बहके न प्रशंसा को सुनकर,
प्रभु का बनकर उपकरण रहे, प्रभु को नित मन में धारण कर ।
वह निर्विकार, वह शान्त चित्त, ब्रह्मा से एकाकार करे ,
मैं स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म, उसके मन में यह बोध जगे ।

साधक का मार्ग रोकने को, बहु शत्रु दोष रुपी आते,
पहिला है तन का अहंकार, जिसके न किले ढहने पाते ।
विषयों का शत्रु सबल होता, विष की दह, दोषों का राजा,
वह सुख का खोल ओढ़ लेता, अच्छे अच्छों को भरमाता ।

भटकाता है सत्पथ से जो, वह 'दर्प'दोष अगला अर्जुन,
विश्वास घात करता रहता, किसको न जला दे क्रोध अगन ।
है काम नाम का दोष प्रबल, वह सर्वनाश करके रहता,
सिर पर चढ़कर रहता परिग्रह अति सूक्ष्म पाश इसका दहता ।

इन दोष शत्रुओं से भिड़कर, करके परास्त बढ़ना होता,
निर्मल मति करना होती है, विषयों को भी तजना होता ।
दोषों को दूर हटा पथ से, पाना होता है आत्मज्ञान,
वह ब्रह्मभूत होता अर्जुन, जिसमें न रहे देहाभिमान ।
श्लोक(५४)
अनुभूति परात्पर की होती, जब ब्रह्मभूत मानव होता,
वह करता कोई शोक नहीं, इच्छाओं का विगलन होता ।
जगता समभाव प्राणियों में, देहात्मबुद्धि सब गल जाती,
पाता वह मेरा भक्तियोग, यह दशा मनुज की जब आती ।

हो एकाकार ब्रह्म से वह, जब बन रहता आत्मा प्रसन्न,
होता न शोक कोई उसको, इच्छा न करे वह रह अनन्य ।
समभाव रखे वह जीवों में, सर्वोच्च भक्ति मेरी पाता,
अज्ञान ज्ञान न कुछ बचता, सब लीन उसी में हो जाता ।

निर्गुण स्वरुप में ब्रह्म रुप, निष्क्रिय होने का भाव नहीं,
यह भक्ति रही सर्वोच्च पार्थ, जिसमें प्रभु की अनुभूति रही ।
यह भक्ति परम चैतन्य बोध, चल अचल सभी को जोड़ रखे,
परमात्म तत्व की ओर सकल, जग की हलचल को मोड़ चले ।

रुक जाते साज बाज सारे, जब बन्द गान हो जाता है
या शरद ऋतु में सरिता जल, जिस तरह शान्त हो जाता है
पाता प्रसन्नता आत्मा की, साधक जब होता ब्रह्मभूत
निस्सार छूट जाते पीछे, सुख-भोगों के साधन अकूत ।

जो भक्त मुझे जैसा भजता, मैं उसको वैसा बनता हूँ,
मेरा ही चित-प्रकाश सारा जिससे दिखलाई देता हूँ ।
मेरा प्रकाश यह सहज इसे, कहते हैं उत्तम भक्ति पार्थ
अपने अनुकूल ढाल लेता है, मुझको मेरा भक्त आर्त ।

होता न क्षुब्ध प्रसन्नात्मा, जो ब्रह्म भाव को प्राप्त हुआ,
सर्वत्र एक सत्ता में ही, रहता है उसका बोध जगा ।
रहती न ब्रह्म से भिन्न दृष्टि, वह राग द्वेष से परे रहे,
वह श्रेष्ठ भक्त मेरा अर्जुन, जिसमें समदर्शी भाव जगे ।
क्रमशः

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
08/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(४८)
जिस तरह धुएँ से अग्नि ढँकी, सब कर्म दोष से ढँके हुए,
निर्दोष न कोई कर्म रहा, कोई न कर्म से विरत रहे ।
इसलिए कर्म स्वाभाविक जो, हों दोष सहित, पर किए चलो
कर्तव्य कर्म करणीय रहा, उसको न परंतप कभी तजो ।

अपना स्वभाव रखता मनुष्य, उपयुक्त उसी के कार्य करे,
हो दोष भले उसमें लेकिन वह उनका करना नहीं तजे ।
ऐसा न कर्म कोई अर्जुन, जो दोषों से आच्छन्न न हो,
अग्नी को देखो, वह ज्वलंत, पर धूम ढँके रहता उसको ।

प्रारम्भकाल में कर्म कौन, जो नहीं कष्टकर होता है?
क्यों नहीं स्वधर्म का पालन हो, जो सहज सरल तम होता है ।
कोई न कर्म निर्दोष पार्थ, हो दोष, धर्म का पालन हो
क्या धुँआ आग के साथ नहीं, दूषित करके चलता उसको?

हों दोष युक्त पर सहज कर्म, ये नहीं त्यागने योग्य कभी,
उसको न दोष का पाप लगे, पर कर्म-त्याग से गति बिगड़ी ।
निर्दोष विकल्प न सुलभ रहे, हर कर्म दोष से युक्त रहा,
केवल स्वधर्म के पालन से, मानव का हित-कल्याण सधा ।
श्लोक(४९)
पिछली जो छूटी बात उसे, फिर से समझाता हॅूं अर्जुन,
सन्यास योग का फल क्या है, किस तरह किया जाए साधन ।
जाग्रत रखना होता विवेक, वैराग्य भावना तीव्र रहे,
एकांत प्राप्त करना होता, तब साधक से सन्यास सधे ।

यह ज्ञान कि मैं हॅूं भिन्न अंश, परमेश्वर का जीवन पाया,
सच्चा सन्यास रहा मन का, जिसने यह सत्य समझ पाया ।
संसिद्धि प्राप्त होती उसको, कर लेता आत्म नियंत्रण जो,
आसक्ति वस्तुओं की तजता, ठुकराता प्राकृत सुख को जो ।

संलग्न न जिसकी बुद्धि कहीं, कुछ भी न रहे परवाह जिसे,
आत्मा को जिसने जीत लिया, परमात्म भाव हो प्राप्त जिसे ।
वह ज्ञान योग में सिद्ध हुआ, धारण करता है सांख्य योग,
नैष्कर्म सिद्धि वह पा जाता, परमात्मा का कर प्राप्त बोध ।

हो बुद्धि अनासक्त जिसकी, कर लिया आत्मवश में जिसने,
इच्छा नि:शेष हुई जिसकी, सन्यास किया धारण जिसने ।
वह दशा उच्चतम पा जाता, सब कर्मो से जो ऊपर है,
उसके न कर्म बंधनकारक, वह नहीं कर्म का धारक है ।

आध्यात्मिक उन्नति पाने को, संयम का आवश्यक पालन,
इच्छा न रहे कोई मन में, सन्यास त्याग का हो धारण ।
आसक्ति अहम् बाधक बनते, यह है स्वभाव निचले तल का,
जो आत्मजयी हो सका नहीं, अज्ञान नहीं उसका हटता ।

सुख भोग सम्पदा सांसारिक, अज्ञान जनित जड़ता लाते,
रखते जो निम्न स्वभाव पार्थ, वे नहीं विजय मन पर पाते ।
सब कर्मो से ऊपर उठना, यह नैष्कर्म सन्यासी का,
जब तक शरीर का साथ रहे, सम्भव न रही रे निष्क्रियता ।

सन्यास आन्तरिक लक्ष्य रहा, हैं प्रकृति अहम् दोनों समान,
मुक्तात्मा रही विशुद्धात्मा, निष्क्रिय, निश्चल, निर्लिप्त शान्त ।
प्राकृतिक जग में कार्य करे,ब्रह्मास्मि बोध को धारण कर,
यह नहीं सकारात्मक प्रवेश, यह हुआ मोह माया तजकर ।

अन्तर्मुख मन से इच्छायें, हो जातीं नष्ट स्वय अर्जुन,
तज मोह, ज्ञान को प्राप्त करे, सन्यस्त हुआ ज्ञानी का मन ।
आ जाता कर्म-साम्य उसमें, सारी प्रवृत्तियाँ रुक जातीं,
अज्ञान मिटा, मिट गये कर्म, लहरें रुक जल में खो जातीं ।

नैष्कर्म सिद्धि यह सर्वश्रेष्ठ, जिसमें न कर्म कोई होता,
मन्दिर का कलश इसे समझो, या नद सागर में लय होता ।
अज्ञान ज्ञान दोनों का ही, हो जाता है इसमें विलयन,
कहते हैं इसको परमसिद्धि, इसके आगे न रहा चिन्तन ।
श्लोक(५०)
यह नैष्कर्म जो सिद्धि रही, जो ज्ञान योग की परनिष्ठा
किस तरह इसे पाता मनुष्य, खुद ब्रह्म रुप जो हो जाता
हे कुन्तीपुत्र वहीं तुझको, अब थोड़े में बतलाता हूँ,
कैसे करता है वह प्रवेश, वह तत्व ज्ञान समझाता हूँ ।

हे अर्जुन जिसको सिद्धि मिली, वह पुरुष कि जो रे सिद्ध हुआ,
जैसे पा गया ब्रह्म को वह, उस परम दशा को प्राप्त हुआ
करता स्वरुप साक्षात्कार, पूर्णावस्था कैसे पाता
कैसे वह ब्रह्मभूत होता, सुन उसको भी मैं समझाता ।

निष्पत्ति ज्ञान की ब्रह्म प्राप्ति, होती है कैसे बतलाता,
आत्मा बन रहता ब्रह्म स्वयं, पर वह माया से ढँक जाता ।
लगता है वह अति दूर मगर, निकटस्थ रहा, यदि नेत्र खुले,
हो रहे प्रशिक्षित बुद्धि अगर, संयम धारे मन, स्वत: मिले ।
क्रमशः

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीत...
07/11/2024

मध्य प्रदेश के, नरसिंगपुर जिले, की माटी के, मूर्धन्य साहित्यकार, स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी, द्वारा रचित, गीता ज्ञान प्रभा ,’ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक ,साहित्यिक, धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा, ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित, ज्ञानेश्वरी गीता ,का भावानुवाद किया है
श्रीमद्भगवतगीता के, 700 संस्कृत श्लोकों को, गीता ज्ञान प्रभा में, 2868 विलक्ष्ण छंदों में ,समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा रचित, श्रीमद्भगवत गीता महाकाव्य की, छंदोंमयी श्रंखला, ‘गीता ज्ञान प्रभा धारावाहिक की,अग्रिम कड़ी .

अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
अध्याय अठारह -’निष्कर्ष योग’

श्लोक(४५)
अपने-अपने गुण धर्म निभा, संसिद्धि प्राप्त जन कर लेते,
संलग्न कर्म में अपने रह, निज आत्मोन्नति का पथ गहते ।
अपने स्वभाव में रहकर ही, वे अपना आत्मोन्नयन करें,
अपनी सीमा में सिद्धि मिले, यह सहज ज्ञान, इसको समझें ।

अपने कामों को निष्ठा से, जो पूर्ण किया करता अर्जुन,
वह प्राप्त पूर्णता करता है, मर्यादा का करके पालन ।
अपने स्वभाव के भीतर रह, संसिद्धि प्राप्त वह कर लेता,
लेकिन वह अपना अहित करे, जो अन्य वर्ण में रुचि लेता ।

ब्राह्मण कर धार्मिक अनुष्ठान, जिस तरह परम पद पाता है,
उस पद को शूद्र प्राप्त करता, यदि अपने कर्म निभाता है ।
हर एक पुरुष अधिकारी है, वर्णो का वहाँ न भेद रहे
जिसका जो वर्ण रहा उसमें, रहकर वह अपने कर्म करे ।

वर्णाश्रम का जो कर्म मिला, वह कर्म विहित स्वाभाविक है,
उसका पालन करना स्वधर्म, उसमें ही निहित परमहित है ।
ज्यों जल प्रवाह के साथ बहे, कर्मो का वैसा यदि पालन,
कर लेता मुक्ति प्राप्त मानव, जो भी हो उसका वर्णाश्रम ।
श्लोक(४६)
जिस परमेश्वर ने सृष्टि रची, जिसने हम सबको जन्म दिया,
जो सबमें रहकर सबका है, जिसने हम पर उपकार किया ।
जब करता अपना कर्म मनुज, वह उसको ही तो पूज रहा,
संसिद्धि कर्म से पा जाता, अन्तर्यामी न अबूझ रहा ।

हर कर्म अर्चना ईश्वर की, कर कर्म पूजते हम उसको,
उसको जो घट-घट का वासी,परिव्याप्त किए जो अग-जग को ।
उत्पन्न जगत-जीवन जिससे, जो किए हुए सबको धारण,
उसकी ही पूजा करते हम, कर्तव्य कर्म का कर पालन ।

पिछले जीवन के कर्म पार्थ, निश्चित करते अगला जीवन,
गुण क्षमता विकसित होती है, वैसी जैसा पिछला जीवन ।
होता स्वभाव यह जन्मजात, निर्धारित करता कर्मो को,
आत्मोन्नति करता है मनुष्य, पालन कर अपने धर्मो को ।
श्लोक(४७)
जो कर्म दूसरे का उसको, चाहे हम अच्छा कर पायें,
पर बेहतर वह निज कर्म रहा जिसमें न कुशलता हम पायें ।
जो कर्म प्रकृति से नियत रहा, कर्तव्य कर्म वह कहलाता,
कर्तव्य कर्म करने वाला, पातक न कभी भी बन पाता ।

गुणयुक्त भले हो कर्म पार्थ, हो विधिवत चाहे अनुष्ठान,
यदि विहित नहीं वह कर्म रहा,तो उचित नहीं उसका विधान ।
गुण रहित भले ही हो स्वधर्म, लेकिन वह श्रेष्ठ कहाता है,
स्ववर्णोचित जो धर्म रहा, वह सहज पार करवाता है ।

उसका कल्याण उसी में है, जिसका जो धर्म उसे पाले
होता न उचित जो अन्यों के, कामिक कर्मो को अपना ले ।
चन्दन की बेड़ी क्यों पहिने, परधर्म उसे बेड़ी जैसा,
क्या पैर त्यागकर सिर के बल, चलने से कोई हित सधता?

होता न पाप को प्राप्त मनुज, जो करता है स्वधर्म पालन,
क्या कुबड़ी माँ का त्याग उचित, जो माँ का प्यार किए धारण?
क्षत्रिय का कर्म ब्राम्हणों के, कर्मो से है हिंसक ज्यादा
इसका यह आशय नहीं कि क्षत्रिय द्वारा वह जाए त्यागा ।

छल,कपट, झूठ ,चोरी, हिंसा, जो कर्म निषिद्ध सभी को हैं,
अन्यान्य रहे जो काम्य कर्म, वे नहीं स्वधर्म किसी के हैं ।
जो कर्म भक्ति-आराधना के, सामान्य धर्म सबका बनते,
चारों वर्णो के नर-नारी, समरुप उन्हें पालन करते ।

हो सत्याचरण कर्म में तो, हिंसादिक दोष नहीं लगते,
परधर्म आचरण से लेकिन, परवृत्ति पाप को गह चलते ।
गुणहीन भले ही हो स्वधर्म, वह अन्य धर्म से श्रेष्ठ रहा,
परधर्म गुणों से युक्त रहे, पर वह स्वधर्म से नहीं बड़ा ।

जल से घी में गुण अधिक रहे, पर क्या मछली घी में जीती?
बचनाग रहा विष दुनिया को, पर उसमें रह कीड़ी जीती ।
परधर्म त्याग के योग्य रहा, धारण करने होता स्वधर्म,
जब तक न आत्म दर्शन कर ले, करता ही जाए मनुज कर्म ।

हो पालन भले अधूरा ही, निज धर्म पार्थ निज धर्म रहा,
पर धर्म पूर्ण पालन जिसका, उससे यह हितकर अधिक रहा ।
अपने स्वभाव के द्वारा जो, कर्तव्य नियत उसको करता,
उसको न पाप लगता कोई, अनुसरण धर्म का वह करता ।

हर एक मनुज का अलग रहा, वैयक्तिक गुण, उसकी क्षमता
वह ऐसा कुछ कर सकता है, जो नहीं दूसरा कर सकता
हर एक व्यक्ति में ईश्वर के, होते हैं, कुछ उद्देश्य छिपे
कोई न किसी से कम होता, पढ़ना होते संकेत उसे ।
क्रमशः

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