16/04/2026
महाभारत के युद्ध का समय था। चारों ओर विनाश, भय और भ्रम का माहौल था। पांडव और कौरव—दोनों ही यह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है।
एक रात, अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा,
“हे माधव, आप तो सब कुछ जानते हैं, फिर भी यह युद्ध, यह विनाश क्यों होने दे रहे हैं? क्या यह सब आपकी माया है?”
कृष्ण मुस्कुराए, लेकिन तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया।
अगले दिन वे अर्जुन को एक शांत झील के पास ले गए और बोले,
“अर्जुन, इस पानी में झाँक कर देखो, तुम्हें क्या दिखाई देता है?”
अर्जुन ने झील में देखा… और चौंक गया।
उसे दिखा कि वह एक साधारण व्यक्ति है—न कोई योद्धा, न कोई धनुष, न कोई युद्ध। उसका एक परिवार है, एक अलग जीवन है, जहाँ युद्ध का नाम तक नहीं।
घबराकर अर्जुन बोला,
“माधव! यह क्या है? यह सच है या भ्रम?”
कृष्ण ने शांत स्वर में कहा,
“यही मेरी माया है, अर्जुन। जो तुम देखते हो, वही तुम्हारा सच बन जाता है। तुम योद्धा हो, इसलिए तुम्हें युद्ध दिखाई देता है। अगर तुम्हारी दृष्टि बदल जाए, तो तुम्हें एक बिल्कुल अलग संसार नजर आएगा।”
अर्जुन और उलझ गया, पर ध्यान से सुनता रहा।
कृष्ण आगे बोले,
“यह युद्ध भी एक माया है—कर्मों का परिणाम। हर व्यक्ति अपने कर्मों से बंधा है। मैं केवल मार्ग दिखाता हूँ, लेकिन चलना हर किसी को खुद पड़ता है। जो हो रहा है, वह होना ही था।”
फिर कृष्ण ने अर्जुन से दोबारा झील में देखने को कहा।
इस बार वहाँ कुछ भी नहीं था—न कोई दूसरा जीवन, न कोई भ्रम। सिर्फ वही युद्ध, वही सच्चाई।
अब अर्जुन समझ चुका था कि सत्य और भ्रम के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।
कृष्ण की माया कोई साधारण छल नहीं, बल्कि एक गहरा ज्ञान है—जो इंसान को अपने कर्म और सोच का असली अर्थ समझाती है।
उस दिन के बाद, अर्जुन ने कभी कृष्ण की लीला पर सवाल नहीं उठाया…
क्योंकि वह जान चुका था कि—
“कृष्ण की माया को समझना, मनुष्य के बस की बात नहीं है।” 🔱✨