10/06/2026
लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है, जिसे दो अर्थ दिये जा सकते हैं-
१. अवसरविशेष के प्रचलित गीत तथा २. परम्परागत गीत।
लोक द्वारा निर्मित होने पर भी लोकगीत को किसी व्यक्तिविशेष से जोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि रचनाकार को उस गीत में समस्त लोक के व्यक्तित्व को उभारना होता है। लोकसाहित्य वस्तुतः जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा, जनता के लिये लिखा जाता है।
"The poetry of the people, by the people, for the people." अंग्रेजी में 'फ़ोक' का अर्थ है- लोक, राष्ट्र, जाति, सर्वसाधारण या वर्गविशेष ।
इसीलिए Folk Song के अनुरूप हिन्दी में लोकसंज्ञा दी गई है। अंग्रेजी का Folk Song जर्मनी के Volkslied का अपभ्रंश है। समस्त मानव समाज में चेतन-अचेतन के रूप में जो भावनाएँ गीतबद्ध हुई हैं, उन्हें लोकगीत कहा जा सकता है।
डॉ० बार्क ने 'फोक' शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि इससे सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति का बोध होता है। ग्रिम का कथन है कि लोकगीत अपने आप बनते हैं-"A folk song composes itself."
ग्रिमन पेरी ने लिखा है कि लोकगीत आदिमानव का उल्लासमय संगीत है। "The primitive spontaneous music has been called folk-music.
राल्फ वी० विलियम्स का कथन है कि "लोकगीत न पुराना होता है न नया। यह तो जंगल के एक वृक्ष जैसा है, जिसकी जड़ें तो दूर जमीन में फैली हुई हैं, परन्तु जिनमें निरन्तर नई-नई डालियाँ, पल्लव और फल लगते हैं।"
लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा हैं। उनमें जीवन के सुख-दुःख, मिलन-विरह, उतार-चढ़ाव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में हैं। इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है।
लोकगीतों का विस्तार कहाँ तक है, इसे कोई नहीं बता सकता। किन्तु इनमें सदियों से चले आ रहे धार्मिक विश्वास एवं परम्पराएँ जीवित हैं। ये हृदय की गहराइयों से जन्मे हैं। श्रुति परम्परा से ये अपने विकास का मार्ग बनाते रहे हैं। अतः इनमें तर्क कम, भावना अधिक है। न इनमें छन्दशास्त्र की लौह श्रृंखला है, न अलंकारों की बोझिलता। इनमें तो लोकमानस का स्वच्छ और पावन गंगा-यमुना जैसा प्रवाह है। लोकगीतों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनमें सहज स्वाभाविकता एवं सरलता है। इनमें सुख-दुःख, प्रेम और करुणा के विविध रंग हैं। कहीं पुत्रजन्म के अवसर पर हर्ष उल्लास के स्वर गूंजते हैं तो कहीं कन्या की विदाई या प्रियवियोग की बेला में करुणा के गीत मुखर होते हैं।
"लोकगीतों में भावों की अभिव्यक्ति स्वाभाविक और हृदय से निकली हुई लय के साथ होती है। हरे जंगलों में जैसे पंछी उन्मुक्त होकर गाते हैं, उसी प्रकार लोकगीत स्वाभाविक रीति से हृदय से फूटकर निकलते हैं। इनमें सरल काव्य होता है, भावों की खींचतान नहीं होती।"
लोकगीतों में लोक का समस्त जीवन चित्रित है। शिशु के प्रथम क्रन्दन से लेकर जीवन की अन्तिम कड़ी तक के भावचित्र इनमें हैं। भाई से मिलने को व्याकुल बहन की व्यथा-कथा, स्त्रियों का आभूषण-प्रेम, सास, ननद तथा सौत के अत्याचारों से पीड़ित स्त्री की मनोव्यथा, कृषकपरिवार की विपन्नता, वीरों की शौर्यगाथा तथा मिलन-विरह के रंगारंग भाव इन गीतों में मिलते हैं। दूसरे शब्दों में, इन लोकगीतों में जीवन का शाश्वत सत्य झलकता है।
मौखिक परम्परा से विकसित होते हुए इन लोकगीतों को वेदों के समान माना गया है, क्योंकि दोनों ही अधिक मात्रा में श्रव्य हैं। लोकगीतों की शैली सहज होती है और उनमें गेयतत्त्वों की प्रधानता होती है।
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