16/05/2026
**बेटी का अभिमान.. बहू की जिम्मेदारी..?**
मम्मी जी..! दिव्या की सास का फोन आया था... उनकी बेटी की गोद भराई की रस्म है, हमें निमंत्रण दिया है.... शालिनी ने अपनी सास सुमित्रा जी से कहा...
सुमित्रा जीः अच्छा... पर समधन जी ने मुझे सीधे फोन करने की जगह तुम्हें क्यों कॉल किया...?
शालिनीः वो कह रही थीं कि आपका फोन नहीं उठ रहा था.. इसीलिए..
सुमित्रा जीः हाँ बस... मुझे सब समझ आ गया है... वो मेरे साथ बात करना ही नहीं चाहती... वरना ये बहाना नहीं बनातीं... चलो मान लिया मेरा नंबर नहीं लगा... पर जब वो तुमसे बात कर रही थीं, तब भी मुझे फोन पकड़ा सकती थीं... पर नहीं... असल में मैं सब भांप गई हूं... वो सोचती होंगी कि अगर वो ऐसा करेंगी तो मैं नाराज हो जाऊंगी और अपनी बेटी की रस्म में शामिल नहीं होऊंगी... पर मैं जरूर जाऊंगी...
शालिनीः मम्मी जी..! आप हमेशा दिव्या के ससुराल वालों की बातों का बुरा ही मतलब क्यों निकालती हैं... और दिव्या की गलतियों को सही ठहराने की कोशिश में क्यों लगी रहती हैं..?
सुमित्रा जीः तुम चुप रहो शालिनी... दिव्या तुम्हारी तरह अकेली नहीं है... वो मेरी बेटी है.. मेरा अभिमान है वो... और कोई भी उसके खिलाफ कुछ बोले, मैं उसे सच मान लूंगी... कतई नहीं... मैंने उस पर आज तक कोई पाबंदी या रोकटोक नहीं लगाई... वो हमेशा से अपनी मर्जी की आजाद रही है और आज भी है... जब उसके माता-पिता ने कभी उस पर कोई जबरदस्ती नहीं की... तो उसके ससुराल वाले ऐसा कैसे सोच सकते हैं..? वो इस हालत में नहीं है कि कहीं सफर कर सके... वरना मैं उसे प्रसव के लिए यहीं ले आती..
पता नहीं वो लोग उसकी ठीक से देखभाल कर रहे हैं या नहीं..? शालिनी और कुछ नहीं कहती... फिर दो दिन बाद सब दिव्या की गोद भराई में पहुंच जाते हैं... घर को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया था... दिव्या भी बिल्कुल दुल्हन की तरह सजी-संवरी निखर रही थी....
अपनी मां को देखते ही वो खुशी से दौड़ पड़ी, जिस पर उसकी सास शोभा जी ने टोका... अरे दिव्या जरा संभलकर... अब हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहिए... शोभा जी की बात पूरी भी नहीं हुई कि दिव्या बोल पड़ी... बस रहने दीजिए मम्मी जी... मैं कोई छोटी बच्ची नहीं... अपना ख्याल मैं खुद रख सकती हूं... आपको कितनी बार समझाया है, हर बात पर मुझे न टोकें... मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं...
शालिनीः दिव्या वो तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रही हैं... जरूरी नहीं कि हर बात का बुरा ही अर्थ लगाओ.. तुम अब अकेली नहीं हो, तुम्हारे पेट में बच्चा भी है, अब तुम्हें ही संभलकर रहना है..
सुमित्रा जीः और तुम कौन होती हो मेरी बेटी को नसीहत देने वाली..? ये उसका निजी मामला है, वो खुद संभाल लेगी.. उसमें इतनी समझदारी तो है... तुम्हें ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं...
दिव्याः भाभी, आप रस्म में आई हैं तो बस उसी में ध्यान दें... ज्यादा दखलअंदाजी की जरूरत नहीं...
दिव्या की इस बात से शालिनी को बहुत बुरा लगा और वो बाहर निकल गई। मन ही मन सोचने लगी कि ये मां-बेटी कितनी घमंडी हैं.. शादी के बाद से दिव्या अपने ससुराल में हमेशा तनाव पैदा करती है... उसे किसी की परवाह नहीं... जब जी चाहा सो गई, जब मन किया उठ गई... बिना बताएं कहीं भी चली जाती... कोई कुछ कहता तो तुरंत झगड़ पड़ती.... जब शोभा जी ने यह बात सुमित्रा जी को बताई, तो उन्होंने बेटी को समझाने की जगह उसे और हौसला दिया तथा ससुराल वालों के खिलाफ ही बोलने लगीं... दिव्या के ससुराल वाले बहुत ही शांत स्वभाव के लोग थे... इसलिए उन्होंने बहस करना छोड़कर मामले को टाल दिया.. पर इससे मां-बेटी का घमंड और बढ़ गया... और दिन-ब-दिन दिव्या की बदतमीजी बढ़ती गई... यह सब शालिनी को बहुत चुभता था... पर सुमित्रा जी उसे 'बेघर' कहकर चुप करा देती थीं.. उसका पति विक्रम अपनी ही धुन में रहता था... जब भी शालिनी उसे यह सब बताती, तो वो कहता... तुम औरतों के झगड़ों में मुझे मत डालो... मैं दिन भर बाहर की चिंताओं में रहता हूं.. घर आकर थोड़ा सुकून से सोना चाहता हूं, तो शालिनी अब उसे भी कुछ नहीं कह पाती थी..
खैर गोद भराई से लौटते ही सुमित्रा जी ने कह दिया... मैं अपनी बेटी को कार से यहीं ले आऊंगी... उसका प्रसव भी इसी घर में होगा... मुझे उन पर बिल्कुल भरोसा नहीं... अगले दिन सुमित्रा जी ने वैसा ही किया.. दिव्या के ससुराल वालों ने बहुत मना किया पर मां-बेटी नहीं मानीं... दिव्या मायके आ गई और ससुराल का फोन उठाना भी बंद कर दिया..
एक दिन सुबह कूरियर से कुछ दस्तावेज आए... जिनमें तलाक के कागज थे...
शालिनीः लो दिव्या... इन पर अपने हस्ताक्षर कर दो... दिव्याः क्या है ये भाभी..?
शालिनीः मैं तुम्हारी नौकरानी नहीं हूं... खुद पढ़ लो...
सुमित्रा जीः तुम दिव्या से ऐसे कैसे बात कर सकती हो..?
शालिनीः हाँ तो जो ननद ससुराल छोड़कर हमेशा के लिए मायके बसने आ जाए, उसके साथ और कैसा बर्ताव करना चाहिए मम्मी जी....
दिव्याः भाभी... मैं हमेशा के लिए नहीं आई... बस प्रसव तक ठहरने आई हूं...
शालिनी हंसते हुएः जरा हाथ में पकड़ा लिफाफा खोलकर पढ़ तो लो, फिर ये बात कहना। और मम्मी जी, अब से इसके खर्चे भी आपको ही उठाने होंगे.... भई विक्रम की तनख्वाह अब इतनी नहीं है... जो इतनों का भार संभाल सके... दिव्या ने जल्दबाजी में लिफाफा खोला तो उसके होश उड़ गए... वो तलाक के दस्तावेज थे... जो उसके पति आर्यन ने भेजे थे... तलाक के कागज देखते ही दिव्या सुन्न होकर सोफे पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी...
शालिनीः क्यों रो रही हो दिव्या..? ये तो होना ही था... तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि अब किसी की सुननी नहीं पड़ेगी... पर एक बात मेरी भी मान लो... यहाँ मैं ज्यादा दिनों तक तुम्हारी सेवा नहीं कर पाऊंगी... मेरे पति पहले से ही तुम्हारी शादी के कर्ज में डूबे हैं... ऊपर से दो नए मेहमान आ गए... तो हम सड़क पर आ जाएंगे... प्रसव के बाद तुम भी कोई काम ढूंढ लेना...
सुमित्रा जीः शालिनी तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आई ऐसा बोलने में..? विक्रम क्या सिर्फ तुम्हारा पति है..? वो इसका भाई भी है... आज आने दो उसे... फिर बताती हूं तुमने दिव्या को क्या कहा..? शाम को जैसे ही विक्रम घर पहुंचा... दिव्या को देखकर बोला... कैसी हो दिव्या..? तुरंत सुमित्रा जी बोलीं... आज तू सबके सामने बता क्या तेरी बहन तेरे पर बोझ बन जाएगी जो वो यहाँ रहेगी..?
विक्रमः ये सब क्या कह रही हैं आप माँ..? भला ऐसी बात करने का क्या कारण..? सुमित्रा जी: तेरी पत्नी कहती है कि वो दिव्या और उसके बच्चे की जिम्मेदारी तुझ पर नहीं डालेगी, क्योंकि तुझ पर पहले से ही कर्ज है... इसलिए प्रसव के बाद दिव्या कहीं नौकरी ढूंढ ले... विक्रमः क्या..? पर प्रसव के बाद दिव्या तो अपने ससुराल ही चली जाएगी, फिर शालिनी ऐसा क्यों कह रही है..?
शालिनीः मम्मी जी पूरी बात तो बताइए अपने बेटे को... रहने दीजिए मैं ही समझा देती हूं... दरअसल दिव्या और आर्यन का तलाक हो रहा है... अब से दिव्या यहीं रहेगी... विक्रमः क्या तलाक..? ये सब क्या हो रहा है इस घर में..? दिव्या तू बता... क्या हुआ..? तुम दोनों में तो बहुत प्यार था... आर्यन तो हमेशा तेरी हर बात मानता था... फिर आज ये सब..?
सुमित्रा जीः बेटा तेरी बहन की कोई गलती नहीं... उसके ससुराल वाले सोचते हैं कि तलाक के कागज भेजकर वो हमें डरा देंगे और दिव्या उनकी मर्जी के मुताबिक चलेगी... पर तू भी उन्हें बता देना कि उसका भाई अभी उसके साथ है....
विक्रमः माँ वैसे तो मैं हूं पर..? इस मामले में मैं शालिनी का साथ दूंगा... अपना ही खर्चा कितनी मुश्किल से चलता है... ऐसे में दो नए लोगों का बोझ..? और दिव्या, यहाँ तेरी भी गलती है... तूने हमेशा अपनी मनमानी की है... जिसकी सजा तो मिलनी ही थी... अब भुगतना तो तुझे ही पड़ेगा ना...
सुमित्रा जीः ये तू क्या कह रहा है विक्रम..? शालिनी ने तुझे बहकाया है ना..? ये आजकल की लड़कियां सिर्फ घर में तनाव लाने आती हैं... परिवार को संभालना तो आता ही नहीं... बस हमेशा बिगाड़ने की बातें करती हैं... बहू लाने से पहले ही पता चल जाता है कि ये आकर बस घर तोड़ेगी... ऊपर से घर के बेटे को ही परिवार के खिलाफ खड़ा कर देगी...
शालिनीः चलिए मम्मी जी... अब तो आपको समझ आ गया कि बहू का मतलब सिर्फ तनाव होता है... इसलिए आपने अपनी बेटी को भी बहू बनकर तनाव पैदा करना ही सिखाया... पर जो बात मेरे लिए गलत थी, वो आपकी बेटी के लिए सही कैसे हो गई मम्मी जी..? बेटी अभिमान और बहू तनाव... ये बात समझ नहीं आ रही...
दिव्या, मम्मी जी की उम्र शायद इतनी नहीं कि वो हमारी बात समझें, पर तुम तो समझ सकती हो ना... एक तरफ मम्मी जी चाहती हैं मैं बहू का पूरा फर्ज निभाऊं... पर तुम्हें वही फर्ज निभाने नहीं देतीं... इसलिए अब तुम्हें तय करना है कि अपनी बसी-बसाई जिंदगी उजाड़नी है या एक बहू की जिम्मेदारी उठानी है...
दिव्याः भाभी सच में आज आपने मेरी आँखों पर से घमंड की पट्टी उतार दी है, जो बात एक माँ को अपनी बेटी को सिखानी चाहिए... वो बात आपने सिखाई... पर अब बहुत देर हो चुकी है... आर्यन ने तो मुझे तलाक देने का फैसला कर लिया है..
शालिनी हंसने लगी.. उसे यूँ हंसते देख दिव्या बोली.. क्या हुआ भाभी..?
शालिनीः पागल तुम अभी तक अपने पति को नहीं समझ पाई.. वो तुम्हें सपने में भी तलाक नहीं दे सकता, तो असली बात ही अलग है... ये सब तो मेरी ही योजना का हिस्सा था.. जिसमें तुम्हारे भाई, आर्यन सभी शामिल थे... वो तो तुमसे एक पल भी दूर नहीं रह सकता फिर तलाक कैसे देगा..? बाहर खड़ा तुमसे मिलने आया था.. पर मैंने रोक दिया और कहा पहले इस नाटक को खत्म करते हैं, फिर आप अंदर आना... उसके बाद आर्यन भी अंदर आ जाता है..
दिव्या रोते हुए बोलीः भाभी मैं बहुत किस्मत वाली हूं जो मुझे आप जैसी भाभी मिली... शालिनी ने कहाः मैं उससे भी ज्यादा किस्मत वाली हूं जो तुम्हें ऐसा पति मिला... विक्रमः अरे नहीं नहीं... सबसे ज्यादा किस्मत वाला तो मैं हूं जिसे ऐसी पत्नी मिली... फिर सब हंसने लगे और सुमित्रा जी बस सिर झुकाए खड़ी रहीं... वो सब समझ तो रही थीं... पर शायद अपनी गलती मानकर छोटे-बड़ों के सामने इकरार करें... ये उनकी उम्र की लाज नहीं दे रही थी... क्योंकि अक्सर बड़ों को लगता है कि वो हमेशा सही होते हैं... पर कभी-कभी छोटे भी बड़ों को सबक सिखा देते हैं... )