Indian Desi Folk

Indian Desi Folk We have primarily chosen the medium of folk music as these folk songs reflect a wide spectrum of Indian culture. Every song tells an interesting story.

On the one extreme, they narrate stories that reflect the hopes and fears of common people. India is one of the most diverse countries in the world. This rich cultural diversity of India is reflected in its folk music. In modern India, the ancient culture of India breathes through its folk songs. And on the other extreme, the songs tell stories motivated by deep insights from the ancient Indian sc

riptures such as the Vedas and the Upanishads. They deal with fundamental questions about human existence such as: Who are we? Where did we come from? What is our destiny? Folk music can also help us see unity in diversity! Looking at the Indian culture through the lens of folk music, it becomes apparent very quickly that there is one common thread behind this cultural diversity. Once we recognize this common thread, the artificial boundaries disappear and unity among the diverse cultural groups is the natural outcome.

12/08/2026

Sanand Manand Davne Vasantam (Kashi Vishvanath - Shiv Mantra)

04/08/2026

भोला के देखे ला बेकल भएल .......... बहुत सुंदर गीत सुनें हमारे मित्र योगेश पांडे की माता प्रियंबदा पांडे जी की आवाज में ......

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कजरीकजरी का उद्भवकजरी का नामकरण श्रावण में घिरने वाले काजल सरीखे बादलों की कालिमा के कारण हुआ है। 'काजल' शब्द 'कज्जल' का...
25/07/2026

कजरी

कजरी का उद्भव

कजरी का नामकरण श्रावण में घिरने वाले काजल सरीखे बादलों की कालिमा के कारण हुआ है। 'काजल' शब्द 'कज्जल' का अपभ्रंश है, इसी से 'कज्जली' शब्द बनता है, जिसे बोलचाल की भाषा में 'कजली' या 'कजरी' कहा जाता है।
काजल सरीखे कजरारे बादलों को देखकर गाने की कल्पना को लेकर ही वर्षाकालीन गीत विशेष को कजली या कजरी नाम दे दिया गया। काला रंग बरखा का द्योतक है। ब्राह्मणग्रन्थ में कहा गया है- कृष्णो वै भूत्वा पर्जन्यो वर्षति।

संबंध-भेद से कज्जली के चार अर्थ हैं (१) वर्षा की काली घटा, (२) कजली देवी, विन्ध्याचल की काली देवी, (३) कजरी का त्योहार, (४) कजरी रागिनी या गीत।

कुछ कजरी गीतों में कजरी खेलने का भी वर्णन है-

कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया

बदरिया घेरि अइले ननदी ।

सावन-भादों के महीने में वृक्षों की डाल पर झूला झूलने और वर्षा का आनन्द लेने से कजरी खेलने का संबंध है।

शैली तथा स्थानीयता की दृष्टि से कजरी के प्रमुख तीन भेद हो जाते हैं.

१. भोजपुरी कजरी

२. बनारसी कजरी

३. मिर्जापुरी कजरी

अधिकांश कजरियाँ मिर्जापुर और चुनार की क्षेत्रीय भाषा में हैं। छपरा की कजरी प्रायः मिर्जापुर की कजरी का ही अनुकरण है। वस्तुतः कजरी के विकास का श्रेय मिजांपुर को ही है।

उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से कजरी की शैली दो प्रकार की मानी जा सकती है। एक को गजल की शक्ल में कजली दंगलों में सुना जा सकता है। दूसरी है डुनमुनिया कजरी, जिसे औरतें वृत्त बनाकर ताल देती हुई झुक झुक कर गाती हैं। घरों की बहू-बेटियाँ घरेलू कामकाज पूरा करने के बाद रात को कहीं एकत्रित होकर कजली गाती हैं-

कहो चित लाके सीस नवा के गणपति बाँके ना साँवलिया सुत गिरिजा के ना ।

जहाँ कजली दंगल में सवाल-जवाब में कजली सुनने को मिलती है वहाँ कजली का वास्तविक सौन्दर्य एवं माधुर्य नारी स्वर में गाई जाने वाली कजरियों में ही मिलता है।

मूलतः कजरी का वर्ण्य विषय प्रेम है। इसके अन्तर्गत श्रृंगार के उभय पक्ष- संयोग एवं वियोग पक्ष की झाँकी मिलती है। पारिवारिक पृष्ठभूमि पर रचे गये गीतों में पति-पत्नी के पारस्परिक आचरण-व्यवहार का उल्लेख है। पति को जल्दी घर लौट आने की सलाह, जुआ खेलने से रोकना, गरीबी का उपालंभ, वस्त्राभूषण की माँग, पीहर जाने का अनुरोध, प्रणय निवेदन, बदली घिर आने से कजरी न खेल पाने की विवशता, दम्पति-परिहास आदि कजरी के मुख्य विषय हैं।

संयोग पक्ष के एक चित्र में कोई पत्नी अपने पति के पास नाना प्रकार के व्यंजन तैयार किये बैठी है। वह पति से जल पीने और भोजन करने का आग्रह करती है। भोजन के बाद वह पति को शय्या पर सुला देना चाहती है-

कि आरे रामा हीरा जड़ी सन्दूक मोतिन के माला रे हरी
सोने के थाली में जेवना परोसौं रामा कि
आरे रामा जेमाँ ननद जू के भइया तुम्हारे पर पैंया रे हरी ।

15/07/2026

गुप्त नवरात्रि की ढेरों शुभकामनाएं

15/07/2026

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लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है, जिसे दो अर्थ दिये जा सकते हैं-१. अवसरविशेष के प्रचलित गीत तथा २. परम्परागत...
10/06/2026

लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है, जिसे दो अर्थ दिये जा सकते हैं-
१. अवसरविशेष के प्रचलित गीत तथा २. परम्परागत गीत।

लोक द्वारा निर्मित होने पर भी लोकगीत को किसी व्यक्तिविशेष से जोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि रचनाकार को उस गीत में समस्त लोक के व्यक्तित्व को उभारना होता है। लोकसाहित्य वस्तुतः जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा, जनता के लिये लिखा जाता है।

"The poetry of the people, by the people, for the people." अंग्रेजी में 'फ़ोक' का अर्थ है- लोक, राष्ट्र, जाति, सर्वसाधारण या वर्गविशेष ।

इसीलिए Folk Song के अनुरूप हिन्दी में लोकसंज्ञा दी गई है। अंग्रेजी का Folk Song जर्मनी के Volkslied का अपभ्रंश है। समस्त मानव समाज में चेतन-अचेतन के रूप में जो भावनाएँ गीतबद्ध हुई हैं, उन्हें लोकगीत कहा जा सकता है।

डॉ० बार्क ने 'फोक' शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि इससे सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति का बोध होता है। ग्रिम का कथन है कि लोकगीत अपने आप बनते हैं-"A folk song composes itself."

ग्रिमन पेरी ने लिखा है कि लोकगीत आदिमानव का उल्लासमय संगीत है। "The primitive spontaneous music has been called folk-music.

राल्फ वी० विलियम्स का कथन है कि "लोकगीत न पुराना होता है न नया। यह तो जंगल के एक वृक्ष जैसा है, जिसकी जड़ें तो दूर जमीन में फैली हुई हैं, परन्तु जिनमें निरन्तर नई-नई डालियाँ, पल्लव और फल लगते हैं।"

लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा हैं। उनमें जीवन के सुख-दुःख, मिलन-विरह, उतार-चढ़ाव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में हैं। इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है।
लोकगीतों का विस्तार कहाँ तक है, इसे कोई नहीं बता सकता। किन्तु इनमें सदियों से चले आ रहे धार्मिक विश्वास एवं परम्पराएँ जीवित हैं। ये हृदय की गहराइयों से जन्मे हैं। श्रुति परम्परा से ये अपने विकास का मार्ग बनाते रहे हैं। अतः इनमें तर्क कम, भावना अधिक है। न इनमें छन्दशास्त्र की लौह श्रृंखला है, न अलंकारों की बोझिलता। इनमें तो लोकमानस का स्वच्छ और पावन गंगा-यमुना जैसा प्रवाह है। लोकगीतों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनमें सहज स्वाभाविकता एवं सरलता है। इनमें सुख-दुःख, प्रेम और करुणा के विविध रंग हैं। कहीं पुत्रजन्म के अवसर पर हर्ष उल्लास के स्वर गूंजते हैं तो कहीं कन्या की विदाई या प्रियवियोग की बेला में करुणा के गीत मुखर होते हैं।

"लोकगीतों में भावों की अभिव्यक्ति स्वाभाविक और हृदय से निकली हुई लय के साथ होती है। हरे जंगलों में जैसे पंछी उन्मुक्त होकर गाते हैं, उसी प्रकार लोकगीत स्वाभाविक रीति से हृदय से फूटकर निकलते हैं। इनमें सरल काव्य होता है, भावों की खींचतान नहीं होती।"

लोकगीतों में लोक का समस्त जीवन चित्रित है। शिशु के प्रथम क्रन्दन से लेकर जीवन की अन्तिम कड़ी तक के भावचित्र इनमें हैं। भाई से मिलने को व्याकुल बहन की व्यथा-कथा, स्त्रियों का आभूषण-प्रेम, सास, ननद तथा सौत के अत्याचारों से पीड़ित स्त्री की मनोव्यथा, कृषकपरिवार की विपन्नता, वीरों की शौर्यगाथा तथा मिलन-विरह के रंगारंग भाव इन गीतों में मिलते हैं। दूसरे शब्दों में, इन लोकगीतों में जीवन का शाश्वत सत्य झलकता है।

मौखिक परम्परा से विकसित होते हुए इन लोकगीतों को वेदों के समान माना गया है, क्योंकि दोनों ही अधिक मात्रा में श्रव्य हैं। लोकगीतों की शैली सहज होती है और उनमें गेयतत्त्वों की प्रधानता होती है।

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