Qissa TV

Qissa TV Kissa TV is a YouTube channel which is popular for Biographies and other informative videos.
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At Kissa TV, You will find the information about forgotten and less popular actors. किस्सा टीवी एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो मुख्यतौर पर सिनेमा व सिने कलाकारों के बारे में बात करता है। खासतौर पर गुज़रे ज़माने की फिल्में व कलाकारों को किस्सा टीवी याद करता है। हालांकि इतिहास, खेल और देश व दुनिया की रोचक जानकारियां भी किस्सा टीवी समय-समय पर साझा करता रहता है।

एक दफा आशा भोसले जी ने महान किशोर कुमार के बारे में एक ऐसी बात बताई थी जिससे किशोर दा के फैंस हैरान रह गए थे। आशा जी ने ...
22/08/2026

एक दफा आशा भोसले जी ने महान किशोर कुमार के बारे में एक ऐसी बात बताई थी जिससे किशोर दा के फैंस हैरान रह गए थे। आशा जी ने कहा था,"किशोरदा अक्सर रिकॉर्डिंग के वक्त किसी अदृश्य बच्चे के साथ आते थे। किशोर दा उस अदृश्य बच्चे के साथ खूब बात करते थे। मज़ाक करते थे। ज़ोर-ज़ोर से हंसते थे।"

"कई दफा तो वो मुझे भी साथ बैठा लेते थे उस बच्चे संग बात करने के लिए। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता था कि क्या चल रहा है। मुझे कैसे रिएक्ट करना चाहिए। मुझे वो सब अजीब नहीं लगता था। बल्कि मेरा तो खूब मनोरंजन होता था।"

कई लोग कहते थे कि किशोर दा स्कीज़ोफ्रेनिक बिहेवियर के शिकार थे। लेकिन उन्हें जानने वाले लोगों का मानना था कि किशोर दा इतने मनमौजी थे कि वो हमेशा मज़ाक के मूड में ही रहते थे। किशोर दा की इन्हीं आदतों का ज़िक्र एक दफा पंचम दा ने भी अपने एक इंटरव्यू में उनके बारे में बात करते हुए किया था।

पंचम दा ने बताया था,"मैं साल 1952 में कलकत्ता मुंबई आया था। मेरे पिता मुझे कारदार स्टूडियो लेकर गए जहां एक रिकॉर्डिंग होनी थी। जैसे ही हम मेन गेट से अंदर घुसे, मैंने देखा कि एक आदमी सफेद कुर्ता पाजामा पहने और गले में मफलर लपेटे बाउंड्री वॉल पर बैठा है।"

"मेरे पिता एस.डी.बर्मन साहब ने मुझसे कहा,"इस आदमी ने मुझे बड़ा परेशान किया है। देखो बाउंड्री पर कैसे बेखबरों की तरह बैठा है।" जैसे ही मेरे पिता जी स्टूडियो में गए, मैं उस आदमी के पास गया। मैंने उनसे पूछा,"आप यहां क्या कर रहे हैं?" वो बोले,"मैं कारदार साहब की नकल करने की कोशिश कर रहा हूं।"

इस दौरान दीवार पर बैठे हुए वो अपने पैर ज़ोर-ज़ोर से हिले रहे थे। तभी उनका एक जूता निकलकर नीचे गिर गया। उन्होंने मुझसे अपना जूता उठाकर देने की गुज़ारिश की। मैंने दे दिया। जूता पहनकर वो नीचे उतरे और बोला,"थैंक्यू साधू।"

"मैंने उनसे फिर एक सवाल पूछा। मैंने कहा,"आप अशोक कुमार के भाई हैं ना?" "हां। तभी तो कोई मुझे काम नहीं देता।" उन्होंने जवाब दिया।" मैंने अपना परिचय दिया और अपना नाम बताया। उन्होंने अपनी भौंहे उचकाकर कहा,"मैं जानता हू्ं। और मैं ये भी जानता हूं कि तुम्हें पंचम नाम मेरे बड़े भाई अशोक कुमार ने दिया है।"

इसके बाद वो अशोक कुमार की नकल करने लगे। मुझे बड़ी हंसी आई उन्हें ये करते देखकर।" "मैं हूं डॉक्टर जैकिल और मिस्टर हाईड। मैं हर रात अपनी पर्सनैलिटी बदलता हूं।" किशोर कुमार ने पंचम दा से कहा। उस वक्त तो पंचम दा को ये बातें अजीब लगी थी। बाद में उन्हें भी किशोर दा की शख्सियत के उस पहलू की आदत हो गई।

सभी जानते हैं कि नंदा जी ने कभी शादी नहीं की थी। एक वक्त था जब मनमोहन देसाई उन्हें बहुत पसंद करते थे। उनसे शादी करना चाह...
22/08/2026

सभी जानते हैं कि नंदा जी ने कभी शादी नहीं की थी। एक वक्त था जब मनमोहन देसाई उन्हें बहुत पसंद करते थे। उनसे शादी करना चाहते थे। वो अक्सर नंदा जी से मिलने और उनके पास जाने का बहाना ढूंढते थे। लेकिन मनमोहन देसाई जी नंदा जी से बात नहीं कर पाते थे। शशि कपूर जानते थे कि मनमोहन देसाई नंदा को बहुत पसंद करते हैं।

शशि कपूर ने ये बात नंदा जी को भी बताई। नंदा जी को भी मनमोहन देसाई पसंद थे। लेकिन वो अपनी तरफ से तो कोई पहल करने वाली थी नहीं। मनमोहन देसाई जी की झिझक का नतीजा ये हुआ कि अपनी मां के कहने पर उन्हें एक दूसरी लड़की से शादी करनी पड़ी। यानि नंदा से शादी करने का उनका ख्वाब टूट गया।

मनमोहन देसाई जी की पत्नी का नाम था जीवनप्रभा। मनमोहन देसाई ने अपनी पत्नी से कहा भी था कि मैंने तुमसे इसलिए शादी की है क्योंकि तुम नंदा जैसी दिखती हो। और नंदा मेरी फेवरिट है। खैर, समय अपनी चाल से चलता रहा। पत्नी जीवनप्रभा से मनमोहन देसाई जी को एक बेटा केतन देसाई हुआ। लेकिन साल 1979 में जीवनप्रभा जी की मृत्यु हो गई।

मनमोहन देसाई एकबार फिर से अकेले हो गए। फिर कुछ सालों बाद यश जौहर ने नंदा और मनमोहन देसाई की शादी की बात चलानी शुरू की। लेकिन मसला अब भी यही था कि नंदा को शादी के लिए कैसे मनाया जाए। उससे भी बड़ा सवाल ये था कि नंदा से बात कैसे की जाए। फाइनली एक दिन यश जौहर नंदा जी की पक्की सहेली वहीदा रहमान जी के पास गए और उन्होंने वहीदा जी से कहा कि आप नंदा से मनमोहन देसाई की बात चलाइए ना।

शुरु में तो वहीदा रहमान ने मना कर दिया। लेकिन यश जौहर के काफी कहने पर वो मान गई। उन्होंने अपने घर पर एक लंच पार्टी रखी और उसमें नंदा को इनवाइट किया। उधर से यश जौहर और मनमोहन देसाई को भी बुलाया गया। ये चारों जब साथ बैठे थे तो वहीदा रहमान और यश जौहर बहाना बनाकर वहां से उठकर चले गए और नंदा जी व मनमोहन देसाई वहीं रह गए। उस दिन पहली दफा मनमोहन देसाई ने नंदा को शादी के लिए प्रपोज़ किया।

हालांकि नंदा जी ने फौरन हां नहीं की। उन्होंने मनमोहन देसाई से सोचकर जवाब देने को कहा। घर वापस लौटने के बाद नंदा जी काफी एक्सायटेड थी। क्योंकि पसंद तो वो भी मनमोहन देसाई जी को करती ही थी। घर पर उन्होंने अपने छोटे भाई को मनमोहन देसाई के प्रपोज़ल के बारे में जानकारी दी।

नंदा के भाई बहुत खुश हुए। नंदा की काफी उम्र हो चुकी है। क्योंकि वो भी चाहते थे कि नंदा जी को जल्द से जल्द शादी कर लेनी चाहिए। और केवल भाई ही नहीं, इनका सारा परिवार यही चाहता था। तो इस तरह साल 1992 में नंदा जी ने मनमोहन देसाई से सगाई कर ली।

लेकिन अफसोस, ये दोनों शादी के बंधन में बंध पाते उससे पहले ही साल 1994 में मनमोहन देसाई की अपने घर की बालकनी से गिरकर मौत हो गई। मनमोहन देसाई की मौत का नंदा जी को बहुत दुख पहुंचा। कहते हैं कि उस घटना के बाद नंदा जी ने अपना बाकि जीवन विधवाओं की तरह गुज़ारा था।

आज कोई सिनेमाई पोस्ट नहीं लिख रहा हूं। आज एक सच्ची कहानी लिख रहा हूं। या कह लीजिए कि अपने दिल का एक जज़्बात लिख रहा हूं।...
22/08/2026

आज कोई सिनेमाई पोस्ट नहीं लिख रहा हूं। आज एक सच्ची कहानी लिख रहा हूं। या कह लीजिए कि अपने दिल का एक जज़्बात लिख रहा हूं। इस कहानी में दो किरदार हैं। मैं और मेरा एक वफादार दोस्त, जिसका नाम था कालू। एक देसी पारिया नस्ल का कुत्ता। 2019 में मुझे वो हमारी गली में मिला था। तब बहुत छोटा पिल्ला ही था। एकदम कमज़ोर हालत में। जैसे शाम तक मर जाएगा।

दूसरे कुत्ते उसे फाड़ने को आ रहे थे, सो मैंने उन कुत्तों को भगाकर उसकी थोड़ी हिफाज़त कर दी। उसे थोड़ा दूध दे दिया। उसे दूध पिलाता देख मेरे मुहल्ले का नाई बोला,"इसे कोई बोरी में बांधकर कचरे के ढेर के पास फेंक गया था। मुझे इसके चिल्लाने की आवाज़ आई तो मैंने खोल दिया बेचारे को। लेकिन ये शायद बच नहीं पाएगा। दूसरे कुत्ते मार डालेंगे इसे।"

मैंने उस नाई से कहा कि जिसकी ज़िंदगी जितनी लिखी है उतनी तो वो जिएगा ही। हो सकता है ये बच जाए और बड़ा भी हो जाए। मैंने उस पिल्ले को बोरी से निकालने के लिए उस नाई भाई की प्रशंसा भी की।

उस दिन के बाद जब भी मैं घर से बाहर निकलता था वो पिल्ला मुझे देखकर पूंछ हिलाने लगता। मैं जानता था कि ये मुझे शुक्रिया कह रहा है। और उम्मीद कर रहा है कि मैं आगे भी इसकी यूं ही मदद करता रहूं। सुबह शाम पानी मिलाकर थोड़ा दूध उस पिल्ले को देने में मुझे कोई मुश्किल नहीं लगी। सो मैंने रोज़ दो वक्त उसे पानी मिला दूध देना शुरू कर दिया।

मैंने यूट्यूब पर एक वीडियो में देखा भी था कि छोटी उम्र के कुत्तों को पानी मिला दूध ही पिलाना चाहिए। इससे उनका पेट खराब नहीं होता। वरना गाय या भैंस जैसे बड़े जानवर का दूध पचा पाना इनके लिए मुश्किल होता है। उसे दूध पिलाने का ये सिलसिला लगभग दो महीने चला। इस दौरान मुझे उस पिल्ले से थोड़ा लगाव भी हो गया। था वो सफेद और काले रंग का। मगर मैंने उसे काले रंग के देसी कुत्तों का सबसे प्रचलित नाम कालू दे दिया। और इस तरह वो पिल्ला बन गया कालू।

इसी दौरान मुझे एक नौकरी के सिलसिले में लखनऊ शिफ्ट होना पड़ा। मैं लखनऊ आ गया। नौकरी की व्यस्तताओं के चलते जल्द ही मैं कालू को भूल गया। फिर एक दिन यूं ही छुट्टी के रोज़ लखनऊ वाले किराए के घर में बैठा था कि ख्याल आया,"जाने कालू ज़िंदा होगा भी कि नहीं। मेरे रोज़ दूध देने से उसकी हालत तो काफी ठीक हो गई थी।

दूसरे कुत्ते भी समझ गए थे कि इस पर गुर्राने से आदम की एक औलाद हम पर चिल्लाने लगती है। सो वो संभलकर ही कालू की तरफ देखते थे। लेकिन अब वो खा क्या रहा होगा? शायद वही गंदगी जिसे खाकर इस देश और दुनिया में लाखों-करोड़ों कुत्ते ज़िंदा रहते हैं? वैसे भी मेरे घर में तो कोई ऐसा नहीं था जो उसे रोज़ दूध देता। घरवालों को तो वैसे भी मेरा उसे महत्व देना पसंद नहीं आ रहा था।"

थोड़ा वक्त बीता और हालात कुछ ऐसे बने कि मुझे लखनऊ की वो नौकरी छोड़कर अपने शहर वापस लौटना पड़ा। दिल में मिले-जुले भाव लेकर मैं अपने शहर वापस आया। और जिस वक्त मैं अपने घर के मुख्य दरवाज़े पर पहुंचा था उस वक्त रात का 1 बज चुका था। घर की कुंडी बजाने से पहले मैंने आस-पास गौर से अपनी नज़र दौड़ाई। कालू कहीं नहीं था।

बहुत अधिक तो नहीं लेकिन मन थोड़ा दुखी ज़रूर हो गया था उस वक्त। मैं सोच रहा था कि जब मैं उस कम उम्र के कुत्ते को अचानक से दिखाई देना बंद हो गया होऊंगा तो अपनी छोटी सी बुद्धि से वो क्या अंदाज़ा लगा रहा होगा? शायद यही कि उस दो पैरों पर चलने वाले ने अब अपने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है। शायद उसके पास अब मुझे देने के लिए दूध नहीं है।

खैर, मुझे अंदर से किसी के आने की आवाज़ आई। मैं समझ गया कि पापा दरवाज़ा खोलने आ रहे हैं। उनके दरवाज़ा खोलने से पहले मैंने बस यूं ही एक सीटी बजाई। लखनऊ जाने से पहले अक्सर मैं सीटी बजाकर ही उसे बुलाता था। और मेरी सीटी सुनते ही कालू ज़ोर-ज़ोर से पूंछ हिलाता हुआ दौड़ा आता था।

जैसे ही पापा ने दरवाज़ा खोला, गली में खड़ी एक कार के नीचे से कालू दौड़ता हुआ आया। मेरी सीटी कालू के कानों तक पहुंच गई थी। और मुझे देखकर कालू इस कदर खुश हो रहा था जैसे कोई अपने किसी खोए हुए को अचानक बरसों बाद अपने सामने देखकर खुश होता है।

मैं भी उसकी ये खुशी देखकर खुश था। वो मुझसे लिपटना चाहता था। पर चूंकि मैं अपने कपड़े गंदे करने का रिस्क नहीं ले सकता था तो मैंने उसे खुद से दूर ही रखा। फिर मैंने पापा की तरफ देखा। उनका चेहरे का भाव उनके मन में चल रहे ख्याल को साफ बंया कर रहा था। मानो वो मन ही मन कह रहे हों कि अब फिर ये इसका वही ड्रामा शुरू हो जाएगा। वो अगर मेरे बचपन का कोई दिन होता तो यकीनन पापा मुझे दो हाथ लगा भी चुके होते।

ये कहानी मैं फिलहाल यहीं रोक रहा हूं। मगर कालू की कहानी अभी बाकी है। कालू की याद अभी बाकी है। वैसे भी रील्स और शॉर्ट्स के इस ज़माने में पढ़ने वाले बहुत कम हो गए हैं। पता नहीं कोई इसे भी पूरा पढ़ेगा या नहीं। लेकिन अगर किसी ने पढ़ लिया हो तो कमेंट ज़रूर करिएगा।

किसी और दिन कालू की कहानी का अगला हिस्सा कहूंगा। नीचे जो कुत्ते की तस्वीर आप देख रहे हैं। यही था कालू। जी हां, था। अब नहीं है। उसके ना होने से भी ज़्यादा, मुझे उसके ना होने की वजह कभी-कभी कचोटती है। वो भी कहूंगा। लेकिन फिर किसी दिन।

भारतीय सिनेमा में कई कलाकार आए और चले गए, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो केवल फ़िल्मी पर्दे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि एक पूरे...
22/08/2026

भारतीय सिनेमा में कई कलाकार आए और चले गए, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो केवल फ़िल्मी पर्दे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि एक पूरे युग की पहचान बन जाते हैं। 'मेगास्टार' चिरंजीवी एक ऐसा ही नाम हैं। आज उनके जन्मदिन के ख़ास मौक़े पर, जब उनके प्रशंसक दुनिया भर में जश्न मना रहे हैं, यह उनके शानदार और ऐतिहासिक सफ़र को याद करने का सबसे बेहतरीन समय है।

चिरंजीवी, जिनका असली नाम कोनिडेला शिव शंकर वर प्रसाद है, उनका जन्म 22 अगस्त 1955 को आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी ज़िले के मोगल्तूर गाँव में हुआ था। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर भारतीय सिनेमा के शीर्ष पर पहुँचना कोई आसान काम नहीं था।

चिरंजीवी के पिता आबकारी विभाग में थे, इसलिए चिरंजीवी का बचपन अलग-अलग शहरों में बीता। लेकिन बचपन से ही उनके भीतर अभिनय और कला को लेकर एक अलग ही जुनून था। चेन्नई (तब मद्रास) के फ़िल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला लेने के साथ ही उनके सपनों ने आकार लेना शुरू कर दिया।

साल 1978 में फ़िल्म पुनाधिरालु से उन्होंने कैमरे का सामना किया, हालाँकि उनकी पहली रिलीज़ फ़िल्म प्राण ख़रीदु बनी। शुरुआती दौर में उन्हें कई छोटी-मोटी और नकारात्मक भूमिकाएँ भी मिलीं, लेकिन चिरंजीवी ने हर रोल में अपनी एक अलग छाप छोड़ी।

1980 के दशक की शुरुआत में आई फ़िल्म ख़ैदी (1983) उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फ़िल्म ने न केवल बॉक्स ऑफ़िस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, बल्कि तेलुगु फ़िल्म इंडस्ट्री को एक नया एंगर यंग मैन और एक्शन स्टार भी दे दिया।

चिरंजीवी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह रही कि उन्होंने सिनेमा को देखने का नज़रिया बदल दिया। वे केवल संवाद अदायगी या अभिनय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारतीय फ़िल्मों में डांस और फाइट सीन्स का मयार पूरी तरह से बदल दिया।

उनके द्वारा पेश किए गए मुश्किल ब्रेकडांस स्टेप्स और ग्रेसफुल मूव्स ने युवाओं को उनका दीवाना बना दिया। 80 और 90 के दशक में आई फ़िल्में, जैसे चैलेंज, पसवादी प्रानाम, जगदेका वीरुडु अतिलोका सुंदरी, और गैंग लीडर ने उन्हें एक ऐसी ऊँचाई पर पहुँचा दिया जहाँ पहुँचना हर किसी का सपना होता है।

90 के दशक के आते-आते वे भारत के सबसे महंगे अभिनेताओं में शामिल हो चुके थे। यहाँ तक कि 'इंडिया टुडे' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने उन्हें अपनी कवर स्टोरी में "अमिताभ बच्चन से बड़े" स्टार का दर्जा दिया था। यह वह दौर था जब उनका नाम ही फ़िल्म के हिट होने की गारंटी बन चुका था।

फ़िल्मों के साथ-साथ चिरंजीवी ने समाज सेवा में भी बड़ा योगदान दिया है। उन्होंने 'चिरंजीवी चैरिटेबल ट्रस्ट' और 'चिरंजीवी ब्लड बैंक' की स्थापना की, जिसने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हज़ारों-लाखों लोगों की जानें बचाई हैं।

कोरोना महामारी के समय में भी उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री के दिहाड़ी मज़दूरों की मदद के लिए आगे बढ़कर काम किया। उनकी इन्हीं सेवाओं और सिनेमा में अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' और 'पद्म विभूषण' जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाज़ा है।

राजनीति के गलियारों में कुछ साल बिताने के बाद जब उन्होंने सिनेमा में वापसी की, तो लोगों ने उनका स्वागत उसी ज़बरदस्त उत्साह से किया। ख़ैदी नं. 150 और सै रा नरसिम्हा रेड्डी जैसी फ़िल्मों ने यह साबित कर दिया कि शेर चाहे जितना भी बूढ़ा हो जाए, उसकी दहाड़ कम नहीं होती। आज 70 के दशक की उम्र में भी जब वे पर्दे पर आते हैं, तो उनकी ऊर्जा और स्क्रीन प्रेजेंस नए कलाकारों के लिए एक मिसाल पेश करती है।

आज उनके जन्मदिन पर हर तरफ़ से शुभकामनाओं का ताँता लगा है। चिरंजीवी केवल एक नाम या अभिनेता नहीं हैं, बल्कि वे संघर्ष, लगन और अपार सफलता का वो जीवंत प्रतीक हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि अगर आपके सपनों में सच्चाई हो, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं होती।

लुक तो बढ़िया था इनका। किस्म बढ़िया साबित नहीं हुई लेकिन एक्टिंग में। वरना अमिताभ बच्चन जैसे धाकड़ एक्टर के सामने इन्हों...
22/08/2026

लुक तो बढ़िया था इनका। किस्म बढ़िया साबित नहीं हुई लेकिन एक्टिंग में। वरना अमिताभ बच्चन जैसे धाकड़ एक्टर के सामने इन्होंने काम बढ़िया किया था अपनी पहली फ़िल्म में। नाम है इनका आर्यमान रामसे। 2006 में आई अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार की फिल्म फैमिली: द टाईज़ ऑफ ब्लड से इनका डेब्यू हुआ था।

वो इनकी होम प्रोडक्शन फिल्म थी। इनके पिता केशू रामसे ने प्रोड्यूस की थी। और डायरेक्ट की थी राजकुमार संतोषी ने। उस फिल्म में आर्यमान अच्छे लगे थे। अच्छा काम किया था आर्यमान ने। लेकिन दुर्भाग्यवश, इनका फिल्मी करियर बहुत खास चल नहीं सका। फैमिली के बाद इन्होंने महज़ पांच-छह फिल्मों में ही औ काम किया था।

आर्यमान रामसे मशहूर रामसे ब्रदर्स खानदान से हैं। यानि फिल्मी दुनिया से इनका नाता पुराना रहा है। अक्षय कुमार की फिल्म सौगंध में भी इन्होंने बाल कलाकार के तौर पर काम किया है। अक्षय को आर्यमान अक्षय भईया कहकर संबोधित करते हैं।

आज आर्यमान रामसे का जन्मदिन है। 22 अगस्त 1980 को दिल्ली में आर्यमान रामसे का जन्म हुआ था। इनके पिता केशू रामसे बड़े प्रोड्यूसर थे। उन्होंने कुछ भूतहा फिल्में डायरेक्ट भी की थी जैसे डाक बंगला व मेरा शिकार।

फिल्मों में जब कामयाबी नहीं मिली तो सालों बाद आर्यमान ने डायरेक्शन में डेब्यू करने का प्लान किया था। लेकिन उनके उस प्रोजेक्ट का क्या हुआ, ये नहीं पता चल सका। आर्यमान की निजी ज़िंदगी की बात करें तो इनका रियल नेम मयूर रामसे था। आर्यमान इनका फिल्मी नाम है।

आर्यमान की शादी पूनम मारवाह रामसे से हुई है। पूनम ने भी इक्का-दुक्का फिल्मों में एक्टिंग की है। इन दोनों का एक बेटा भी है। आर्यमान रामसे को किस्सा टीवी की तरफ से जन्मदिन की शुभकामनाएं।

"नहीं। इरफ़ान को मैंने कभी भी दौड़ के लिए कंसीडर नहीं किया था। मैं तो उसे जानता भी नहीं था जब दौड़ बन रही थी। मैंने मनोज...
22/08/2026

"नहीं। इरफ़ान को मैंने कभी भी दौड़ के लिए कंसीडर नहीं किया था। मैं तो उसे जानता भी नहीं था जब दौड़ बन रही थी। मैंने मनोज को शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन में देखा था। तब मैंने उसे दौड़ में वो रोल ऑफ़र किया था।" राम गोपाल वर्मा ने कुछ साल पहले ये बात एक इंटरव्यू में कही थी। दरअसल, उस वक्त इस तरह की खबरें चल रही थी कुछ मीडिया पोर्टल्स पर कि इरफ़ान और मनोज के बीच राम गोपाल वर्मा की दौड़ फ़िल्म में काम करने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। और उस प्रतिस्पर्धा में मनोज बाजपेयी ने बाज़ी मारी थी।

कहा जा रहा था कि मनोज बाजपेयी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वो दौड़ फ़िल्म में काम मांगने के लिए राम गोपाल वर्मा के ऑफ़िस गए थे तो वहां पर इरफ़ान खान और विनीत कुमार पहले से बैठे हुए थे। वो दोनों भी उसी रोल के लिए रामू से बात करने आए थे जिसके लिए मनोज बात करने गए थे। लेकिन फिर मनोज ने ऐसा चक्कर चलाया कि वो रोल ना इरफ़ान को मिला और ना विनीत कुमार को मिला। मनोज बाजपेयी वो रोल हासिल करने में कामयाब हो गए। वो था दौड़ के खलनायक परेश रावल के मुख्य हैंचमैन का रोल।

लेकिन, राम गोपाल वर्मा ने पत्रकार सुभाष के. झा को दिए एक इंटरव्यू में इस बात को बिल्कुल खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वो तो इरफ़ान को जानते तक नहीं थे दौड़ फ़िल्म की मेकिंग के दौरान। रामू ने ये भी कहा था कि दौड़ के तो बहुत बाद में इरफ़ान से उनकी जान-पहचान हुई थी। और इरफ़ान से फ़िल्म के बारे में उनकी कभी कोई बात नहीं हुई। कभी ऐसी सिचुएशन ही नहीं बनी कि इरफ़ान उनकी किसी फ़िल्म में काम करते। इरफ़ान खान की डेथ के बाद रामू ने कहा था कि उन्हें अफ़सोस है कि वो क्यों इरफ़ान खान के साथ काम नहीं कर सके। करते तो शायद कोई शानदार फ़िल्म बना पाते।

साथियों आज दौड़ फ़िल्म के 29 साल पूरे हो गए हैं। 22 अगस्त 1997 को दौड़ रिलीज़ हुई थी। बजट था इस फ़िल्म का 8 करोड़ 60 लाख रुपए। और वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलैक्शन था 14 करोड़ 80 लाख रुपए था। राम गोपाल वर्मा ही इस फ़िल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर थे। संगीत ए.आर. रहमान ने दिया था। और गीत महबूब ने लिखे थे। फ़िल्म में कुछ सीन्स वाकई में मज़ेदार हैं। जैसे कि चाको जी वाले सीन्स, जो लेट नीरज वोरा साहब ने निभाए थे।

"मैं कसम लेता हूं कि तब तक मटन-चिकन नहीं खाऊंगा जब तक कि अपनी कमाई से खरीदने के काबिल नहीं बनूंगा।" मशहूर एक्टर पेंटल ने...
22/08/2026

"मैं कसम लेता हूं कि तब तक मटन-चिकन नहीं खाऊंगा जब तक कि अपनी कमाई से खरीदने के काबिल नहीं बनूंगा।" मशहूर एक्टर पेंटल ने ये कसम तब ली थी जब वो FTII में थे और आर्थिक तौर पर बहुत स्ट्रगल कर रहे थे। चलिए ये कहानी विस्तार से जानते हैं। आज पेंटल साहब का जन्मदिन है। 22 अगस्त 1948 को पेंटल साहब दिल्ली में जन्मे थे। उन्हें जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई। चलिए कहानी शुरू करते हैं।

जब FTII में पेंटल जी का सिलेक्शन हुआ था तब इनके पिता एक नौकरी कर रहे थे। हालांकि कोई खास नौकरी नहीं थी वो। बहुत मामूली सी नौकरी थी। बहुत कम पैसे मिलते थे। इसलिए वो बहुत परेशान थे ये सोचकर कि पूना में बेटे की पढ़ाई का और रहने का खर्च कैसे उठाएंगे?

ये बात इत्तेफ़ाक से इनके मामाजी को पता चल गई। मामाजी फौरन घर आए और उन्होंने इनके पिता से कहा,"जीजा जी आप घबराइए मत। मैं इसका खर्च उठाऊंगा। हम बाद में हिसाब देख लेंगे।" मामा की मदद से पेंटल पूना आ गए। लेकिन तीन महीने ही बीते थे कि एक दिन इन्हें अपने पिता की चिट्ठी मिली।

चिट्ठी में लिखा था,"बेटा, मेरी नौकरी चली गई है। अब मैं तेरी पढ़ाई का खर्च अफ़ोर्ड नहीं कर सकूंगा। इसलिए बेहतर होगा कि तुम इंस्टिट्यूट छोड़ दो और वापस दिल्ली लौट आओ।" पेंटल का दिल बैठ गया चिट्ठी पढ़कर। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा जैसे ज़िंदगी ने उनसे सबकुछ छीन लिया।

आंखों में आंसू लिए पेंटल अपने हॉस्टल की तरफ़ जा रहे थे। तभी इनके एक दोस्त ने बताया इन्हें कि नोटिस बोर्ड पर तेरा नाम लिखा है। पेंटल ने नोटिस बोर्ड चैक किया। पता चला कि चूंकि तिमाही के एग्ज़ाम्स में पेंटल ने पहला स्थान हासिल किया है, इसलिए 85 रुपए महीना की स्कॉलरशिप उन्हें अलॉट की जाती है।

यानि पिछले तीनों महीनों की स्कॉलरशिप उन्हें एक साथ मिलनी थी। और उन्होंने एक माइम शो भी किया था इस दौरान, जिसके उन्हें पचास रुपए मिले थे। आखिरकार पेंटल साहब ने अपने पिता को चिट्ठी लिखी और पिता को बताया कि उन्हें स्कॉलरशिप मिलने लगी है। और शोज़ वगैरह करके भी वो कुछ पैसे कमा लेंगे। यानि अपना खर्च वो खुद उठा लेंगे। इसलिए उन्हें कोर्स करने दिया जाए।

इस तरह अपने खुद के दम पर कंवरजीत पेंटल साहब ने FTII में एक्टिंग का अपना कोर्स पूरा किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वो बहुत कम पैसों में अपना गुज़ारा कर रहे थे। इसलिए उन्होंने फै़सला किया था कि जब तक अच्छे पैसे नहीं कमाएंगे, मटन या चिकन नहीं खाएंगे। जबकी वो बहुत शौकीन थे मटन-चिकन के।

कई बार ऐसा होता था कि इनके यार-दोस्त इनसे कहते थे कि तुम टेंशन क्यों लेते हो? हम तुम्हें चिकन खिलाएंगे। लेकिन पेंटल साहब मना कर देते थे। क्योंकि वो तय कर चुके थे कि जब तक अपने पैसों से खरीदने की हैसियत नहीं बनाएंगे, तक तक नॉनवेज नहीं खाएंगे। नॉनवेज महंगा जो होता था।

कवंरजीत पेंटल जी के संघर्षों की कहानी पर, एक्टर बनने की कहानी पर बहुत पहले हमने एक लेख लिखा था। कमेंट सेक्शन में वो लेख मौजूद है। पढ़िएगा। इनके बारे में काफ़ी कुछ आपको पता चलेगा। पेंटल जी को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

बहुत संघर्ष किया था पेंटल साहब ने भी अपने जीवन में। किस्मत ने इन्हें इनकी मेहनत का फल दिया भी। तभी तो आज इतना बड़ा नाम ह...
22/08/2026

बहुत संघर्ष किया था पेंटल साहब ने भी अपने जीवन में। किस्मत ने इन्हें इनकी मेहनत का फल दिया भी। तभी तो आज इतना बड़ा नाम हैं ये। पढ़िए इनकी कहानी। आज जन्मदिन है पेंटल साहब का।

Meerut Manthan पर आज पेश है Actor Kanwarjit Paintal की कुछ अनसुनी कहानियां। दिल्ली की गलियों से निकलकर कैसे Actor Kanwarjit Paintal मुंबई में इतना...

22/08/2026

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2013 में मैंने एक क्षेत्रीय समाचार चैनल में नौकरी शुरू की थी। उस चैनल पर हर रविवार को एक प्रोग्राम चलता था जिसमें गुज़रे...
22/08/2026

2013 में मैंने एक क्षेत्रीय समाचार चैनल में नौकरी शुरू की थी। उस चैनल पर हर रविवार को एक प्रोग्राम चलता था जिसमें गुज़रे ज़माने के कलाकारों की कहानी बताई जाती थी। उन कलाकारों की कहानियों को प्रमुखता दी जाती थी जिनका अंत दुखद हुआ हो। बतौर ट्रेनी प्रोड्यूसर मुझे आदेश मिला कि मैं ऐसे कुछ कलाकारों की लिस्ट तैयार करूं जिनकी कहानी उस प्रोग्राम में फिट बैठती हो।

मैंने गूगल पर सैड स्टोरीज़ ऑफ बॉलीवुड स्टार्स लिखकर सर्च किया तो मुझे कई लिंक्स में विमी का नाम मिला। मेरी दिलचस्पी विमी में तब और ज़्यादा बढ़ गई जब मुझे पता चला कि पुरानी हमराज़ फिल्म का गीत,"तुम अगर साथ देने का वादा करो" विमी व सुनील दत्त साहब पर फिल्माया गया था।

फिर मैंने विमी की कहानी जानने के लिए गूगल को और अधिक गहराई तक खंगालना शुरू कर दिया। मुझे विमी की कहानी शुरुआत से जाननी थी। उनके जन्म से लेकर फिल्मों में आने तक का उनका पूरा किस्सा मुझे पता करना था। लेकिन कहीं पर भी संतोषजनक जानकारी नहीं मिल पाई।

उस वक्त सिर्फ इतना ही पता चल पा रहा था कि विमी ने हमराज़ से करियर शुरू किया। लेकिन हमराज़ के बाद उनका करियर नहीं चल पाया। और आखिरी वक्त में विमी की ये हालत हो गई कि उनकी मौत एक सरकारी अस्पताल में हुई। उनकी लाश को श्मशान तक ठेले पर ले जाना पड़ा।

पूरी कहानी मुझे पता नहीं चली तो मैंने उस शो के लिए विमी की कहानी आगे नहीं बढ़ाई। कुछ दिनों बाद वो शो बंद हो गया और उसकी जगह एक दूसरा प्रोग्राम चलाया जाने लगा। फिर कुछ महीनों बाद मैंने भी वो न्यूज़ चैनल छोड़ दिया और दूसरे मीडिया संस्थान में नौकरी करने लगा। गुज़रते वक्त के साथ मैं विमी का नाम भी भूल गया।

फिर जीवन में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए कि मैंने मीडिया जगत से खुद को दूर कर लिया और किस्सा टीवी नाम से अपना खुद का यूट्यूब चैनल शुरू किया। एक दिन घर पर मैं अपना एक पुराना रजिस्टर यूं ही उठाकर देखने लगा तो मुझे उसमें विमी का नाम लिखा मिला।

मुझे याद आया कि विमी के बारे में रिसर्च करने के दौरान मुझे जो भी जानकारी मिल रही थी मैं इस रजिस्टर में नोट करता जा रहा था। उसी वक्त मैंने फिर से गूगल पर विमी को तलाशा। और मुझे एक ऐसा लिंक मिला जिस पर किसी पाकिस्तानी लेखक ने विमी की पूरी कहानी किसी ज़माने में भारत में छपने वाली उर्दू की प्रसिद्ध फिल्म मैगज़ीन शमा के हवाले लिखी थी।

मैं सच कह रहा हूं। विमी की पूरी कहानी जानने के बाद मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। वो पहला दिन था जब मुझे पता चला था ये फिल्मी दुनिया कितनी बेरहम हो सकती है। ये जीवन कभी-कभी कितना क्रूर हो सकता है। एक बहुत बड़े व अमीर घराने की बहू फिल्मी दुनिया के मायाजाल में किस तरह फंसकर अपना जीवन तबाह कर सकती है।

आज विमी की पुण्यतिथी है। आज ही के दिन यानि 22 अगस्त को साल 1977 में मात्र 33 साल की उम्र में ही विमी ने मुंबई के नानावटी हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली थी। घंटों तक विमी की लाश अस्पताल के एक गलियारे में लावारिसों की तरह पड़ी रही थी। अंतिम संस्कार के लिए श्मशान तक ले जाने वाला भी कोई नहीं था।

विमी के बारे में लिखी गई इस पोस्ट में मैंने विमी से जुड़ी अपनी यादें कही हैं। लेकिन मुझे यकीन है कि विमी की असल कहानी जब आपको पता चलेगी तो आपको भी उतना ही दुख होगा जितना की मुझे हुआ था। वैसे विमी की कहानी बार-बार आती रही है हमारे पेज पर। लेकिन ये कहानी ही ऐसी है कि इसका ज़िक्र बार-बार किया भी जाना चाहिए।

बहुत से नए लड़के-लड़किया हैं जो फ़िल्म लाइन में जाने का ख्वाब देखते हैं। उन्हें विमी के जीवन से सबक लेना चाहिए और हर कदम सोच-समझकर उठाना चाहिए। कमेंट सेक्शन में विमी की विस्तृत कहानी का लेख आपको मिल जाएगा। पढ़िएगा उसे अगर पहले ना पढ़ा हो तो। इनकी कहानी बहुत दुखद लगेगी आपको।

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