02/02/2026
नज़्म : “पसमांदा औरत की आवाज़”
इस्लाम ने औरत को इज़्ज़त दी,
हक़ दिया, पहचान दी,
मोहब्बत को मुक़द्दस कहा,
ख़्वाबों को उड़ान दी।
क़ुरआन ने कहा
औरत रहम है, अमानत है,
निकाह उसकी रज़ा से,
ज़िंदगी उसकी इजाज़त है।
मगर सवाल ये है
अगर इस्लाम बराबरी सिखाता है,
तो फिर पसमांदा औरत ही
हर दौर में क्यों सताई जाती है?
महिला आयोग हो या सरकारी योजना,
अक़लियत के नाम पर नाम लिखा गया,
मगर हक़ जब बंटने का वक़्त आया,
तो पसमांदा औरत को भुला दिया गया।
हक़ खा गईं वो औरतें,
जो शेख़, सैयद, पठान, मिर्ज़ा कहलाती रहीं,
बेटी-बीबी और माँ बनकर,
सदियों तक कुर्सी सँभालती रहीं।
और पसमांदा औरत?
वो हर बार लाइन के आख़िर में रही,
कभी मज़हब के नाम पर,
कभी फ़िक़्ह के नाम पर,
हमेशा दबाई गई,
हमेशा सहती रही।
कहा गया
“तुम नीची जात की हो,
कमज़र्फ़ हो, बदज़ात हो”
जुलाहिन, भठियारिन, डोमणी, धोबिन,
डायन जैसे लफ़्ज़ों से
रूह तक को तोड़ा गया।
ये गालियाँ नहीं थीं सिर्फ़,
ये ज़ुल्म की ज़बान थी,
ये वो वार थे
जो औरत की पहचान थे।
अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने
बहिश्ती ज़ेवर में लिखा,
शादी औरत की रज़ा से हो, पर नसब देखके करे,
उसका हक़ मुक़द्दस है ये कहा।
फिर सवाल ये है
अगर इस्लाममें बराबरी है,
तो किताब में ऊँच-नीच क्यों?
अगर इस्लाम में इंसाफ़ है,
तो फ़िक़्ह के नाम पर
अशराफ़-अजलाफ़ क्यों?
औरत की मोहब्बत,
उसके सपने,
उसका प्यार
सब इस्लाम में जायज़ हैं,
मगर सिर्फ़ तब
जब वो “ऊँची जात” की हो?
नहीं!
अब और नहीं!
अब पसमांदा औरत जाग चुकी है,
उसने चुप्पी तोड़ दी है,
उसने डर की ज़ंजीरें
ख़ुद अपने हाथों से तोड़ दी हैं।
अब हम भी माँ हैं,
बेटियाँ हैं,
बहनें हैं,
और सबसे पहले
इंसान हैं।
अब हमे भी हक़ चाहिए,
बराबरी चाहिए,
महिला आयोग में जगह चाहिए,
हर योजना में हिस्सेदारी चाहिए।
इस्लाम हमारा भी है,
देश हमारा भी है,
और इंसाफ़ पर
सबसे पहला हक़
पसमांदा औरत का भी है।
लेखक: इरफान जामियावाला
राष्ट्रीय महासचिव: आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़,
#पसमांदा_औरत_का_हक़
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