Abhishek kaushik-Poet

Abhishek kaushik-Poet आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य
(गोपालदास नीरज)

29/03/2026

भाषण देने कभी गया था
मथुरा के कोई कॉलिज में

रस्ते भर खाने के पैसे बचा लिए थे।
और ख़रीदे थे जो मैंने

जन्मभूमि वाले मंदिर से,
मुझे देख जो मुस्काते थे

नटखट शोख़ इशारे करके,
तुम्हें देख जो शरमाते थे,

सहज रास आँखों में भरके,
आले में चुपचाप अधर पर वेणु टिकाए,

अभी तलक क्या वो छलिया घनश्याम रखे हैं?
बच्चों के क्या नाम रखे हैं?

आँसू की बारिश में भीगे
ठोड़ी के जिस तिल को मैंने

विदा-समय पर चूम लिया था
और कहा था ‘मन मत हारो’

तुम से अनगाया गाया है
तुमको खो कर भी पाया है

चाहे मैं दुनिया भर घूमूँ,
धरती भोगूँ, अंबर चूमूँ

इस तिल को दर्पण में जब भी कभी देखना,
यही समझना—

ठोड़ी पर यह तिल थोड़ी है,
जग-भर की नज़रों से ओझल,

मेरी भटकन रखी हुई है,
मेरे चारों धाम रखे हैं।

सच बतलाओ, नए प्रसाधन के लेपन में
चेहरे की चमकीली परतों के ऊपर भी

जिसमें तुमको ‘मैं’ दिखता था।
गोरे मुखड़े वाली

चाँदी की थाली में अब तक भी
क्या मेरे शालिग्राम रखे हैं?

बच्चों के क्या नाम रखे हैं?
सरस्वति पूजन वाले दिन,

मेरा जन्म-दिवस भी है जो,
बाँधी थी जो रंग-बसंती वाली साड़ी,

फाल ढूँढ़ने को जिसका मैं
तीन-तीन बाज़ारों तक ख़ुद

दौड़-दौड़ कर फैल गया था,
बी.एड. की गाइड हो या हो

लव-स्टोरी की वी.सी.डी.,
मौसी के घर तक जाने को,

सीट घेरनी हो जयपुर की बस में चाहे,
ऐसे सारे ग़ैर-ज़रूरी काम, ज़रूरी हो जाते थे,

एक तुम्हारे कहने भर से।
अब जिसके संग निभा रही हो,

हँस-हँस कर अनमोल जवानी,
उस अनजाने, उस अनदेखे,

भाग्यबली के हित भी तुमने
ऐसे ही क्या ग़ैर-ज़रूरी काम रखे हैं?

बच्चों के क्या नाम रखे हैं?

डॉ कुमार विश्वास सर

12/10/2025

घजहाँ जाते हैं हम कोई कहानी छोड़ जाते हैं
ज़रा सा प्यार थोड़ी सी जवानी छोड़ आते हैं

कहानी राम की वन-वासियों पर फ़ख़्र करती है
उसूलों के लिए जो राजधानी छोड़ आते हैं

हमारे मय-कदे का ख़ास ये दस्तूर है वाइज़
यहाँ आए तो बाहर बद-गुमानी छोड़ आते हैं

कहीं पर दिल नहीं मिलता कहीं महफ़िल नहीं मिलती
इसी चक्कर में हम शामें सुहानी छोड़ आते हैं

कभी जब ख़ुद से मिलने की ज़रूरत पेश आती है
सुनहरे ख़्वाब बातें आसमानी छोड़ आते हैं

मोहब्बत में 'उदय' देना न दिल कम-ज़र्फ़ लोगों को
नई की धुन में जो चीज़ें पुरानी छोड़ आते हैं

दादा उदय प्रताप सिंह

हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में मां हिंदी की आराधना के लिए भक्ति एवं साहित्य की अद्वितीय पुण्यभूमि गिरिराज जी की धरती पर आयोज...
12/09/2025

हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में मां हिंदी की आराधना के लिए भक्ति एवं साहित्य की अद्वितीय पुण्यभूमि गिरिराज जी की धरती पर आयोजित इस अनुष्ठान में आप सभी स्वजनों की उपस्थिति अभीष्ट व प्रार्थित है।🙏🏻
समय - दोपहर 01:00 बजे से।
दिनांक - 13 सितंबर
स्थान - श्री बाबू लाल महाविद्यालय, गोवर्धन, मथुरा ।

06/08/2025

जिस गीतकार को पढ़ कर में हमेशा आनंदित होता हूं उनका एक गीत आप भी पढ़िए💞

बस नयन का हाल थोड़ा सा अजब है

सो गए सारे नज़ारे रात गहरी हो गयी है
प्राण के आवागमन पर देह प्रहरी हो गयी है
दोनों पलकों पर उतर आई हैं आंसू की कतारें
देह की चादर प्रतीक्षा में सुनहरी हो गयी है

पुतलियां ठहरी हुई हैं एक ही जगह कभी से
नींद के आवागमन का हाल थोड़ा सा अजब है
बस नयन का हाल थोड़ा सा अजब है

शून्य जैसे हो गयी सम्भवना हर इक प्रणय की,
मन निरंतर खींचता है किंतु प्रत्यंचा समय की
दोनों पलके हो गई हैं प्रार्थना में मौन कबकी
मन्द्र होती जा रही है और गति पल पल हृदय की

अंजुरी भर दे रही है नींद की देवी सपन को,
अंजुरी से आचमन का हाल थोड़ा सा अजब है
बस नयन का हाल थोड़ा सा अजब है

कवि Himaanshu Shankar भैया 🙏

02/08/2025

गीत पढ़िए

कैसे भूलूँ नयन-तुम्हारे,कैसे मन से इन्हें निकालूँ,
भाव,नयन के देह-युक्त हैं,और हमारा मन दल-दल है।

दृग में सावन उतरा जब-जब,
सूखे बांध पुलिन हो बैठे।
जितने स्वप्न बुने थे सँग-सँग,
उनके गाझ-गझिन हो बैठे।

छिपते अब स्वप्नो के शावक, कैसे आखिर इन्हें बचा लूँ,
कुशल शिकारी नयन-तुम्हारे,और हमारा मन जंगल है।

नाम तुम्हारा लिया किसी ने,
मन की वैजंती हरषाई।
फिर याद तुम्हारे नयनो की,
भावों के द्वारे तक आई।

निशिदिन निर्मल करते हमको,जी करता है डूब नहा लूँ,
गङ्गा जैसे नयन तुम्हारे,और हमारा मन कलिमल है।

जितनी बार पुकारा हमने,
ये पाहुन बनकर आए हैं।
खूब लजाते रहे मगर ,मन
के आंगन सोहर गाए हैं।

भावों की बारात लिए अब,कैसे इनको द्वार बुला लूँ,
हृदय डूबता निर्धनता में,और हमारा मन दंगल है।

प्रकाश आदित्य मिश्रा

12/07/2025

पढ़िए गीत!

कितनी गीतो की गंगाएँ, कहो बहाई तुमने साधक?
मुझे आचमन करना उनमें,मुझे निमज्जनरत होना है।

मुझे बताओ की शब्दों के,
तुमने कितने महल बनाए।
कितने आँगन कहो सँवारे,
कितने तुमने द्वार सजाए।

मुझे बताओ भाव-भूमि पर,कितने शब्द हुए आराधक?
मुझे प्रणाम सौपना उनको, उनके आगे नत होना है।

मुझे दिखाओ व्यथा-भूमि पर,
तुमने घाव कहाँ हैं बोये।
किसकी पीड़ा देख प्रथमतः,
तुम व्याकुल होकर हो रोए।

मुझे दिखाओ घाव सभी तुम,और कहो सब व्यथित-कथानक,
पीर कहाँ उपजी कह डालो, मुझको भी आहत होना है।

शब्दो की संकुल गलियों से,
कितनी पीड़ा ढोयी तुमने।
लोचन की इस निर्झरिणी से,
कितनी बूंदें खोयी तुमने।

मुझे बताओ व्यथित-वियोगी,कितना हृदय हुआ है धक-धक,
मुझे दिखाओ कहां व्यथा है?मुझको शरणागत होना है।

प्रकाश आदित्य मिश्रा

01/06/2025

तुम किसी मन्त्र की सिद्धि का पुण्य फल
मैं अशुभ कामनाओं में ढाला गया
तुम प्रतिष्ठित हुई मन्दिरों में, मुझे
प्रार्थनाओं के घर से निकाला गया

तुम बनी इसलिए हो, दिखाकर तुम्हें
कह सकें देवता उनकी रचना हो तुम
और मानक बनो रूप का विश्व में
लोग देखें, कहें, कोई सपना हो तुम

मेरी मिट्टी से जाने हुआ पाप क्या
मुझको केवल हवा में उछाला गया
तुम किसी मन्त्र की सिद्धि का....

जब मदन ने मथा रूप के सिंधु को
रत्न के रूप में उनको तुम मिल गई
इन्द्र से कल्पवृक्षों ने वरदान में
पुष्प माँगा, तो शाखों पे तुम खिल गई

आँसुओं ने किया यज्ञ पुत्रेष्टि, जब
गोद में उनकी मुझको ही डाला गया
तुम किसी मन्त्र की सिद्धि का....

क्या हुआ यदि पुरस्कृत हुई तुम सदा
और मुझको तिरस्कृत किया लोक ने
क्या हुआ तुम बनी सुख की अनिवार्यता
और मुझको प्रकाशित किया शोक ने

मैं न विचलित तनिक हूँ किसी कष्ट से
मुग्ध हूँ, मैं दुखों का दुशाला हुआ
तुम किसी मन्त्र की सिद्धि का पुण्य फल...

: मुक्तेश्वर पराशर

31/05/2025

साथ के लोग पहुंचे कहाँ से कहाँ
हम किसी के नयन में फँसे रह गये !

कुछ सफल लोग हमको बुलाते रहे
एक ऊँचा शिखर चूमने के लिये
मस्तियों ने हजारों इशारे किये
साथ में खेलने झूमने के लिये

झुक न पाये कभी तो निकाले नहीं
और काँटे चरन में फँसे रह गये !

दूर से एक सूरज दिखाया गया
पास पँहुचे मिली इक किरन भी नहीं
उम्र भर की कमाई कहीं छिन गयी
ब्याज छोड़ो मिला मूलधन भी नहीं

एक विश्वास की डोर थामे हुए
हम किसी के वचन में फँसे रह गये !

एक कर्त्तव्य था तो निभाया गया
राजधानी कभी जो छुटी,छोड़ दी
सब सही था मगर भ्रम बुलाने लगे
एक दिन फिर अकेली कुटी छोड़ दी

साधुवेशी दशानन उधर छल गये
हम इधर इक हिरन में फँसे रह गये !

- ज्ञानप्रकाश आकुल

05/05/2025

"
तुम बिन हर दिन पीड़ा देता
औ रातें भी तड़पाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।

तुमसे बिछड़े सदियां बीती पर बिछड़न के घाव हरे हैं।
सुख निर्वासित हैं आँगन से दुःख ड्योढ़ी तक पाँव धरे हैं।
एक तुम्हारे खालीपन का चित्र अकेले कब तक रंगें ?
हाथ उदासी की डोरी अब खुशियों की सब कटी पतंगें।

यदि कुछ पल मै हँस लूं खुलकर
साँसे बोझिल हो जाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
बरबस आँखें भर आती हैं।

जब से तुम हो रूठे मुझसे जग ये लगता रूठा रूठा।
मन वैरागी हो बैठा है हाथ तुम्हारा जब से छूटा।
दौलत शोहरत महल अटारी लगते पीड़ा की परछाई।
औ महफ़िल के उत्सव सारे भेंट में देते हैं तन्हाई।

अब तो सारी आशाएं भी
गीत निराशा के गाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।

सपनों के पथरीले पथ पर जब जब साथ तुम्हारे घूमे।
होंठों की सूखी परतों को तब तब आंसू आकर चूमे।
अंतर्मन की उस वेदी पर मूर्ति तुम्हारी स्थापित है
जहां रुद्ध है अन्य आगमन अन्य कल्पना तक दूषित है।

पावनता की निश्छल कलियां
अर्पित होकर इठलाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
बरबस आँखें भर आती हैं।

Sameer Tiwari Sam

श्याम और सूर की भूमि पर बने इस सुयोग में आप सभी सुधि श्रोताओं की उपस्थिति सादर प्रार्थित है🙏🙏
19/04/2025

श्याम और सूर की भूमि पर बने इस सुयोग में आप सभी सुधि श्रोताओं की उपस्थिति सादर प्रार्थित है🙏🙏

13/04/2025

"
क्यों सजल हैं नेत्र दोनों
क्यों अधर इतनी पिपासा ?
आह ! यह कैसी निराशा ?

क्या हुआ जो एक दूजे के नहीं पूरक हुऐ हम ?
ज़िंदगी की पटकथा का यदि नहीं सूचक हुऐ हम।
क्या हुआ जो साधना को दे नहीं हम साध्य पाये ?
क्या हुआ जो हम प्रणय में ना मिलनमय भाग्य पाये ?

हाय ! यह अवसाद कैसा
दीप्ति मुख छाई हताशा
आह ! यह कैसी निराशा ?

जानता हूँ ! वेदना का ताप अब सहना पड़ेगा।
इक अपरिचित अंक में ही उम्रभर रहना पड़ेगा।
पर नियति निर्णय यही अब व्यर्थ है प्रतिकार करना।
जो विधाता का चयन है , है वही स्वीकर करना।

इस विषम बदलाव तुम
जीने की हो एक आशा।
आह ! यह कैसी निराशा ?

जो अतिथि है द्वार आया अब उसे सत्कार दो तुम।
भाग्य से जो वर मिला है अब उसे सब प्यार तुम।
कल रहा कैसा हमारा यह किसी को मत बताना।
ना मुझे तुम याद करना ना स्वयं का दिल दुखाना।

फिर मिलेंगे नवल युग में
प्रीत यह देती दिलासा।
आह ! यह कैसी निराशा ?
Sameer Tiwari 🙏

21/02/2025

प्रेम के सुंदर, सरल, शाश्वत, सहज सौन्दर्य में हूँ।
मैं सुखद आश्चर्य में हूँ!

जब निरुत्साहित बहुत थी, शून्य थी संभावनाएँ।
क्या पता था भाग्य की हैं कुछ नियोजित योजनाएँ!
तुम मिले तो चित्त के भटकाव ने ठहराव पाया।
जो असंभव था, स्वयं में बस वही बदलाव पाया।

दिव्यतम अनुभूति में मैं, मौनमय मौखर्य में हूँ।
मैं सुखद आश्चर्य में हूँ!

थी कभी प्रतिद्वंद्विता मुझमें, अभी झुठला रहे हैं।
पाँव मेरे अनुसरण का मार्ग चुनते जा रहे हैं।
अग्रणी, अधिकारिणी का भाव खोती जा रही हैं।
कौन सी ये इंद्रियां मुझमें समर्पण ला रही हैं।

बंधनों में साम्य संप्रभुता लिए ऐश्वर्य में हूँ।
मैं सुखद आश्चर्य में हूँ।

खूबियों पर अब परस्पर रीझ जाएँ, प्यार कर लें।
जो कमी है वह सुधारें या उन्हें स्वीकार कर लें।
है भली आश्वस्ति यह, उल्लास से घेरे रहोगे।
इस जगत में एक तुम हो, मात्र जो मेरे रहोगे।

मैं तुम्हारे स्नेहमय सान्निध्य में, औत्कर्ष्य में हूँ।
मैं सुखद आश्चर्य में हूँ!

इति शिवहरे

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