23/04/2026
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।।श्री सर्वेश्वरो जयति।।
। ऊर्ध्वत्वात् सर्वधर्माणाम् ऊर्ध्वाम्नायः प्रशस्यते ।।
।।जयजय श्रीजीपरमकृपाल,शिवकामेश्वर वृहद्गोपाल ।।
।एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति ।
।। श्रीगुरु गणेशाय नमः ।।
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।। श्री हरिः ।।
"अनन्ता वै वेदा:" - (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।१०।११।४)
पुरातन महर्षियों का,भारत की महान मेधा का,जीवन दर्शन है कि वेद सर्वज्ञानमय हैं वे चरम सत्य हैं "वेदोऽखिलो धर्ममूलम्"- वे धर्म मूल हैं मनुस्मृति (2.6)। ये सामान्य ज्ञान या विद्या मात्र नहीं अपितु लौकिक अलौकिक समस्त ज्ञानस्वरुप या ज्ञान का बोधक हैं। "विद" धातु सत्ता अर्थ में, लाभ अर्थ में तथा विचरणा आदि अर्थ में प्रयुक्त होता है। अतः वेद का स्वरुप अत्यंत व्यापक हो जाता है। इस व्यापक अर्थ के अनुसार पुरातन महर्षियों ने वेद की परिभाषा दी है -
" विद्यन्ते ज्ञायन्ते लभ्यन्ते वा एभिर्धमादि पुरुषार्था इति वेद:. "
- धर्मादि पुरुषार्थ जिसमें हैं तथा जिससे ज्ञात होते हैं तथा जिससे प्राप्त होते हैं, वे वेद हैं।
उपरोक्त परिभाषानुसार वेद परम तत्त्व का स्वभाव हैं, वे चरम सत्य हैं, वे सर्वज्ञान मय हैं -
- "सर्वज्ञानमयो हि स:" (मनु २। ७)
बृहदारण्यकोपनिषद्में भी वेदोंको परमात्माका निःश्वास कहा गया है-
एवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः। (बृ० उ० २। ४।१०)
वेदको ईश्वरीय ज्ञानके रूपमें ही साक्षात्कृतधर्मा ऋषि महर्षियोंने अपने अन्तश्चक्षुओंसे प्रत्यक्ष दर्शन किया और तदनन्तर उसे प्रकट किया। इसी कारण महर्षि यास्क ने ऋषियों को मन्त्र दृष्टा कहा है - "ऋषयो मन्त्रद्रष्टार:।"
कुछ लोग मन्त्रभाग मात्र को ही वेद मानते हैं, जबकि मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद कहे जाते हैं -
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।'
(आपस्तम्ब यज्ञपरिभाषा 1.3.31)
धीरे-धीरे ये भी दुरूह होते गये, बादमें आरण्यक, उपनिषद् तथा वेदाङ्ग आदि भी व्याख्याक्रम से अस्तित्वमें आये। अतएव आचार्य यास्कने लिखा- '
'उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे बिल्मग्रहणाय इमं ग्रन्थं समाम्नासिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि च।'
(निरुक्त, प्रथम अध्याय, खण्ड २०)
- "जब बाद के समय के लोग (अवर) केवल मौखिक उपदेश से वेदों को समझने में असमर्थ होने लगे, तब उन्होंने वेदों के अर्थ को स्पष्ट रूप से समझने के लिए वेदों और वेदांगों (जैसे निरुक्त, व्याकरण आदि) को ग्रंथों के रूप में लिपिबद्ध या संकलित किया।"
परवर्ती क्रम में आगम आदिक इतिहास पुराण भी इसी क्रम में हुए,
इसीलिये माना जाता है कि इतिहास-पुराणोंके अनुशीलनद्वारा ही सम्प्रति वेदोंका वास्तविक ज्ञान सम्भव है, अन्यथा वेद स्वयं डरते हैं कि कहीं अल्पश्रुत व्यक्ति (अर्थात् भारतीय साहित्य-परम्परासे अनभिज्ञ व्यक्ति) हमपर प्रहार (अनर्थ) न कर दे-
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदः मामयं प्रहरिष्यति ॥
(महाभारत, आदिपर्व 1.267)
तात्पर्य यही है कि जो लोग भारतीय साहित्य और परम्पराओंसे अनभिज्ञ हैं या आस्था नहीं रखते, वे वेदोंके साथ न्याय नहीं कर सकते।
वस्तुतः वेद अज्ञात पुराकाल की ऐसी सारस्वत रचना है, जो भारतीयों के आस्तिक-नास्तिक धर्मदर्शन, तन्त्र-पुराण, शैव-शाक्त एवं वैष्णव, यहाँतक कि बौद्ध एवं जैन-मान्यताओं एवं प्रेरणाओंका भी स्रोत रहा है। वेद-रूपा विग्रहवती पयः स्विनी सरस्वतीके ज्ञानामृतमय पयोधरोंका पान करके ही परवर्ती युगोंमें निरन्तर भारतवर्षकी संततियाँ निरपेक्षभावसे अपनी ज्ञान-ऊर्जा एवं मनीषाको समृद्ध करती रही हैं। वेद भारतीयों की आस्था के आधार, जीवन के सर्वस्व तथा परम पवित्र और अति सम्मान्य हैं।
मनुमहाराजने इन्हें देव, पितृ एवं मनुष्योंका सनातन चक्षु कहा है-'देवपितृमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनः ।'
मनु महाराज के अनुसार इनकी उपयोगिता त्रैकालिक है-'
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ।' ( मनुस्मृति )
वेदोंका भारतमें जैसा शीर्ष-सम्मान्य स्थान है, विश्वके किसी भी देश में किसी भी ग्रन्थको वैसा नहीं है। वेद भारतवर्षकी अमूल्य सम्पत्ति हैं। इनकी अनन्तता के सम्बन्ध में महर्षि भरद्वाज का आख्यान प्रमाण है।
महर्षि भरद्वाज ने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदों का अध्ययन किया। किन्तु जीवन के संध्याकाल तक वे स्वाध्याय और ज्ञान से संतुष्ट ना हुए उन्होंने इन्द्र देव का आह्वान किया और उनसे वेदाध्ययन के लिये कुछ समय माँगा, देवराज ने प्रसन्न होकर १०० वर्ष की अतिरिक्त आयु प्रदान की , जब २०० वर्ष की आयु में भी ऋषि भारद्वाज को उनका ज्ञान अल्प ही लगा तो इंद्रदेव ने २०० वर्ष की अतिरिक्त आयु प्रदान की। किन्तु जब ४०० वर्ष के स्वाध्याय के पश्चात् भी जब ऋषि संतुष्ट न हुए, और स्वयं के ज्ञान को तुच्छ कहने लगे तो उन्होंने देवराज का पुनः आह्वान किया।
देवराज प्रकट हुए, ऋषिने भावविह्वल-कण्ठसे कहा- 'भगवन् ! आपकी कृपासे अभी भी मैंने ज्ञानके थोड़े ही कण बटोर पाने में सफलता पायी है। कालचक्रकी गति अत्यन्त तीव्र है और मानव-क्षमता कितनी सीमित !' देवराज मुसकराये।
उन्होंने कहा- 'चिन्ता न करो वत्स ! मैं तुम्हारी ज्ञान-निष्ठासे प्रसन्न हूँ। सामनेकी ओर देखो।'
अत्यन्त उन्नत शिखरवाले तीन पर्वत खड़े थे। उनसे
प्रतिफलित होनेवाले तेज-प्रकर्षसे आँखें चौंधिया रही थीं। पुनः देवराजने एक मुट्ठी धूल हाथमें लेकर, भरद्वाजसे प्रश्न किया- वत्स! मेरी मुट्ठीमें क्या है?
ऋषिने हँसते हुए उत्तर दिया- 'भगवन् ! मेरी तुच्छ बुद्धिके अनुसार आपकी मुट्ठीमें तो थोड़ी-सी धूलमात्र है। वैसे महात्माओंके निगूढ अभिप्रायको भला मैं कैसे जान सकता हूँ!'
इन्द्रने समर्थन किया- 'साधु वत्स ! मेरी मुट्ठीमें थोड़ी-सी धूलमात्र है। उत्तुंग पर्वतोंकी तुलनामें यह नगण्य-सी है। इसी प्रकार तुम्हारा अद्यावधिपर्यन्त अर्जित ज्ञान अत्यल्प है। ज्ञानकी कोई सीमा नहीं, उसका कोई अन्त नहीं,'
'अनन्ता वै वेदाः - 'वेद अनन्त हैं।
(तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।१०।११।४)
श्रीमते विद्यानन्द योगिने परमात्मने ।
रक्तशुक्ल प्रभामिश्रतेजसे गुरुवे नम:।।
।।श्रीहरि:।।
भगवादाश्रित,
पू. पा. श्री श्रीकान्त श्रीजी महाराज
साहित्य तीर्थ, वेदान्त भूषण